मंगलवार, 27 जनवरी 2015

माननियों की शिक्षा का हो इंतजाम

 अ कसर यह बहस खड़ी की जाती है कि विधायक-सांसद बनने के लिए भी न्यूनतम योग्यता तय होनी चाहिए। इंजीनियर बनने के लिए इंजीनियरिंग की पढ़ाई जरूरी है, डॉक्टर बनने के लिए एमबीबीएस, एमडी सहित अन्य डिप्लोमा अनिवार्य हैं, शिक्षक बनने के लिए भी मापदण्ड तय हैं लेकिन ऐसा क्यों है कि विधायक-सांसद बनने के लिए किसी प्रकार की शैक्षणिक योग्यता अनिवार्य नहीं है। ऐरा-गैरा नत्थूखेरा, कोई भी, अंगूठाछाप भी, विधानसभा से लेकर देश के सर्वोच्च सदन संसद में प्रवेश पा जाता है। न्यूनतम योग्यता क्यों तय नहीं की जाती? जवाब में अमूमन यही कहा जाता है कि शैक्षणिक योग्यता अलग है और मुद्दों की समझ अलग बात है। राजनेता के पास कागज की डिग्रियों से अधिक मानवीय संवेदनाओं का होना जरूरी है। राजनीति में आने के लिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि नेता अपने क्षेत्र, परिवेश और देश-प्रदेश की नब्ज को पहचानता हो। नेता बनने के लिए जरूरी है कि वह लोगों की समस्याओं को समझता हो। कुछ हद तक यह सही बात भी है कि शैक्षणिक योग्यता से ही समझदारी और संवेदनाएं नहीं आती हैं। जिन्दगी असल पाठ खुद ही पढ़ा देती है। राजनीति में अधिक कारगर वह आदमी है जो संवेदनशील है, न कि उच्च शिक्षित मशीनी आदमी। यूपीए सरकार की कैबिनेट में दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों से उच्चतम शिक्षा प्राप्त मंत्री शामिल थे, लेकिन क्या उनकी शैक्षणिक योग्यता का देश को लाभ मिला? बीती सरकार का कार्यकाल देखें तो पढ़े-लिखे लोगों ने देश का अधिक बेड़ागर्ग किया। लेकिन, इस सबके बावजूद अनेक मौकों पर नेताओं की टिप्पणी, उनके क्रियाकलाप और उनके विचार-चिंतन को देखकर लगता है कि माननियों की शिक्षा का कुछ तो इंतजाम होना चाहिए। ज्यादा वक्त नहीं बीता जब राजनीतिक पार्टियां अपने कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण का पूरा ध्यान रखती थीं। चिंतन शिविर, राष्ट्रीय अधिवेशन, प्रादेशिक कार्यकर्ता प्रशिक्षण कार्यशालाओं का आयोजन पार्टियां अपने स्तर पर किया करती थीं, ताकि उनके कार्यकर्ता अधिक संवेदनशील और जागरूक बन सकें। लोक जीवन में आने के लिए किस प्रकार का व्यवहार जरूरी है, इन प्रशिक्षण शिविरों में राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सिखाया जाता था। हाल के कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति और राजनेताओं का जैसा चरित्र सामने आया है, उसे देखकर समाज का प्रबुद्ध वर्ग चिंतित है। अपने समय के सर्वाधिक लोकप्रिय राजपुरुष और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह राजनीतिक बदलाव की शुरुआत की है, उससे आशा की उम्मीद बंधी है। लगता है कुछ सार्थक परिवर्तन की बात की जा सकती है। इसलिए यह बहस और अधिक ताकत से खड़ी होने की कोशिश में है कि माननियों के शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था तय होनी चाहिए। 
       माननीय अपने परिवेश, अपने प्रदेश और अपने देश के प्रति कितने जागरूक हैं? समसामयिक घटनाओं को लेकर उनका कैसा चिंतन है? सामाजिक क्षेत्र में हो रहे सद्प्रयासों पर उनकी कितनी पैनी नजर है? यह बताने के लिए मध्यप्रदेश के माननियों का उदाहरण संभवत: सबसे सही होगा। बचपन बचाओ आंदोलन के पुरोधा और सर्वेसर्वा कैलाश सत्यार्थी को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार मिलने की घोषणा हुई। कैलाश सत्यार्थी चूंकि मध्यप्रदेश के विदिशा जिले के निवासी हैं, इसलिए पत्रकारों ने मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्यों से इस पर प्रतिक्रिया लेनी चाही। युवा पत्रकार सुधीर दण्डौतिया ने भाजपा के एक मंत्री से सवाल पूछा कि मध्यप्रदेश के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है? उन माननीय के लिए तो एकमात्र कैलाश ही इस दुनिया में हैं, वह हैं भाजपा नेता कैलाश विजयवर्गीय। मंत्री ने चट से जवाब दिया- 'हमें खुशी है। हमारे नेता हैं। उनको तो नोबेल पुरस्कार मिलना ही था। उन्होंने इंदौर में बहुत काम कराया है। हरियाणा विधानसभा चुनाव में अभूतपूर्व जीत पार्टी को दिलाई है। नोबेल पुरस्कार मिलने पर उन्हें बहुत बधाई।' टीवी पत्रकार श्री दण्डौतिया ने उन्हें समझाने का प्रयास भी किया लेकिन वे कहां किसी की सुनते। खैर, पत्रकारों को एक बढिय़ा खबर हाथ लग गई। फिर क्या था, अलग-अलग चैनल और अखबारों के पत्रकारों ने विधानसभा भवन से बाहर निकल रहे मंत्री-विधायकों को पकड़-पकड़ कर पूछना शुरू किया- 'कैलाश जी को नोबेल पुरस्कार मिला है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे? ' धड़ाधड़ कैलाश विजयवर्गीय की प्रशंसा में जवाब आने शुरू हो गए। यह स्थिति ऐसी पार्टी (भाजपा) के नेताओं की थी, जो खुद को 'औरों से अलग' मानकर चलती है। जिसके नेताओं से अपेक्षा की जाती है कि वे पढ़ते-लिखते भी हैं। उनकी अपनी एक विचारधारा है। हालांकि कांग्रेस सहित दूसरे दल के नेता भी पीछे नहीं रहे। उन्होंने कहा कि अब तो केन्द्र और राज्य दोनों में भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। झूठे पुरस्कार लेकर आना उनके लिए कोई बड़ी बात नहीं है। कैलाश जी अच्छे नेता हैं लेकिन फिर भी वे नोबेल पुरस्कार के लायक नहीं हैं। अब सोचिए क्या यह सवाल वाजिब नहीं हो जाता कि माननियों को शिक्षा की जरूरत है। दुनियाभर के इलेक्ट्रोनिक चैनल्स और अखबार पाकिस्तान की मलाला और भारत के कैलाश सत्यार्थी को नोबेल पुरस्कार मिलने के समाचारों, विश्लेषणों और शुभकामनाओं से भरे पढ़े थे, तब भी हमारे माननीय बेखबर थे। ऐसे में इनसे कैसे अपेक्षा की जाए कि आमजन के सरोकारों को लेकर जागरूक रहते होंगे। 
      सदन में किस तरह का व्यवहार अपेक्षित है, इसकी भी जानकारी शायद इन्हें न हो। तभी तो सदन में जूता-चप्पल, कुर्सी, मिर्च पाउडर फेंकने की घटनाएं हमारे सामने आती हैं। संभवत: हमारे माननीय यह मानकर चलते हैं कि सदन होता ही इसलिए है। कर्नाटक विधानसभा के सदस्य तो दो-चार कदम और आगे तक निकल गए हैं। उन्होंने तो विधानसभा भवन को अश्लील फिल्म देखने का अड्डा बना दिया। सदन में चल रही गंभीर बहस के बीच कोई पोर्न फिल्म देख रहा है तो कोई प्रियंका गांधी के ग्लैमर को नजदीक से देखने के लिए उसका चित्र बार-बार जूम करके देख रहा है। जिन माननियों को इन सब काम में रुचि नहीं हैं, वे बेफिक्र होकर खर्राटे ले रहे होते हैं। खुले आम सदन में सो रहे माननियों से कैसे अपेक्षा की जाए कि ये जागरूक हैं, देश की समस्याओं के हल के लिए इन्होंने व्रत लिया है। क्यों नहीं माना जाए कि सदन में बैठकर आपत्तिजनक गतिविधियों से संलिप्त माननियों के दिमाग में गंदगी भरी होगी? फिर गंदे दिमाग कैसे समाज को स्वच्छ करेंगे? एक बार निर्वाचित होने के बाद जब माननियों को कुछ समझ नहीं आता तो लोकप्रिय होने के लिए, खबरों में बने रहने के लिए, न्यूज चैनल पर छाए रहने के लिए ऊल-जुलूल बयान देना ही इनका प्रिय काम हो जाता है। हकीकत यह है कि यदि कोई जिम्मेदार राजनेता हो तो उसके लिए देश में इतना काम है कि उसे सांस लेने की फुरसत न मिले। लेकिन, हमारे कई माननियों का कार्य-व्यवहार देखकर तो लगता है कि देश में करने के लिए अब कुछ काम ही शेष नहीं है।  
       लोकतंत्र जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए शासन व्यवस्था है। लोकतंत्र में प्रत्येक व्यक्ति को समान अधिकार प्राप्त हैं। सबकी हैसियत एक वोट की है। प्रत्येक नागरिक चुनाव में खड़ा हो सकता है, चुनाव जीतकर विधानसभा-संसद जा सकता है। इसे लोकतंत्र की खामी न माना जाए। यह तो लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन, जिस तरह से समाज ने समय की मांग को देखते हुए पुरानी शासन व्यवस्थाओं में फेरबदल किए, उसी तरह अब भी कुछ बदलाव तो लाए ही जा सकते हैं। चुनाव लडऩे की आजादी सबको हो लेकिन उसके लिए निर्धारित योग्यता होना अनिवार्य कर दी जाए। इससे लोकतंत्र का कुछ बिगड़ेगा नहीं बल्कि कुछ तो सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे ही। इससे भी आगे बढ़ा जा सकता है। चूंकि सरकार में अलग-अलग मंत्रालय हैं। जिन माननियों को ये मंत्रालय सौंपे जाएं, जरूरी नहीं कि उन्हें उसकी समझ हो। ऐसे में क्यों न नई सरकार के गठन पर मंत्री-सांसदों का प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाएं। वर्तमान में भी यह व्यवस्था है लेकिन प्रभावी नहीं है। उसे प्रभावी बनाया जाना चाहिए। प्रशिक्षण कार्यशाला में जनप्रतिनिधि अनिवार्य रूप से शामिल हों, इसे सुनिश्चित किया जाना जरूरी है। ताकि वे संसदीय कार्यवाही की प्रणाली को, अपने विभाग की कार्यप्रणाली को, संबंधित मंत्रालय की चुनौतियों को समझ सकें। ताकि उन्हें यह पता चल सके कि उन्हें क्या काम करने हैं। ताकि उन्हें समझ आए कि उन्हें कहां अपनी ऊर्जा बर्बाद नहीं करनी है? यह जिम्मेदारी अकेले सरकार की नहीं है। पार्टियों को भी अपने स्तर पर यह चुनौती स्वीकार करनी होगी कि जिन कार्यकर्ताओं को वे आगे बढ़ा रहीं हैं, उनकी योग्यता को भी बढ़ाएं। चुनाव जरूरी लोकप्रियता के बूते जीते जा सकते हैं लेकिन चुनाव जीतने के लिए जनता को जो सपने दिखाए हैं, उन्हें पूरा करने के लिए तो काबिलियत ही काम आने वाली है। पार्टी संगठनों को सोचना होगा कि विधायक-सांसद-मंत्री जब अर्मादित, हास्यास्पद और मूर्खतापूर्ण व्यवहार करते हैं तो बदनामी सिर्फ माननियों की नहीं होती बल्कि पार्टी का चरित्र भी गिरता है। पार्टी की भूमिका माता-पिता की तरह है। उनका बेटा (कार्यकर्ता) जैसा व्यवहार करेगा, उसका प्रतिसाद माता-पिता (पार्टी-संगठन) को ही मिलेगा। अच्छा व्यवहार करेगा का यश मिलेगा और बुरा व्यवहार करेगा तो ताने मिलेंगे कि जरूरी माता-पिता (पार्टी-संगठन) ने अच्छे संस्कार नहीं दिए होंगे। जरूर उनके घर में भी ऐसा ही माहौल होगा। नरेन्द्र मोदी के आने से भारतीय राजनीति में आई बदलाव की इस बयार के बीच हर कोई यह अपेक्षा कर रहा है कि शायद अब माननीय 'शिक्षित' हो जाएंगे।

बुधवार, 14 जनवरी 2015

३१वां वसंत

आज जीवन के ३१ वसंत पूरे हुए। जीवन का यह साल बहुत कुछ लेकर आया। थोड़ा संतुष्ट हूं इस साल की उपलब्धियों को लेकर। बहुत-कुछ काम हुआ। सामाजिक दायरा भी बड़ा। नए मित्र भी बने। यह एक पड़ाव था। अब आगे का सफर शुरू करना है। सुखद बात यह है कि मेरे जीवन में अच्छे लोगों की बाढ़ आ गई है। इसलिए आगे के सफर की अधिक चिंता नहीं है। सही राह दिखाने के लिए मेरे पास अच्छे मार्गदर्शक हैं और ढेर सारी हिम्मत देने के लिए शानदार दोस्त भी हैं। आप सबके साथ के लिए धन्यवाद। यूं ही सदैव आपका स्नेह मिलता रहे। 






सोमवार, 12 जनवरी 2015

शिक्षा नीति में दिखे विवेकानन्द का चिंतन

 यु वा नायक स्वामी विवेकानन्द को याद करते ही बुद्धि, हृदय और शरीर में ऊर्जा का संचार होने लगता है। स्वामी विवेकानन्द सबके प्रेरणा स्रोत हैं। लेकिन, युवाओं के तो वे हृदय सम्राट हैं। यही कारण है कि उनकी जयंती (१२ जनवरी) युवा दिवस के रूप में मनाई जाती है। देश की वर्तमान परिस्थितियों के हिसाब से देखें तो स्वामी विवेकानन्द, उनके विचार, उनका चिंतन, उनकी सीख आज बहुत प्रासंगिक हैं। दरअसल, भारत दुनिया का सबसे युवा देश है। निकट भविष्य में हम और अधिक जवां होंगे। लेकिन, क्या ये तरुणाई हमारी ताकत बन सकेगी? यह बड़ा प्रश्न है। ये तरुणाई देश को शक्ति तभी दे सकेगी जब इनकी आस्था भारत में होगी। फिर एक सवाल उठता है कि क्या आज की शिक्षा नीति ऐसी है कि जिससे युवाओं में राष्ट्र के प्रति श्रद्धा के भाव जागृत होते हैं? समर्पण की बात आती है? 'राष्ट्र सबसे पहले' यह भाव जागृत होता है क्या? यही नहीं, क्या हम अपनी तरुणाई को राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप शिक्षित कर रहे हैं? हमारी शिक्षा नीति क्या राष्ट्र के उद्देश्य के अनुरूप है? स्वामी विवेकानन्द ने जिस मैन मेकिंग एजुकेशन की बात कही है, क्या आज की शिक्षा नीति वैसी है? आज की शिक्षा विद्यार्थी को मनुष्य बनाने की प्रक्रिया की ओर ले जाती है या पैसा कमाने की मशीन बनाने का प्रयास करती है। स्वामी विवेकानन्द अर्थवादी शिक्षा व्यवस्था का कड़ा विरोध करते थे लेकिन, आज की शिक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह अर्थ आधारित होकर रह गई है। क्या इस अर्थवादी शिक्षा नीति से हम अपने राष्ट्र को फिर से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी बना सकेंगे? मैकाले की शिक्षा पद्धति का उद्देश्य मनी मेकिंग, पैसा बनाने की शिक्षा देना था और स्वामी विवेकानन्द की शिक्षा का उद्देश्य मैन मेकिंग, व्यक्ति निर्माण था। हमें मैकाले की शिक्षा नीति पर आगे बढऩा चाहिए या फिर स्वामी विवेकानन्द के विचारों को भारत की शिक्षा नीति में शामिल करना चाहिए? यदि हम सही अर्थों में भारत निर्माण करना चाहते हैं, भारत को शिक्षा के क्षेत्र में दुनिया का नेतृत्व करते हुए देखना चाहते हैं तो भारत की शिक्षा नीति में स्वामी विवेकानन्द के विचारों का समावेश होना ही चाहिए। शिक्षा नीति में परिवर्तन समय की मांग है और यह परिर्वतन स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा संबंध उपदेशों को ध्यान में रखकर होना चाहिए। 
       स्वामी विवेकानन्द ने शिक्षा पर बहुत बल दिया था। उनका स्पष्ट मानना था कि भारत का सबसे अधिक नुकसान किसी ने किया है तो वह अशिक्षा ने किया। चंद लोगों के मस्तिष्क तक शिक्षा के सीमित रह जाने से भी भारत का अनिष्ट हुआ है। इस संबंध में २४ अप्रैल १८९७ को 'भारती' की सम्पादक सरला घोषाल को दार्जिलिंग से लिखे उनके पत्र को देखना होगा। स्वामीजी लिखते हैं- 'भारत के सत्यानाश का मूल कारण यही है कि देश की सम्पूर्ण विद्या-बुद्धि राजशासन और दम्भ के बल से केवल मुट्ठीभर लोगों के अधिकार में रखी गई है। यदि हमें फिर से उन्नति करनी है, तो हमको उसी मार्ग पर चलना होगा अर्थात् जनता में विद्या का प्रचार करना होगा।' सम्पूर्ण भारत को शिक्षित करने का चिंतन जब स्वामी विवेकानन्द करते हैं तो वे प्रत्येक उपाय पर विचार करते हैं। गांव-गांव, नगर-नगर घूम रहे साधु और संन्यासियों को भी वे उनका मूल काम याद दिलाने का प्रयास करते हैं। भारत को शिक्षित करने के अपने संकल्प को पूरा करने के लिए वे इन्हें शिक्षा अभियान से जोडऩे की बात करते हैं। स्वामी विवेकानन्द ने २३ जून १८९४ को शिकागो से मैसूर के महाराजा को पत्र लिखा कि मान लीजिए महाराज आपने हरएक गांव में एक नि:शुल्क पाठशाला खोल दी, तो भी इससे कुछ काम न होगा। क्योंकि, भारत में इतनी अधिक गरीबी है कि गरीब लड़के पाठशाला आने की बजाय खेतों में अपने माता-पिता को मदद देना या दूसरे किसी उपाय से रोटी कमाने का प्रयत्न करना अधिक पसंद करेंगे। यदि पहाड़ मुहम्मद के पास न आये, तो मुहम्मद ही पहाड़ के पास क्यों न जाय? यदि गरीब लड़का शिक्षा के मन्दिर तक न आ सके, तो शिक्षा को ही उसके पास जाना चाहिए। हमारे देश में हजारों एकनिष्ठ और त्यागी साधु हैं, जो गांव-गांव धर्म की शिक्षा देते फिरते हैं। यदि उनमें से कुछ लोग सुनियन्त्रित रूप से ऐहिक विषयों के भी शिक्षक बनाये जाएं तो गांव-गांव, दर-दर जाकर वे केवल धर्मशिक्षा ही नहीं देंगे, बल्कि ऐहिक शिक्षा भी दिया करेंगे। 
      ऐहिक शिक्षा के साथ ही धर्मशिक्षा पर भी स्वामी जी का जोर था। वे विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ अध्यात्म की शिक्षा को भी अनिवार्य मानते थे। शिक्षा के विषय में समय-समय पर दिए गए उनके विचारों से यह परिलक्षित होता था। तीन जनवरी १८९५ को शिकागो से सर एस. सुब्रह्मण्य अय्यर को पत्र में स्वामी विवेकानन्द लिखते हैं- 'बहुत सोच-विचार के बाद मेरे मन ने तय किया है कि पहले मद्रास में धर्मशिक्षा के लिए एक विद्यालय खोलना ठीक होगा, फिर इसका कार्यक्षेत्र धीरे-धीरे बढ़ाया जाएगा। नवयुवकों को वेदों, विभिन्न भाष्यों और दर्शनों की पूरी शिक्षा देनी होगी, जगत् के अन्य धर्मों का ज्ञान भी इसमें शामिल होगा।' लेकिन, हमने क्या किया? शिक्षा को धर्मविहीन कर दिया। सेकुलरिज्म के चक्कर में फंस कर हमने स्वामी विवेकानन्द के विचारों को खूंटी पर टांग दिया। शिक्षा को नैसर्गिक नहीं रहने दिया। यही कारण है कि आज अभिभावक, शिक्षक, राजनेता और प्रबुद्ध वर्ग मूल्य आधारित शिक्षा की जरूरत महसूस कर रहे हैं। समाज की 'गति' देखकर धर्मविहीन, मूल्यहीन, असंवेदनशील शिक्षा में परिवर्तन की बात हर कोई कर रहा है। स्वामी विवेकानन्द के लिए धर्म अंग्रेजी का शब्द 'रिलीजन' नहीं था। स्वामीजी ने धर्म की व्याख्या उन नियमों और संहिताओं के रूप में की, जो प्रकृति में करोंड़ों वर्षों से प्रचलित हैं। इसलिए देश की तथाकथित सेकुलर बिरादरी को धर्मशिक्षा की बात से बिदकने की जरूरत नहीं है। स्वामी विवेकानन्द ने बार-बार बल दिया है कि धर्म ही भारत की आत्मा है। उन्होंने कहा है -'मैं धर्म को शिक्षा का सबसे आंतरिक सारतत्व मानता हूं।' धर्मविहीन वर्तमान शिक्षा मनुष्य को डॉक्टर, इंजीनियर, टेक्नोक्रेट, ब्यूरोक्रेट आदि बनने के लिए प्रेरित करती है। जबकि वास्तव में मनुष्य की शिक्षा का उद्देश्य स्वयं को पहचानने का होना चाहिए। यूनेस्को ने भी शिक्षा पर प्रकाशित अपनी रिपोर्ट का शीर्षक दिया था- 'कुछ होने के लिए सीखना, न कि कुछ बनने के लिए सीखना।' स्वामीजी भी बार-बार कहते रहे कि विद्यार्थी को कुछ बनाने की जरूरत नहीं है। उसके भीतर सबकुछ है, बस उसे बाहर आने दो। 
      यह बात जग जाहिर है कि एक समय में भारत शिक्षा के क्षेत्र में सबसे आगे था। भारत में विश्वविद्यालय जैसे संस्थाएं थीं, जिनमें शिक्षा प्राप्त करने के लिए दुनियाभर से विद्यार्थी आते थे। नगरों में ही नहीं ग्रामीण क्षेत्रों में भी पाठशालाएं थीं, यह बात प्रसिद्ध गांधीवादी विचारक धर्मपाल ने भी अपने शोध से प्रमाणित की है। धर्मपाल ने अपनी पुस्तक 'अ ब्यूटीफुल ट्री' में बताया है कि अंग्रेजों के सर्वे के मुताबिक १८वीं सदी में भारत में लाखों की संख्या में स्कूल थे। भारतीयों ने चिंतन, अध्यात्म, सामाजिक विज्ञान, अर्थशास्त्र, कला ही नहीं परंतु विज्ञान के क्षेत्र में भी अभूतपूर्व उपलब्धियां अर्जित की थीं। मैकाले की शिक्षा नीति के प्रभाव में आकर भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में अपना नेतृत्व तो खोया ही, स्वाभिमान भी खो दिया। स्वामी विवेकानन्द लगातार भारतीयों से आग्रह करते रहे कि अपने तईं भेड़-बकरी होने का भ्रम दूर करो। खुद को पहचानो, तुम सिंह हो, अमृत के पुत्र हो। अत्यंत अल्पायु में बहुत कुछ मार्गदर्शन देकर स्वामीजी चले गए। अब उनके मार्गदर्शन पर आगे बढऩे का काम हमारा होना चाहिए। हमारे शिक्षाविदों के सामने ऐसी शिक्षा नीति बनाने की चुनौती है, जिसमे बूते फिर से हम शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी हो जाएं। लेकिन, शिक्षा नीति तय करने से पहले यह जान लेना जरूरी होगा कि स्वामी विवेकानन्द असल में शिक्षा किसे मानते थे? स्वामी विवेकानन्द देवघर (वैद्यनाथ) से २३ दिसम्बर १९०० को एक बंगाली महिला को पत्र में लिखते हैं कि आखिर शिक्षा क्या है? क्या वह केवल कुछ पुस्तकों का पठन-पाठन ही है? नहीं। फिर क्या विविध विषयों का ज्ञान? वह भी नहीं है। शिक्षा तो वह है, जिसके सहारे इच्छाशक्ति का प्रवाह एवं उसकी अभिव्यक्ति संयत की जाती है। अब यह विचार कीजिए कि क्या वह शिक्षा कहलाने के योग्य है, जिसके फलस्वरूप इच्छाशक्ति पीढिय़ों से बलपूर्वक अनवरत अवरुद्ध होकर आज मृतप्राय हो रही है। जिसके प्रभाव से नवीन विचारों की कौन कहे, पुराने तक एक-एक करके विलुप्त होते जा रहे हैं? क्या वह शिक्षा है, जो धीरे-धीरे मनुष्य को मशीन बना दे रही है? मेरे विचार से यंत्रवत् अच्छे होने की अपेक्षा स्वतन्त्र इच्छा और बुद्धि द्वारा प्रेरित होकर एक बार गलती भी कर लेना अधिक श्रेयस्कर है। 
     बहरहाल, स्वामी विवेकानन्द के विचार-दर्शन से होकर गुजरते हैं तो यह स्पष्ट होता है कि उनके विचारों का प्रमुख केन्द्र जीविकोपार्जन की शिक्षा, तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा नहीं था, वे सबसे पहले व्यक्ति के अंदर निहित क्षमताओं को उजागर करने की शिक्षा देना चाहते थे। वे तकनीकी ज्ञान और विज्ञान की शिक्षा के साथ-साथ चरित्र निर्माण की शिक्षा पर अधिक बल देते थे। शिक्षा के संबंध में उनका महत्वपूर्ण कथन है - 'शिक्षा मनुष्य में निहित सम्पूर्णता की अभिव्यक्ति है।'

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

धर्मान्तरण रोधी कानून से किसके पेट में दर्द

 ध र्मान्तरण पर हिन्दू संगठनों खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को पानी पी-पीकर गाली दे रहे तथाकथित सेक्यूलरों ने शायद इतिहास के पन्ने नहीं पलटे। वैसे भी ये 'सेक्यूलर जमातें' तो इतिहास को अपने हिसाब से रचने के लिए कुख्यात हैं। यदि इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन 'सेक्यूलरों' ने किया होता तो संभवत: ये मतान्तरण जैसा लांछन हिन्दू धर्म पर लगाने की हिमाकत न कर पाते। बहरहाल, सेक्यूलर जाति तो हिन्दू धर्म पर प्रश्न चिह्न लगाने, राष्ट्रवादी विचार को कोसने, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी को खलनायक साबित करने के मौके खोजने का ही काम करती रहती है। आगरा में कुछ मुसलमानों के हिन्दू बनने की घटना तो इनके लिए वियाग्रा की खुराक साबित हो रही है। उनसे रहा नहीं जा रहा। वे उछल-उछलकर हिन्दू समाज और हिन्दू संगठनों का मुंह नोंचना चाह रहे हैं। आगरा की घटना से करीब दो माह पूर्व मध्यप्रदेश के शिवपुरी में संयुक्त परिवार को मुसलमान बना लिया गया था। ग्वालियर और भोपाल के समाचार पत्रों ने इस घटना को प्रकाशित भी किया लेकिन इन ढकोसलावादी सेक्यूलरों ने ऐसी ऊर्जा तब नहीं दिखाई थी। क्या तब धर्मान्तरण की घटना ठीक थी? क्या वर्षों से होता आ रहा हिन्दुओं का धर्मान्तरण जायज है? कभी तलवार के दम पर तो कभी प्रलोभन और धोखा देकर हिन्दुओं को मुसलमान-ईसाई बना लेना ठीक है? क्या यह सेक्यूलरों का दोहरा चरित्र नहीं है? क्या इसे मनुष्यों के बीच बैर भाव बढ़ाने की मानसिकता नहीं माना जाना चाहिए? निश्चित ही हिन्दुओं के मन में यह बात उठती है कि ये तथाकथित बुद्धिजीवी सदैव उन्हें बेइज्जत करने का अवसर खोजते रहते हैं।  
        अपने इस लेख से आगरा की घटना को सही ठहराने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। धर्मान्तरण अगर प्रलोभन देकर किया गया है तो यह निन्दनीय है। अपने इतिहास से सबक लेकर अब तो सरकारों को जाग जाना चाहिए। इस तरह की घटना दोबारा न घटे, इसके ठोस उपाय किए जाने चाहिए। आगरा की घटना से जन्मी बहस को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की जरूरत है। एक तो, तथाकथित सेक्यूलरों के चेहरे से नकाब एक बार फिर हट गए हैं। जनता जान गई है उन लोगों को जो धर्मान्तरण जैसी बीमारी को भी चयनित दृष्टिकोण से देखते हैं। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस बीमारी का इलाज खोजने की बहस ने जोर पकड़ लिया है। धर्मान्तरण पर मचे हो-हल्ला के बीच धर्मान्तरण रोधी कानून बनाए जाने की मांग जोर-शोर से उठने लगी है। धर्मान्तरण रोधी कानून बनाने की मांग से इन सेक्यूलरों की स्थिति भी खराब हो गई है। क्योंकि इनका असल मकसद हंगामा खड़ा करना था। जिन हिन्दू संगठनों पर प्रलोभन देकर जबरन धर्मान्तरण का आरोप लगाया जा रहा था, उन्होंने ही धर्मान्तरण को सामाजिक बुराई बताकर उसे रोकने के लिए कानून बनाने की अपील सरकार से की है। इसके बाद से सेक्यूलर जमातें अपनी बगलें झांक रही हैं। भारतभूमि को एक रंग में रंगने का ख्वाब पालकर यूरोप और अरब के इशारे पर हिन्दुओं के धर्मान्तरण में लिप्त साम्प्रदायिक ताकतों में भी उथल-पुथल मच गई है। दूध का दूध, पानी का पानी हो गया है। देश को साफ नजर आ रहा है कि धर्मान्तरण से असल में कौन पीडि़त है, किसे लाभ है और धर्मान्तरण रोधी कानून की मांग पर पेट किसका दुखने लगा है। अब कुछ छिपा नहीं है। 
      धर्मान्तरण की समस्या से भारत बुरी तरह पीडि़त है। धर्मान्तरण समूची मानव जाति के लिए खतरा है। इतिहास गवाह है कि धर्मान्तरण की आग में कई जातियां खाक हो चुकी हैं। हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई गहरी होने का एक बहुत बड़ा कारण जबरन धर्मान्तरण रहा है। औरंगजेब की तरह कुछ धर्मान्ध शासकों ने तलवार से इतने जनेऊ काटे कि दो कौमों के बीच खून की लकीर खिंच गई। गुरु तेगबहादुर के बलिदान की कीमत पर भी धर्मान्तरण रुका नहीं। रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'संस्कृति के चार अध्याय' में लिखा है- 'इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं? ' अंग्रेजी राज का संरक्षण पाकर चर्च ने भी सम्प्रदायों के बीच वैमनस्य बढ़ाया है। यहां तक कि ईसाई बनाने के लिए एक ही सम्प्रदाय के लोगों में ऊंच-नीच की भावना को खड़ा कर दिया। ईसाई मिशनरीज ने बड़ी चालाकी से जोर-शोर से मतान्तरण का खेल खेला। मध्यप्रदेश में ईसाई मिशनरियों की गतिविधियों का अध्ययन करने के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित नियोगी कमीशन की रिपोर्ट वर्ष १९५७ में प्रकाशित हुई थी। रिपोर्ट से उजागर हुए ईसाई मिशनरीज के खेल ने देश में हलचल पैदा कर दी थी। रिपोर्ट से यह स्पष्ट हो गया था कि ईसाई मिशनरियों ने स्कूल, अस्पताल और अनाथालयों का निर्माण गरीब भारत की सेवा के लिए नहीं किया है। ईसाई मिशनरीज का तो एक मात्र उद्देश्य है, सेवा की आड़ में धोखाधड़ी से गरीब लोगों का धर्मान्तरण करना। धर्म परिवर्तन के उद्देश्य से भारत आए ईसाई मिशनरीज की चालाकियों को हमारे महापुरुष काफी पहले समझ चुके थे। स्वामी विवेकानन्द ने तो शिकागो में आयोजित धर्म संसद में ईसाई मिशनरीज की गतिविधियों पर तीखा कटाक्ष किया था। उन्होंने कहा कि भारत में धर्म बांटने की जरूरत नहीं है, धर्म तो वहां विपुल मात्रा में फैला हुआ है। दुनिया को अहिंसा का अनोखा पाठ पढ़ाने वाले और सभी धर्मों का समान रूप से आदर करने वाले महात्मा गांधी को भी ईसाई मिशनरीज की इन करतूतों से सख्त एतराज था। गांधीजी धर्मान्तरण को भारत के लिए गलत मानते थे। वे इसके खिलाफ थे। ईसाई मिशनरीज के अनैतिक कृत्य देखकर गांधीजी को यह कहने के लिए मजबूर होना पड़ा- 'भारत में तथा अन्यत्र जिस ढंग से मिशनरियों द्वारा लोगों का धर्मान्तरण किया जा रहा है, उसे किसी भी तरह से उचित मान सकना मेरे लिए असम्भव है। यह एक ऐसी भूल है जो संसार के शान्ति-पथ पर अग्रसर होने में कदाचित् सर्वाधिक बाधक है। किसी विशेष पद्धति पर आग्रह रखना या किसी विशेष मजहबी मान्यता को बार-बार दोहराना ऐसे उग्र झगड़ों का कारण बन सकता है, जिससे अन्त में भीषण रक्तपात मच जाए।' उन्होंने यह भी कहा- 'जब तक ईसाइयत का प्रचार एवं धर्मान्तरण विश्व में जारी रहता है, विश्व में शान्ति कदापि नहीं हो सकती।' धर्मान्तरण जैसी प्रवृत्ति मानव जाति के लिए कितनी खतरनाक है, महात्मा गांधी के उक्त कथन से इसे आसानी के साथ समझा जा सकता है। उन्होंने धर्मान्तरण को तत्काल रोकने के संकेत भी अपने विचारों से दिए हैं। 
      तथाकथित बुद्धिजीवी अगर वास्तव में धर्मान्तरण को मानव सभ्यता के लिए खतरा मानते हैं, तो उन्हें सरकार के साथ खड़ा होना चाहिए। महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा छोड़कर आगरा की घटना पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का स्पष्टीकरण और फिर से ऐसी घटना न होने का आश्वासन चाह रहे विपक्षी दलों को भी धर्मान्तरण रोकने के लिए कानून बनाने की प्रक्रिया में सक्रियता के साथ सरकार के साथ चलना होगा। अल्पसंख्यकों के ठेकेदार यदि वास्तव में धर्मान्तरण से खतरा महसूस कर रहे हैं तो उन्हें भी धर्मान्तरण रोकने के लिए सख्त कानून बनाने के लिए सरकार के हाथ मजबूत करने होंगे। लेकिन, चयनित धर्मान्तरण को ही मानव सभ्यता के लिए खतरा मानने वाले सेक्यूलर, साम्प्रदायिक राजनीतिक दल और अल्पसंख्यकों के ठेकेदार संगठन क्या सरकार के साथ आएंगे? इनका अब तक का इतिहास और चाल-चरित्र तो यही बताता है कि ये सिर्फ हंगामा खड़ा करना जानते हैं। धर्मान्तरण रोकने का कानून बन गया तो विदेश से आ रहे अकूत धन-दौलत पर सुख भोगने का अवसर इनके हाथ से चला जाएगा। वर्ष १९७८ में जनता दल के सांसद ओमप्रकाश पुरुषार्थी ने निजी विधेयक लाकर धर्मान्तरण पर रोक लगाने की मांग की थी। सेवा की प्रतिमूर्ति कही जाने वाली मदर टेरेसा ने इस विधेयक का जमकर विरोध किया था। मदर टेरेसा का उद्देश्य सेवा करना था तो उन्हें धर्मान्तरण विरोधी कानून से क्या तकलीफ हो गई थी कि वे बौखला गईं। अन्य इस्लामिक और ईसाई संगठनों के प्रमुखों ने भी इस विधेयक का विरोध किया। भाजपा शासित केन्द्र सरकार ने जब से धर्मान्तरण रोकने के लिए कानून बनाने की बात की है तब से आगरा की घटना को आधार बनाकर धर्मान्तरण पर स्यापा कर रहे तमाम सेक्यूलर बुद्धिजीवियों को उल्टे दौरे पड़ गए हैं। कल तक धर्मान्तरण की घटनाओं का विरोध करने वाले अब धर्मान्तरण रोकने के लिए कानून बनाने की बात पर बौखलाए हुए हैं। लेकिन, इस सबके बीच यह सही समय है जब धर्मान्तरण जैसी गंभीर बीमारी का इलाज किया जा सकता है। केन्द्र सरकार को इस दिशा में जल्द ही ठोस कदम उठाना चाहिए। ताकि इंसान को हिन्दू, मुसलमान और ईसाई बनाने की जगह मुकम्मल इंसान बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जा सके। 

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

नायब नायक

 व्या वसायिक पत्रकारिता में रहकर निरन्तर करुणा, बुद्धि और विवेक के चिन्तन की परम्परा को आगे बढ़ा रहे हैं। आधुनिकरण के नाम पर जब देश-समाज अपना 'स्व-भाव' खो रहा है तब गुलाब कोठारी अपने नियमित स्तम्भ 'स्पंदन' और 'मानस' में लगातार भारतीय मूल्यों, परंपराओं और संस्कृति के संरक्षक के तौर पर निरन्तर लिखते हैं। अपनी लेखनी के साथ ही अपने कर्म-वचन से भी वे भारतीय संस्कृति के पैरोकार, अग्रदूत और हितचिंतक के रूप में दिखते हैं। उनकी संवेदनशीलता को पौत्री 'आद्या' को सम्बोधित करते हुए लिखी गईं कविताओं में अनुभूत किया जा सकता है। देश के शीर्ष दस समाचार-पत्र समूहों में शामिल 'राजस्थान पत्रिका समूह' के मालिक और प्रधान संपादक श्री कोठारी इतने सहज हैं कि किसानों के हित में सड़क पर उतर गए। मध्यप्रदेश भाजपा और भारतीय किसान संघ में जब संघर्ष हुआ तो समझौते के लिए गुलाब कोठारी ने प्रभावी भूमिका निभाई थी। राजस्थान पत्रिका समूह एक परिवार की तरह है और गुलाब कोठारी उसके मुखिया हैं। इस परिवार के छोटे-बड़े सभी सदस्य श्री कोठारी को 'बड़े भाईसाहब' कहकर सम्बोधित करते हैं। मालिक और कर्मचारी का संबंध कहीं गौण हो जाता है। 
       आजादी के दो बरस बाद 6 जनवरी, 1949 को जन्मे गुलाब कोठारी भारत के स्वाभिमान को देश-दुनिया में बढ़ा रहे हैं। आम आदमी के जीवन में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए गुलजारीलाल नंदा फाउण्डेशन उन्हें नैतिक सम्मान-2006 से नवाज चुका है। जबकि तिरुपति (आंध्रप्रदेश) स्थित ब्रह्मचारी आश्रम के आचार्य गुरुजी गुरुवानंदजी ने वर्ष 2007 में उन्हें राष्ट्र गौरव अवार्ड से सम्मानित किया। देश में जितना प्यार और सम्मान गुलाब कोठारी को मिलता है उतना ही मान उन्हें देश के बाहर भी मिलता है। इटली की ओकीदो जिक्कोकई मिक्यो योगा संस्थान उन्हें सम्मानित कर चुका है। नीदरलैण्ड की इंटरकल्चरल ओपन यूनिवर्सिटी ने 'समाचार-पत्र  का प्रबंधन' विषय पर पीएचडी करने वाले गुलाब कोठारी को 2002 में यही यूनिवर्सिटी 'दर्शनशास्त्र' में डीलिट की मानद उपाधि से नवाजती है। एक खास बात का जिक्र करना बेहद जरूरी है, जिससे हिन्दी और हिन्दी पत्रकारिता में उनके महत्वपूर्ण योगदान की तस्वीर सबके सामने आती है। गुलाब कोठारी की पहचान राजस्थान पत्रिका समूह के मालिक से अधिक एक सम्मानित पत्रकार और लेखक के रूप में है। गुलाब कोठारी की लिखी गईं पुस्तकें आम आदमी और समाज को तनाव भरे आज के जीवन में खुशियों के साथ संतुलित जीवन जीने की राह दिखाती हैं। वैदिक परम्पराओं की हामी भरती हैं।
      जिस दौर में पत्रकारिता मिशन को मीलों पीछे छोड़कर प्रोफेशन हो गई है। प्रोफेशन से भी आगे आकर मीडिया इडस्ट्री हो गई है तब मूल्य आधारित पत्रकारिता के प्रतिमान स्थापित कर रहे गुलाब कोठारी दरअसल राजस्थान पत्रिका के संस्थापक कर्पूर चंन्द्र कुलिश की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं। 
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"गुलाब कोठारी ने स्वतंत्रचेता, मौलिक एवं प्रबुद्ध विचारक-पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठा अर्जित की है। उनका समस्त लेखन अध्यात्म और आधुनिक जीवन मूल्यों से अनुप्रमाणित है। सामाजिक सरोकारों से जुड़े उनके पत्रकार कर्म ने कभी बाजारवादी ताकतों से समझौता नहीं किया।" 
- संजीव भानावत, मीडिया शिक्षक एवं लेखक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

वैचारिक योद्धा

 प्र ख्यात लोहियावादी-समाजवादी चिंतक राजकिशोर को क्रांतिकारी पत्रकार, लेखक और साहित्यकार कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा। अपने समय की राजनीति, पत्रकारिता, साहित्य और समाज व्यवस्था पर अपनी कलम को पैना करना और तमाम सवालों की खोज में उनके समाधान प्रस्तुत करते हुए नए सवाल खड़े करना सचमुच एक क्रांतिकारी कदम ही तो है। राजकिशोर द्वारा संपादित लोकप्रिय पुस्तक शृंखला 'आज के प्रश्न' इसका जीता-जागता उदाहरण है। इस शृंखला के अंतर्गत अब तक 17 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये पुस्तकें आज के प्रश्नों के उत्तर तो देती ही हैं साथ ही प्रत्येक विषय पर एक नई बहस जो जन्म भी देती हैं। 
      02 जनवरी 1947 को कलकत्ता में जन्मे राजकिशोर ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से बी.कॉम (ऑनर्स), एलएलबी और एमए (हिन्दी) किया। इतना पढ़-लिखने के बाद वे चाहते तो कहीं बेहतर स्तर पर शासन व्यवस्था का हिस्सा हो सकते थे। लेकिन, अगस्त 1977 में आनंद बाजार पत्रिका समूह द्वारा प्रकाशित प्रतिष्ठित हिन्दी साप्ताहिक 'रविवार' से उन्होंने अपने पत्रकारिता के सफर की शुरुआत की। 1986-87 में इत्यादी प्रकाशन से प्रकाशित हिन्दी साप्ताहिक 'परिवर्तन' का संपादन किया। नवभारत टाइम्स दिल्ली में 1990 से 1996 तक वरिष्ठ सहायक संपादक रहे। इसके बाद उन्होंने जुलाई 1996 से सितंबर 1998 तक प्रेस इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया की त्रैमासिक पत्रिका 'विदुर' में बतौर संयुक्त संपादक काम किया। उन्होंने फरवरी 1997 से फरवरी 1998 तक 'दूसरा शनिवार' और 1998 से इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज की मासिक पत्रिका 'पंचायती राज का अपडेट' का भी संपादन किया। 
      कुछ अलग, कुछ सार्थक, वर्तमान की समस्याओं को सुलझाने के साथ ही आने वाले भविष्य को भी कुछ राह दिखा सके, ऐसा कुछ रचने की खदबदाहट उनके मन को व्यथित कर रही थी। सक्रिय पत्रकारिता के बीच ही 1996 से स्वतंत्र पत्रकारिता एवं स्तम्भ लेखन की शुरुआत राजकिशोर ने कर दी थी। पत्रकारिता और लेखन के प्रति अपने समर्पण, मेधा और कठिन परिश्रम से उनके ख्वाब कुछ बुनते हुए नजर आए। राजकिशोर द्वारा लिखित और संपादित तमाम पुस्तकों से होकर ये ख्वाब हमारी आंखों में भी उतर रहे हैं। पत्रकारीय लेखन में उनकी सक्रियता को देखकर उम्मीद ही नहीं भरोसा है कि और भी कुछ सार्थक ख्वाब वे भविष्य के लिए बोएंगे। विचार-क्रांति की अलख जगाती उनकी कुछ चुनिंदा पुस्तक हैं - आजादी एक अधूरा शब्द है, एक अहिन्दू का घोषणा-पत्र, हिन्दी लेखक और उसका समाज, स्त्री-पुरुष : कुछ पुनर्विचार, उदारीकरण की राजनीति, समाजवाद का भविष्य, रोशनी कहां है और तुम्हारा सुख (उपन्यास)। 'जाति कौन तोड़ेगा' पुस्तक के लिए तो उन्हें हिन्दी अकादमी, दिल्ली की ओर से साहित्यिक कृति पुरस्कार भी प्रदान किया गया है। इसके अलावा लोहिया पुरस्कार (1988), हिन्दी अकादमी, दिल्ली द्वारा साहित्यकार सम्मान (1990), बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा राजेन्द्र माथुर पत्रकारिता पुरस्कार (1995) सहित अन्य सम्मान भी उनके माध्यम से हिन्दी पत्रकारिता को गौरवान्वित कर चुके हैं। 
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"साहित्य, राजनीति और पत्रकारिता में उनकी बराबर की गति है। उनका ज्यादा झुकाव सांस्कृतिक और साहित्यिक है।"   
- डॉ. विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

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