शनिवार, 7 नवंबर 2015

वैचारिक असहिष्णुता के शिकार मोदी

 'प्र धानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैचारिक असहिष्णुता के सबसे बड़े शिकार और सबसे ज्यादा पीडि़त हैं।' वित्तमंत्री अरुण जेटली ने देश के सामने यह प्रश्न खड़ा करके सबको विचार करने पर मजबूर कर दिया है। उन्होंने सीधा-सा सवाल भी बुद्धिवादियों से पूछ लिया है कि 'पिछले पंद्रह सालों से नरेन्द्र मोदी के साथ उनके विरोधी जिस तरह का व्यवहार कर रहे हैं, उस व्यवहार को किस श्रेणी में रखा जाए?' अचानक तेजी से बढ़ती कथित असहिष्णुता की बात कहकर बुद्धिवादियों ने जिस तरह की मुहिम चलाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा सरकार को घेरने का प्रयास किया है, उससे क्या समझा जाए? इस बात से कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि बढ़ती असहिष्णुता के नाम पर देश-दुनिया में भारत की छवि खराब करने वाले बुद्धिवादियों का समूह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से पूर्व से 'नफरत' की हद तक असहमत रहा है। 

       वर्ष 2002 में इन्होंने नरेन्द्र मोदी के खिलाफ लिखना-बोलना और आंदोलन करना शुरू किया था। लेकिन, तब से अब तक यह समूह नरेन्द्र मोदी को कहीं भी असहिष्णुता बढ़ाने के लिए दोषी सिद्ध नहीं कर सका है। न्यायापालिका में भी मोदी के खिलाफ कोई आरोप साबित नहीं हो सके हैं और जनता के बीच में भी मोदी को 'मौत का सौदागर' साबित नहीं किया जा सका है। बुद्धिवादियों के समूह के तमाम कुप्रचार के बाद भी जनता ने तीन-तीन बार गुजरात में नरेन्द्र मोदी को सिर-आँखों पर बैठाया और 2014 में विकास के लिए देश की सत्ता सौंप दी है। नरेन्द्र मोदी को अमरीका वीजा नहीं दे, इसके लिए तमाम मर्यादाएं लांघकर हमारे वामपंथी नेता-लेखक विदेशी सरकार के दरबार में पहुंच गए। भाजपा और मोदी चुनाव जीतकर केन्द्र की सत्ता में न आ जाएं, इसलिए इन्हीं बुद्धिजीवियों ने हस्ताक्षर अभियान चलाया था। 
       ये कितने असहिष्णु हैं, इसका प्रकटीकरण, 2014 के आम चुनाव के समय दिए गए इनके बयानों से भी जाहिर होता है- 'मोदी प्रधानमंत्री बना तो मैं देश छोड़कर चला जाऊंगा।' 'मोदी जीता तो काशी हार जाएगी।' इससे स्पष्ट है कि यह समूह नरेन्द्र मोदी और भाजपा की विचारधारा को किसी भी स्थिति में स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। भाजपा सरकार पर असहिष्णुता का आरोप लगाने वालों को यह भी देखना चाहिए कि वे कितने सहिष्णु हैं। वामपंथी विचारधारा के प्रभुत्व वाले संस्थानों और राज्यों में विरोधी विचारधारा खासकर राष्ट्रवादी विचारधारा को स्वीकार किया गया है क्या? 
       वास्तव में देखा जाए तो असहिष्णुता के खिलाफ सम्मान वापसी करने वाला बुद्धिवादियों का समूह वैचारिक कट्टरवाद का प्रतिनिधित्व करता है और वैचारिक असहिष्णुता को बढ़ावा दे रहा है। चिह्नित घटनाओं पर विरोध करने को अपना लोकतांत्रिक अधिकार बताने वाला यह समूह अपने ही कथनों से जाहिर करता है कि विरोध का उनका दृष्टिकोण चयनित है। उनकी धर्मनिरपेक्षता भी चयनित है। असल में यह धर्मनिरपेक्षता नहीं बल्कि 'धर्मपक्षधरता' है। 
       इसे वैचारिक असहिष्णुता नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे कि यह समूह राज्य सरकारों की जिम्मेदारी पर खामोश है और गैर-भाजपा शासित राज्यों में हुई घटनाओं का दोष केन्द्र सरकार के माथे मढ़कर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा को बदनाम कर रहा है। अरुण जेटली ने अपने बयान से नरेन्द्र मोदी और भाजपा के खिलाफ अभियान चला रहे समूह की वैचारिक असहिष्णुता को उजागर करने का प्रयास किया है और उनकी वैचारिक कट्टरता पर करारी चोट की है। 
        इस समूह को समझना होगा कि अब हालात वैसे नहीं है कि देश की आँखों में धूल झौंकी जा सके। बुद्धिवादी जिस विचारधारा को बरसों से बदनाम करते चले आ रहे हैं अब उसने भी प्रतितर्क करना शुरू कर दिया है। लोकतंत्र में वैचारिक सहिष्णुता का सम्मान है, असहिष्णुता का नहीं। इसलिए दूसरी विचारधाराओं का भी सम्मान कीजिए। दूसरे विचार के प्रति सहिष्णु बनिए। छोटी-छोटी घटनाओं को तूल देकर वैचारिक असहिष्णुता का प्रकटीकरण मत कीजिए। 

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