शनिवार, 24 अक्तूबर 2015

'बौद्धिक आतंकवाद' का विरोध

 के न्द्र सरकार का विरोध करने के लिए सम्मान वापसी का अभियान चलाने वाले साहित्यकारों के खिलाफ भी विरोध तेज होता जा रहा है। यह शुभ है या अशुभ, अभी कहा नहीं जा सकता। लेकिन, इतना तो है कि साहित्यकारों की असलियत जनता के सामने आने लगी है। चरित्र अभिनेता अनुपम खैर ने दशहरे के दिन ट्वीट किया था- 'अब वक्त आ गया है कि नकली धर्मनिरपेक्ष पाखंडियों का पर्दाफाश किया जाए। इनके कारण से हमारी एकता खतरे में आ गई है।' यह सही बात है। सांप्रदायिकता पर चयनित दृष्टिकोण ठीक नहीं है। इसी दौरान और भी सांप्रदायिक घटनाएं हुई हैं, उन पर ये साहित्कार चुप क्यों रहे? सांप्रदायिक घटनाओं में मारे गए हिन्दुओं के प्रति किसी प्रकार की सहानुभूति का न होना, जाहिर करता है कि सम्मान लौटाने की राजनीति कर रहे साहित्यकारों की धर्मनिरपेक्षता पाखंड है। उनका असल मकसद साहित्य को आधार बनाकर राजनीति करना है।
        एक घटना को साहित्यकारों ने इतना अतिरंजित कर दिया है कि लगता है देश में सांप्रदायिकता का जहर फैल गया है। मुसलमानों का रहना मुश्किल हो गया है। साहित्यकारों की नौटंकी से हिन्दू-मुस्लिम एकता पुष्ट होने की जगह चटक रही है। सहजता के साथ रह रहे मुसलमानों के मन में भी संदेह घर करने लगा है कि वाकई हालात इतने खराब हैं क्या? साहित्यकारों को शायद दिख नहीं रहा कि दादरी के बिसाहड़ा गांव में हिन्दू-मुसलमान इखलाक की मौत को पीछे छोड़कर फिर से भाईचारे के साथ रहने लगे हैं। मालूम होता है कि साहित्यकारों ने देश की छवि को बट्टा लगाने की सुपारी ले ली है। इसलिए अनुपम खैर का कथन उचित प्रतीत होता है कि अब 'नकली धर्मनिरपेक्षता' की पोल खोलने का वक्त आ गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी कहना पड़ता है कि सरकार के खिलाफ 'झूठों का समूह' दुष्प्रचार में लगा है।
       शुक्रवार को दिल्ली में अजब माहौल दिखा। एक ओर खुद को 'प्रगतिशील' मानने वाले साहित्यकारों का गुट प्रोफेसर कलबुर्गी और इखलाक की हत्या के विरोध में मौन जुलूस निकाल रहा था। वहीं, दूसरी ओर 'राष्ट्रवादी' साहित्यकारों का समूह सम्मान लौटाने वाले साहित्यकारों पर 'बौद्धिक आतंकवाद' फैलाने का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन कर रहा था। 'राष्ट्रवादी' साहित्यकारों के इस समूह में प्रख्यात उपन्यासकार नरेन्द्र कोहली, वरिष्ठ लेखक-पत्रकार सूर्यकांत बाली और एनएसडी के सुरेश शर्मा प्रमुख नाम हैं। इस समूह ने साहित्य अकादमी को ज्ञापन भी सौंपा है जिसमें साहित्य अकादमी से दबाव में नहीं आने का आग्रह किया गया है। 
       विरोध-प्रदर्शन में शामिल नरेन्द्र कोहली का कहना है कि वामपंथी साहित्यकार एक अलग किस्म की सांप्रदायिकता फैला रहे हैं, इसमें साहित्य को गाली की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं। अनेक अवसर पर चुप रहने वाले तथाकथित प्रगतिशील साहित्यकार नरेन्द्र मोदी और भाजपा को हासिये पर धकेलने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं, सूर्यकांत बाली का स्पष्ट मत है कि सांप्रदायिक घटनाओं पर साहित्यकारों के विरोध प्रदर्शन का तरीका सही नहीं है। देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर किसी प्रकार की पाबंदी नहीं है। इसलिए अब इस 'बौद्धिक आतंकवाद' को उजागर करना जरूरी हो गया है। 
       बहरहाल, साहित्य का सम्मान करने वाले लोग साहित्य को राजनीति में घसीटने के इस प्रकरण से आहत जरूर होंगे। कितना अच्छा होता यदि साहित्यकार दादरी पर राजनीति करने की अपेक्षा हिन्दू-मुस्लिम एकता को पुष्ट करने का प्रयास करते। लेकिन, उन्होंने तो वितंडावाद खड़ा कर दिया है। हिन्दू और मुसलमानों के बीच कायम भरोसे की दीवार को तोडऩे का काम साहित्यकारों का 'प्रगतिशील' गुट कर रहा है। वामपंथी साहित्यकार भले ही विरोध के अपने तरीके को कितना भी जायज बताएं, जनता को उनके तर्क पच नहीं रहे। उनकी चयनित धर्मनिरपेक्षता से राष्ट्रवादी साहित्यकार ही नहीं बल्कि देश की जनता भी नाराज है। 

3 टिप्‍पणियां:

  1. दादरी पर राजनीति करने वाले लोगों को यह क्यों नही दिखाई दिया कि घटना के समय भी गाँव के लोगों ने मीडिया व नेताओं को आने से रोका था . बाद में तो और भी गजब हुआ कि एक सम्प्रदाय के लोगों ने दूसरे सम्प्रदाय की ,जिसके लिये लोग टसुए बहा रहे थे ( हैं) बेटियों के विवाह मे बढ़चढ़कर सहयोग किया . व्यर्थ ही विरोध को हवा देने वालों को ऐसी बातें न दिखाई देतीं हैं न ही अच्छी लगती है . वरना विरोध के लिये कितने गंभीर मामले समाज में आए दिन देखने मिल जाते हैं .

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    1. दीदी इसीलिये मैंने लिखा है-
      साहित्यकारों को शायद दिख नहीं रहा कि दादरी के बिसाहड़ा गांव में हिन्दू-मुसलमान इखलाक की मौत को पीछे छोड़कर फिर से भाईचारे के साथ रहने लगे हैं। मालूम होता है कि साहित्यकारों ने देश की छवि को बट्टा लगाने की सुपारी ले ली है।

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    2. दीदी इसीलिये मैंने लिखा है-
      साहित्यकारों को शायद दिख नहीं रहा कि दादरी के बिसाहड़ा गांव में हिन्दू-मुसलमान इखलाक की मौत को पीछे छोड़कर फिर से भाईचारे के साथ रहने लगे हैं। मालूम होता है कि साहित्यकारों ने देश की छवि को बट्टा लगाने की सुपारी ले ली है।

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