शनिवार, 19 सितंबर 2015

महागठबंधन पर प्रश्न चिन्ह है तीसरा मोर्चा

 बि हार की राजनीति पहर-दर-पहर करवट बदल रही है। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर असामान्य गठबंधन बन रहे हैं, टूट रहे हैं और फिर नए गठबंधन बन रहे हैं। एक ओर, भारतीय जनता पार्टी के विरुद्ध नीतीश कुमार के नेतृत्व में बने 'महागठबंधन' के सामने नित नई चुनौतियां आ रही हैं। दूसरी ओर, चुनावी सर्वेक्षण भाजपा के नेतृत्व में बने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) के हित में बेहतर स्थितियां बता रहे हैं। फिलहाल तो महागठबंधन के समक्ष मुलायम सिंह के नेतृत्व में गठित 'तीसरा मोर्चा' नई चुनौती बनकर उभरा है। ज्ञात हो कि अपमानजनक व्यवहार के कारण महागठबंधन से नाता तोडऩे वाली समाजवादी पार्टी (सपा) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एसीपी) ने 'तीसरा मोर्चा' बनाया है, जिसे पूर्व लोकसभा अध्यक्ष पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी (एपीपी) भी सहयोग कर रही है। बिहार के कद्दावर नेता राजद के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ झा और बिहार विधान परिषद के सदस्य जदयू के नेता मुन्ना सिंह भी अपनी-अपनी पार्टियां छोड़कर सपा में शामिल हो गए हैं। सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के नेतृत्व में पटना में तीसरे मोर्चे की बैठक हुई है। बैठक में बिहार चुनाव की रणनीति और सीटों के बंटवारे पर चर्चा हुई है। बिहार के चुनावी रण में तीसरे मोर्चे के उतरने से चुनावी गणित में जबरदस्त बदलाव आने वाला है।

         महागठबंधन के हितैषी भले ही यह तर्क दें कि तीसरे मोर्चे में शामिल दलों की बिहार में राजनीतिक जमीन नहीं है। लेकिन, सच तो यह है कि तीसरा मोर्चा महागठबंधन को चुनाव में भारी नुकसान पहुंचाने वाला है। यही कारण है कि महागठबंधन की ओर से मुलायम सिंह यादव पर भाजपा को लाभ पहुंचाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। यही आरोप इस्लामिक कट्टरवादी नेता ओवैसी पर लगाए जा रहे हैं। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि ओवैसी की पार्टी आईएमआई और तीसरा मोर्चा महागठबंधन के वोट बैंक (यादव-मुसलमान) में ही सेंध लगाएगा। बिहार में अपनी वैचारिक और राजनीतिक जमीन बचाने के लिए सबसे अधिक जद्दोजहद कर रहे वाम मोर्चे की चर्चा कहीं भी नहीं हो रही है। वाम मोर्चे को सबसे कमजोर माना जा रहा है। लेकिन, कमजोर वाम दल भी महागठबंधन के लिए फांस साबित हो रहे हैं।
         बिहार की राजनीतिक स्थिति ऐसी हो गई है कि भाजपा के विरुद्ध जितनी भी पार्टियां या गठबंधन हैं, सबका वोट बैंक समान है। यानी वे सब एक ही थाली में से खाने की छीना-झपटी करने वाली हैं। जदयू, राजद और कांग्रेस के हिस्से कितना खाना आएगा यह तो आने वाले दिन बताएंगे, लेकिन मौजूदा हालात को देखकर यह तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि बहुत सारा खाना तिकड़ी के हाथ से झिटकने वाला है। अहंकार दूर रखकर, ज्यादा सीट का लालच छोड़कर, यदि शुरुआत से ही बड़े दलों ने बड़प्पन दिखाते हुए महागठबंधन को संभाल लिया होता तो आज उनके समझ ऐसी विषम परिस्थितियां न बनतीं। स्पष्टतौर पर कहना होगा कि 'तीसरे मोर्चे' का गठन महागठबंधन के वजूद पर प्रश्न चिह्न है। बहरहाल, बिहार की नूरा-कुश्ती में अभी तक भारतीय जनता पार्टी सबसे अधिक लाभ की स्थिति में दिख रही है।

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