मंगलवार, 8 सितंबर 2015

अपनी भाषा में हो शिक्षा

 ज ब किसी राष्ट्र पर विदेशी भाषा हावी हो जाती है तो उसकी संस्कृति, परंपरा और उसके जीवन मूल्यों के समक्ष गहरा संकट खड़ा हो जाता है। उस राष्ट्र की संतति भ्रम की स्थिति में होती है। बाहरी भाषा के प्रभुत्व के कारण एक ही राष्ट्र में भाषाई आधार पर भेदभाव की दीवार खड़ी हो जाती है। भारत जैसे बहुभाषी देश में तो एक विदेशी भाषा ने भारतीय भाषाओं को आमने-सामने शत्रु की तरह खड़ा करवा दिया है। इसके साथ ही विदेशी भाषा के प्रभाव में वह राष्ट्र स्वभाविक प्रगति भी नहीं कर पाता है। अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण यह स्थिति भारत के साथ दिखती है। दरअसल, भाषा महज संवाद की सेतु नहीं है। संवाद सेतु से कहीं अधिक, भाषा संस्कृति की धुरी है। संस्कृति भाषा पर ही टिकी रहती है। भाषा बदलने पर संस्कृति बदल जाती है, मूल्य बदल जाते हैं। बात सांस्कृतिक मूल्यों तक भी सीमित नहीं है बल्कि सार्वभौमिक सत्य है कि कोई भी राष्ट्र अपनी भाषा के साथ ही आगे बढ़ता है। हम दुनिया के उन्नत और प्रगतिशील राष्ट्रों का इतिहास-वर्तमान उलट-पलट कर जब देखेंगे तो ज्ञात होगा कि उन्होंने निज भाषा को नहीं त्यागा। लोक व्यवहार से लेकर पठन-पाठन और शोध तक अपनी मातृभाषा में किए। मातृभाषा में शिक्षा का क्या महत्व है, इसे दुनिया के उन्नत राष्ट्रों जापान, जर्मनी, रूस, अमरीका और चीन से लेकर इजराइल तक ने साबित करके दिखाया है। दुनिया के शिक्षाविद् भी यही मानते हैं कि शिक्षा मातृभाषा में होनी चाहिए। महामना मदनमोहन मालवीय, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव अम्बेडकर, रविन्द्रनाथ ठाकुर, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे महापुरुषों ने भी मातृभाषा में शिक्षा पर जोर दिया है। भारत में समय-समय पर गठित शिक्षा आयोगों राधाकृष्णन आयोग और कोठारी आयोग सहित अन्य आयोगों ने भी मातृभाषा में ही शिक्षा की अनुशंसा की है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने भी प्रस्ताव पास कर मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा पर जोर दिया है। संघ ने अपने प्रस्ताव में कहा है कि प्रारंभिक शिक्षण किसी विदेशी भाषा में करने पर जहाँ व्यक्ति अपने परिवेश, परंपरा, संस्कृति और जीवन मूल्यों से कटता है वहीं पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य आदि से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है। संघ दुनिया का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संगठन है। समाज से उसका सीधा जुड़ाव है। निश्चित ही समाज के साथ अपने सतत् संपर्क से उसे भी यह अनुभव आया होगा कि अंग्रेजी माध्यम से पढ़ रही आज की पीढ़ी कहीं न कहीं अपनी जड़ों से कट रही है। अपने संस्कार, अपने मूल्यों और अपने आदर्शों से दूर हो रही है। इसलिए संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा में इस आशय का प्रस्ताव पास किया गया। संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने मातृभाषा में शिक्षा को बढ़ाने के लिए अपने स्वयंसेवकों से आह्वान किया है। संघ का मानना है कि अंग्रेजी भाषा का मोह परिवारों के माध्यम से ही छूटेगा। इसके लिए समाज जागरण आवश्यक है। लोगों को यह समझाना जरूरी है कि किस तरह उनकी अगली पीढ़ी भारतीय मूल्यों से कट जाएगी। यह भी समझाना होगा कि रोजगार का एकमात्र माध्यम अंग्रेजी नहीं है। जब यह बात लोगों के मन में बैठ जाएगी कि मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने पर बच्चा अधिक रचनात्मक होता है। वह अधिक तेजी से सीखता है, तब आम समाज भी अपने बच्चों की प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में कराएंगे। सामान्य-सी बात है कि घर-परिवार में छुटपन से बच्चा जिस भाषा को सुन-सीख रहा होता है, स्कूल में भी वह उसी भाषा में सहजता से सीखता है। घर-परिवार में मातृभाषा और स्कूल में अंग्रेजी या दूसरी भाषा, ऐसी स्थिति में बच्चे के सामने मुश्किल तो खड़ी होगी ही। भाषा भी एक कारण है जिसके चलते बच्चों को स्कूली पढ़ाई उबाऊ और बोझिल लगने लगती है। अलग-अलग भाषाओं के संकट के कारण उसकी प्रतिभा का नैसर्गिक विकास नहीं हो पाता है। 
       दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह अंग्रेजी में प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करेगा तो अंग्रेजी की कविताएं, कहानियां और विदेशी चरित्रों को पढ़ेगा। अपने मूल भारतीय साहित्य से वह अछूता रह जाएगा। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षित होने वाला बच्चा पूर्वजों से प्राप्त होने वाले ज्ञान, शास्त्र, साहित्य से अनभिज्ञ रहकर अपनी पहचान खो देता है। बाद में, बड़ा होकर जब वह अपना मूल साहित्य पढऩा चाहता है तब फिर उसके सामने भाषा का संकट खड़ा हो जाता है। यानी अपनी जड़ों से जुडऩा भी उसके लिए मुश्किल हो जाता है। अंग्रेजी को श्रेष्ठ भाषा मानकर पढऩे वाली पीढ़ी अपनी विरासत को खो रही है। ऐसे विद्यार्थियों के जीवन पर कीट, शैली, मिल्टन, हीगल और शेक्सपीयर जैसे अंग्रेजी के विद्वानों के विचारों का प्रभाव होता है। तुलसी, वाल्मीक, सूर, कबीर के विचार उसके जीवन में नहीं दिखते हैं। अंग्रेजीदां स्कूलों में हिन्दी साहित्य को भी किस तरह से पढ़ाया जाता है, यह बात किसी से छिपी नहीं है। कीट, शैली, मिल्टन और शेक्सपीयर को पढऩे से दिक्कत नहीं है। हमें तो दुनिया को पढऩा है लेकिन अपनी विरासत खोने की शर्त पर नहीं। 
       बात साहित्य तक सीमित नहीं है, विज्ञान की पढ़ाई के साथ भी यही है। अंग्रेजी का पक्ष लेने वाले लोग तर्क देते हैं कि विज्ञान का ज्ञान तो अंग्रेजी के बिना मिल ही नहीं सकता। जबकि वास्तविकता इससे अलग है। दुनिया के सभी देशों में उनकी अपनी मातृभाषा में विज्ञान की पढ़ाई कराई जाती है। जर्मन में जर्मनी में, रूस में रूसी में और जापान में जापानी भाषा में ही विज्ञान पढ़ाया जाता है। भारत के ही महान वैज्ञानिक जगदीश चन्द्र बसु, प्रफुल्ल चंद्र राय ने भी मातृभाषा में ही शिक्षण को नैसर्गिक और वैज्ञानिक बताया है। प्रख्यात वैज्ञानिक सीवी रमन ने तो यहां तक कहा है कि भारत में यदि विज्ञान मातृभाषा में पढ़ाया गया होता तो भारत आज अग्रगण्य देशों में होता। विज्ञान के लिए अंग्रेजी का तर्क देने वाले महानुभाव गलत हैं या फिर भारत के महान वैज्ञानिक? हम किसकी बात को सही मानें? बच्चे की शिक्षा का सवाल है तो गहराई से विचार करने की आवश्यकता है। विचार कीजिए, अंग्रेजी में शिक्षा सही है या अपनी निज भाषा में? 10वां विश्व हिंदी सम्मलेन देश के ह्रदय प्रदेश की राजधानी भोपाल में आयोजित हो रहा है। हिंदी की इस भूमि से हिंदी सम्मलेन में संकल्प लिया जाना चाहिए कि मातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा के लिए वातावरण तैयार किया जायेगा।

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