शनिवार, 29 अगस्त 2015

मूल्य खोकर क्या पाया हमने?

 स नसनीखेज शीना बोरा हत्याकांड ने भारतीय समाज को सोचने का अवसर दिया है कि वह किस तरफ आगे बढ़ रहा है। रिश्तों में खोखलापन, झूठ की बुनियाद पर टिके रिश्ते, विवाह को खेल बना देना, रिश्तों में जिम्मेदारी से ऊपर हावी व्यक्तिगत सोच ने हमें कहां लाकर पटक दिया है? क्या यह आधुनिकता है? आधुनिक होने के लिए क्या भारतीय मूल्यों को छोडऩा जरूरी है? अपने चिर-पुरातन और जीवन को संयमित करने वाले संस्कारों के साथ हम आधुनिक नहीं हो सकते? एक बड़ा सवाल है आखिर तथाकथित प्रगतिशीलता की दौड़ में अपने मूल्यों को खोकर हमने क्या पाया है? चमकती दुनिया में रहने वाली इंद्राणी मुखर्जी की कहानी आज बहुत से परिवारों का यथार्थ है। जहां हर कोई अपने कर्तव्य-जिम्मेदारी निभाने में असफल हैं। रिश्ते दिखावटी अधिक हैं। उनमें मिठास नहीं है, संवेदनाएं नहीं हैं, जीवतंता नहीं है। चमकती दुनिया के पीछे कितना गहन अंधकार पसरा रहता है, इसके कई उदाहरण शीना बोरा हत्याकांड प्रकरण से उजागर हो रहे हैं। एक घर में, एक छत के नीचे रहते हुए एक-दूसरे से अजनबी हैं। एक-दूसरे के जीवन की दिशा का पता नहीं है और जब पता चलता है तब रिश्तों को तार-तार कर देने वाला विस्फोट होता है। कितने आश्चर्य और चिंता की बात है कि समाज तो क्या घर में ही किसी को पता नहीं होता है कि शीना बोरा और इंद्राणी मुखर्जी का रिश्ता क्या है?
        इंद्राणी अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने के लिए बार-बार रिश्ते तोड़ती है। खुद के पूर्व विवाह से पैदा हुए बच्चे, पति के पूर्व विवाह से पैदा हुए बच्चे, कौन भाई-कौन बहन? उफ! रिश्तों का मकडज़ाल। ये मकडज़ाल इसलिए क्योंकि जीवन को हमने गंभीरता से लेना छोड़ दिया। भारतीय मूल्य हमने कोरे ढकोसले बताकर छिटक दिए। हम भूल गए कि बरसों से हमारी परिवार व्यवस्था दुनिया के लिए कौतुहल और सीखने का केन्द्र बनी रही है। दुनिया सोचती है कि कैसे भारतीय परिवारों में 'एक के लिए सब और सबके लिए एक' का विचार काम करता है। कैसे यहां खुद से अधिक चिंता अपनों की रहती है? दरअसल, इन सबके पीछे भारतीय मूल्य हैं। आज भी भारतीय मूल्यों को साथ लेकर जी रहे अनेक परिवार हमारे उदाहरण हैं, जहां न रिश्तों में खोखलापन है, न धोखा है और न ही जीवन में तनाव है। भारतीय परिवारों की खूबसूरती है कि वे सुख-दुख में एक दूसरे के साथ खड़े रहते हैं। बहरहाल, आधुनिक होने की कीमत पर हम क्या खो रहे हैं? यह विचार करने का वक्त भी यही है। 
        जीवन को हम संतुलित तरीके से जीना शुरू नहीं करेंगे तो कभी आरुषी, कभी शीना बोरा हत्याकांड सामने आते ही रहेंगे। इंद्राणी की कहानी से हमें सीख लेनी चाहिए कि आखिर हमारे समाज की दिशा क्या हो? जिस परिवार व्यवस्था का उदाहरण दुनिया में दिया जाता है, उसे कैसे बचाए रखा जा सकता है? हम कैसे उसे संवद्र्धित करें? यह भी हमें समझ लेना चाहिए कि आधुनिक होने का मतलब अपने संस्कारों-मूल्यों का त्याग करना कतई जरूरी नहीं है। खून के रिश्तों में अविश्वास की दरार और गहरी हो, उससे पहले खून को फिर से गाढ़ा करना होगा। हमारे मूल्य ही हमें बचाएंगे। मूल्य नहीं होंगे तो मानवीय रिश्तों का तानाबाना खत्म होना तय है।  
पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों के अनूठे पर्व रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाएं। 

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