बुधवार, 26 अगस्त 2015

आरक्षण : इधर कुंआ, उधर खाई

 पा टीदार समुदाय को आरक्षण देने की मांग को लेकर गुजरात में दो माह से आंदोलन चल रहा है। आंदोलन की कमान 22 साल के नवयुवक हार्दिक पटेल के हाथ में है। अहमदाबाद में मंगलवार को विशाल रैली का आयोजन किया गया। आरक्षण की मांग के लिए रैली में भारी संख्या में भीड़ जमा हुई। हार्दिक पटेल ने जोरशोर से आरक्षण की मांग उठाते हुए फिल्मी स्टाइल में नारे भी दिए हैं। 'जो पाटीदार की सुनेगा, वही पाटीदार पर राज करेगा।' 'हक से दोगे तो ठीक है वरना छीन लेंगे।' बहरहाल, पाटीदार आंदोलन राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के लिए मुसीबत का सबब बनता जा रहा है। हालांकि गुजरात सरकार ने साफ कर दिया है कि आरक्षण की मांग स्वीकार नहीं। दरअसल, आरक्षण का मसला बहुत संवेदनशील है। आरक्षण को लागू करना और नहीं मानना या खत्म करना किसी भी सरकार के लिए राजनीतिक तौर पर आसान काम नहीं है। आरक्षण की मांग स्वीकार की तो बहुसंख्यक सामान्य वर्ग सरकार से नाराज हो सकता है। यदि मांग नहीं मांगी गई तो संबंधित समाज सरकार के खिलाफ हो जाएगा। यानी सरकार चलाने वाले राजनीतिक दल के लिए 'इधर कुंआ, उधर खाई' की स्थिति हो जाती है।
       गौरतलब है कि ओबीसी को आरक्षण देने के प्रस्ताव पर 1978 में गठित किए गए मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने पर पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार गिर गई थी। वीपी सिंह ने सोचा होगा कि भारत के बहुत बड़े पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने से उन्हें राजनीतिक मजबूती मिलेगी लेकिन हुआ उल्टा। पिछड़ा वर्ग उनके साथ था लेकिन आरक्षण को लागू करने से पहले उन्होंने बहुसंख्यक सामान्य वर्ग को सहमत नहीं किया। सामान्य वर्ग की नाराजगी उन्हें ले डूबी। सामाजिक ताने-बाने, आपसी सौहार्द और भारतीय राजनीति के लिए कितना अच्छा होता यदि वे सामान्य वर्ग को विश्वास में लेकर मंडल कमीशन की सिफरशों को लागू करते। दरअसल, आरक्षण का मुद्दा राजनीतिक भस्मासुर है। गुजरात की कुल आबादी में पटेल समुदाय की मौजूदगी करीब 20 फीसदी है। यह संख्या सरकार को बनाने और गिराने में अहम है। यही कारण है कि हार्दिक पटेल ने राज्य और केन्द्र की भाजपा सरकार को चुनौती देते हुए कहा है कि हम सरकार बना सकते हैं तो गिरा भी सकते हैं। 
       आरक्षण विवादास्पद मुद्दा अभी बना है ऐसा भी नहीं है। इतिहास के पन्ने पलटें देखें तो दो बड़े राजनेता भी आरक्षण के मसले पर एकमत नहीं थे। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री मैकडोनाल्ड ने जब 1932 में भारत के दलित वर्ग और दूसरे पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रस्ताव रखा तो महात्मा गांधी ने कड़ा विरोध किया। गांधीजी का मत था कि आरक्षण के कारण हिन्दू समुदाय में दरारें आएंगी। यह विभाजित हो जाएगा। यह कहना गलत नहीं कि गांधीजी की आशंका आशिंक तौर पर सच साबित हुई है। आरक्षण के मसले पर सामान्य वर्ग के मन में कहीं न कहीं आरक्षण प्राप्त वर्गों के प्रति नाराजगी है। हालांकि यह भी सच है कि बहुत बड़ा सामान्य वर्ग मानता है कि वनवासी और पिछड़े समाजों को मुख्यधारा में लाने के लिए आरक्षण की आवश्यकता है। बहरहाल, मैकडोनाल्ड ने जब आरक्षण का प्रस्ताव रखा तब दूसरी तरफ डॉ. भीमराव आम्बेडकर ने इस पर अपनी सहमति दी थी। 
        आरक्षण की राजनीति और आरक्षण पर राजनीति बड़ी पेचीदा है। वैसे यह बात साफ है कि आज के दौर में आरक्षण पिछड़े समाज को मुख्यधारा में लाने की व्यवस्था से कहीं अधिक राजनीति चमकाने का माध्यम हो गया है। आरक्षण आज संवेदनशील मसला इसलिए हो गया है क्योंकि हमने इस पर राजनीति अधिक की है, हम व्यवहारिक कम रहे हैं। आरक्षण पर विवाद के कई कारण इसलिए भी हैं क्योंकि इसे ठीक से लागू नहीं किया जा सका है। बहुत से प्रश्नों पर सामूहिक विमर्श के माध्यम से समाधान निकालना चाहिए था, जो नहीं निकाला गया। जाति के आधार पर आरक्षण का मसला हो। या फिर आर्थिक स्थिति के आधार पर। चाहे भौगोलिक स्थिति के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था हो। ऐसे किसी भी बिन्दु पर आम सहमति हमने नहीं बनाई। आखिर में, पाटीदार आरक्षण आंदोलन से पटेल समाज को आरक्षण मिलेगा या नहीं, कहा नहीं जा सकता लेकिन पटेल समाज और भारतीय राजनीति को एक नेता जरूर मिल गया है। देखना होगा कि भारतीय जनता पार्टी की राज्य सरकार और केन्द्रीय सरकार कैसे आरक्षण के भस्मासुर से निपटती है। 

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