शनिवार, 15 अगस्त 2015

कभी खुद से पूछा है- क्या हैं आजादी के मायने?

 आ ज हम स्वाधीनता के 68 वर्ष पूरे कर रहे हैं। किसी से छिपा नहीं है कि स्वाधीनता के संघर्ष में हमने क्या और कितना कुछ खोया है। स्वतंत्रता संग्राम के महायज्ञ में अनेक हुतात्माओं ने अपना जीवन होम कर दिया। ब्रिटिश शासन के कालखण्ड का एक-एक पन्ना हम पलटें तब समझ आएगा स्वाधीनता का वास्तविक मूल्य। आजादी के असली मायने। बीते 68 वर्षों से हम निरंतर अपनी आजादी को खोते जा रहे हैं। क्षण-क्षण जिम्मेदारी का भाव छूट रहा है। मानसिक गुलामी की ओर बढऩे का प्रश्न हमारे सामने खड़ा कर दिया जाता है। ब्रिटिश दासता की जंजीरें काटकर देश को स्वाधीन दिलाने के लिए खून का एक-एक कतरा बहा दिया था, स्वतंत्रता सेनानियों ने। जरा सोचिए, उसी आजादी को समृद्ध करने के लिए हमने 68 वर्षों में क्या किया? यह सवाल जब हम स्वयं से पूछते हैं तो सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि हमारे जीवन की दिशा क्या है? हम इस समाज और देश से सिर्फ प्राप्त करना चाहते हैं। देने का भाव कहां गया? हम तो किसी जमाने में दाता थे। मांगने वाले कब बन गए? आजादी के नाम पर हमें सिर्फ सहूलियतें ही क्यों चाहिए? अधिकार हमें याद रहते हैं, कर्तव्य कहां ताक पर रख दिए हैं?
      हम आजाद भारत के नागरिक हैं। हमें आतंकवाद, नक्सलवाद, उग्रवाद का समर्थन करने से कैसे रोका जा सकता है? आतंकवादी का समर्थन करने से कोई कैसे रोक सकता है? संवैधानिक संस्थाओं के खिलाफ अकारण ही लिखने-बोलने की आजादी हमसे कोई कैसे छीन सकता है? आजाद भारत का नागरिक हूं- जैसी मर्जी आएगी, वैसा करूंगा। अपने आसपास आजादी के नाम पर यह सब चलता देखकर, कभी-कभी ऐसा नहीं लगता कि हम आजादी का भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं। क्या हम आजादी की आड़ में स्वच्छंदता की मांग और उसका समर्थन नहीं करने लगते? आजादी के मायने स्वच्छंदता कदापि नहीं है। आजादी गंभीर जिम्मेदारी है। घूमने-फिरने की आजादी हो, खाने-पीने की आजादी हो, रहन-सहन की आजादी हो, धार्मिक स्वतंत्रता का मसला हो या फिर अभिव्यक्ति की आजादी की बात हो, तब हमें सोचना चाहिए कि हम जिम्मेदारी की बात कर रहे हैं क्या? हमारी मांग-हमारा विरोध आजादी के लिए है या स्वच्छंदता के लिए? देश के प्रति भी हमारी कुछ जिम्मेदारियां हैं। अनियंत्रित आजादी की मांग में ये जिम्मेदारियां कहां पीछे छूट जाती हैं? 
       आज भी ये सभी सवाल इसलिए खड़े हैं, क्योंकि हमारे लिए राष्ट्र सबसे पहले नहीं है। हमारे टुच्चे स्वार्थ हम पर हावी हैं। राष्ट्र सबसे पहले होगा तो जिम्मेदारी का भाव स्वत: आ जाएगा। फिर हम आतंकवादी और देशद्रोहियों के समर्थन में न्यायालय पर प्रश्न चिह्न खड़ा नहीं करेंगे। पोर्न वेबसाइट पर प्रतिबंध लगाने पर सरकार को लानत कोई नहीं भेजेगा। भारत के सांस्कृतिक मूल्यों, परम्पराओं और पहचान को भी हम संकट में नहीं डालेंगे। जरा-जरा से लेकिन महत्वपूर्ण नियंत्रण पर 'आपातकाल आ गया-आपातकाल थोप दिया' नहीं चिल्लाने लगेंगे। राष्ट्र पहले होगा तो तुष्टीकरण की राजनीति को हवा नहीं मिलेगी। जातिवाद सिर नहीं उठा सकेगा। सम्पूर्ण भारत हमारी मातृभूमि है, हम उसके पुत्र हैं तो फिर क्षेत्रीयता का सवाल रह ही नहीं जाएगा। फिर ये ख्याल मन में नहीं आएगा कि इस देश में हमको क्या मिला है, बल्कि बार-बार यह टीस उठेगी कि हमने देश के लिए क्या किया है और क्या कर सकते हैं? ये सवाल सरकारों के लिए भी हैं, राजनीतिक दलों, नेताओं, सामाजिक संगठनों और सबसे महत्वपूर्ण आम आदमी के लिए भी हैं। इसलिए सबको इन सवालों पर मनन करते हुए सोचना चाहिए कि वर्ष 1947 के बाद इन 68 वर्षों में हमने आजादी के मूल्य क्या तय कर दिए हैं? हमारे लिए आजादी के मायने क्या हैं?

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