रविवार, 26 जुलाई 2015

विरोध तो विचारधारा का ही है

 भा रतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान (एफटीआईआई) के अध्यक्ष पद पर अभिनेता गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति से उठा विवाद शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। कुछ विद्यार्थियों ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। वे चौहान को संस्थान के अध्यक्ष के रूप में देखना नहीं चाहते हैं। उनका आरोप है कि गजेन्द्र चौहान के पास फिल्मों का अच्छा अनुभव नहीं है। उनका ज्ञान बहुत ही सीमित है। चौहान ने 'सी' और 'बी' ग्रेड फिल्मों में ही काम किया है। उनकी योग्यता यही है कि वे सत्तारूढ़ पार्टी (भारतीय जनता पार्टी) के कार्यकर्ता हैं। अत: वे भावी फिल्मकार तथा कलाकार गढऩे वाले इस संस्थान के मुखिया होने के काबिल नहीं हैं। ऋषि कपूर, रणवीर कपूर, कुंदन शाह और अनुपम खेर भी छात्रों के साथ खड़े हो गए हैं। अब तक दिखाई जा रही 'फिल्म' को एक दृष्टिकोण से देखने पर तो यही लगता है कि गजेन्द्र चौहान की नियुक्ति ठीक नहीं है। न तो छात्र उनके साथ हैं और न ही फिल्म जगत से जुड़ी प्रमुख हस्तियों का समर्थन उन्हें मिल पा रहा है। सब विरोध में हैं। लेकिन, इस फिल्म का दूसरा पहलू दिखाने की कोशिश कोई नहीं कर रहा है। छात्रों की हड़ताल जारी है, इसी बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र ऑर्गेनाइजर में गजेन्द्र चौहान के समर्थन में एक लेख आया है। इस लेख में बताया गया है कि छात्रों का विरोध गजेन्द्र चौहान से नहीं बल्कि राष्ट्रवादी विचारधारा और हिन्दुत्व से है। छात्रों को ढाल बनाकर कुछ दूसरे लोग भी आग में घी डालने का काम कर रहे हैं। उन्हें संस्थान की चिंता नहीं है बल्कि वे लोग अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कोशिश। ये लोग एफटीआईआई में अपनी अवैध घुसपैठ को बनाए रखना चाहते हैं।
        छात्रों की सभी आपत्तियां संदिग्ध हैं। गजेन्द्र चौहान ने बी और सी ग्रेड की फिल्मों के साथ कई मुख्यधारा की फिल्मों में भी काम किया है। महाभारत में उनकी भूमिका इतनी प्रभावी थी कि आज भी उन्हें 'युधिष्ठिर' के नाते ही पहचाना जाता है। स्वयं छात्र भी उन्हें 'युधिष्ठिर' ही संबोधित कर रहे हैं। गजेन्द्र चौहान के पास 600 से ज्यादा टेलीविजन धारावाहिकों में काम करने का अनुभव है। श्याम बेनेगल की प्रतिभा पर कोई सवाल नहीं है। लेकिन, इसके बावजूद एक सवाल तो बनता है कि श्याम बेनेगल जब पहली बार अध्यक्ष बने थे तब उनके पास कितनी फिल्मों का अनुभव था। भाजपा और हिन्दुत्व के धुर विरोधी यूआर अनंतमूर्ति ने किस फिल्म में अभिनय किया है? इस तरह देखें तो गजेन्द्र चौहान को सिनेमा का अनुभव नहीं होने का सवाल भी फर्जी साबित होता है। जबकि उन्होंने सिनेमा में 34 साल गुजार दिए हैं। 
        'खुली खिड़की' टाइप की फिल्म में काम करने पर गजेन्द्र सिंह का विरोध वे लोग कर रहे हैं जिन्होंने सरेआम 'चुंबन आंदोलन' चलाया है। बॉलीवुड में गंदगी को बड़े पैमाने पर परोसने वाले महेश भट्ट का विरोध छात्रों ने क्यों नहीं किया था? महेश भट्ट की फिल्में भी तो बी और सी ग्रेड से ऊपर नहीं हैं। जब वे एफटीआईआई के अध्यक्ष बनाए गए थे तब 'गाय का मांस' खाने को अपना मौलिक अधिकार बताने वाले ऋषि कपूर और आंदोलन कर रहे छात्र कहां गए थे? बॉलीवुड को नग्नता परोसने की आदत लगाने वाले निर्देशक महेश भट्ट का विरोध सिर्फ इसलिए नहीं किया गया क्योंकि वे उनकी विचारधारा के पैरोकार हैं। इसलिए नैतिकता की चिन्ता का सवाल भी खारिज हो जाता है। दूसरी सबसे बड़ी बात यह है कि एफटीआईआई के अध्यक्ष का सीधा संबंध छात्रों के अध्यापन से जुड़ा हुआ नहीं है। इस बात को स्वयं श्याम बेनेगल स्वीकारते हैं। फिर, गजेन्द्र चौहान छात्रों को क्या सिखा पाएंगे या क्या नहीं सिखा पाएंगे, यह सवाल ही नहीं बनता है? 
        वास्तव में देखा जाए तो आंदोलन की मंशा पर ऑर्गेनाइजर में प्रकाशित लेख में उठाए प्रश्न ज्यादा उचित प्रतीत होते हैं। यह सारा विरोध केवल विचारधारा से है। यह बात किसी से छिपी नहीं है कि इस संस्थान पर लम्बे समय तक वामपंथियों का कब्जा रहा है। हिन्दुत्व विरोधी और घोर वामपंथी मृणाल सेन, गिरीश कर्नाड, अदूर गोपाल कृष्णन और सईद मिर्जा एफटीआईआई के अध्यक्ष क्यों बनाए गए थे? यह सब जानते हैं। इन सबने संस्थान का कितना भला किया, यह भी किसी से छिपा नहीं है। हां, संचार के इस महत्वपूर्ण संस्थान को वामपंथियों का अड्डा जरूर बना दिया। वरना, क्या बात है कि डिप्लोमा पूरा होने के बाद जिन विद्यार्थियों को चले जाना था वे अब तक संस्थान के हॉस्टल में पड़े हुए हैं। ये वे ही छात्र हैं जो वामपंथ की लकीर से इधर-उधर कुछ भी यहां होता है तो आंदोलन करने लगते हैं, हड़ताल पर उतर आते हैं। कक्षाएं बंद कराकर ये क्रांतिकारी छात्र उन छात्रों का भी नुकसान करते हैं जो पढऩे के लिए आए हैं, राजनीति के लिए नहीं। वामपंथियों के पेट में दर्द इसलिए भी हो रहा है क्योंकि उन्हें डर सता रहा है कि इतने महत्वपूर्ण संस्थान से भी उनकी छुट्टी होने वाली है। वरना क्या बात है कि जिन श्याम बेनेगल का उदाहरण देकर संस्थान के अध्यक्ष होने के लिए पैरामीटर तय किए जा रहे हैं, छात्र उनके ही कथन को नहीं मान रहे हैं। बेनेगल ने स्पष्ट कहा है कि गजेन्द्र चौहान को इस्तीफा नहीं देना चाहिए। वे यह भी कहते हैं- 'सबसे पहले गजेन्द्र चौहान की काबिलियत को परखा जाना चाहिए।' लेकिन, जिनका उद्देश्य सिर्फ किसी विचारधारा का विरोध करना हो, उन्हें किसी की काबिलियत परखने से क्या मतलब? 

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