बुधवार, 31 दिसंबर 2014

हैप्पी न्यू ईयर या नववर्ष, तय कीजिए

 दृ श्य एक। सुबह के पांच बजे का समय है। चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रथम तिथि यानी वर्ष प्रतिपदा का मौका है। ग्वालियर शहर के लोग शुभ्रवेश में जल विहार की ओर बढ़े जा रहे हैं। जल विहार के द्वार पर धवल वस्त्र पहने युवक-युवती खड़े हैं। उनके हाथ में एक कटोरी है। कटोरी में चंदन का लेप है। वे आगंतुकों के माथे पर चंदन लगा रहे हैं। भारतीय संगीत की स्वर लहरियां गूंज रही हैं। सुर-ताल के बेजोड़ मेल से हजारों मन आल्हादित हो रहे हैं। बहुत से लोगों ने तांबे के लोटे उठाए और जल कुण्ड के किनारे पूर्व की ओर मुंह करके खड़े हो गए। सब अघ्र्य देकर नए वर्ष के नए सूर्य का स्वागत करने को तत्पर हैं। तभी सूर्यदेव ने अंगडाई ली। बादलों की चादर को होले से हटाया। अपने स्वागत से शायद सूर्यदेव बहुत खुश हैं। तभी उनके चेहरे पर विशेष लालिमा चमक रही है। सूर्यदेव के आते ही जोरदार संघोष हुआ। सबने आत्मीय भाव से, सकारात्मक ऊर्जा से भरे माहौल में एक-दूसरे को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं। 
       दृश्य दो। दिसम्बर की आखिरी रात। पुलिस परेशान है कि 'हैप्पी न्यू ईयर वालों' को कैसे संभाला जाएगा? शराब पीकर बाइक-कार को हवाईजहाज बनाने वालों को कैसे आसानी से लैंड कराया जा सकेगा? खैर पुलिस के तनाव के बीच जैसे ही रात १२ बजे घड़ी की दोनों सुईयां एक जगह सिमटीं, जोरदार धमाकों की आवाज आती है। आसमान आतिशबाजी से जगमग हो उठा। आस-पास के घरों से म्यूजिक सिस्टम पर कान-फोडू संगीत बज उठा है। देर शाम से नए साल के स्वागत में शराब पी रहे लौंडे अपने बाइक पर निकल पड़े हैं। कुछ बाइकर्स कॉलोनी में भी आए हैं। सीटी बजाते हुए, चीखते-चिल्लाते हुए, धूम मचा रहे हैं। नारीवादी आंदोलन के कारण खुद को 'ठीक से' पहचान सकीं लड़कियों ने भी लड़कों से पीछे नहीं रहने की कसम खा रखी है। शोर-शराबे के बीच जैसे-तैसे सो सके। सुबह उठे तो अखबार में फोटो-खबर देख-पढ़कर जाना कि नए साल का स्वागत बड़ा जोरदार हुआ। कई लीटर शराब पी ली गई। बहुत-से मुर्गे-बकरे भी निपट गए। कुछ लोग पीकर सड़क किनारे गटर के ढक्कन पर पाए गए तो कुछ लोग सड़क दुर्घटना में घायल हो गए, जिनकी एक जनवरी अस्पताल में बीती। और भी बहुत कुछ है बताने को। 
       दो तस्वीर आपने देखीं। इनमें नया कुछ नहीं है। कुछ दिन से यह सब बताने वाले चित्र आपके फेसबुक पेज और व्हाट्सअप पर आ रहे होंगे। हो सकता है आपने इन्हें लाइक-शेयर-कमेन्ट भी किया हो। हो सकता है आप थोड़ी देर के लिए भारतीय हो गए हों और आपने इन्हें आगे बढ़ा दिया हो। आपको अचानक से अपनी संस्कृति खतरे में नजर आई हो। बहरहाल, समस्या यहां सिर्फ संस्कृति संरक्षण की नहीं है। यहां यह प्रश्न भी नहीं है कि मेरी संस्कृति अच्छी, उनकी संस्कृति घटिया। यहां प्रश्न लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी नहीं है। असल में प्रश्न तो यह है कि हमें किस तरफ आगे बढ़ाना चाहिए? हमें भारतीय मूल्यों, भारतीय चिंतन और भारतीय संस्कृति की ओर बढ़ाना चाहिए या फिर पश्चिम से आए कचरे को भी सिर पर रखकर दौड़ लगा देना है? क्या भारतीय संस्कृति पुरातनपंथी है? क्या वर्ष प्रतिपदा 'बैकवर्ड' समाज का त्योहार है और न्यू ईयर 'फॉरवर्ड' का? प्रश्न तो यह भी है कि वास्तव में हमारा आत्म गौरव कब जागेगा? कब हमारी तरुणाई अंगडाई लेगी? कब हम अपने मूल्यों में अधिक भरोसा दिखाएंगे? कब हम अपनी चीजों को दुनिया से सामने प्रतिष्ठित करेंगे? 
       समय तो तय करना पड़ेगा, खुद को बदलने का। सोचते-सोचते, भाषण देते-देते, कागज कारे करते-करते बहुत वक्त बीत गया है। अब समय आ गया है कि हम भारतीय हो जाएं। आखिर कब तक प्रगतिशील दिखने के लिए दूसरे का कोट-जैकेट पहने रहेंगे? अब हम जान रहे हैं कि एक जनवरी को हमारा नववर्ष नहीं है। कारण भी क्या हैं कि एक जनवरी को नववर्ष मनाया जाए? सिर्फ यही कि अंग्रेजी कैलेण्डर बदलता है। अब तय कीजिए क्या यह हमारे लिए उत्सव मनाने का कारण हो सकता है? यदि हो सकता है तो निश्चित ही हमारे पुरखे तय कर गए होते। हम तो वैसे भी उत्सवधर्मी हैं, त्योहार मनाने के मौके खोजते हैं। लेकिन, हमने इस नववर्ष को उत्सव घोषित नहीं किया, क्योंकि हमारे लिए एक जनवरी को नया साल मनाने का कोई कारण नहीं था। हिन्दू जीवनशैली पूर्णत: वैज्ञानिक है। यह तथ्य सिद्ध हो चुका है। इसीलिए भारतीय मनीषियों ने प्रकृति के चक्र को समझकर बताया कि चैत्र से नववर्ष शुरू होता है। उस वक्त मौसम बदलता है। वसंत ऋतु का आगमन होता है। प्रकृति फूलों से मुस्काती है। फसल घर आती है तो किसानों के चेहरे पर खुशी चमकती है। दुनिया के दूसरे कैलेण्डर से भारतीय कैलेण्डर की तुलना करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि भारतीय मनीषियों की कालगणना कितनी सटीक और बेहतर थी। वर्ष प्रतिपदा को ही नववर्ष मनाने का एक प्रमुख कारण यह है कि भारतीय कालगणना के मुताबिक इसी दिन पृथ्वी का जन्म हुआ था। 
       बहुत से विद्वान कहते हैं कि जब ईस्वी सन् ही प्रचलन में है तो क्यों भारतीय नववर्ष को मनाने पर जोर दिया जाए। जब एक जनवरी से ही कामकाज का कैलेण्डर बदल रहा है तो इसे ही नववर्ष मनाया जाना चाहिए। जवाब वही है, सनातन। जब सब काम ग्रेगेरियन कैलेण्डर से ही किए जा रहे हैं तो फिर निजी जीवन में जन्म से लेकर अंतिम संस्कार तक की सभी प्रक्रियाओं के लिए पंचाग क्यों देखा जाता है। क्योंकि अंतर्मन में विश्वास बैठा है कि कालगणना में भारतीय श्रेष्ठ थे। भारतीय कैलेण्डर का पूर्णत: पालन करने पर कोई क्या कहेगा, इसकी चिंता हमें खाए जाती है। सारी चिंताएं छोड़कर अपने कैलेण्डर को प्रचलन में लाने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। एक मौका हाथ आया था लेकिन पाश्चात्य प्रेम में फंसे हमारे पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने वह मौका खो दिया था। वर्ष 1952 में वैज्ञानिक और औद्योगिक परिषद ने पंचाग सुधार समिति की स्थापना की थी। समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट में विक्रम संवत को भी स्वीकार करने की सिफारिश प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से की थी। लेकिन, पंडितजी ने इस सिफारिश को नजरअंदाज कर दिया। खुद को सेक्यूलर कहने वाले प्रधानमंत्री ने ऐसे कैलेण्डर को मान्यता दी, जिसका संबंध एक सम्प्रदाय से है। जनवरी से शुरू होने वाले नववर्ष का संबंध ईसाई सम्प्रदाय और ईसा मसीह से है। रोम के सम्राट जूलियस सीजर इसे प्रचलन में लाए। जबकि भारतीय नववर्ष का संबंध हिन्दू धर्म से न होकर प्रकृति से है। यानी खुद को सेक्यूलर कहने वाले विद्वानों को भी अंग्रेजी नववर्ष का विरोध कर पंथ निरपेक्ष भारतीय कैलेण्डर के प्रचलन के लिए आंदोलन करना चाहिए। 
       बहरहाल, खुद से सवाल कीजिए कि अपने नववर्ष को भूल जाना कहां तक उचित है? अगर भारतीयपन बचा होगा तो निश्चित ही आप जरा सोचेंगे। यह भी सोचेंगे कि वास्तव में उत्सव के रंग एक जनवरी के नववर्ष में दिखते हैं या फिर चैत्र शुक्ल पक्ष प्रतिपदा में। उत्सव मनाने का तरीका पाश्चात्य का अच्छा है या भारत का? कब तक गुलामी के प्रतीकों को गले में डालकर घूमेंगे? अब अपने मूल्यों, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान और अपने ज्ञान-विज्ञान को दुनिया में स्थापित करने का वक्त आ गया है। 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

हिन्दी का योद्धा

 द मदार लेखन शैली और प्रभावशाली वक्तृत्व कला डॉ. वेदप्रताप वैदिक की ताकत है। लेकिन, हिन्दी के सम्मान के लिए लड़ाई उनकी पहचान है। रूसी, फारसी, अंग्रेजी और संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं को जानने वाले डॉ. वेदप्रताप वैदिक अपने हिन्दी प्रेम को लेकर सर्वाधिक चर्चित तब हुए जब उन्होंने अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर अपना शोध प्रबंध हिन्दी में लिखा। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के प्रशासन ने उनके शोध प्रबंध को अस्वीकार कर दिया। उनसे कहा गया कि जाइए, अपना शोध प्रबंध अंग्रेजी में लिखकर लाइए। लेकिन, महज 13 साल की उम्र में हिन्दी के लिए सत्याग्रह कर जेल जाने वाले डॉ. वैदिक क्या यूं ही हार मान जाते। यह मामला भारत के सर्वोच्च सदन भारतीय संसद तक पहुंचा। वर्ष 1966-67 में संसद में जबर्दस्त हंगामा हुआ। डॉ. राममनोहर लोहिया, अटल बिहारी वाजपेयी, मधु लिमये, आचार्य कृपलानी, हीरेन मुखर्जी और चन्द्रशेखर सहित तमाम राजनेताओं ने डॉ. वैदिक का समर्थन किया। आखिर में इन्दिरा गांधी की पहल पर जेएनयू के संविधान में संशोधन हुआ। डॉ. वैदिक के शोध प्रबंध को स्वीकार किया गया। तब से देशभर में डॉ. वेदप्रताप वैदिक की पहचान हिन्दी के योद्धा की हो गई। देशभर में घूम-घूमकर, हिन्दी में भाषण देकर आवाम को सम्मोहित करने वाले नरेन्द्र मोदी ने जब ऐतिहासिक विजय के बाद राष्ट्रपति को अंग्रेजी में पत्र लिखा तो उनका विरोध करने वालों में डॉ. वेदप्रताप वैदिक सबसे आगे रहे। जबकि आम चुनाव-2014 से पूर्व वे मोदी के समर्थन में लेख पर लेख लिखे जा रहे थे।
       पत्रकारिता में 50 साल से अधिक समय बिताने वाले डॉ. वैदिक के चिंतन और विचारों का जादू भारत में ही नहीं विदेश में भी चलता है। दुनियाभर में, असरदार शख्शियतें छोटे कद के लेकिन ऊंचे माथे वाले डॉ. वैदिक से प्रभावित हैं। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव के शासनकाल में राजनेता न होने के बाद भी डॉ. वैदिक को डिप्टी पीएम कहा जाता रहा। इंदिरा गांधी से अटल बिहारी वाजपेयी तक उनके मुरीद रहे। बाबा रामदेव के 'कालाधन वापस लाओ' अभियान के तो वे सेनापति रहे हैं। 
       करीब 80 देशों की यात्रा कर चुके डॉ. वेदप्रताप वैदिक की हाल ही में पाकिस्तान यात्रा काफी हंगामाखेज रही। मुम्बई ब्लास्ट के मास्टर माइंड हाफिज सईद के साथ मुलाकात ने डॉ. वैदिक की देशभक्ति पर ही प्रश्न चिह्न खड़े करवा दिए। हालांकि सब जानते हैं कि डॉ. वैदिक एशिया महाद्वीप में शांति के लिए प्रयासरत हैं। 
       इंदौर में 30 दिसम्बर, 1944 को जन्मे डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने 1958 में बतौर प्रूफ रीडर पत्रकारिता कदम रखा था। इसके बाद तो उन्होंने हिन्दी पत्रकारिता को नित नई ऊंचाइयां दीं। वे 12 साल तक नवभारत टाइम्स में पहले सह सम्पादक फिर सम्पादक के पद पर रहे। उन्होंने हिन्दी समाचार एजेन्सी भाषा के संस्थापक सम्पादक के रूप में एक दशक तक प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया में काम किया। फिलवक्त भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष और नेटजाल डाट काम के सम्पादकीय निदेशक हैं।
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"वेदप्रताप वैदिक के संस्कार समाजवादी और हिन्दी के रहे हैं। इसलिए उनके लेखन में सदैव प्रखरता और आक्रामकता रही है। उनकी राष्ट्रवादिता संदेह से परे है और उनके उद्देश्यों पर कभी शक नहीं किया जा सकता।"
 - रघु ठाकुर, प्रख्यात समाजवादी चिन्तक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

हिन्दुत्व का सिपाही

 दु नियाभर का काम, सांसद होने से बाय प्रोडक्ट मिली तमाम व्यस्तताएं और सामाजिक गतिविधियों में सक्रियता के बाद भी आप उन्हें नियमित पढ़ पाते हैं, राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व का मजबूती से पक्ष रखने के लिए कटिबद्ध तरुण विजय ही यह कर सकते हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साप्ताहिक समाचार-पत्र पाञ्चजन्य के पूर्व संपादक के नाते भी हम सब उन्हें जानते हैं। वर्ष 1961 में जन्मे तरुण विजय महज 25 वर्ष की आयु में दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन आरएसएस के मुखपत्र 'पाञ्चजन्य' के संपादक हो गए और लगातार 22 साल तक यहां रहे।
      तरुण विजय के तर्क, विमर्श क्षमता, स्वाध्याय और लेखनी की ताकत है कि वामपंथी विचारधार की ओर झुके समाचार-पत्र जनसत्ता में उनका कॉलम 'दक्षिणावर्त' सर्वाधिक लोकप्रिय है। वे अपने विरोधियों को तर्कों से चित करते हैं। वे खुलेमन के हैं, विरोधियों का स्वागत करते हैं, उनसे सार्थक संवाद की परम्परा बनाने की कोशिश करते हैं। तरुण विजय और पाञ्चजन्य तब बहुत चर्चा में आए जब उन्होंने कांग्रेसनीत यूपीए सरकार के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का साक्षात्कार पाञ्चजन्य में छाप दिया। मीडिया, कांग्रेस, भाजपा और आरएसएस में हंगामा खड़ा हो गया। लेकिन, यही तो सच्चा लोकतंत्र है, जहां विरोधी की बात भी सुनी जाती है और उसे समझने का प्रयास भी किया जाता है। 
      संवेदनशील पत्रकार एवं लेखक तरुण विजय पाञ्चजन्य से अलग होने के बाद संघ के प्रचारक होकर वनवासियों के बीच काम करने के लिए दादरा और नगर हवेली चले गए। वंचित और मुख्यधारा से पिछड़े समाज के लिए बेहतर करने की उनकी हमेशा से कोशिश रही है। दलित और जनजातीय समुदाय के लोगों को सम्मान दिलाने के लिए उन्होंने प्रशिक्षित और योग्यता प्राप्त दलित एवं जनजातीय पुजारियों को हिन्दू मंदिरों के गर्भगृह में देवपूजन तथा कर्मकाण्ड का अधिकार प्रदान करने के लिए राज्यसभा में अधिनियम पेश किया।
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे तरुण विजय ने अपने पत्रकारीय जीवन की शुरुआत प्रतिष्ठित अखबार ब्लिट्ज से की थी। बाद में, खुद को स्वतंत्र पत्रकार के रूप में स्थापित किया। वे टाइम्स ऑफ इंडिया, पायोनियर और जनसत्ता सहित देशभर के तमाम अखबारों और पत्रिकाओं के लिए लिखते रहे हैं। उन्होंने वामपंथी कलुषगाथा, समरसता के सूत्र, मानसरोवर यात्रा सहित कई किताबों का संपादन और लेखन भी किया है। श्री विजय जितने बड़े पत्रकार, विचारक और लेखक हैं, उतने ही उम्दा फोटोग्राफर भी हैं। सिंध नदी और हिमालय की धवल चोटियां उन्हें फोटोग्राफी के लिए बुलाती हैं। उनके मुताबिक सिंधु नदी की शीतल बयार, कैलास पर शिवमंत्रोच्चार, चुशूल की चढ़ाई या बर्फ से जमे झंस्कार पर चहलकदमी - इन सबको मिला दें तो कुछ-कुछ तरुण विजय नजऱ आएंगे।
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"तरुण जी की पत्रकारिता इस मायने में प्रशंसनीय है कि यहाँ राजनीति का 'र' राष्ट्र के 'र' पर हावी नहीं होता। नई पीढ़ी के पत्रकारों के लिए अनुकरणीय यह वह लीक है जहाँ कलम स्वार्थ के लिए नहीं स्वदेश के लिए उठी है।"
- हितेश शंकर, संपादक, पाञ्चजन्य

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

भाषा का सिपाही

 प त्रकारिता के गिरते मूल्यों और घटती साख के बीच राहुल देव एक ऐसा नाम है जो पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों और भारतीय भाषाओं के वजूद के लिए लम्बी लड़ाई लड़ रहा है। हिन्दी पत्रकारिता में राहुल देव का नाम बेहद सम्मान के साथ लिया जाता है। उन्होंने 30 साल से भी अधिक वक्त इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया में बिताया है। इतने लम्बे सफर के दौरान एक दिन भी ऐसा नहीं आया, जब उन पर किसी ने कोई आरोप लगाया हो। झक सफेद दाड़ी और बालों के बीच चमकता राहुल देव का भाल धवल पत्रकारिता का पैरोकार है। 
     वर्ष 1997 में सुरेन्द्र प्रताप सिंह की मृत्यु के बाद लोकप्रिय न्यूज चैनल 'आजतक' पर एंकरिंग की जिम्मेदारी सम्भालने वाले राहुल देव पत्रकारिता में भाषा के स्वरूप और उसके संस्कार को लेकर बेहद संजीदा हैं। समाचार-पत्रों और न्यूज चैनल्स में भाषा के सरलीकरण और बोलचाल की भाषा के नाम पर भारतीय भाषाओं के साथ हो रहे खिलवाड़ से चिंतित नजर आते हैं। 'भारतीय भाषाओं का भविष्य और हमारी भूमिका' विषय पर ग्वालियर में आयोजित व्याख्यान में उन्होंने कहा था कि अंग्रेजियत के कारण मात्र हिन्दी ही नहीं वरन् भारतीय भाषाओं के वजूद पर संकट आ गया है। हमारी भाषाओं में जबरन अंग्रेजी के शब्द ठूंसे जा रहे हैं। उनका मानना है कि भाषा कोई भी हो, उसकी पवित्रता बनी रहनी चाहिए। अंग्रेजी बोलो तो शुद्ध। हिन्दी में बाचतीत करो तो फिर वह भी हिन्दी ही हो, उसमें अंगे्रजी के शब्द न हों। उनका मानना है कि मीडिया की भाषा के कारण नई पीढ़ी गंभीर और परिष्कृत भाषा से विमुख हो रही है। मीडिया में हिंग्लिश के प्रयोग से काफी दिक्कतें खड़ी हो रही हैं। इस खतरनाक प्रयोग को रोकने की जरूरत है। भारतीय भाषाओं के भविष्य को लेकर चिंतित राहुल देव सम्यक फाउण्डेशन के मार्फत एक मुहिम चला रहे हैं। वे इस फाउण्डेशन के संस्थापक एवं अध्यक्ष हैं। उनका कहना है कि भाषा के साथ व्यक्ति और समाज के संस्कार भी बदलते हैं। हिन्दी के भविष्य को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने आशंका जताई कि अगर हिन्दी की स्थिति यही रही तो 2050 तक भारत में लिखाई और पढ़ाई के सारे गंभीर काम अंग्रेजी में किए जा रहे होंगे और हिन्दी सिर्फ मनोरंजन की भाषा बनकर रह जाएगी। 'सम्यक फाउण्डेशन' के माध्यम से वे सामाजिक विकास, शिक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, एचआईवी-एड्स और सामाजिक मूल्यों के प्रति भी लोगों को जागरूक करने में लगे हैं। इसके साथ ही युवाओं को समाजोन्मुखी पत्रकारिता का प्रशिक्षण देना और उन्हें शोधकार्य करने का अभ्यास भी वे बखूबी करा रहे हैं।
     खुद का प्रोडक्शन हाऊस शुरू कर कई न्यूज चैनल्स के लिए बेहतरीन कार्यक्रम और महत्वपूर्ण वृत्तचित्र बनाने वाले राहुल देव ने अनेक पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज चैनल्स में काम किया। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं पर उनकी गहरी पकड़ है। दि पायोनियर, करेंट, दि इलस्ट्रेटड वीकली, दि वीक, प्रोब, माया, जनसत्ता और आज समाज में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालने के अलावा उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में भी लम्बे समय तक काम किया। टीआरपी की जगह हर हाल में कंटेंट को प्राथमिकता देने वाले राहुल देव ने आजतक, दूरदर्शन, जी न्यूज, जनमत और सीएनईबी न्यूज चैनल में शानदार सफर गुजारा है। 
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"बाजारवाद के प्रभाव में जब भारतीय भाषाओं, खासकर हिन्दी की गरिमा को क्षति पहुंचाई जा रही है, तब राहुल देव भाषाओं की गरिमा के लिए लड़ रहे हैं। यह अपने आप में अनूठी और साहस की बात है।"
- जयंत सिंह तोमर, गांधीवादी चिन्तक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख 

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

अनथक यात्री

 स फल लोग कभी कुर्सी पर बैठकर आराम नहीं कर सकते। उन्हें लगातार काम में व्यस्त रहने में ही आराम मिलता है। जिस उम्र में अधिकतर लोग अपने काम से ही नहीं अपनी जिम्मेदारियों से भी सेवानिवृत्ति ले लेते हैं, 71 वर्षीय विजय सहगल आज भी पत्रकारिता, लेखन और अध्यापन में सक्रिय हैं। उनके उत्साह और ऊर्जा को देखकर युवाओं को भी रश्क हो जाए। भारतीय जीवन मूल्यों और पत्रकारिता के उच्च आदर्शों को लेकर जीने वाले विजय सहगल का समूचा जीवन प्रखर पत्रकार, संवेदनशील साहित्यकार और प्रेरक मीडिया अध्यापक का अनूठा मिश्रण है। 
      सुबाथू (हिमाचल प्रदेश) के प्रसिद्ध लेखक, प्रकाशक, समाजसेवी और स्वतंत्रता सेनानी प्रेमचंद सहगल के घर 16 जुलाई, 1943 को जन्मे विजय सहगल करीब चार दशक से पत्रकारिता और साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय हैं। उन्होंने जालंधर से प्रकाशित वीर प्रताप से बतौर उप-संपादक अपनी पत्रकारिता की सार्थक पारी की शुरुआत की। इसके बाद श्री सहगल ने टाइम्स ऑफ इंडिया, नवभारत टाइम्स, धर्मयुग और मुम्बई से प्रकाशित सारिका में काम किया। खबरों पर उनकी पकड़, भाषा की गहरी समझ और कुशल नेतृत्व क्षमता जैसे गुणों के चलते 1978 में दैनिक ट्रिब्यून की स्थापना पर उन्हें सहायक सम्पादक की महती जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्ष 1990-2003 तक बतौर सम्पादक विजय सहगल दैनिक ट्रिब्यून को नई ऊंचाइयां देते रहे। फिलहाल वे दिव्य हिमाचल के राजनीतिक समीक्षक और सलाहकार सम्पादक हैं। 
      मानवीय और सामाजिक सरोकारों की पूंजी के सहारे विजय सहगल ने हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के सफर में जो मुकाम हासिल किया है, वह कम लोगों को ही नसीब होता है। साहित्य में कहानीकार के तौर पर खास पहचान रखने वाले श्री सहगल का उपन्यास 'बादलों के साए', कहानी संग्रह 'आधा सुख' और यात्रा वृत्तांत 'आस्था की डगर' बेहद चर्चित हैं। भारत में हिन्दी पत्रकारिता का इतिहास, हिन्दी पत्रकारिता के विविध आयाम, हिन्दी पत्रकारिता - दिशा और दशा जैसे महत्वपूर्ण ग्रंथों के सहलेखक होने के साथ ही उन्होंने हिमाचल में हिन्दी पत्रकारिता के उद्भव व विकास पर शोधग्रंथ लिखकर अभूतपूर्व योगदान दिया है। वे चंडीगढ़ साहित्य अकादमी, नेशनल बुक ट्रस्ट और इंडियन सोसायटी ऑफ ऑथर्स सहित पत्रकारिता से संबंधित संस्थाओं से जुड़े रहे हैं। श्री सहगल फोकस हरियाणा, ईटीवी, डे एण्ड नाइट न्यूज और ए-1 तहलका सहित अन्य टीवी चैनल्स पर विभिन्न विषयों पर होने वाले विमर्शों में शामिल रहते हैं।  
      उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, बुरकिना फासो अर्जेंटीना, घाना, मलेशिया, अमरीका और कनाडा का प्रवास कर चुके विजय सहगल को उनकी उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए मातृश्री पत्रकारिता पुरस्कार, यशपाल साहित्य परिषद सम्मान, उदंत मार्तंड पत्रकारिता पुरस्कार और पंजाब कला साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित कई सम्मानों से नवाजा जा चुका है। श्री सहगल हिन्दी पत्रकारिता के सुनहरे हस्ताक्षरों में से एक हैं।  
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"वैचारिक जगत की सभी वैचारिक धाराओं का समन्वय करते हुए वास्तविकता की पत्रकारिता करने वाले पुरोधा श्री विजय सहगल एक अत्यंत सहज एवं सरल व्यक्ति हैं। उनकी प्रकृति में बंधुत्व एवं संवेदनाओं का आनंददायी समिश्रण हर कोई अनुभव करता हैं।" 
- प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

रौबदार संपादक

 ल गभग 50 साल से पत्रकारिता में सक्रिय श्रवण गर्ग हिन्दी मीडिया के नायाब हीरे हैं। वे उस कुम्हार की तरह हैं, जो काली-पीली मिट्टी से बेहद खूबसूरत और जरूरी बर्तनों को आकार देता है। हिन्दी पत्रकारिता में दैनिक भास्कर को ब्रांडनेम बनाने के लिए उन्हें सदैव याद रखा जाएगा। लोहे को छूकर सोना बना देने की उनकी पारसमणि की अलौकिक क्षमता का उपयोग फिलहाल जागरण ग्रुप कर रहा है। जागरण ग्रुप ने छजलानी बंधु से देश का प्रतिष्ठित समाचार-पत्र नईदुनिया खरीदा और उसे फिर से शिखर पर पहुंचाने की महती जिम्मेदारी रौबदार और संजीदा संपादक श्रवण गर्ग को सौंप दी है। 
     67 वर्ष में भी 'युवा ऊर्जा' से भरे श्रवण गर्ग के बारे में कहा जाता है कि उन्हें ना सुनने की आदत नहीं है। श्री गर्ग समस्याएं और बहाने नहीं सुनते, वे समाधान प्रिय सम्पादक हैं। गुस्से के तेज लेकिन अमूमन शांत दिखने वाले श्रवण गर्ग के कैबिन में अधूरा काम लेकर जाने की हिम्मत बड़े-बड़े धुरंधर भी नहीं कर पाते हैं। समाधानकारक और सकारात्मक सोच की मदद से ही उन्होंने दैनिक भास्कर को मध्यप्रदेश से निकालकर देशभर में जमाया और बड़ा नाम बनाया। यह कोई आसान काम नहीं था। स्थितियों और लोगों को पहचानने की उनकी क्षमता अद्भुत है। हिन्दी मीडिया को उन्होंने कई संपादक और पत्रकार चुनकर-गढक़र दिए हैं। दैनिक भास्कर के संपादक रहे श्रवण गर्ग हिन्दी पत्रकारिता जगत में महज एक चर्चित नाम ही नहीं है बल्कि वे अच्छा और बड़ा काम करने वालों के लिए उदाहरण एवं प्रेरणा पुंज बन गए हैं। हिन्दी पत्रकारिता के बेजोड़ सम्पादक श्रवण गर्ग बाहर से जितने कड़े दिखते हैं, भीतर से उतने ही मुलायम हैं। लिखने-पढऩे के अलावा वे घुम्मकड़ी और फोटोग्राफी के भी शौकीन हैं।
     भारत की आजादी के साल में 14 मई को इंदौर में जन्मे श्रवण गर्ग की प्रारंभिक शिक्षा मिनी मुंबई के नाम से मशहूर इसी शहर में हुई। इलेक्ट्रिक इंजीनियरिंग में डिप्लोमा प्राप्त श्री गर्ग को उनके माता-पिता इंजीनियर बनाना चाहते थे। कलकत्ता में इंजीनियरिंग में उनकी अच्छी-भली सरकारी नौकरी भी लग गई लेकिन हिन्दी मीडिया बांहें पसारे उन्हें बुला रहा था। सरकारी नौकरी छोडक़र वे अपने पसंदीदा क्षेत्र में काम करने चले आए। उन्होंने भारतीय विद्या भवन, दिल्ली से अंग्रेजी में पत्रकारिता का डिप्लोमा हासिल किया और वापस इंदौर लौट आए। नईदुनिया में काम शुरू किया। इसके बाद फ्री प्रेस, एमपी क्रॉनिकल (भोपाल) और कुछ समय इंडियन एक्सप्रेस समूह में भी बिताया। प्रभाष जी के साथ मिलकर दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस समूह का 'प्रजानीति' अखबार निकाला। बाद में यह बंद हो गया। बाद में जब दैनिक भास्कर के साथ जुड़े तो फिर श्रवण गर्ग भास्कर के पर्याय हो गए। एक तरह से दैनिक भास्कर के ब्रांड एम्बेसडर।
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"श्रवण गर्ग साहब संपादक नाम की संस्था के संभवतः आख़िरी वारिस हैं। एक ऐसे संपादक, जो हर हाल में बेहतर नतीज़े के लिए न केवल सिर्फ जूझते हैं, बल्कि अपनी पूरी टीम को झोंके रखते हैं। उनकी सम्पादकीय समझ का ही नतीज़ा है कि कई बड़े अख़बार सिर्फ इस कारण बड़े हो पाए क्यूंकि उनके संपादक श्रवण जी थे।" 
- प्रवीण दुबे, वरिष्ठ पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

'सिटी ऑफ जॉय' : कोलकाता

 को लकाता अपनी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत के लिए जितना प्रसिद्ध है, उतना ही अपनी भव्य इमारतों और दौड़ती-भागती जिन्दगी के लिए भी। यह दीगर बात है कि ज्यादातर भव्य इमारतें बूढ़ी हो चुकी हैं। ये ठीक वैसे ही दुर्दशा की शिकार हैं, जैसे नालायक औलाद की अनदेखी से बूढ़े मां-बाप का हाल होता है। साक्षात मां काली इस ऐतिहासिक शहर की संरक्षक देवी हैं। यह भगवान रामकृष्ण परमहंस और युवा नायक स्वामी विवेकानन्द की साधना-स्थली भी है। नजदीक ही हावड़ा स्थित बेलूर मठ में आत्मिक सुख की अनुभूति होती है। यहां पक्षियों की चहचहाहट क्लासिकल संगीत का सुख देती है। दक्षिणेश्वरी और कालीघाट के काली मंदिर में आध्यात्मिक ऊर्जा मिलती है। मैदान में हुगली (गंगा) किनारे टहलते हुए दिल बाग-बाग हो उठता है। कोलकाता के कॉफी हाउस आज भी बौद्धिक बहसों के अड्डे हैं। पुराने बाजारों का अपना ही ठाठ है। मिष्टी दोई, संदेश, रॉसगुल्ला का स्वाद और खुशबू कोलकाता से मोहब्बत करने के लिए काफी है। 
       सात नवम्बर, २०१४ को चम्बल एक्सप्रेस (ग्वालियर से हावड़ा) से हावड़ा पहुंचा। कोलकाता में पीले रंग की टैक्सी यातायात के प्रमुख साधनों में से एक है। भारत की पहली भूमिगत मेट्रो ट्रेन भी कोलकाता में है। यह इकलौता शहर है जहां अब भी ट्रॉम चलती है। ट्रॉम दो-तीन बोगी की छोटी ट्रेन है जो सड़क पर बिछे ट्रेक पर टैक्सी, बस और दीगर साधनों के साथ-साथ मंद गति से चलती हुई आपको दिख जाएगी। हावड़ा रेलवे स्टेशन से बाहर निकलते ही मैं प्रीपेड टैक्सी कर पार्क स्ट्रीट पहुंचा। पत्रकार मित्र तनय सरकार यहां मेरा इंतजार कर रहे थे। कोलकाता उनका गृहनगर है। उन्होंने ग्वालियर के लक्ष्मीबाई राष्ट्रीय शारीरिक शिक्षण संस्थान से खेल पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। मैंने जीवाजी विश्वविद्यालय से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म एण्ड मास कम्युनिकेशन (एमजेएमसी) किया है। लेकिन, हम दोनों के शिक्षक एक ही रहे हैं। जयंत सिंह तोमर। तनय अभी आकाशवाणी के लिए प्रोग्राम बनाते हैं। उनके सहयोग से पार्क स्ट्रीट में एक होटल तलाशा। सामान रखा। तैयार हुए। कैमरा निकाला और चल दिए 'सिटी ऑफ जॉय' से मिलने के लिए। कहते हैं कि ब्रिटिश अधिकारी जॉब चार्नोक ने वर्ष १६९० में कोलकाता की स्थापना की थी। हालांकि इस अवधारणा को कोलकाता हाईकोर्ट की एक खण्डपीठ ने १६ मई, २००३ को एक फैसले में यह कह कर पलट दिया है कि जॉब चार्नोक कोलकाता का संस्थापक नहीं है। पहले यह शहर कलकत्ता के नाम से जाना जाता था। लेकिन एक जनवरी, २००१ के बाद से पश्चिम बंगाल की राजधानी का आधिकारिक नाम कोलकाता हो गया। ज्यादातर लोगों का मानना है कि देवी काली की भूमि होने के कारण इसका नाम कोलकाता है। हालांकि कुछ लोगों की दूसरी दलीलें हैं इसके नाम को लेकर। वैसे मुगल बादशाह अकबर (शासनकाल १५५६-१६०५) के राजस्व खाते और बंगाली कवि बिप्रदास (सन् १४९५) की कृति 'मनसामंगल' में भी कालीकाता के नाम से शहर का जिक्र है। 
     
       तनय सरकार और मैंने तय किया कि ज्यादातर कोलकाता हम पैदल ही घूमेंगे ताकि तबियत से शहर को जान सकें। पार्क स्ट्रीट के पास ही स्थित सुनियोजित बाजार न्यू मार्केट और बस स्टैण्ड धर्मतला होते हुए हम मैदान पहुंचे। कोलकाता अपनी स्पोर्ट्स स्प्रिट के लिए खास पहचान रखता है। मैदान के समीप कई प्रसिद्ध फुटबाल, हॉकी और क्रिकेट क्लब हैं। अपने १५० साल पूरे कर रहे विश्व प्रसिद्ध क्रिकेट मैदान 'ईडन गार्डन' के सामने खड़े होकर फोटो खिंचवाया। यहां पांच दिन बाद भारत-श्रीलंका के बीच एकदिवसीय मैच खेला जाना था। उसकी तैयारी जोर-शोर से चल रही थी। जब मैं यह यात्रा वृत्तांत लिख रहा हूं, तब भारत-श्रीलंका के बीच वह मैच खेला जा चुका है। १३ नवम्बर, २०१४ को एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड ईडन गार्डन के खाते में आ गया। रोहित शर्मा ने वनडे मैच की सबसे बड़ी पारी खेली। उन्होंने २६४ रन का पहाड़ खड़ा कर दिया। सन् १९२० में स्थापित किया गया प्रसिद्ध ईस्ट बंगाल क्लब भी देखा। यहां से थोड़ा चलने पर सन् १८८९ में स्थापित किए गए मोहन बागान एथलेटिक क्लब के मैदान में पहुंच गए। इसे एशिया के सबसे पुराने फुटबॉल क्लब होने का गौरव प्राप्त है। देर शाम को शहर में स्थित मोहन बागान स्ट्रीट भी पहुंचे। यहां गली के बाहर उन धुरंधर खिलाडिय़ों की टीम की प्रतिमाएं स्थापित हैं जिन्होंने सन् १९११ में ईस्ट यॉर्कशायर रेजीमेंट को हराया था। यह पहली बार था जब किसी भारतीय टीम ने किसी यूरोपीय टीम को हराया था। यॉर्कशायर रेजीमेंट की टीम फुटबॉल  बूट पहनकर खेली थी जबकि मोहन बागान के टाइगर नंगे पैर ही मैदान में उतरे थे। लेकिन, उनके हौसले के सामने अंग्रेज टिक नहीं सके। परास्त हो गए। यहां आसपास कोलकाता पुलिस और आबकारी सहित अन्य स्पोर्ट्स क्लब भी हैं।
इन जांबाजों ने नंगे पैर फुटबॉल खेलकर यूरोपीय टीम को हराया था.
      हुगली (गंगा) के किनारे विशाल पार्क में टहलते हुए एक स्तम्भ तक पहुंचे। तनय ने बताया कि इसका संबंध ग्वालियर के मराठाओं से है। उनकी स्मृति में यह स्तम्भ बनाया गया है। थोड़ा आगे चले तो प्रिंसेस घाट देखा। अब अगला पड़ाव विक्टोरिया मेमोरियल था। सन् १९०६-२१ के बीच निर्मित यह स्मारक रानी विक्टोरिया को समर्पित है। मेमोरियल का स्थापत्य देखते ही बनता है। भवन के आसपास सुन्दर बगीचे हैं। इन बगीचों में कुछ प्रेमी युगल आपत्तिजनक हालत में दिख रहे थे। उनके सिर पर मोहब्बत (संभवत: वासना) का बेताल इस कदर चिपका हुआ था कि उन्हें ख्याल ही नहीं था कि यहां बहुत से लोग अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ भी आते हैं। बड़े-बुजुर्ग भी इन दृश्यों को देखकर असहज नजर आ रहे थे। खैर, संग्रहालय में शहर के इतिहास को संजोकर रखा गया है। इसमें विक्टोरिया से संबंधित वस्तुओं को भी प्रदर्शन के लिए रखा गया है। 
       अब अगला ठिकाना था नंदन। नंदन में एक साथ नौ फिल्मों का प्रदर्शन किया जा सकता है। सार्थक सिनेमा के प्रेमियों के लिए यह शानदार जगह है। हमेशा से कोलकाता फिल्म फेस्टीवल का आयोजन नंदन में होता रहा है। लेकिन, इस बार सरकार ने २०वें कोलकाता फिल्म फेस्टीवल का स्थान बदलकर नेताजी स्टेडियम रख दिया। कई सिनेप्रेमियों ने इसका विरोध किया है। बहरहाल, पैदल चल-चलकर थक गए थे। तरोताजा होने के लिए चाय पीने का मन था। मैंने तनय से पूछा कि मुझे नींबू चाय मांगनी है तो बांग्ला में कैसे बोलेंगे? उसके बताने के बाद मैंने जुबान संभालते हुए, शब्दों को जमाते हुए चायवाले को कहा - 'दो टो लीमूचा दीन।' चायवाले ने दो चाय दीं और दस टका लिए। यहां रुपये को टका कहते हैं। हालांकि तकनीकीतौर पर रुपये को टका कहना गलत है। टका बांग्लादेश की आधिकारिक मुद्रा है, जो रुपये से आधा होता है। लेकिन, पूरे पश्चिम बंगाल में रुपये को टका ही कहते हैं। एक खास बात यहां बताना चाहूंगा कि सुबह से एक बात मैंने बार-बार दुकान, होटल और शोरूम में पढ़ी - '५०० और १००० के नोट स्वीकार नहीं किए जाएंगे।' जिस बात का अंदेशा था, पूछताछ के बाद वही सच निकला। बांग्लादेश और पाकिस्तान से भारी संख्या में पश्चिम बंगाल में जाली नोट खपाए जा रहे हैं। बांग्लादेश के अवैध घुसपैठियों के कारण यहां के लोग बहुत परेशान हैं। बेरोजगारी, जनसंख्या दबाव और अपराध का बड़ा कारण बांग्लादेशी घुसपैठ है। इस घुसपैठ को वोटबैंक के चक्कर में राजनीतिक संरक्षण प्राप्त है। कोलकाता अपनी दुर्दशा पर जो आंसू बहा रहा है, उसके पीछे कम्युनिस्ट पार्टियों की राजनीति है। लम्बे समय तक पश्चिम बंगाल में शासन करने के बाद भी कम्युनिस्ट कोलकाता को संवार नहीं सके बल्कि अपनी विरासत का संरक्षण भी ठीक से नहीं कर सके। कभी ब्रिटिश भारत की राजधानी रहा कोलकाता आज अन्य शहरों के मुकाबले प्रत्येक क्षेत्र में पिछड़ गया है। 
       ठाकुरबाड़ी में रवीन्द्रनाथ ठाकुर का घर है। यहां उनका जन्म हुआ था। उनके घर को देखने के लिए देश-दुनिया से लोग आते हैं। देर से पहुंचने के कारण वह बंद हो गया था। बाहर से ही देखकर हम लौट आए। कॉलेज स्क्वायर के आसपास किताबों का सबसे बड़ा बाजार देखा। कोलकातावासी पढऩे-लिखने में गहरी रुचि रखते हैं। आपको समाचार-पत्र, पत्रिका और किताबों की दुकानें सब दूर मिल जाएंगी। कोलकाता विश्वविद्यालय के नजदीक ही कॉलेज स्ट्रीट में मशहूर कॉफी हाउस है। असल में यह है तो बंकिम चटर्जी स्ट्रीट पर लेकिन, लोग कॉलेज स्ट्रीट कॉफी हाउस के नाम से ही जानते हैं। यहां कॉफी-कल्चर अब भी जिन्दा है। पुरानी रवायत के साथ। शाम के वक्त बमुश्किल कोई सीट खाली मिलती है। करीब १५ मिनट इंतजार के बाद बैठने के लिए जगह मिली। सब ओर दीवारों पर खूबसूरत पेंटिग्स लगे हैं। पेंटिंग देखकर मन आल्हादित हो रहा था लेकिन मीनू देखा तो चिंता बढ़ गई। पचास व्यंजन में से महज तीन व्यंजन ही शाहकारी थे। वेटर उत्तरप्रदेश का था। उसने भावनाओं को समझा और फ्राइड राइस लेकर आ गया। बताया जाता है कि यह भवन सन् १८८२ में बना था। तब इसे अल्बर्ट हॉल कहते थे। वर्ष १९४२ कॉफी बोर्ड ने यहां कॉफी हाउस शुरू किया। कहते हैं कि रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुभाषचंन्द्र बोस, सत्यजीत रे और अमर्त्य सेन जैसी हस्तियां भी यहां आते रहें हैं। गपशप, बौद्धिक बहस, वाग्विलास और धुंए के छल्ले उड़ाने का यह बेहतर ठिकाना है। अगले दिन कालीघाट, बेलूर मठ और दक्षिणेश्वरी जाने की योजना के साथ तनय सरकार से विदा ली। विदा क्या ली, वह मुझे ही मेरे होटल तक छोडऩे आया था। 
       
युवा नायक स्वामी विवेकानन्द की साधना-स्थली देखने की हूक ने रातभर ठीक से सोने नहीं दिया। बहुत थकने के बाद भी सुबह जल्दी हो गई। जैसे सूरज दादा अपने उजाले में कोलकाता दिखाने के लिए घर से जरा जल्दी निकल आए हों। तनय सरकार के आने तक अकेले ही कोलकाता के बाजार में टहला। इमारतों पर खूबसूरत नक्काशी का काम देखा। कोलकाता में बहुत सी इमारतें गोथिक, बरोक, रोमन और इंडो-इस्लामिक स्थापत्य शैली की हैं। पार्क स्ट्रीट मेट्रो स्टेशन से भारत की पहली भूमिगत मेट्रो में बैठे कालीघाट स्टेशन तक। दिन की शुरुआत कोलकाता की संरक्षक देवी मां काली के दर्शन से की। बेलूर जाने के लिए सबसे पहले बस से हावड़ा रेलवे स्टेशन पहुंचे। यहां से दूसरी बस पकड़ी। बस ने ठीक बेलूर मठ के सामने उतारा। बेलूर मठ के परिसर में प्रवेश करने के बाद सचमुच असीम शांति की अनुभूति हुई। वैराग्य। लेकिन, सामाजिक जिम्मेदारियों से भरा वैराग्य। स्वामी विवेकानन्द की तरह। बेलूर मठ रामकृष्ण मिशन का मुख्यालय है। इसकी स्थापना १८९९ में स्वामी विवेकानंद ने की थी। मुख्य मंदिर में भगवान रामकृष्ण परमहंस की आदमकद प्रतिमा है। परिसर गंगा के किनारे है। यहां घाट पर बैठकर आप घंटों आनंद के साथ गुजार सकते हैं। गंगा को छूकर आने वाली ठण्डी हवा झौंके मां के आंचल की शीतलता का अहसास कराते हैं। हुगली नदी के पूर्वी तट पर स्थित दक्षिणेश्वर काली मंदिर जाने के लिए यहीं से बोट मिलती है। महज दस रुपये प्रतिव्यक्ति किराया। करीब २०-३० मिनट बोट ने दक्षिणेश्वर काली मंदिर के घाट पर पहुंचा दिया। रास्ते में गंगा किनारे पर जमीदारों के निजी घाट भी देखे। हालांकि अब वे सार्वजनिक घाट हो गए हैं। कोलकाता के बंगाली बाबुओं के किस्से भी खूब मशहूर हैं। बाबू लोग अय्यास और शौकीन थे। बताते हैं कि बाबू अंग्रेजों के प्रभाव में आ गए थे। उनके रंग में रंगने के लिए हरसंभव प्रयास करते थे। उनकी तरह कपड़े पहनना। उनके जैसे शौक पालना। भारतीय मूल्यों को हिकारत की नजर से देखते थे। लेकिन, अंग्रेज उन्हें अपने से हीन ही समझते रहे। बंगाल के क्रांतिकारियों, समाजसेवियों और बौद्धिक जगत के लोगों ने 'बाबू संस्कृति' का जमकर विरोध किया। फिल्म आनंद में अपने समय से सुरपस्टार राजेश खन्ना ने तो 'बाबू मोशाय' शब्द बोलकर प्रत्येक भारतवासी के जुबान पर यह शब्द चढ़ा दिया है। हालांकि अब बाबू का मतलब वह नहीं रह गया है जिसका कभी बंगाल के स्वतंत्रतासेनानियों ने विरोध किया। अब तो किसी को प्यार से बुलाने के लिए बाबू शब्द का इस्तेमाल करते हैं। 
       कम समय था इसलिए बहुत सा कोलकाता छूट गया। एशिया में अपनी तरह का पहला शहर साइंस सिटी, भारतीय विरासत का विशाल भण्डार भारतीय संग्रहालय (इंडियन म्यूजियम) और बॉटनीकल गार्डन, जहां विश्व का दूसरा सबसे बड़ा बरगद का पेड़ है। ये नहीं देख सका। देखने का मन है। कोलकाता फिर बुलायेगा, तब कोलकाता दर्शन पूरा करूंगा। किसी को भी 'दा' कहकर बुलाना, भयंकर जाम में बस का सफर, ट्रॉम की टन-टन, शाकाहारी खाने की तलाश, रॉसगुल्ला की मिठास सदैव स्मृतियों में रहेगा। बहरहाल, पर्यटन के नजरिए से नवम्बर से मार्च के बीच में कोलकाता जाना बेहतर रहेगा।
प्रिंसेस घाट के पार्क में.

दक्षिणेश्वरी काली मंदिर

बेलूर मठ से दक्षिणेश्वरी के लिए नाव से जाते हुए.

हुगली के किनारे मैदान पार्क में ग्वालियर के मराठों की स्मृति में निर्मित स्तम्भ.

दक्षिणेश्वरी काली मंदिर.

विक्टोरिया मेमोरियल में कर्जन की प्रतिमा.

खेल पत्रकार तनय सरकार के साथ ईस्ट बंगाल क्लब के बाहर.

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

एक्टीविस्ट जर्नलिस्ट

 ए क युवक, जिसे डॉक्टरों के मुताबिक 12-13 साल पहले करीब 30 वर्ष की आयु में ही दुनिया को अलविदा कह देना था। अंग्रेजी दवाओं के साइड इफैक्ट से जिसका शरीर खोखला हो चुका था। फेफड़े और लीवर डैमेज की स्थिति में थे। वह युवक छोटी उम्र से डायबिटीज जैसी बीमारी से जूझ रहा था। आंखों की रोशनी ऐसी हो गई थी कि उसे लगता था जैसे कि वह कुहासे के भीतर से देख रहा हो। वर्षों तक 2-3 घण्टे ही बमुश्किल सो सकता था। अल्सर और एसिडिटी का हाल यह था जैसे पेट में आग जल रही हो। अपने हौसले, अपने लड़ाका स्वभाव और नियमित छोटे-छोटे प्रयोगों के अभ्यास से वह युवक आज न केवल स्वस्थ है बल्कि शारीरिक और वैचारिक स्तर पर समाज को भी स्वस्थ करने की दिशा में प्रयत्नशील है। संत समीर समाजकर्मी हैं, आंदोलनकारी हैं और लड़ाका किस्म के पत्रकार हैं। अपनी बीमारियों से लड़ते-लड़ते समाजशास्त्र से स्नातकोत्तर करने वाले समीर जी स्वदेशी चिकित्सक भी हो गए।
      उत्तरप्रदेश के भगवानपुर गांव में 10 जुलाई, 1970 को जन्मे संत समीर फिलहाल हिन्दुस्तान टाइम्स समूह की प्रतिष्ठित मासिक पत्रिका कादम्बिनी के मुख्य कॉपी संपादक हैं। नब्बे के दशक में वैकल्पिक पत्रकारिता के रास्ते उन्होंने खबरों की दुनिया में कदम रखा। प्रतिष्ठित फीचर सर्विस 'स्वदेशी संवाद सेवा' में समीर जी ने करीब आठ साल तक संपादन कार्य किया। वे बहुराष्ट्रीय उपनिवेशवाद, वैश्वीकरण और डब्ल्यूटीओ जैसे मुद्दों पर बहस की शुरुआत करने वाली इलाहाबाद से प्रकाशित पत्रिका 'नई आजादी उद्घोष' के संपादक और सलाहकार संपादक भी रहे। आजाद भारत में पहली बार बहुराष्ट्रीय उपनिवेश के खिलाफ अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में स्वदेशी-स्वावलंबन का आंदोलन खड़ा करने वालों में भी संत समीर का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। बहरहाल, व्यावसायिक पत्रकारिता के तौर पर उन्होंने सबसे पहले पूर्वी उत्तरप्रदेश के अखबार 'जनमोर्चा' के लिए खबरनवीसी की। बाद में न्यूज एजेंसी 'ईएमएस' और क्रॉनिकल समूह के पाक्षिक 'प्रथम प्रवक्ता' से जुड़े। 
      'हिन्दी की वर्तनी' और 'अच्छी हिन्दी कैसे लिखें' सहित कई चर्चित किताबों के लेखक संत समीर के तमाम लेखों की अनुगूंज विधानसभाओं और संसद तक पहुंची है। हाल ही में दिल्ली चुनाव के बाद 'आप के विधायकों के नाम खुला खत' शीर्षक से लिखी गई उनकी लम्बी चिट्ठी खासी चर्चित हुई। सही मायने में यह चिट्ठी न केवल आम आदमी पार्टी बल्कि भ्रष्ट होती जा रही समूची भारतीय राजनीति के लिए एक दिशाबोध भी थी। बेहद संवेदनशील और विनम्र स्वभाव के संत समीर जिंदगी को बड़े करीब से जीते हैं। गरीब बच्चों को पढ़ाना, नि:शुल्क चिकित्सकीय परामर्श के साथ होम्योपैथी दवाएं बांटना और जिंदगी से निराश हो चुके लोगों का हौसला बढ़ाना, उनकी दिनचर्या का हिस्सा हो गए हैं। 
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"हिंदी पत्रकारिता में भाषा-संहार के इस युग में संत समीर उन विरले पत्रकारों में से हैं जो शुद्ध भाषा के आग्रही हैं और अच्छी हिंदी लिखने के लिए सहायक ग्रंथों की रचना भी कर रहे हैं।
- विजयदत्त श्रीधर, संस्थापक-संयोजक, सप्रे संग्रहालय, भोपाल
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
  

शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

सबके साथी

 ध रती पर अगर स्वर्ग कहीं है तो वह है जम्मू-कश्मीर। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की बड़ी आबादी को भयंकर कष्ट भोगने को विवश होना पड़ रहा है। स्वर्ग का सुख उनके नसीब में नहीं है। लाखों की संख्या में कश्मीरी पण्डितों को अपने ही देश में विस्थापित होकर बसर करना पड़ रहा है। अपने ही देश में पराए बनकर खुशी से रहा जाता है क्या? जम्मू-कश्मीर के धवल शिखरों को जब आतंकवादियों और अलगाववादियों ने लाल रंग में रंगना शुरू किया, खासकर कश्मीरी पण्डितों को निशाना बनाया गया तो मजबूरन उन्हें अपना आशियाना छोडऩा पड़ा। इस विस्थापन में अपने परिवार के साथ एक बच्चे ने भी घर छोड़ा था। आज यह बच्चा देश का सम्मानित और प्रख्यात टीवी पत्रकार है। नाम है राजेश रैना। दुनिया के तमाम संघर्ष से तपकर आगे आए राजेश रैना सदैव दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। वे सौम्य हैं, सरल हैं और सहज हैं। 
      जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के खूबसूरत गांव सलिया में 01 अक्टूबर, 1970 को जन्मे राजेश रैना के दिल में आज भी अपनी धरती से जुदा होने का दर्द है। भले ही वे देश के सबसे बड़े रीजनल न्यूज नेटवर्क समूह ईटीवी के समूह सम्पादक हो गए हों। लेकिन, आज भी वे अपनी जमीन को शिद्दत से याद करते हैं, महसूस करते हैं। अपनी जमीन के लिए उनके मन की तड़प को कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि श्री रैना जम्मू से अपनी पढ़ाई पूरी करने के तत्काल बाद दूरदर्शन के न्यूज कास्टर बनकर सीधे श्रीनगर की खूबसूरत वादियों में पहुंच गए। तमाम आशंकाओं और खतरों के बीच यहां करीब छह साल तक उन्होंने पत्रकारिता की। इसके बाद एक निजी टीवी चैनल का हिस्सा होकर दिल्ली चले आए। लेकिन, दिल्ली में उनका दिल ज्यादा लगा नहीं। जम्मू-कश्मीर के बाद हैदराबाद को उन्होंने अपना दूसरा घर बना लिया। रामोजी राव के टीवी नेटवर्क ईटीवी (अब टीवी१८ ग्रुप का हिस्सा) से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा। रामोजी राव से प्रेरित होकर अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के दम पर राजेश रैना ने जो मुकाम हासिल किया है, मीडिया जगत में उसे पाने के सपने कई लोग देखते हैं। 
      हिन्दी, कश्मीरी, तेलगू, उर्दू और अंग्रेजी, पांच भाषाओं के जानकार और एक दशक से अधिक वक्त से इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सक्रिय राजेश रैना ने ईटीवी के उर्दू चैनल को नई ऊंचाइयां दी हैं। 15 अगस्त, 2014 को उर्दू ईटीवी की 13वीं वर्षगांठ शानदार अंदाज में पूरी हुई है। उनके गरिमापूर्ण नेतृत्व में ईटीवी उर्दू, ईटीवी कन्नड़ और ईटीवी गुजराती को सफलतापूर्वक लांच किया गया। शिखर पर पहुंचने के बाद भी मिलनसार स्वभाव के राजेश रैना जमीन से जुड़े हुए हैं। वे खुलकर लोगों से मिलते हैं, उन्हें पूरी तन्मयता के साथ सुनते और समझते हैं।
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"राजेश रैना उस शख्सियत का नाम है, जो सबको साथ लेकर चलते हैं और सबके साथ चलते हैं। ईटीवी उर्दू को ऊंचाईयां देने में उन्होंने जो मेहनत की है वह काबिले तारीफ है।" 
- तहसीन मुनव्वर, पत्रका
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
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सोमवार, 1 दिसंबर 2014

राष्ट्रवादी विचारक

 उ न्हें पत्रकार, संगठक, लेखक, चिंतक, विचारक, शिक्षाविद और साहित्यकार के रूप में पहचाना जाता है। उनको चाहने वाले हर भूमिका में उन्हें फिट पाते हैं। उन्होंने भी प्रत्येक जिम्मेदारी को पूरी तरह निभाया है। पत्रकारिता के सर्वाधिक प्रतिष्ठित संस्थान माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल के संस्थापक कुलपति (तब महानिदेशक) होने का गौरव उन्हें हासिल है। जी हां, हम बात कर रहे हैं ध्येयनिष्ठ पत्रकार राधेश्याम शर्मा की। उन्होंने अपने चार साल के कार्यकाल में शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक गतिविधियों से विश्वविद्यालय को देशभर में पहचान दिलाई। आज शायद ही देश का कोई मीडिया हाउस होगा जहां इस विश्वविद्यालय के विद्यार्थी पत्रकारिता को नये आयाम न दे रहे हों। 
      राजस्थान के गांव जोनाइचकलां में 01 मार्च 1934 को जन्मे श्री शर्मा पत्रकारिता और पत्रकारिता के विद्यार्थियों के हित की सदैव चिंता करते रहे हैं। विद्यार्थियों के बीच रहना उन्हें बहुत भाता है। वे माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय से ही नहीं वरन् पंजाब यूनिवर्सिटी, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर, रानी अहिल्याबाई यूनिवर्सिटी इंदौर, गुरु घासीदास यूनिवर्सिटी बिलासपुर में भी पत्रकारिता के अध्यापन से जुड़े रहे हैं। किताबें नई राह दिखाती हैं, दिमाग की खिड़कियां खोलती हैं और ज्ञान का विस्तार करती हैं। किताबें एक से दूसरे हाथ पहुंचे, विद्यार्थी उनका लाभ ले सकें, इसीलिए उन्होंने अपनी किताबी दौलत माखनलाल चतुर्वेदी विश्वविद्यालय को समर्पित कर दी। साहित्य अकादमी हरियाणा से प्रकाशित 'जनसंचार' और 'हिंदी पत्रकारिता एवं विविध आयाम' उनकी दो महत्वपूर्ण पुस्तकें हैं।   
      वर्ष 1952 में काशी हिंदी विश्वविद्यालय में पढ़ते हुए बनारस से प्रकाशित जनसत्ता से बतौर संवाददाता पत्रकारीय जीवन की शुरुआत करने वाले राधेश्याम शर्मा ने भविष्य में पत्रकारिता को नए आयाम दिए। वे छह साल तक जबलपुर से प्रकाशित युगधर्म के संपादक रहे। 1978  में वे दैनिक ट्रिब्यून, चंडीगढ़ से जुड़ गए और 1982 से 90 तक वहां संपादक रहे। 1997 में चंडीगढ़ और धर्मशाला से प्रकाशित दिव्य हिमाचल के संपादकीय सलाहकार रहे। देश के बड़े अखबारों में शुमार दैनिक भास्कर समूह ने भी चंडीगढ़ संस्करण को मजबूत करने के लिए लम्बे सफर के दौरान पत्रकारिता में कमाए श्री शर्मा के अनुभव का लाभ लिया। साहित्यिक अभिरुचि और पत्रकारिता जगत में उनकी प्रतिष्ठा को देखते हुए हरियाणा सरकार ने 2005 में उनको हरियाणा साहित्य अकादमी का निदेशक नियुक्त किया। दो साल के सेवाकाल में उन्होंने अपनी संगठक दक्षता से युवा साहित्यकारों, कवियों और लेखकों को अच्छी संख्या में अकादमी से जोड़ा। 
     हिन्दी पत्रकारिता में श्री शर्मा के योगदान को भारतीय पत्रकार जगत तो सदैव याद करेगा ही, मध्यप्रदेश सरकार ने भी मामा माणिकचंद वाजपेयी राष्ट्रीय पुरस्कार से उनकी ध्येयनिष्ठ, मूल्याधारित और उद्देश्यपूर्ण पत्रकारिता का सम्मान किया है। श्री शर्मा को बलराज साहनी, मातुश्री, राज बदलेव, बाबू बालममुकुंद गुप्त सहित गणेश शंकर विद्यार्थी पत्रकारिता पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है।
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"राष्ट्रवादी विचारक, सत्य को समर्पित पत्रकार, अध्यापक के रूप में गुरु एवं एक मार्गदर्शक मित्र श्री राधेश्याम शर्मा का समग्र व्यक्तित्व आज की पीढ़ी के लिए अनुकरणीय है।
- प्रो. बृजकिशोर कुठियाला, कुलपति, माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

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