शुक्रवार, 28 नवंबर 2014

विश्व बंधुत्व और शांति का संदेश देता है सांची


साँची स्थित मुख्य स्तूप (स्तूप क्रमांक-1) फोटो : लोकेन्द्र सिंह/Lokendra /Singh 
 जी वन में चलने वाले रोज-रोज के युद्धों से आपका मन अशांत है, आपकी आत्मा व्यथित है, आपका शरीर थका हुआ है तो बौद्ध तीर्थ सांची चले आइए आपके मन को असीम शांति मिलेगी। आत्मा अलौकिक आनंद की अनुभूति करेगी। शरीर सात्विक ऊर्जा से भर उठेगा। सांची के बौद्ध स्तूप प्रेम, शांति, विश्वास और बंधुत्व के प्रतीक हैं। मौर्य सम्राट अशोक को बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा के लिए प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर एकान्त स्थल की तलाश थी। ताकि एकांत वातावरण में बौद्ध भिक्षु अध्ययन कर सकें। सांची में उनकी यह तलाश पूरी हुई। जिस पहाड़ी पर सांची के बौद्ध स्मारक मौजूद हैं उसे पुरातनकाल में बेदिसगिरि, चेतियागिरि और काकणाय सहित अन्य नामों से जाना जाता था। यह ध्यान, शोध और अध्ययन के लिए अनुकूल स्थल है। कहते हैं महान सम्राट अशोक की महारानी ने उन्हें सांची में बौद्ध स्मारक बनाने का सुझाव दिया था। महारानी सांची के निकट ही स्थित समृद्धशाली नगरी विदिशा के एक व्यापारी की पुत्री थीं। सम्राट अशोक के काल में ही बौद्ध धर्म के अध्ययन और प्रचार-प्रसार की दृष्टि से सांची कितना महत्वपूर्ण स्थल हो गया था, इसे यूं समझ सकते हैं कि सम्राट अशोक के पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा ने भी कुछ समय यहीं रहकर अध्ययन किया। दोनों भाई-बहन बौद्ध धर्म की शिक्षाओं के प्रचार-प्रसार के लिए सांची से ही बोधि वृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका गए थे। सांची के स्तूप सिर्फ बौद्ध धर्म के अनुयायियों के लिए ही श्रद्धा के केन्द्र नहीं हैं बल्कि दुनियाभर के लोगों के लिए आकर्षण का केन्द्र हैं। ये स्तूप आज भी भगवान बुद्ध की शिक्षाओं को देश-दुनिया में पहुंचा रहे हैं। दुनिया को शांति, सह अस्तित्व और विश्व बंधुत्व की भावना के साथ रहने का संदेश दे रहे हैं।  
       भगवान गौतम बुद्ध ने जब देह त्याग किया तो उनके शरीर के अवशेषों पर अधिकार पाने के लिए उनके अनुयायी राजा आपस में झगड़ा करने लगे। तब, एक बौद्ध संत ने इन राजाओं को समझाया और भगवान बुद्ध के शरीर के अवशेष को आठ हिस्सों में इन राजाओं को बांटकर सुलह कराई। इन अवशेषों पर प्रारंभ में आठ स्तूपों का निर्माण किया गया। इसके बाद बौद्ध धर्म का प्रचार-प्रसार इन स्तूपों को प्रतीक मानकर किया जाने लगा। विद्वान मानते हैं कि सम्राट अशोक ने इन आठों स्तूपों को खुलवाकर उनमें से भगवान बुद्ध के अवशेषों को निकालकर कई हिस्सों में बांटा और उन पर अनेक स्तूप बनाये। सांची का स्तूप भी उनमें से एक है। लोक मान्यता है कि सांची के महास्तूप (स्तूप क्रमांक-1) में भगवान बुद्ध के अस्थि अवशेष सुरक्षित हैं। हालांकि, अंग्रेज जनरल कनिंघम ने महास्तूप को खुलवाया था, तब उसमें किसी भी प्रकार के अवशेष प्राप्त नहीं हुए। सम्राट अशोक द्वारा निर्मित महास्तूप सांची स्थित सभी स्तूपों में बड़ा और सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र भी। महास्तूप का आकार प्रारंभ में इतना विशाल नहीं था जितना वर्तमान में है। शुंग काल में महास्तूप का परिवर्धन-परिवर्तन कराया गया था। इससे स्तूप का आकार लगभग दोगुना हो गया। स्तूप के चारों ओर भूमिस्थ वेदिका, चारों दिशाओं में चार अलंकृत तोरण, मेधि वेदिका और मेधि तक पहुंचने के लिए सोपान हैं। चारों ओर बने तोरणों पर जातक कथाओं और भगवान बुद्ध के जीवन से संबंधित घटनाओं को उत्कीर्ण किया गया है। इनमें दो कथाएं बेहद मार्मिक हैं। एक कथा युवराज वसंतारा से संबंधित है। वसंतारा ने धर्म और दया की स्थापना के लिए अपने धन, अपनी पत्नी और बच्चों तक को दान में दे दिया था। दूसरी कथा तथागत से संबंधित है। जिसमें भगवान बुद्ध ने महान वानरराज के रूप में अपने सहकर्मियों की प्राण रक्षा के लिए अपना ही उत्सर्ग कर दिया। पत्थर पर यह कारीगरी इस तरह मालूम पड़ती है जैसे किसी अत्यंत कुशल कलाकार ने कागज पर पेंसिल से चित्रकथा बनाई हो। इन तोरण-द्वारों का निर्माण शुंग सातवाहन काल में हुआ था। इसका प्रमाण दक्षिणी तोरण-द्वार पर अंकित अभिलेख से मिलता है। चारों तोरणों के सामने स्तूप से सटकर भगवान बुद्ध की चार मूर्तियों की स्थापना पांचवी सदी में की गई थी। स्तूप के सबसे ऊपर केन्द्र में छत्र और इसके चारों ओर वर्गाकार हर्मिका है। 
मुख्य स्तूप के द्वार पर कलाकृति. फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
       महास्तूप के साथ ही यहां स्तूप क्रमांक-दो और तीन भी आकर्षण के केन्द्र हैं। आकार-प्रकार में ये भी महास्तूप के समान अर्धचन्द्राकार हैं। दरअसल, अर्धचन्द्राकार स्तूप वस्तुत: आकाश अथवा ब्रह्माण का प्रतीक माना जाता है। बौद्ध स्तूपों के ऊपरी भाग में चौकोर हर्मिका होती थी। इस हर्मिका में धातु को रखा जाता था। वस्तुत: यह हर्मिका स्वर्गलोक का प्रतीक होती थी। हर्मिका की छत्र-यष्टि साधना का प्रतीक थी। छत्र तीन, सात या चौदह होते थे। स्तूप से सटकर चबूतरे पर चारों ओर वृत्ताकार प्रदक्षिणा-पथ बनाया जाता था। इस पथ को 'मेधि' कहा जाता है। स्तूप के आसपास भूमि पर भी एक और प्रदक्षिणा-पथ बनाया जाता था। यह प्रदक्षिणा-पथ उपासकों के स्तूप से कुछ दूर रहकर परिक्रमा करने के लिए बनाया जाता था। इसका उद्देश्य स्तूपों की पवित्रता को बनाये रखना था। स्तूप क्रमांक-दो में दस बौद्ध भिक्षुओं के अस्थि अवशेष सुरक्षित हैं। स्तूप क्रमांक-तीन में तथागत (बुद्ध) के दो शिष्यों सारिपुत्त और महामोगलनस के अस्थि शेष प्राप्त हुए हैं। इन्हें श्रीलंका भेज दिया गया था लेकिन भारत की स्वाधीनता के बाद वहां से वापस मंगवाकर सांची में बनाए गए बौद्ध मंदिर में इन्हें रखवा दिया गया है। प्रतिवर्ष नवम्बर माह के अंतिम रविवार को इन अस्थियों को दर्शनार्थ रखा जाता है। बाद में, इन्हें स्तूपों के चारों ओर प्रदक्षिणा करके मंदिर में रख दिया जाता है। बुद्ध के शिष्यों की अस्थियों के दर्शन के लिए सांची में देश-दुनिया से धर्मावलंबी आते हैं। 
बौद्ध विहार इक्यावन. फोटो : लोकेन्द्र सिंह
       सम्राट अशोक के समय में सांची बौद्ध शिक्षा-दीक्षा और साधना का बड़ा केन्द्र बन गया था। यहां स्थित बौद्ध मंदिर, चैत्यालय और विहार के अवशेष आज भी इसकी गवाही देते हैं। महास्तूप (स्तूप क्रमांक-1) के सामने ही चैत्यालय है। यहां बौद्ध भिक्षुओं को शिक्षा दी जाती थी। इसका ऊपरी भाग नष्ट हो चुका है। यहां शिक्षा लेने वाले बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए विहार और संघाराम के अस्तित्व भी सांची में हैं। जिनमें विहार इक्यावन बड़ा है। भिक्षुओं के आवास के लिए इसमें कई कक्ष हैं। यह विहार पूर्व से पश्चिम में 32.69 मीटर चौड़ा और उत्तर से दक्षिण में 33.22 मीटर लंबा है। विहार में अशोक के समय की ईंटें भी देखी जा सकती हैं। विहार इक्यावन के पीछे ही पत्थर का विशाल कटोरा है, जिसमें से भिक्षुओं को अन्न बांटा जाता था। महास्तूप के दक्षिणी तोरण-द्वार के पास ही सम्राट अशोक द्वारा बनवाया गया स्तम्भ दस है। स्तम्भ पर ब्राह्मी लिपि में मौर्य सम्राट अशोक की राजज्ञा अंकित है। इसके समीप ही बौद्ध मंदिर भी स्थित है। 
साँची स्थित प्राचीन मंदिर. फोटो : लोकेन्द्र सिंह
      मौर्य, शुंग, कुषाण सातवाहन और गुप्तकाल तक सांची बौद्ध शिक्षा का प्रमुख केन्द बना रहा। राजपूत काल में भी इन बौद्ध स्मारकों की कीर्ति थी लेकिन मुगलों की सत्ता आने के बाद सांची गुमनामी के अंधेरे में खो गया था। वर्ष 1818 में अंग्रेज जनरल टेलर ने इन बौद्ध स्मारकों की पुन: खोज की। बाद में जनरल जॉनसन, जनरल कनिंघम, कैप्टन मैसी, मेजर कोल और सर जॉन मार्शन ने इन बौद्ध स्मारकों का अन्वेषण, उत्खनन और संरक्षण करवाया। वर्ष 1989 में यूनेस्को ने जब सांची स्थित बौद्ध स्मारकों को विश्व धरोहरों की सूची में शामिल किया तब इन्हें अन्तरराष्ट्रीय पहचान मिल गई। सांची स्थित बौद्ध स्मारक फिर से दुनिया की नजर में आ गए हैं। सांची के आसपास बौद्ध स्मारकों का खजाना है। सांची से लगभग 14 किलोमीटर की दूरी पर चौथी से दसवीं शताब्दी तक निर्मित उदयगिरी की गुफाएं भी स्थित हैं। सांची के नजदीक ही बौद्ध धर्म से संबंधित सतधारा और सोनारी भी है। विदिशा से करीब 46 किलोमीटर की दूरी पर ग्यारसपुर है। ग्यारसपुर में आठ खम्बों का विशाल मंदिर सहित अन्य पुरातत्व महत्व के मंदिरों के अवशेष हैं। इसके साथ ही ग्यारसपुर में बौद्ध स्तूपों के अवशेष भी हैं। पत्थरों के मुख से इतिहास को सुनने की रुचि आपकी है तो सांची एक अच्छा स्थान है। यहां आकर आप मौर्य, शुंग और गुप्तकाल में निर्मित बौद्ध स्मारकों की सादगीपूर्ण भव्यता देखकर आल्हादित तो होओगे ही, शांत वातावरण में भगवान बुद्ध के संदेशों को भी समझ सकोगे।  
कैसे पहुंचे : सांची रायसेन जिले का एक छोटा-सा कस्बा है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से करीब 50 किलोमीटर की दूरी है जबकि विदिशा से महज 10 किलोमीटर की दूरी पर सांची है। सांची रेलवे लाइन से तो जुड़ा है लेकिन एक्सप्रेस गाडिय़ां यहां नहीं रुकती हैं। सांची आने के लिए सबसे बढिय़ा है कि आप पहले भोपाल आएं। भोपाल घूमें। भोपाल से निजी कार या बस से सांची पहुंचें। निजी वाहन से आए तो सांची के आसपास के रमणीय और पुरातत्व महत्व के स्थान देखने में सुविधा होगी। हवाई मार्ग से आना हो तो भोपाल सबसे नजदीकी हवाई अड्डा है। ठहरने के लिए सांची में मध्यप्रदेश पर्यटन का गेटवे रिट्रीट है। रेस्ट हाउस भी एक अच्छा विकल्प है। श्रीलंका महाबोद्धी सोसाइटी के गेस्ट हाउस में भी ठहरने की व्यवस्था है। कुछेक निजी होटल भी हैं। यूं तो वर्षभर यहां पर्यटक और धर्मावलंबी आते हैं लेकिन सांची देखने का सबसे अच्छा वक्त अक्टूबर से मार्च है। 
भोपाल से साँची के रास्ते में. फोटो : हरेकृष्ण दुबोलिया 

मित्र हरेकृष्ण दुबोलिये. फोटो : लोकेन्द्र सिंह

मुख्य स्तूप का प्रवेश द्वार. फोटो : लोकेन्द्र सिंह

बौद्ध विहार इक्यावन के सामने. फोटो : हरेकृष्ण दुबोलिया 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

मीडिया में शिवसैनिक

 अ नूठी लेखन शैली, वाकपटुता, प्रतिबद्धता, गंभीर अध्ययन, बेबाक बयानी और धारदार तर्क प्रेम शुक्ल को निर्भीक पत्रकारों की श्रेणी में सबसे आगे खड़ा करते हैं। मंच से भाषण दे रहे हों, टीवी चैनल्स पर बहस में शामिल हों या फिर पत्रकार के रूप कलम चला रहे हों, प्रेम शुक्ल में दिल-दिमाग में कोई कन्फ्यूजन नहीं होता। उन्हें पता है कि कहां खड़ा होना है। सच्चाई का पक्ष लेना और सही बातों को बिना लाग-पलेट के कहना, यही उनको औरों से अलग करता है। तथाकथित सेकुलर पत्रकारों की जमात में उनकी राष्ट्रवादी लेखनी और वाणी सिंह गर्जना-सी प्रतीत होती है। खैर, प्रेम शुक्ल हिन्दी के लिए समर्पित उन चंद पत्रकारों में से हैं जिनके बारे में कहा जा सकता है कि उनकी रगों में खून के साथ-साथ अखबारी स्याही भी बहती है। देश के सबसे प्रभावशाली और चर्चित सांध्य दैनिक 'दोपहर का सामना' के कार्यकारी सम्पादक प्रेम शुक्ल बेहद सरल और मिलनसार स्वभाव के धनी हैं। प्रेम अपने नाम के अनुरूप सौम्य, निर्मल और नैसर्गिक हैं। 
       प्रेम शुक्ल मूलत: उत्तरप्रदेश के जिले सुल्तानपुर के छोटे-से गांव भोकार के हैं। यह दीगर बात है कि उनका जन्म मुम्बई के उपनगर बांद्रा में 1 अक्टूबर 1969 को हुआ। एक अरसा पहले उनके प्रपितामह रोजी-रोटी की तलाश में मुम्बई आए और फिर यह परिवार मायानगरी का होकर ही रह गया। तब किसने सोचा था, आज भी यह जानकार लोग हैरत में पड़ जाते हैं कि एक उत्तर भारतीय नौजवान शिवसेना के मुखपत्र 'दोपहर का सामना' का सम्पादक है। वही शिवसेना, जिसे उत्तर भारतीयों की शत्रु की तरह दिखाया-बताया जाता है। उनके साप्ताहिक कॉलम 'टंकार' और 'दृष्टि' पढऩे के लिए लोग उतावले रहते हैं। इन दोनों विशिष्ट लेखमालाओं के जरिए श्री शुक्ल हिन्दुस्थान की गरिमा, हिन्दुत्ववादी अस्मिता और सभ्यता-संस्कृति को निरूपित करने का उपक्रम कर रहे हैं। प्रेम शुक्ल जनसत्ता, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, मराठी साप्ताहिक विवेक, तरुण भारत सरीखे समाचार-पत्रों में भी काम कर चुके हैं। देश की पहली ऑडियो-वीडियो मैग्जीन 'लहरें' और ईटीसी न्यूज के कंसल्टिंग एडिटर के रूप में प्रेम शुक्ल ने कई सामाजिक, आर्थिक, आपराधिक और राजनैतिक घटनाओं-घोटालों से पर्दा उठाया है। 
      प्रेम शुक्ल महज पत्रकार ही नहीं बल्कि एक सक्रिय समाजसेवी, साहित्यकार और अत्यंत धार्मिक प्रवृत्ति के व्यक्ति हैं। उनके भीतर पुश्तैनी मिट्टी की सौंधी गंध बसी हुई है। मुंबई में वे उत्तर भारत के गौरव की तरह हैं। प्रेम शुक्ल बड़े स्तर पर भोजपुरी सम्मेलन, अवधी अधिवेशन और लाई-चना उत्सव मनाते हैं। मारीशस में रामकथा को जीवंत और लोकप्रिय बनाये रखने के लिए प्रयासरत् रामकथा वाचकों को सम्मानित-प्रोत्साहित करते हैं। प्रेम शुक्ल सूरीनाम और फिजी में भी हिन्दी भाषा और हिन्दी जनों के प्रिय हैं।  
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"राष्ट्रवादी पत्रकारिता के मजबूत स्तम्भ हैं प्रेम शुक्ल। हिन्दी पट्टी के लोगों के लिए अनुकूल जगह नहीं होने बाद भी उन्होंने मुम्बई में हिन्दी पत्रकारिता को बहुत सम्मान दिलाया है।" 
- अनिल सौमित्र, मीडिया एक्टिविस्ट 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

बुधवार, 26 नवंबर 2014

कवि पत्रकार

 प त्रकार की चेतावनी को नजरअंदाज करना कितना घातक साबित हो सकता है, दुनिया में इसका सबसे बड़ा उदाहरण है भोपाल गैस त्रासदी। राजकुमार केसवानी उस पत्रकार का नाम है, जो वर्ष 1984 में हुई भीषणतम गैस त्रासदी की ढाई साल पहले से चेतावनी देते आ रहे थे। हुक्मरानों ने अगर उनकी चेतावनी को संजीदगी से लिया होता तो संभवत: 3 दिसम्बर को वह काली रात न आई होती है, जिसके गाल में हजारों लोगों का जीवन चला गया और अब भी उसकी मार से हजारों लोग पीडि़त हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी गंभीर और संवेदनशील पत्रकारिता की सराहना हुई है। श्रेष्ठ पत्रकारिता के लिए पत्रकारिता का प्रतिष्ठित पुरस्कार 'बीडी गोयनका अवॉर्ड' उन्हें मिल चुका है।  
      26 नवंबर, 1950 को भोपाल की बाजेवाली गली में जन्मे राजकुमार केसवानी ने एलएलबी की पढ़ाई की है लेकिन उनका मन तो लिखत-पढ़त के काम की ओर हिलोरे मार रहा था। इसीलिए वकालात के पेशे में न जाकर, 1968 में कॉलेज के पहले साल से ही स्पोर्ट्स टाइम्स में सह संपादक का बिना वेतन का पद पाकर पत्रकारिता की दुनिया में चले आए। उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स, इलस्ट्रेटेड वीकली, संडे आब्जर्वर, इंडिया टुडे, इंडियन एक्सप्रेस, द एशियन एज, ट्रिब्यून, आउटलुक, द इंडिपेंडेट, द वीक, न्यूज टाइम, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स और दिनमान जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशनों में काम किया है। वर्ष 1998 से 2003 तक एनडीटीवी के मध्यप्रदेश-छत्तीसगढ़ के ब्यूरो प्रमुख रहे। 2003 में दैनिक भास्कर इन्दौर के सम्पादक बने। दैनिक भास्कर समूह में ही सम्पादक (मैग्जीन्स) की जिम्मेदारी संभालते हुए रविवारीय रसरंग को अलग ही पहचान दी। कंटेन्ट और भाषा (खासकर उर्दू) की शुद्धता के लिए इस शिद्दत से काम किया कि लोग रसरंग के दीवाने हो गए। रसरंग में ही 'आपस की बात' शीर्षक से लाजवाब स्तंभ लिखकर राजकुमार केसवानी रुपहले पर्दे के सुनहरे कल की याद दिलाते हैं। उनके पास विश्व-सिनेमा की बेस्ट क्लासिक फिल्मों के वीएचएस कैसेट्स, दुर्लभ हिन्दी फिल्मी और गैर फिल्मी रेकॉर्ड्स का अनूठा खजाना है। कैनेडियन ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोरेशन (सीबीसी) और व्हाइट पाइन पिक्चर्स, टोरंटो ने पत्रकारिता में उनके योगदान को रेखांकित करते हुए एक वृत्तचित्र का निर्माण भी किया है। 
      जितना पैनापन राजकुमार केसवानी की पत्रकारिता में रहा है, उतनी ही मुलायमियत उनकी कविताओं में है। वे पेशेवर नहीं बल्कि मन के कवि हैं। कविता संग्रह 'बाकी बचें जो' में बच्चों के प्रति उनकी मोहब्बत, उनके अंदर बैठे बेहतरीन इंसान को सबके सामने लाती है। कवि लीलाधर मंडलोई उनकी कविताओं के बारे में कहते हैं- 'मितकथन राजकुमार केसवानी का गुण है। स्थानीयता उनकी पूँजी। कहन में सादगी। भाषा में गहरी लय और संगीत। वे तफसीलों में कम जाते हैं कविता में व्याख्यान की जगह वे भाव को तरजीह देते हैं।'
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"राजकुमार केसवानी पत्रकार के साथ-साथ बेहद संवेदनशील कवि भी हैं। भोपाल गैस त्रासदी पर उनकी ख़बरों ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई हैं।" 
- डॉ. विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

भूत भगाने वाला

 क रीब तीन साल पहले तक प्राइम टाइम में भूत-प्रेत की कहानियां, रियलिटी शो और मनोरंजन के नाम पर फूहड़ सामग्री दिखा रहे टीवी चैनल्स की स्क्रीन अब कुछ बदली-बदली सी नजर आती है। प्राइम टाइम में न्यूज चैनल्स पर सार्थक बहस और सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर शुद्ध खबरें अब दिखने लगी हैं। युवा हो रही टीवी पत्रकारिता के चरित्र में यह सकारात्मक बदलाव कुछ लोगों की स्पष्ट सोच और संकल्प का नतीजा है। अलबत्ता, इस बदलाव में ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के लगातार तीसरी बार महासचिव चुने गए नवलकिशोर सिंह (एनके सिंह) की महती भूमिका है। टीआरपी की होड़ में दीवाने हुए न्यूज चैनल्स के प्रबंधकों-संपादकों को चैनल्स पर दिखाई जा रही सामग्री और उसके प्रभाव के प्रति चेताने में एनके सिंह को काफी मशक्कत करनी पड़ी। खैर, पत्रकारिता में सामाजिक सरोकारों के लिए प्रतिबद्ध एनके सिंह काफी हद तक अपने प्रयत्नों में सफल हुए। वे एक संकल्प के साथ निरंतर टीवी पत्रकारिता और उसके कंटेन्ट को अधिक गंभीर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं। 
      स्वभाव से मृदुभाषी और मिलनसार एनके सिंह फिलहाल देशभर के हिन्दी और अंग्रेजी समाचार पत्र-पत्रिकाओं के लिए सामाजिक और राजनीतिक सरोकारों पर लेख लिख रहे हैं। वे न्यूज चैनल्स पर होने वाली बहसों में भी राजनीतिक और मीडिया विश्लेषक की हैसियत से शिरकत करते हैं। हाल ही में उन्होंने लाइव इंडिया न्यूज चैनल को राष्ट्रीय न्यूज चैनल्स के बीच री-लॉन्च करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी संभाली है। वे लाइव इंडिया से ग्रुप एडिटर और एडिटर इन चीफ के तौर पर जुड़े हैं। अपने 33 साल के पत्रकारीय जीवन में उन्होंने नेशनल हेराल्ड, द पायोनियर और न्यूज टाइम/ईनाडू में रिपोर्टर से लेकर विभिन्न भूमिकाओं में काम किया। करीब एक दशक पहले उन्होंने ईटीवी न्यूज से टीवी पत्रकारिता में कदम रखा और बाद में साधना न्यूज चैनल में राजनीति संपादक के रूप में काम किया। श्री सिंह ने द पायोनियर और ईनाडू/ईटीवी के कई एडिशन भी सफलतापूर्वक लॉन्च कराए। एनके सिंह ने देश-दुनिया से जुड़े कई गंभीर मसलों का कवरेज किया है। 6 दिसम्बर 1992 को बाबरी विध्वंस की घटना के तत्काल बाद श्री सिंह की खोजपरक खबर प्रकाशित हुई, जिसकी चर्चा देशभर में हुई। उनकी कुछ स्टोरी के कारण तो भारत सरकार को कई नियमों में भी संशोधन करने पड़े हैं। 
      व्यावसायिकता के इस दौर में भी एनके सिंह के लिए पत्रकारिता प्रोफेशन नहीं बल्कि पैशन है। पत्रकारिता उनको आध्यात्मिक अनुभव और संतुष्टी देती है। वे कहते हैं कि पत्रकारिता के लिए तड़प होनी चाहिए और यह तड़प गरीबी के अनुभव से आती है। आम भारतीय के दर्द से जुडऩे के लिए एनके सिंह बेहद साधारण जीवन जीते हैं। ट्रेन के स्लीपर क्लास में सफर करने का एक प्रयोग वे कर रहे हैं।
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"पत्रकारिता में निष्पक्षता एवं खरी-खरी अभिव्यक्ति के पक्षधर एनके सिंह की कथनी और करनी में मामूली अंतर भी नहीं दिखता है। प्रखर राजनीतिक चिंतन और निष्पक्ष विश्लेषण, आपकी पत्रकारिता की विशेषता है।" 
- श्रीकान्त सिंह, संपादक, मीडिया विमर्श 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 21 नवंबर 2014

पीड़ितों की आवाज

 प्र ख्यात गांधीवादी चिंतक मणिमाला, सामाजिक सरोकार की पत्रकारिता में एक जाना-पहचाना नाम हैं। पत्रकारिता उनके लिए फैशन नहीं पैशन है। पत्रकारिता उन्हें समाज में सार्थक बदलाव लाने का एक प्रभावी जरिया लगा। इसीलिए पढ़ाई के दौरान ही वे लेखन और पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हो गईं। आज जब पत्रकारिता पर बाजार हावी है तब मणिमाला यशस्वी पत्रकार राजेन्द्र माथुर, बाबूराव विष्णु पराडक़र और प्रभाष जोशी की परंपरा को आगे बढ़ा रही हैं। अपने 30 साल के पत्रकारिता के सफर में कभी उन्होंने कभी सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनकी कलम न तो कभी रुकी और न ही कभी झुकी। महिलाओं, बच्चों और सामाजिक व्यवस्थाओं से जुड़े मसलों पर उन्होंने निर्भीक होकर लेखन किया है। 
      गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति, नईदिल्ली की निदेशक मणिमाला महात्मा के विचारों और जीवन सूत्रों को समाज तक पहुंचाने की महती जिम्मेदारी निभा रही हैं। शब्दों का चयन, विषय की प्रस्तुति का अनूठा अंदाज और भाषा का सहज प्रवाह उनके लेखन की सबसे बड़ी खूबसूरती है। अपने पत्रकारीय जीवन की विधिवत शुरुआत उन्होंने 1984 में प्रभात खबर जैसे मजबूत अखबार से की। नवभारत टाइम्स में बतौर संवाददाता काम करते हुए उन्होंने पुरुषों के वर्चस्व वाले क्षेत्र पत्रकारिता में अपने लिए एक अलग मुकाम बनाया। वे अपनी तेजतर्रार छवि और धारधार लेखनी के लिए देशभर में पहचानी जाने लगीं। यही नहीं उन्हें बिहार की पहली महिला पत्रकार होने का श्रेय भी हासिल है। वे मलयालम मनोरमा समूह की मासिक पत्रिका वनिता की संपादक भी रहीं। दिल्ली में रहकर अन्य संस्थानों के साथ काम का भी अनुभव उन्हें हैं। फिलहाल वे गांधी स्मृति एवं दर्शन समिति की पत्रिका 'अंतिम जन' की संपादक हैं। अंतिम जन में प्रकाशित होने वाले उनके सम्पादकीय पत्रकारिता, साहित्य और अन्य क्षेत्रों में खासे चर्चित होते हैं। इसके अलावा बाल विवाह पर धारावाहिक, दिवराला सती पर धारावाहिक, अपराध का त्रिकोण, स्त्री के बिना समाज और सीता के बिना राम, उनके चर्चित आलेख हैं। जीत लेंगे अंधेरे को (दलित महिला नेतृत्व एक सफर), गलत हो गया तो (कविता संग्रह), वजूद (कविता संग्रह) इराक : या इलाही कोई और न लूटे ऐसे, धर्मान्तरण : जरा सी जिन्दगी के लिए और हिन्दी पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार उनकी बेहद चर्चित किताबे हैं।
      उत्कृष्ट पत्रकारिता के लिए मणिमाला जी को वर्ष 2006 में राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम साहब के हाथों गणेश शंकर विद्यार्थी सम्मान से नवाजा गया। वर्ष 2011 में संसद के सेन्ट्रल हॉल में राष्ट्रभाषा सेवा सम्मान प्रदान किया गया। 2003 में इंटरनेशनल फेडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट अवार्ड दिया गया। 1998 में आउटस्टैंडिंग साउथ एशियन वुमन जर्नलिस्ट सम्मान दिया गया। जबकि सामाजिक क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान के लिए 2013 में अन्ना साहेब पटवर्धन सामाजिक कार्य सम्मान, 2012 में गांधी-विनोबा स्मृति सम्मान, 1986 जनजागरण पत्रकारिता पुरस्कार और सोशल जर्नलिज्म अवार्ड से मणिमाला जी को सम्मानित किया गया।
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"पत्रकारिता में जुझारू और जुनूनी नाम तलाशना हो तो मणिमाला पहली पंक्ति में खड़ी नजर आएंगी। वे महज लिखकर अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं कर लेतीं, बल्कि मैदान में उतरकर पीड़ितों के पक्ष में सीधे संघर्ष का माद्दा रखती हैं।" 
- सन्त समीर, वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

मंगलवार, 18 नवंबर 2014

मध्यप्रदेश की धड़कन है माण्डू

जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
 जि सने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश में देखा क्या? इसलिए भारत का दिल देखने निकलो तो माण्डव जाना न भूलिएगा। बादशाह अकबर हो या जहांगीर, सबको यह ठिया पसंद आया है। अबुल फजल तो सम्मोहित होकर कह गया था कि माण्डू पारस पत्थर की देन है। माण्डू प्रकृति की गोद में खूब दुलार पा रहा है। ऐसा लगता है कि वर्षा ऋतु तो माण्डू का सोलह श्रंगार करने के लिए ही यहां आती है। बारिश में तो यह अल्हड़ नवयौवन की तरह अंगड़ाई लेता नजर आता है। यहां आकर आपका दिल भी आशिक मिजाज हो ही जाएगा। रानी रूपमति के महल से दिखने वाला नैसर्गिक सौंदर्य आपको प्रेम सिखा ही देगा। जहाज महल पर खड़े होकर आप असीम सुकून की अनुभूति करेंगे। हिन्डोला महल में आपका मन डोले बिना नहीं रहेगा। होशंगशाह का मकबरा मन को मोह लेगा और ताजमहल की याद दिलाएगा। आल्हा-ऊदल की कथाएं रोमांच बढ़ा देंगी, आपकी भुजाओं की मछलियां बाहर आने को मचल उठेंगी। ईको प्वाइंट पर खड़े होकर जब आप जोर से अपना नाम पुकारेंगे तो लगेगा कि दुनिया आपको सुन रही है। अद्भुत है माण्डू। रानी रूपमति और बाज बहादुर की खूबसूरत मोहब्बत की तरह माण्डू भी बेहद हसीन है। 
  मालवा के परमार राजाओं के बसाए माण्डू को देखने के लिए अपने मित्र मनोज पटेल और गजेन्द्र सिंह अवास्या के साथ जाना हुआ। सुबह करीब 8 बजे राजेन्द्र नगर, इंदौर से कार से रवाना हुए और करीब दो घंटे में 100 किलोमीटर दूर स्थित माण्डू पहुंच गए। विंध्याचल की पहाड़ी पर करीब 2000 फीट की ऊंचाई पर स्थित माण्डू दुर्ग में प्रवेश से पहले एक गहरी खाई कांकडा खो है। थोड़ी देर यहां फोटो सेशन हुआ। इसके बाद अपनी समृद्धि, अपने सौंदर्य और रूपमति-बाज बहादुर के प्रेम के लिए मशहूर माण्डू के परकोटे में आलमगीरी और भंगी दरवाजे से प्रवेश किया। माण्डू दुर्ग का विस्तार बहुत अधिक है। इसके अलग-अलग हिस्सों में स्थित ऐतिहासिक इमारतें, भवन, धार्मिक स्थल और तालाब-बावड़ी किसी बड़े मैदान में बिखरे पड़े नायाब मोतियों, हीरे, जवाहरातों की तरह हैं। आधे दिन में सब कीमती मोतियों को निहारना मुमकिन नहीं था। इसलिए सबसे पहले हम किले पर बसाहट के बीच से कच्चे-पक्के रास्ते से होते हुए तारापुर दरवाजे पर पहुंचे। तारापुर दरवाजा माण्डू दुर्ग का एक छोर है। रास्ते में 'माण्डू की इमली' के पेड़ देखे। इसका स्वाद और आकार सामान्य इमली से अलग है। यह लगभग गोलाकार होती है। आप जब माण्डू जाएं तो 'माण्डू की इमली' जरूर चखें। मालवा अंचल में इसे 'खुरासिनी इमली' भी कहा जाता है। खुरासिनी इमली के पेड़ भी बरबस ही आपको अपनी ओर खींचते हैं। इनका तना काफी मोटा होता है। असल में ये पेड़ भारतीय मूल के नहीं हैं। सुल्तान होशंगशाह ने अफ्रीका से खुरासिनी इमली का बीज मंगाया था। अफ्रीका में इन्हें 'बाओबाब' के नाम से जाना जाता है। माण्डू के अनुकूल वातावरण पाकर यहां ये खूब फल रहे हैं। माण्डू  के सीताफल और रेत ककड़ी भी खास हैं। 
  तारापुर दरवाजे पर प्राकृतिक छटा का आनंद लेने के बाद हम लोग रानी रूपमति के महल पहुंच गए। अक्टूबर का महीना था। थोड़ी तीखी धूप तो थी। इसलिए हम चाह रहे थे कि कहीं से भी बादल घिर आएं, हल्की बारिश हो जाए तो माण्डू की अंगड़ाई का लुत्फ इत्मिनान से ले सकेंगे। कहते हैं न कि तुम जिस चीज को दिल से चाहो, तुम्हें उससे मिलाने में पूरी कायनात जुट जाती है। हुआ भी यही। कायनात खुद हाजिर हो गई हमारी ख्वाहिश पूरी करने के लिए। माण्डू आए थे तो दूर-दूर तक कहीं भी बादलों का नामोनिशान नहीं था लेकिन जैसे ही हल्की बारिश में उसका सौंदर्य देखने की हूक मन में उठी तो बादल भी घिर आए और बारिश भी हो गई। रानी रूपमति के महल में ठण्डी हवाएं संगीत सुनाने लगीं। महल की ऊपरी मंजिल में दो मण्डप हैं। बाज बहादुर यहां रूपमती से संगीत सुना करता था। वह रानी रूपमती के रूप के साथ-साथ उसके संगीत और नृत्य पर मुग्ध था। दोनों ही एक-दूजे से निश्छल प्रेम करते थे। बाजबहादुर और रूपमती की प्रेमकथाएं आज भी मालवा के लोकगीतों में गूंजती हैं। कहते हैं रानी रूपमती मां नर्मदा के दर्शन किए बिना अन्न ग्रहण नहीं करती थीं। इसलिए बाज बहादुर ने माण्डू में सबसे ऊंचे स्थान पर रूपमती महल का निर्माण कराया था। रानी रूपमती यहां से नित्य नर्मदा के दर्शन करती थीं। दूसरे मण्डप से रानी बाज बहादुर के महल को भी निहारती थीं। रानी रूपमती और बाज बहादुर की प्रेमकथा माण्डू की स्थायी और विशेष पहचान बन गई है।
  रानी रूपमती के महल से निकलकर हम माण्डू के आकर्षण के केन्द्रों में शुमार जहाज महल और हिन्डोला महल को देखने चल दिए। पानी से घिरा होने के कारण यह महल ऐसा लगता है जैसे लंगर डालकर पानी में कोई विशाल जहाज खड़ा हो। जहाज महल करीब 120 मीटर लंबा, 15 मीटर चौड़ा और दो मंजिला है। यह मुंज तालाब और कपूर तालाब के बीच है। महल का वास्तु राजसी वैभव को बयां है। इसकी छत पर बने मण्डप में बैठकर मनोहारी दृश्यों का आनंद लिया जा सकता है। जहाज महल का निर्माण गयासुद्दीन खिलजी ने कराया था। सुल्तान गयासुद्दीन खिलजी ने इसका उपयोग अपने विशाल हरम के रूप में किया था। कहते हैं कि उसके हरम में पन्द्रह हजार सुन्दर महिलाएं थीं। जहाज महल के पास ही गयासुद्दीन ने अपने सभा मण्डप के लिए हिंडोला महल का निर्माण कराया था। अपनी ढलानदार दीवारों के कारण यह झूलता हुआ-सा दिखाई देता है। महल की बाहरी दीवारें 77 डिग्री के कोण पर झुकी हुई हैं। बलुआ पत्थर से निर्मित इसकी सुंदर जालीदार नक्काशी और शानदार ढले हुए स्तम्भ पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। हिंडोला महल के पीछे खूबसूरत चम्पा बावड़ी है। यहां कभी ठंडे और गर्म पानी का प्रबंध रहता था। चंपा बावड़ी जमीन के नीचे बनाए गए मेहराबदार तहखाने से जुड़ी है। माण्डू की सबसे बड़ी विशेषता इसकी अंत:भूगर्भीय संरचना है। माण्डू का फैलाव जितना ऊपर है उतना ही नीचे है। शत्रु के आक्रमण के समय यह भूगर्भीय रचना सुरक्षा का एक साधन भी थी। रानियां और सैनिक चम्पा बावड़ी में छलांग लगाते थे और तहखानों के रास्ते सुरक्षित निकल जाते थे जबकि शत्रु को लगता था कि सब बावड़ी में डूबकर मर गए। यहीं आस-पास अनेक खण्डर राजसी वैभव और भव्यता की कहानी कहते नजर आते हैं। यहां दिलावर खान की मस्जिद, नाहर झरोखा, तवेली महल, उजली और अंधेरी बावड़ी और गदाशाह का घर भी देखना चाहिए। 
  सीरिया की राजधानी दमिश्क की विशाल मस्जिद से प्रेरित होकर बनाई गई जामी मस्जिद भी अपने महराबों, स्तम्भों और गुम्बदों के लिए चर्चित है। जामी मस्जिद के सामने अशरफी महल है। यह सोने के सिक्कों के महल के नाम से भी मशहूर है। इसे होशंगशाह के उत्तराधिकारी मोहम्मद शाह खिलजी ने बनवाया था। इसका उपयोग मदरसे के रूप में किया जाता रहा। खिलजी ने इस महल के प्रांगण में मेवाड़ के राणा कुंभा पर अपनी जीत की यादगार में एक सात मंजिला मीनार बनवाई थी। अब इसकी एक ही मंजिल बची है। हालांकि इतिहासकार बताते हैं कि युद्ध में राणा कुंभा ने खिलजी को परास्त किया था और चित्तौड़ में विजय स्तम्भ का निर्माण कराया था, जो आज भी शान से खड़ा है। 
  नीलकण्ठ महादेव मंदिर और नीलकण्ठ महल प्रमुख दर्शनीय स्थलों में से शामिल हैं। नीलकण्ठ मंदिर एक पुराना शिव मंदिर है। जहां लोग आज भी पूरी आस्था के साथ जाते हैं। महल में एक कुण्ड है, जिसमें पहाड़ी झरने से पानी आता है। मंदिर के समीप ही महल का निर्माण मुगलकाल के मुस्लिम गवर्नर शाह बादशाह खान ने अकबर की हिन्दू पत्नी के लिए कराया था। यहां की दीवारों पर अकबर के समय के कुछ ऐसे शिलालेख हैं जो सांसारिक वैभव और समृद्धि की निस्सारता की ओर संकेत करते हैं। इसके अलावा होशंगशाह का मकबरा, रेवा कुण्ड, बाज बहादुर महल, हाथी महल, दरयाखान का मकबरा, दाई का महल, दाई की छोटी बहन का महल और जाली महल भी माण्डू की शान हैं। इन्हें भी देखा जाना चाहिए। शाम हो गई है अब हमें अगले पड़ाव पर निकलना है। हम तीनों मित्र जामी मस्जिद के सामने चाय पी रहे हैं तब तक आप माण्डू की कहानी सुनिए।
माण्डू का प्राचीन नाम मण्डप दुर्ग या माण्डवगढ़ है। माण्डू की आधारशिला रखने का प्रथम श्रेय परमार राजाओं को है। हर्ष, मुंज, सिंधु और राजा भोज इस वंश के चर्चित शासक रहे। लेकिन, इनका ध्यान माण्डू की अपेक्षा धार पर ज्यादा था। 12वीं-13वीं सदी में जैन मंत्रियों ने मांडवगढ़ को ऐश्वर्य की चरम सीमा तक पहुंचाया। अलाउद्दीन खिलजी के माण्डू पर आक्रमण के बाद से यहां हिन्दू शासन खत्म हो गया। हालांकि मुगल साम्राज्य के पतन के बाद माण्डू पर कुछ दिनों तक पेशवाओं का अधिकार रहा। इसके बाद यह इंदौर की मराठा रियासत में शामिल हो गया। 1401 ई. में माण्डू दिल्ली के तुगलकों के आधिपत्य से आजाद हो गया। मालवा के पठान शासक दिलावर खां गोरी का पुत्र होशंगशाह 1405 ई. में अपनी राजधानी धार से उठाकर माण्डू में ले आया। बाद में सत्ता गयासुद्दीन के हाथ में आई। गयासुद्दीन ने विलासता का वह दौर शुरू किया जिसकी चर्चा उस समय भारत में चारों ओर थी। 1531 ई. में गुजरात के सुल्तान बहादुरशाह ने माण्डू पर हमला किया। 1534 ई. में हुमायूं ने यहां अपना आधिपत्य स्थापित किया। 1554 ई. में माण्डू बाजबहादुर के शासनाधीन हुआ। किन्तु 1570 ई. में अकबर के सेनापति आदम खान और आसफ खान ने बाजबहादुर को परास्त कर माण्डू पर अधिकार कर लिया। कहा जाता है कि रूपमती पर आदम खान की गन्दी नजर थी। अपने सम्मान की रक्षा के लिए रूपमती ने विषपान करके अपने जीवन का अन्त कर लिया था। माण्डू की लूट में आदम खान ने बहुत सी धनराशि अपने अधिकार में कर ली और उसने अकबर के कार्यवाहक वजीर को छुरा घोंप दिया। जिससे नाराज होकर अकबर ने आदम खान को आगरा के किले की दीवार से दो बार नीचे फिकवाकर मरवा दिया था।
  आल्हा-ऊदल के बिना माण्डू का वर्णन अधूरा माना जाता है। आल्हाखण्ड में महाकवि जगनिक ने 52 लड़ाइयों का जिक्र किया है। उसमें पहली लड़ाई माड़ौगढ़ की मानी जाती है, जिसका साम्य इसी माण्डू से किया जाता है। इसलिए आल्हा गायकों के लिए माण्डू एक तीर्थस्थल सरीखा है। बुंदेलखंड के लोग यहां इस लड़ाई के अवशेष देखने आते हैं। राजा जम्बे का सिंहासन, आल्हा की सांग, सोनगढ़ का किला, जहां आल्हा के पिता और चाचा की खोपडिय़ां टांगी गई थी और वह कोल्हू जिसमें दक्षराज-वक्षराज को करिंगा ने पीस दिया था। ये सब आज भी आल्हा के मुरीदों को आकर्षित करते हैं। 
  मध्यप्रदेश अगर भारत का दिल है तो मांडू उस दिल की धड़कन है। अगर आप घुमक्कड़ी के शौकीन हो, इतिहास को उसके गवाहों से सुनना चाहते हो तो, राजसी वैभव की कल्पना करना चाहते हो, आपका मन कोमल है, प्राकृतिक सौंदर्य आपको आल्हादित करता है, किलों में दिलचस्पी है तो एक बार जरूर आइये माण्डू। बारिश के मौसम में जवान हुआ माण्डू निश्चित ही आपको बार-बार बुलाएगा और आप माण्डू बार-बार आने को मजबूर हो जाएंगे। तो एक दिन तो गुजारो गजब एमपी के अजब माण्डू में।
      कब और कैसे पहुंचे माण्डू : माण्डू की इंदौर से दूरी करीब 100 किलोमीटर है। महू, इंदौर और खंडवा निकटतम रेलवे स्टेशन हैं। 30 किमी दूर स्थित धार से प्रत्येक आधे घंटे पर बस सेवा है। इसके अलावा इंदौर, खंडवा, रतलाम, उज्जैन और भोपाल से भी नियमित बस सेवा है। माण्डू घूमने का सबसे उचित समय जुलाई से मार्च तक है। एक-दो बारिश के बाद तो यहां पर्यटकों का हुजूम उमड़ पड़ता है। माण्डू में रात्रि विश्राम के लिए अनेक निजी और सरकारी होटल हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन के होटल मालवा रिसॉर्ट और मालवा रीट्रीट में भी ठहरने की उत्तम व्यवस्था है। 
हिंडोला महलजहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह

खुरासिनी इमली का पेड़जहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह

रानी रूपमती का महलजहाज महल फोटो : लोकेन्द्र सिंह

कांकडा खो पर तीन घुमक्कड़ी- लोकेन्द्र सिंह, गजेन्द्र सिंह और मनोज पटेल 
रानी रूपमती महज का बुर्ज, यहाँ से बाज बहादुर का महल दिखता है फोटो : लोकेन्द्र

रानी रूपमती के महल से बाज बहादुर के महल का नजारा फोटो : लोकेन्द्र सिंह 
तारा पुर दरवाजे के नजदीक फोटो : गजेन्द्र सिंह 


जामी मस्जिद के भीतर गलियारे में अपुन फोटो : गजेन्द्र सिंह 

जहाज महल के सामने का कुंड फोटो : लोकेन्द्र सिंह 


सोमवार, 17 नवंबर 2014

दर्द का बयान

 उ नका बचपन गरीबी में बीता। वे मेरठ में रहते थे। मिट्टी का कच्चा घर था। एक बरसात में उनका मकान गिर गया। उनके पास इतने भी पैसे न थे कि उनकी मुरम्मत करा पाते। समाज के वंचित वर्ग का हिस्सा होने के कारण उन्हें हर कदम पर समूची मानवता को लजाने वाला अपमान भी झेलना पड़ता था। उनके हौसले को सलाम है कि इस गरीबी और संघर्ष के बीच भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। चप्पल-जूते भी नहीं थे, उनके पास। स्कूल के लिए नंगे पैर ही आना-जाना पड़ता था। अच्छे कपड़े तो बहुत दूर की बात है, उनके पास स्कूल की गणवेश सिलवाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे। दो-दो साल पुराने, फटे और छोटे हो गए कपड़े पहनकर वे स्कूल जाते थे। यहां पर भी संघर्ष ही उनका स्वागत करता था। शिक्षा के मंदिर में उन्हें शिक्षक ही अपमानित करते थे। उन्हें कहा जाता था कि क्या करोगे पढ़-लिखकर जूते-चप्पल ही तो बनाना है। लेकिन, धुन के पक्के मोहनदास नैमिशराय ने हार नहीं मानी। आग से तपकर निकले मोहनदास नैमिशराय आज दलित पत्रकारिता और साहित्य के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं।  
      उत्तरप्रदेश के मेरठ शहर में 5 सितंबर 1949 को जन्मे बेहद मृदुभाषी, सहज और सरल व्यक्ति के धनी मोहनदास नैमिशराय सामाजिक सरोकारों और वंचित समूह के लिए समर्पित चर्चित पत्रिका 'बयान' के सम्पादक हैं। उन्होंने पांच वर्ष तक भारत सरकार के डॉ. आम्बेडकर प्रतिष्ठा, नई दिल्ली को बतौर सम्पादक और मुख्य सम्पादक अपनी सेवाएं दीं। प्रिंट पत्रकारिता, रेडियो, दूरदर्शन, फिल्म और नाटक आदि में भी उन्होंने अपने लेखन कार्य से अमिट छाप छोड़ी है। संघर्षशील जीवन में भोगा गया यथार्थ, गरीबी का दंश और तिरस्कार से उपजी वेदना को श्री नैमिशराय ने अपने लेखन में उतारा है। उनका यह दर्द सम्पूर्ण दलित समाज का है। उनका चर्चित उपन्यास 'जख्म हमारे' इसकी बानगी है। उनके लेखन की विशेषता है कि समाज के दु:ख के साथ अपने दु:ख को जोड़ते हैं। वे सार्थक बदलाव की बात करते हैं, भविष्य की बात करते हैं, अतीत को पकडक़र रोते नहीं है, अमानवीय व्यवहार के लिए सवर्णों की भूल पर उन्हें कोसते भी नहीं हैं। 
      महानायक बाबा साहेब डॉ. आम्बेडकर पर पहला ऐतिहासिक उपन्यास लिखने वाले मोहनदास नैमिशराय की करीब पचास कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें कहानी संग्रह, कविता संग्रह, विचार-सार, अनुवाद, आत्मकथा, उपन्यास सहित अन्य विद्याओं की कृतियां शामिल हैं। उन्होंने भारतीय दलित आंदोलन का इतिहास चार भागों में लिखा है। 
     हिन्दी पत्रकारिता और साहित्य के गौरव मोहनदास नैमिशराय को कास्ट एण्ड रेस पुस्तक के लिए डॉ. आम्बेडकर इंटरनेशनल मिशन पुरस्कार, कनाडा से सम्मानित किया जा चुका है। हिन्दी साहित्य के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित श्री नैमिशराय को पत्रकारिता के लिए गणेश शंकर विद्यार्थी पुरस्कार से भी नवाजा गया है।
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"मोहनदास नैमिशराय आम्बेडकरवादी धारा के ऐसे लेखक हैं जिनके समूचे लेखन से सामाजिक समरसता की भावना को शक्ति मिलती है।"  
- संजय द्विवेदी, कार्यकारी संपादक, मीडिया विमर्श
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शुक्रवार, 14 नवंबर 2014

सहजता है पहचान

 प त्रकारिता की एक व्याख्या यह भी है कि पत्रकारिता व्यक्ति को कुछ दे या न दे लेकिन घमण्ड इतना देती है कि पैर जमीन पर टिकते नहीं, अचानक ही 'आम लोगों' के बीच का आदमी 'बेहद खास' हो जाता है। सोचिए, यहां सहज और सरल रहना कितना मुश्किल होगा। पत्रकारिता में शानदार 35 साल गुजारकर और पांच साल से भी अधिक समय तक मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में नवदुनिया जैसे प्रतिष्ठित अखबार के सम्पादक रहकर भी गिरीश उपाध्याय बेहद सहज और सरल ही नहीं बल्कि सर्वसुलभ और मिलनसार भी हैं। नई पीढ़ी के पत्रकारों से संवाद को वे सदैव तैयार रहते हैं, हर मसले पर उनके साथ खुलकर बात की जा सकती है। वे प्रेरक और मार्गदर्शक हैं। 
साहित्य और वैचारिकी उन्हें विरासत में मिली। मालवा के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकार और हिन्दी की ख्यातनाम साहित्यिक पत्रिका 'वीणा' के सम्पादक रहे मोहनलाल उपाध्याय 'निर्मोही' उनके पिता थे। अपने पिता से गिरीश उपाध्याय ने माटी से जुड़ाव, सामाजिक सरोकार और देशहित में कलम साधना सीखा। वर्ष 1981 में दैनिक स्वदेश, इंदौर से उन्होंने अपने पत्रकारीय सफर की विधिवत शुरुआत की। वर्ष 1983 से 2001 तक समाचार एजेंसी यूनीवार्ता के लिए विभिन्न पदों पर रहते हुए मध्यप्रदेश के भोपाल, ग्वालियर, इंदौर-उज्जैन और राजस्थान की राजधानी जयपुर में एजेंसी पत्रकारिता को नए आयाम दिए। देश के सबसे बड़े रीजनल चैनल ईटीवी की हिन्दी सेवा से 2001 के अंत में जुड़े। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में ईटीवी न्यूज चैनल का नेटवर्क खड़ा करने की अहम जिम्मेदारी सफलतापूर्वक पूरी की। यही नहीं हैदराबाद स्थिति ईटीवी के मुख्यालय में भी हिन्दी रीजनल चैनल का सेटअप तैयार कराने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाहन किया। इसके बाद अमर उजाला अखबार के चंडीगढ़ संस्करण में पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ स्टेट ब्यूरो प्रमुख के नाते काम किया। देश बड़े समाचार-पत्र समूहों में शामिल राजस्थान पत्रिका में 2005 से 2008 तक बतौर डिप्टी एडिटर अखबार के कंटेन्ट पर काम किया। वर्ष 2008 संपादक होकर नवदुनिया, भोपाल चले आए। फिलहाल माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की स्वामी विवेकानन्द पीठ पर रिसर्च फैलो हैं। 
24 सितम्बर, 1958 को इंदौर में जन्मे गिरीश उपाध्याय लाइफ टाइम अचीवमेंट अवार्ड से सम्मानित हैं। माधवराव सप्रे संग्रहालय भोपाल द्वारा माखनलाल चतुर्वेदी सम्मान और राष्ट्रीय पत्रकार न्यास द्वारा बापूराव लेले सम्मान उन्हें प्रदान किया जा चुका है। वर्ष 2011 में राज्य स्तरीय श्रेष्ठ पत्रकारिता सम्मान और 2012 में बेस्ट एडिटर सम्मान, भोपाल भी उन्हें मिल चुके हैं। चीन, जापान, हांगकांग और मलेशिया की यात्रा कर चुके गिरीश उपाध्याय सामाजिक सरोकारों की पत्रकारिता के हामी हैं। वर्तमान में वे इंडियन मीडिया सेंटर के मध्यप्रदेश चैप्टर के अध्यक्ष हैं और अपने स्तर पर पत्रकारिता में शुचिता और पत्रकारों की बेहतरी के लिए प्रयत्नशील हैं।  
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"गिरीश उपाध्याय हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। उनकी पत्रकारिता सनसनीखेज नहीं है। उनकी पत्रकारिता में देश और समाज सबसे पहले हैं। सकारात्मक पत्रकारिता के गुरुकुल हैं गिरीशजी।" 
- लोकेन्द्र पाराशर, संपादक, स्वदेश ग्वालियर 
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 10 नवंबर 2014

खोज का जुनून

 प्र त्येक पत्रकार की इच्छा होती है कि वह राजनीतिक या फिर अपराध पत्रकारिता में सबसे चर्चित नाम बन जाए। मीडिया जगत में उसकी धमक हो। बड़े से बड़ा राजनेता या फिर अंडरवर्ल्ड के कुख्यात गुण्डे सबसे पहले उससे बात करें। लेकिन, इस मुकाम तक पहुंचने के लिए बड़ी मेहनत तो लगती ही है, यहां कदम जमाए रखना भी रोज कुंआ खोदकर पानी पीने जैसा है। दीपक शर्मा एक ऐसा ही नाम है, जो देश के सबसे बड़े और उलझे सूबे उत्तरप्रदेश की राजनीति की डोर को सुलझाकर हमारे सामने रखते हैं। केन्द्र सरकार की भी छोटी-बड़ी सब खबरों पर उनकी पैनी नजर रहती है। बात अगर इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिज्म की हो तो दीपक शर्मा हिन्दी के बहुमुखी खोजी पत्रकारों में से एक हैं। उनके तेजतर्रार जोश को देखकर लगता नहीं, सबसे तेज होने का दावा करने वाले न्यूज चैनल आजतक की रफ्तार कभी धीमी होगी।
       मिलनसार, सहज और सरल स्वभाव के दीपक शर्मा ने वर्ष 2002 में विशेष संवाददाता के रूप में आजतक ज्वाइन किया। अभी वे एडीटर के रूप में आजतक में ही विशेष खोजी टीम का नेतृत्व करते हैं। इससे पहले वे दैनिक जागरण, पायोनियर और इंडिया टुडे में भी काम कर चुके हैं। भारत में आतंकी नेटवर्क और माफिया गिरोहों के विषय में वो गहरी अंतर्दृष्टि रखते हैं। चाहे तालिबान, मिलिशिया के साथ सीधी बातचीत करना हो या फिर कराची स्थित अंडरवल्र्ड सरगना दाऊद के गुर्गों के साथ बातचीत, दीपक शर्मा ने हमेशा अपने चैनल को आगे रखा है।
       अमूमन बड़ी खबरों को सबसे पहले ब्रेक करने वाले दीपक शर्मा अपनी खोजी पत्रकारिता के लिए हाल ही काफी चर्चित भी हुए हैं। उनकी एक रिपोर्ट ने यूपीए सरकार में मंत्री रहे सलमान खुर्शीद को सिर के बल खड़ा कर दिया तो मुजफ्फरनगर के दंगों का सच दिखाने पर, उन्हें हिन्दुवादी पत्रकार होने का आरोप झेलना पड़ा। साहसिक पत्रकारिता के लिए जीने वाले श्री शर्मा तमाम तोहमत और जोखिम के बाद भी सच दिखाने से कभी पीछे नहीं रहे। सच के लिए लडऩे-भिडऩे का जुनून उनके भीतर उबाल मारता रहता है।
       देश के लिए ओलंपिक में पदक जीतने वाले पद्मश्री जमनालाल शर्मा के सपूत दीपक शर्मा जितने अच्छे पत्रकार हैं उतने ही उम्दा स्पोर्ट्स मैन भी हैं। वे राष्ट्रीय स्तर के हॉकी खिलाड़ी रहे हैं। खबरों से खेलने के बीच में जब भी खाली वक्त मिलता है, वे गोल्फ खेलना पसंद करते हैं। इन सबके अलावा सोशल मीडिया पर सक्रियता, फेसबुक पर अलग-अलग विषय पर शॉर्टनोट लिखना, बड़े ही सहज अंदाज में आम आदमी से बात करना, लोगों से सीधे कनेक्ट रहना भी उनकी दिनचर्या में शुमार है।
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"दीपक शर्मा जुनूनी पत्रकार हैंl कब्र खोदकर खबर लाने की अद्भुत क्षमता वाले दीपक भ्रष्ट नेताओं और अफसरों के खतरनाक दुश्मन हैंl वे बहुत प्यारे दोस्त हैंl"
-सईद अंसारी, सीनियर एंकर, आजतक
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
 

शुक्रवार, 7 नवंबर 2014

भरोसेमंद नाम

 बा जार की होड़ के साथ-साथ सामाजिक प्रतिबद्धता, पाठकों की रुचि और बेहतर मापदंडों के बीच कोई समाचार-पत्र कैसे संतुलन कायम रख सकता है, यह साबित करके दिखाया था हिन्दी पत्रकारिता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर अभय छजलानी ने। पिछले 40-50 वर्षों में अखबार मालिक से लेकर संपादक तक उन्होंने नईदुनिया को भारतीय भाषायी पत्रकारिता में एक अलग पहचान दिलाई। उनके संपादकीय कार्यकाल में नईदुनिया हिन्दी का शब्दकोश बन गया था। हर आयु वर्ग के पाठक नईदुनिया के नशे में पागल थे। पाठक नईदुनिया को इतनी मोहब्बत करते थे कि इंदौर से मीलों दूर जाने के बाद भी नईदुनिया उनके जीवन का हिस्सा बना रहा, वे डाक से नईदुनिया के आने का एक दिन तक इंतजार करते थे। नईदुनिया के साथ सुबह की चाय की चुस्कियां कुछ ज्यादा ही मीठी जाया करती थीं। 
      सामाजिक सरोकारों को पत्रकारिता का धर्म मानने वाले अभय छजलानी का जन्म 4 अगस्त, 1934 को इंदौर में हुआ। उन्होंने वर्ष 1965 में दुनिया के श्रेष्ठ संस्थानों में शामिल थॉम्सन फाउंडेशन, कार्डिफ (यूके) से पत्रकारिता में प्रशिक्षण प्राप्त किया। हालांकि अभयजी 1955 में ही पत्रकारिता के क्षेत्र में आ गए थे। 1963 में नईदुनिया के कार्यकारी संपादक हो गए और बाद में लंबे अरसे तक नईदुनिया के प्रधान संपादक रहे। 
      पत्रकारिता से जुड़े उच्च आदर्शों और मूल्यों की स्थापना के लिए प्रयास करने वाले पत्रकारों की पहली पंक्ति में अभय छजलानी का नाम आता है। आजादी के बाद की हिन्दी पत्रकारिता के संरक्षण और संवर्धन में श्री छजलानी की अहम भूमिका रही है। हिन्दी पत्रकारिता में उनके योगदान को भारत सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित किया है। हिन्दी पत्रकारिता अपने हीरो अभय छजलानी के भारतीय भाषाई समाचार पत्रों के शीर्ष संगठन इलना के तीन बार अध्यक्ष रहने के लिए भी गौरव का अनुभव करती है। अभयजी 2004 में भारतीय प्रेस परिषद के लिए मनोनीत किए गए। इसके अलावा उन्हें 1986 का पहला श्रीकांत वर्मा राष्ट्रीय पुरस्कार प्रदान किया गया। ऑर्गनाइजेशन ऑफ अंडरस्टैंडिंग एंड फ्रेटरनिटी की ओर से वर्ष 1984 में गणेश शंकर विद्यार्थी सद्भावना अवॉर्ड दिया गया। विशेष योगदान के लिए उन्हें 1997 में जायन्ट्स इंटरनेशनल पुरस्कार और इंदिरा गांधी प्रियदर्शिनी पुरस्कार से भी नवाजा गया। 
      पत्रकारिता बेहद जोखिमभरा कार्यक्षेत्र है। किसी भी पत्रकार को कभी यह भरोसा नहीं रहता कि कल नौकरी उसके हाथ रहेगी या नहीं। घोड़ा दौड़ रहा है तो मालिक बोली लगाएगा वरना तो नमस्ते लंदन तय है। लेकिन, सरल, सहज और सुलभ स्वभाव के धनी अभय छजलानी के अखबार में कर्मचारी स्वयं को सबसे अधिक सुरक्षित महसूस करते रहे। पत्रकारों का यह भरोसा ही हिन्दी पत्रकारिता के हीरो अभय छजलानी की सबसे बड़ी पूंजी है। 
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"अभय जी का जीवन निरंतर संघर्ष की दास्तान है। संघर्ष- अपना स्थान पाने के लिए, मालिक-संपादक की छवि से, अपने लोगों से, अपने आप से और हालात से। सतत संघर्ष।" 
- जयदीप कर्णिक, संपादक, वेबदुनिया
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

सोमवार, 3 नवंबर 2014

राष्ट्रवादी तेवर

 जि सकी कथनी-करनी-लेखनी में राष्ट्र सबसे पहले रहा और है। न्यूजरूम में जिसने कागद कारे करने से पहले राष्ट्र का चिंतन किया और करता है। दमदार लेखनी, स्पष्ट सोच, अनथक श्रम करने का माद्दा, घुमक्कड़ी और मिलनसार स्वभाव, ये कुछ गुण हैं जो हितेश शंकर को भीड़ से अलग पहचान दिलाते हैं। 
      महज 36 वर्ष की उम्र में देश के सबसे पुराने हिंदी साप्ताहिक, दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन के वैचारिक मुखपत्र कहे जाने वाले पाञ्चजन्य का, सम्पादक हो जाना कोई मामूली बात नहीं है। पाञ्चजन्य का संपादकत्व संभालने के लिए ध्येयनिष्ठ पके-पकाए आदमी की तलाश होती है। पाञ्चजन्य के पहले संपादक थे श्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब से आज तक इस पद के लिए खोज अमूमन पचास बसंत देख चुके अनुभवी पत्रकार पर ही पूरी होती रही है। सम्भवत: यह पहली बार है जब व्यावसायिक पत्रकारिता के मुकाबले राष्ट्रवाद का स्वर प्रखर करने, भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उद्घोष करने के लिए 'पाञ्चजन्य' युवा 'कृष्ण' के हाथ में है। हिन्दुस्तान अखबार के लिए उत्तरप्रदेश में विभिन्न संस्करण जमाने में महती भूमिका निबाहने, एनसीआर के पांच संस्करणों की सफलतापूर्वक संभाल करने के बाद जब हितेश शंकर मेट्रो एडिशन की सम्पादकीय धुरी बने हुए थे तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश-दुनिया की समझ रखने वाला बेहद सम्भावनाशील डिप्टी न्यूज एडिटर मुख्यधारा के बड़े ब्रांड की चमक छोड़कर पाञ्चजन्य का रुख करेगा।
      हितेश शंकर का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र को आगे रखे बिना पत्रकारिता संभव ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि अन्य संस्थान राष्ट्रवादी पत्रकारिता से दूर हैं, हां उनके बरक्स पाञ्चजन्य राष्ट्रीयता का मजबूत और शाश्वत प्रहरी है। यानी कह सकते हैं कि दैनिक जागरण, इंडिया टुडे और हिन्दुस्तान सहित पत्रकारिता की तमाम राहों के बाद अब हितेश शंकर को मनमाफिक मार्ग चलने के लिए मिला है। हालांकि यह भी सच है कि इतनी कम उम्र में इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने चलना तब शुरू कर दिया था जब कई दिग्गज घर से निकले भी नहीं थे। कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही उन्होंने पत्रकारिता शुरू कर दी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर करने के बाद हितेश एमफिल के लिए जेएनयू कैम्पस पहुंचे लेकिन वहां का माहौल रास नहीं आया। बाद में विज्ञापन और विपणन प्रबंधन की शिक्षा ली। लेकिन विज्ञापन बाजार की चकाचौंध से पीठ फेर पूर्णकालिक पत्रकारिता में कूद पड़े। काबिलियत के दम पर हितेश पत्रकारिता में सोपान-दर-सोपान चढ़ते रहे। बालपन से यात्राओं और अध्ययन में लगे रहे हितेश शंकर पत्रकारिता शुरू करने से पहले पूरे भारत को बेहद करीब से देख चुके थे। वैसे उनका मानना है कि समझ विकसित करने के लिहाज से एक कोस चलना, सौ पेज पढऩे से ज्यादा कारगर होता है। पन्नों और पगडंडियों से अर्जित यही अनुभवजन्य पाथेय पत्रकारिता में उनकी पूंजी है और ताकत भी। वे देश की बोलियों, समाज, संस्कार और संस्कृति को बेहद नजदीक से समझते हैं। 
      हितेश सिर्फ कलमकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे चित्रकार रहे हैं और इसीलिए डिजाइन की बारीकियां भी समझते हैं। प्रबंधन के विद्यार्थी होने के नाते बाजार की नब्ज भी पहचानते हैं। उनके आने के साथ पाञ्चजन्य की पाठ्य सामग्री पहले की अपेक्षा ज्यादा धारदार ही नहीं हुई बल्कि इसका कलेवर भी बदला गया है। उनकी ही युवा सोच का नतीजा है कि पाञ्चजन्य अब आधुनिक प्रबंधकीय अपेक्षाओं के अनुरूप टेबलॉइड की काया त्याग कर पत्रिका के रूप में व्यावसायिक पत्रिकाओं से मुकाबला करने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। वे अभी और नई ऊंचाइयां छूएंगे, नए आसमान रचेंगे, हिन्दी मीडिया उनसे ये उम्मीद कर रहा है। 
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"हिन्दी पत्रकारिता में हितेश शंकर का अपना वजूद है। वह सबसे अलग है। खबरों पर पैनी नजर रहती है। वे छोटे-बड़े मुद्दों की गहरी समझ रखते हैं। हितेश जितने मजबूत संपादन में है, उतनी ही गहरी समझ उन्हें मार्केटिंग की भी है। सही मायने में वे ऑलराउण्डर हैं।" 
- मोहम्मद वकास, पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

शनिवार, 1 नवंबर 2014

मिशनरी पत्रकार

 व्या वसायिक पत्रकारिता के दौर में भी पत्रकारिता किसी के लिए मिशन बनी रही तो वह नाम है जयकिशन शर्मा का। सामाजिक चेतना और सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए पत्रकारिता को औजार बनाने वालों में जयकिशन शर्मा का नाम ऊपर आता है। उनका स्पष्ट मानना है कि पत्रकार का मूल कार्य है समाज जागरण करना। पत्रकारिता ही एक ऐसा जरिया है जिससे समाज को उसके अधिकारों, कर्तव्यों और संभावित खतरों के प्रति सचेत किया जा सकता है। 
      समाजोन्मुखी पत्रकारिता के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले जयकिशन शर्मा बताते हैं कि व्यावसायिकता अखबार चलाने के लिए जरूरी है। पत्रकारिता के व्यावसायिक होने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन जब पत्रकार व्यवसायी हो जाता है तब पत्रकारिता को खतरा होता है। यह पत्रकार को तय करना है कि जो कलम उसने उठाई है, उसका दुरुपयोग नहीं बल्कि जनकल्याण के लिए उसका सदुपयोग हो। 
       62 वर्षीय जयकिशन शर्मा ने अपने 45 वर्षीय पत्रकारिता के कार्यकाल में अनेक पत्रकारों को प्रशिक्षित और संस्कारित किया। ऊर्जा से भरे नौजवानों को पत्रकारिता सिखाने के लिए उन्होंने 'स्वदेश' को 'पाठशाला' बना दिया और स्वयं इस पाठशाला के आचार्य की भूमिका में रहे। सच कहें तो स्वदेश और जयकिशन शर्मा दोनों ही पत्रकारिता की पाठशाला हो गए। उनके सानिध्य में पत्रकारिता सीखे लोग आज हिन्दी मीडिया में अहम पदों पर कार्यरत हैं। सरल हृदय के जयकिशन शर्मा जी सबकी चिंता करते हैं। ग्वालियर में जिस परिसर में स्वदेश का दफ्तर और मशीन लगी है, उसी परिसर में श्री शर्मा का आवास था। युवा पत्रकार अखबार छूटने तक उनके साथ रहकर पत्रकारिता की बारीकियां सीखा करते थे। काम की अधिकता के कारण कई बार कुछ पत्रकार खाना खाने घर नहीं जा पाते थे। जैसे ही यह बात श्री शर्मा को पता चलती तो वे अपने घर पर ही उसके भोजन का प्रबंध करते थे। 
        दैनिक भास्कर के मुकाबले स्वदेश को शीर्ष पर पहुंचाने वाले जयकिशन शर्मा ने सन् 1969 में ग्वालियर से प्रकाशित 'हमारी आवाज' से पत्रकार जीवन की शुरुआत की। 'हमारी आवाज' ही आगे चलकर 'स्वदेश' हो गया। इसके बाद वे रांची चले गए। यहां कुछ वक्त 'रांची एक्सप्रेस' में बिताया। लेकिन, स्वदेश का मोह फिर से खींच लाया। इसके बाद उन्होंने स्वदेश और हिन्दी पत्रकारिता की सेवा को ही अपना ध्येय बना लिया। जयकिशन शर्मा ने करीब 42 वर्ष तक स्वदेश में रहकर हिन्दी पत्रकारिता में अभूतपूर्व योगदान दिया। उन्होंने हिन्दी के शुद्धिकरण के प्रयास किये। अखबारों में मानक हिन्दी का उपयोग हो, इसके लिए विशेष आग्रह किया। 
      अखबारों को अपना दायरा बढ़ाना चाहिए। नए-नए संस्करण प्रारंभ करने चाहिए। यह विचार जयकिशन शर्मा के मन में आया। इसे मूर्तरूप देने के लिए उन्होंने स्वदेश के अलग-अलग संस्करण शुरू कराए। प्रयोगधर्मी और नवाचार में विश्वास करने वाले जयकिशन शर्मा ने बाबरी विध्वंस की खबरें पाठकों तक सबसे पहले पहुंचाने के लिए उस दिन सांध्य स्वदेश ही निकाल दिया। स्वदेश के प्रधान संपादक के पद से सेवानिवृत्त होकर वे 11 फरवरी 2014 से मध्यप्रदेश शासन के सूचना आयुक्त की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभा रहे हैं। 
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"जयकिशन जी उस परंपरा के पत्रकार हैं, जिन्होंने पत्रकारिता, राष्ट्र और समाजोत्थान के लिए सर्वस्व त्याग दिया। हिन्दी पत्रकारिता की उन्होंने बहुत सेवा की है। युवा पीढ़ी के लिए वे आदर्श पत्रकार और प्रेरणास्रोत हैं।"
- भुवनेश तोमर, वरिष्ठ पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" के विशेषांक "हिंदी मीडिया के हीरो" में प्रकाशित आलेख

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