रविवार, 23 फ़रवरी 2014

रोज बिकती हैं औरतें और मासूम भी

सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्त्ता नीरू सिंह ज्ञानी। 
 भ गवान ने इंसान को इंसान बनाते समय कोई भेदभाव नहीं बरता। लेकिन मनुष्य ने अपनी बुद्धि का दुरुपयोग करते हुए आदमी-आदमी के बीच भेदभाव की तमाम दीवारें खड़ी कर दीं। किसी को जाति के आधार पर बांट दिया। किसी को काले-गोरे के भेद में रंग दिया। किसी को धन-दौलत के तराजू में तौल दिया। खुद इंसान ने इंसान को इंसान नहीं रहने दिया। अपनी दुष्ट बुद्धि के उपयोग से उसने इंसानों के साथ जानवरों-सा बर्ताव किया और कर रहा है। पैसे और रसूख के जोर पर कमजोर आदमी को अपना गुलाम बनाया। उसे अपनी जागीर समझा। उससे कोहलू तक चलवाया और दो वक्त का खाना तक नसीब नहीं होने दिया। इंसानों के द्वारा ही इंसानों की खरीद-फरोख्त का धंधा चलाया जा रहा है। यह देख मानवता के रचियता को भी रोना आता होगा। 
       अपने निहित स्वार्थों के चलते इंसान ने कई काले टीके अपने माथे पर लगा रखे हैं। मानव तस्करी (ह्यूमन ट्रैफिकिंग) इंसानों की दुनिया का विद्रूप सत्य है। यह एक तरह से इंसानों की मण्डी है। जहां इंसानों की खरीद-फरोख्त होती है। इसमें सबसे अधिक औरतें और मासूम बेटियां बेची जाती हैं। ह्यूमन ट्रैफिकिंग के जरिए सबसे अधिक महिलाओं और बच्चों का शोषण, उनके साथ दुराचार और अनैतिक व्यवहार किया जाता है। दुनिया ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या से जूझ रही है। भारत में भी यह गंदा धंधा संगठित रूप से चल रहा है। पड़ोसी मुल्कों के अलावा उत्तरप्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश सहित भारत के अन्य राज्यों से महानगरों में लाकर महिलाओं को अनैतिक तरीके से देह व्यापार में इस्तेमाल किया जाता और बच्चों को बंधुआ मजदूर की तरह रखा जाता है। दिल्ली, बैंगलूरू, गोवा, मुंबई और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों में रसूखदार और तथाकथित ऊंचे तबके के लोग अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए मासूम बच्चों और लड़कियों की खरीद-फरोख्त करते हैं। उन्हें अपने घर में बंधक बनाकर रखते हैं। जानवरों की तरह काम कराते हैं। बर्ताव भी घोर आपत्तीजनक रहता है। छोटे बच्चों से जोखिम भरे काम कराए जाते हैं। खाने को बचा-खुचा दिया जाता है। लड़कियों से देह व्यापार कराया जाता है। उन्हें नर्क की ऐसी आग में झौंक दिया जाता है कि वे वर्षों तक उसमें झुलसती रहती हैं। हालांकि भारत में भी सरकार ने मानव तस्करी के खिलाफ कानून बना रखा है। अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम-१९५६ किसी भी प्रकार से इंसान को अनैतिक व्यापार में लगाने का सख्ती से विरोध करता है। इसके बावजूद भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग रुकने का नाम नहीं ले रही। 
समाज से ह्यूमन ट्रैफिकिंग जैसे भद्दे दाग को हटाने के लिए सरकार के साथ-साथ तमाम एनजीओ भी अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। दुनिया में ह्यूमन ट्रैफिकिंग की समस्या खत्म हो, इसके लिए एमटीवी एक्जिट (एण्ड एक्सप्लोएशन एण्ड ट्रैफिकिंग) अपने स्तर पर कार्य कर रही है। खासकर इस समस्या को लेकर जनजागृति लाने की दिशा में उनके प्रयास को सार्थक कहा जा सकता है। ट्रैफिकिंग की समस्या को लेकर २८ फरवरी से एमटीवी पर आधे-आधे घंटे की पांच शॉर्ट डाक्युमेंट्री का प्रसारण किया जाएगा। सोशल मीडिया पर इसके प्रोमो आने लगे हैं। लीक से हटकर फिल्में बनाने के लिए ख्यात बॉलीवुड के डायरेक्टर अनुराग कश्यप ने इन फिल्मों का निर्देशन किया है। ग्वालियर की समाजसेवी नीरू सिंह ज्ञानी और उनकी प्रतिभाशाली बेटी प्रांजुल एक-एक फिल्म में दिखेंगी। प्रांजुल ने पांचों फिल्मों में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर काम किया है। नीरू सिंह एक फिल्म में समाजसेवी की भूमिका में दिखेंगी। दिल्ली का एक परिवार है, जहां एक मासूम को अवैध रूप से खरीदकर रखा गया है। वह परिवार उस मासूम से घर के सभी काम कराता है। समाजसेवी रागिनी (नीरू सिंह ज्ञानी) उस मासूम को मुक्त कराती हैं। उसके पुनर्वास की व्यवस्था करती हैं। यह तो फिल्म की बात हुई। असल जिन्दगी में भी नीरू सिंह ज्ञानी अपने स्तर पर समाजसेवा के काम करती रही हैं। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि भी ऐसी ही है। श्रीमती सिंह के श्वसुर ने ग्वालियर के नजदीक रायरू में बेशकीमती जमीन पर गांव के बच्चों के पढऩे के लिए स्कूल शुरू किया। वे हमेशा स्थानीय लोगों के लिए मददगार के रूप में मौजूद रहते थे। अब उनके बेटे-बहू उनकी सोच और काम को आगे बढ़ा रहे हैं। नीरू सिंह ज्ञानी अपने एनजीओ प्रांजुल आटर््स के जरिए सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बढ़ाने की दिशा में भी काम कर रही हैं। उनके प्रयास प्रसंशनीय हैं। सार्थक हैं। उनकी सोच सकारात्मक है। समाजसेवा के उनके प्रयास तब और महत्वपूर्ण हो जाते हैं जबकि वे सक्रिय राजनीति से जुड़ी हैं। उनका अधिकतम समय महिलाओं और गांवों में भाजपा संगठन को मजबूत करने में जाता है। राजनीति कोयले की कोठरी है। इसमें सब काले ही काले लोग हैं। साफ-सुथरे लोग भी इसमें आकर काले हो जाते हैं। सब अपने लोभ-स्वार्थ को लेकर राजनीति में आते हैं। अब वो दौर नहीं रहा जब राजनीति को समाजसेवा का जरिया माना जाता था। अब तो राजनीति शुद्ध रूप से करियर हो गई है। ऐसा करियर जिसमें अकूत धन-दौलत कमाने का मौका मिलता है, बेईमान होकर। उम्दा और क्रियेटिव लोगों की यहां कमी है। भारतीय राजनीति और राजनेताओं के बारे में अमूमन हम यह सब सुनते रहते हैं। नीरू सिंह ज्ञानी जैसे लोगों से मिलकर यह मिथक टूटता-सा महसूस होता है। राजनीति में सब बुरे हैं, यह पूरा सच नहीं है। सच तो यह है कि बहुत से लोग भाजपा सहित अन्य पार्टियों में भी ऐसे हैं, जो निहायत ईमानदार हैं। बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। बिना किसी शोर-शराबे के अपने स्तर पर काम कर रहे हैं। कुछ क्रियेटिव वर्क। कुछ नया गढ़ रहे हैं। कुछ नई राहें बना रहे हैं। 
       ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में नीरू सिंह बताती हैं कि मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के साथ यह भेदभाव किसी एक देश में नहीं अपितु पूरी दुनिया में हुआ। प्रत्येक मनुष्य में ईश्वर का अंश मानने वाली परम्परा का देश भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। दुनिया में रोज कई औरतें और बेटियां खरीदी-बेची जा रही हैं। स्त्री के मान का मर्दन किया जा रहा है। दुनिया इक्कीसवीं सदी में प्रवेश कर गई है। पारदर्शिता का जमाना आ गया है। दुनियाभर में जनजाग्रति के अभियान चलाए जा रहे हैं। मनुष्य खुलकर, अपने हिसाब से, स्वस्थ वातावरण में जी सके इसके लिए दुनियाभर में तमाम कानून बन गए हैं। १० दिसम्बर १९४८ को संयुक्त राष्ट्रसंघ की महासभा में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा हो चुकी है। तब से अब तक मानवाधिकारों पर लम्बी-लम्बी सार्थक बहस हो चुकी हैं, ठोस कदम उठाए जा चुके हैं। इस सबके बावजूद आज भी मनुष्य अपनी दुष्टतई से बाज नहीं आ रहा। किसी व्यक्ति से, चाहे वो पुरुष हो, महिला हो या फिर छोटा बच्चा, उसकी मर्जी के खिलाफ  या उनकी मजबूरी का फायदा उठाकर, उनका शोषण करना, उन पर अत्याचार करना, उन्हें बंधुआ मजदूरों की तरह रखना, अनैतिक काम में लगाना, मानवाधिकारों का सीधा-सीधा उल्लंघन है। दरअसल, कुछ पैसे वाले लोग, रसूखदार, सफेदपोश और तथाकथित सभ्य समाज के लोग ह्यूमन ट्रैफिकिंग को बढ़ावा देते हैं। मनुष्य होकर मनुष्यों के साथ दुराचार करते हैं। मानव सभ्यता को लज्जित करते हैं। किसी की गरीबी का फायदा उठाकर मासूम बच्चों के साथ अनाचार करते हैं। ये ही पढ़े-लिखे रईस लोग सार्वजनिक मंचों से समानता की बात करते हैं और घर में किसी को गुलाम बनाकर रखते हैं। यह समाज का असली चेहरा है। यह समाज का घिनौना चेहरा है। वे बताती हैं कि अशिक्षा, गरीबी और बेरोजगारी के कारण ही बहुत से लोग इंसानों की मण्डी में अपनों को बेचते हैं। मानव तस्करी रोकने के लिए समाज जागरण के साथ ही सरकारी स्तर पर बहुत से प्रयास होने जरूरी हैं। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढऩे से काफी हद तक ह्यूमन ट्रैफिकिंग को रोका जा सकता है। 
      ह्यूमन ट्रैफिकिंग पर आधारित पांचों शॉर्ट फिल्मस् सच्ची घटनाओं पर आधारित हैं। इनमें पहली फिल्म सेक्सुल ट्रैफिकिंग है। इसके अलावा डोमेस्टिक सर्विट्यूट, बांडेड लेबर और चाइल्ड लेबर में भी ह्यूमन ट्रैफिकिंग का स्याह चेहरा दिखाया गया है। इन फिल्मों की ज्यादातर शूटिंग बनारस, मुंबई, गोवा और दिल्ली में हुई है। ह्यूमन ट्रैफिकिंग को लेकर जनजागृति लाने में ये फिल्में मील का पत्थर साबित हों, इसी उम्मीद के साथ। 

रविवार, 9 फ़रवरी 2014

पैदा हो सकते हैं अभिमन्यु

 भा रत की लोक कथाओं में जो ज्ञान समाहित है, उसे आधुनिक विज्ञान आधार देता नजर आ रहा है। रामायण-महाभारत काल और उससे जुड़ी कथाओं को खयाली पुलाव मानने वालों को समय-समय पर वैज्ञानिक खोजों और शोधों से जवाब मिलता रहता है लेकिन बावजूद इसके वे अपने दिमाग पर पड़ी धूल को हटाने के लिए तैयार नहीं होते हैं। मैकाले शिक्षा व्यवस्था से शिक्षित ज्यादातर बुद्धिजीवी पता नहीं यह मानने को क्यों तैयार नहीं होते कि भारत में विज्ञान, कला, व्यापार और राजनीति उन्नत शिखर पर थी, भारत विश्वगुरु था, भारत सोने की चिडिय़ा था। भारत आगे-आगे है और दुनिया पीछे-पीछे। जिस वैज्ञानिक सोच और प्रमाणों की बात वे करते हैं कम से कम उसी वैज्ञानिक सोच के माध्यमों से जो सच सामने आ रहा है उसे तो स्वीकार कर ही लेना चाहिए।
         गर्भ में ही शिशु शिक्षित होने लगता है, यह भारत का बहुत पुराना मत है। वेदों में भी वर्णन है। यही कारण है कि घर-गांव के बुजुर्ग गर्भवती महिला को अच्छे माहौल में रहने की सीख देते हैं। उसे अच्छा खाना, अच्छा पहनना, अच्छे चिंतन की सलाह देते हैं। बढिय़ा पुस्तकें पढऩे के लिए प्रेरित करते हैं। ईष्टदेव का स्मरण करने को कहते हैं। गर्भ में ही शिशु सीखना शुरू कर देता है, इसके लिए यह सब किया जाना चाहिए, यह भारतवासियों के लोक-व्यवहार में दिखता भी है। भारत के महान विचारकों के इस मत को अब ताजा शोधों से बल मिला है। फिनलैण्ड की हेलसिंकी यूनिवर्सिटी के न्यूरोसांइटिस्ट इनियो पार्टानेन और उनके साथियों ने एक शोध से इस बात की पुष्टि की है कि शिशु गर्भ में शिक्षित होना शुरू कर देता है। उनके शोध को लेकर हाल ही में देश-दुनिया के अखबारों में समाचार प्रकाशित हुए हैं। वैज्ञानिकों ने स्वीडिश और अमरीकी बच्चों के ऊपर जन्म के सात से लेकर ७५ घंटे बाद तक परीक्षण किए। शोधकर्ताओं ने शिशु के मस्तिष्क की प्रतिक्रियाओं को इलेक्ट्रोड्स द्वारा जांचा तो गर्भावस्था में सुने गए शब्दों के प्रति उसने तंत्रकीय समानता दिखाई। शोध के नतीजे बताते हैं कि गर्भ में शिशु ने मातृभाषा के जिन शब्दों को पहचाना था, जो गीत-संगीत सुना था, उसे वे जन्म के चार माह बाद तक याद रख सकते हैं। पश्चिम का विज्ञान और विद्वान इस बात का पता अब लगा सके हैं, जबकि भारत में यह आमधारण है। इनियो पार्टानेन और उनके वैज्ञानिक साथी अभी भी इस बात को नहीं जान सके हैं कि गर्भ में शिशु के सीखने की क्षमता क्या है? वह किस सीमा तक और कितना सीख सकता है? जबकि भारतवर्ष में इस संबंध में कई उदाहरण मौजूद हैं। युद्ध से लेकर वेद तक की शिक्षा गर्भ में ही पाकर बालकों का जन्म भारत में हुआ। उन्होंने गर्भ में पाए ज्ञान का प्रकटीकरण और उपयोग भी किया।
       गर्भ में ही शिक्षा प्राप्त करने वालों में सबसे बढिय़ा उदाहरण अभिमन्यु और अष्टावक्र का है। अभिमन्यु विश्वविख्यात धर्नुधर अर्जुन के पुत्र थे। अर्जुन अपनी पत्नी सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदने की विधि सुना रहे थे। सुभद्रा गर्भवती थीं। गर्भ में महान योद्धा अभिमन्यु थे। इसी दौरान अभिमन्यु ने अपने पिता अर्जुन से चक्रव्यूह भेदना सीख लिया लेकिन अभिमन्यु चक्रव्यूह से बाहर निकलना नहीं सीख सके, क्योंकि पूरी विधि सुनने से पहले ही उनकी मां सुभद्रा को नींद आ गई थी। महाभारत युद्ध के दौरान अभिमन्यु ही थे जिन्होंने कौरवों के चक्रव्यूह को भेदा। अभिमन्यु को चक्रव्यूह से बाहर निकलने की विधि नहीं पता थी, इसका लाभ कौरव पक्ष ने उठाया। कौरव पक्ष की ओर से रणभूमि में उतरे महारथियों ने मिलकर अभिमन्यु का वध कर दिया। गर्भ में ही शिक्षा पाए एक महान योद्धा के अंत की यह करुण कथा विश्वविख्यात है और भारत के उन्नत वैज्ञानिक दृष्टिकोण की एक झलक भी है। कुछ इसी तरह की अद्भुत कहानी है आठ अंगों से टेढ़े-मेढ़े पैदा होने वाले ऋषि अष्टावक्र की। अष्टावक्र के पिता कहोड़ ऋषि थे। वे वेदपाठी पण्डित थे। प्रतिदिन वेद पाठ करना उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा था। उनकी पत्नी सुजाता गर्भवती हुई। एक रात जब कहोड़ ऋषि वेद पाठ कर रहे थे तो गर्भ से बालक की आवाज आई- 'हे पिता! आप रातभर वेद पाठ करते हैं लेकिन आपका उच्चारण कभी शुद्ध नहीं होता। मैंने गर्भ में ही आपके प्रसाद से वेदों के सभी अंगों का ज्ञान प्राप्त कर लिया है।' ऋषि कहोड़ के पास उस समय और भी ऋषि बैठे थे। गर्भस्थ बालक की ऐसी बात सुनकर उन्होंने स्वयं को अपमानित महसूस किया। वेद पण्डित पिता का अंहकार जाग गया। वे क्रोध से आग-बबूला हो उठे। क्रोध में ही उन्होंने अपने गर्भस्थ शिशु को अभिशाप दे दिया - 'हे बालक! तुम गर्भ में रहकर ही मुझसे इस तरह का वक्र वार्तालाप कर रहे हो। मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुम आठ स्थानों से वक्र होकर अपनी माता के गर्भ से पैदा होगे।' बाद में जब बालक का जन्म हुआ। बालक श्राप के अनुसार आठ स्थान से टेढ़ा-मेढ़ा था। इसलिए उसका नाम अष्टावक्र पड़ा। गर्भ में ही वेदों के सभी अंगों को जान लेना वाला यह बालक आगे चलकर महान विद्वान बने और विश्व विख्यात हुए। अभी तक अभिमन्यु और अष्टावक्र की कथाओं को महज कल्पना मानने वाले लोगों को अब मान लेना चाहिए कि सब सच है, अभिमन्यु पैदा हो सकते हैं।
       हिन्दू धर्म में सोलह संस्कारों का बड़ा महत्व है। सोलह संस्कार का चरण जन्म से पहले और मृत्यु के बाद तक चलता है। सोलह में से दो संस्कार तो शिशु के पैदा होने से पहले के ही हैं। एक गर्भाधान संस्कार और दूसरा पुंसवन संस्कार। दोनों संस्कारों का उद्देश्य बलशाली, संस्कारी और स्वस्थ्य संतान को जन्म देना है। भारतीय मनीषियों ने इस ज्ञान को अच्छे से जान लिया था कि जैसा बीज होगा, वैसा ही पेड़ उगेगा यानी गर्भ में जैसे संस्कार बालक को दिए जाएंगे, उसका व्यक्तित्व उसी तरह बनेगा। श्रेष्ठ संतान उत्पन्न हों, इसके लिए उन्होंने धर्म में ही ऐसी व्यवस्था कर दी। उन्होंने गर्भाधान संस्कार के संबंध में समाज को बताया। गर्भाधान संस्कार के महत्व को शास्त्रों में इस तरह बताया गया है- 
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते। 
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलम् स्मृतम।।
अर्थात् विधिपूर्वक संस्कार से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्य संबंधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन और क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान का फल है। बाद में चिकित्साशास्त्र भी तमाम शोधों के आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि गर्भाधान के समय स्त्री-पुरुष जिस भाव से भावित होते हैं, उसका असर रज-वीर्य पर पड़ता है और बाद में ये भाव शिशु में प्रकट होते हैं। भारतीय चिंतकों को मानना था कि जीव जब माता के गर्भ में आता है तभी से उसका शारीरिक विकास शुरू हो जाता है। शिशु का सही दिशा में शारीरिक और बौद्धिक विकास हो, इसके लिए हिन्दू धर्म का दूसरा संस्कार है। शास्त्रों में कहा गया है कि जब गर्भाधान का तीसरा महीना होता है, तब पुंसवन संस्कार किया जाता है। धर्मग्रथों में पुंसवन संस्कार करने के दो प्रमुख उद्देश्य मिलते हैं। पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा स्वस्थ, सुंदर तथा गुणवान संतान पाने का है। 
         भारत की थाती के बारे में जब चिन्तन करते हैं तो ध्यान आता है कि हम क्या थे और क्या हो गए। हम कहां थे, अब कहां हैं। दुनिया के नेता थे, अब अनुसरणकर्ता हो गए हैं। दुनिया पहले भारत की ओर देखती थी, अब हम दुनिया की ओर देख रहे हैं। ज्ञान-विज्ञान, खोज-आविष्कार, जीवनशैली में भारत आगे-आगे था, दुनिया पीछे-पीछे। अब हम कई मामलों में पीछे रह गए हैं, दुनिया आगे-आगे चल रही है। भारत की संतानें अपना अतीत भूल गईं। पुरखे जिस ऊंचाई पर ज्ञान-विज्ञान को लेकर पहुंचे थे, उनके बाद की पीढ़ी उसे आगे नहीं ले जा सकी। भारत को फिर से दुनिया का सिरमौर बनाना है तो हमें वेदों की ओर लौटना पड़ेगा। वेदों और धर्मशास्त्रों को कपोल कल्पना या महज धर्मग्रंथ मानने की मनोस्थिति से बाहर निकलना होगा। वे प्राचीन भारत के गौरवमयी इतिहास के साक्षी हैं। वेदों को आधार बनाकर खोज और शोध करने होंगे। भारत के प्राचीन ज्ञान को सामने लाना होगा। जिस पड़ाव पर भारत था, हमें उस बिन्दु से आगे बढऩा होगा। इस दिशा में बहुत काम करने की जरूरत है। कुछ संस्थान भारतीय धर्मग्रंथों और शास्त्रों को आधार बनाकर शोधकार्य कर रहे हैं लेकिन ये प्रयास अभी नाकाफी हैं। इनकी गति और दायरा बढ़ाने की जरूरत है। एक बार फिर भारत का प्राचीन ज्ञान-विज्ञान साकार हो जाए तो भारत फिर आगे-आगे होगा और दुनिया पीछे-पीछे। 

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