शुक्रवार, 31 जनवरी 2014

मीडिया पर नहीं पूरा भरोसा

 स माचार-पत्र और न्यूज चैनल्स धीरे-धीरे अपनी विश्वसनीयता खोते जा रहे हैं। लोगों को अब समाचार-पत्र में प्रकाशित होने वाली सामग्री पर पूरा-पूरा भरोसा नहीं रहा। अलग-अलग न्यूज चैनल्स पर आने वाले समाचारों को लेकर भी दर्शकों का मानना है कि सब सच नहीं है। एक ही खबर का लगभग पूरा सच जानने के लिए चार-छह अखबार पढऩे पड़ते हैं। तब भी कुछ न कुछ सवाल बाकी रह जाते हैं। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय की ओर से चुनावी परिप्रेक्ष्य में लोक विमर्श का अध्ययन करने के लिए जब छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और राजस्थान में जाना हुआ और लोगों से बातचीत हुई तो मीडिया को लेकर एक कड़वा सच सामने आया। हालांकि मीडिया से लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है, इस सच से मैं पहले भी वाकिफ था। लेकिन बरसों-बरस पत्रकारों ने खुद को खपा-खपा कर विश्वसनीय पत्रकारिता की जो इमारत बुलंद की थी, वह कितनी तेजी से दरक रही है, यह जानकर अच्छा नहीं लगा। समाचार-पत्र और टेलीविजन से राजनीतिक मुद्दों पर आपको जो जानकारी मिलती है, उस पर आपका कितना विश्वास हैं? लगभग पूरा विश्वास करते हैं, उक्त सवाल का ऐसा जवाब देने वाला एक भी जागरूक पाठक और दर्शक नहीं मिला। हां, दस-पांच लोगों ने जरूर कहा कि अस्सी फीसदी तक विश्वास करते हैं। लेकिन, तीन सौ लोगों में दस-पांच ऐसे नामों की कोई गिनती नहीं की जा सकती। पत्रकारिता के भविष्य के लिए यह एक चुनौती है। मीडिया संस्थानों को अब चेत जाने की जरूरत है। अभी भी लोग अखबार और टेलीविजन पर आधा-आधा विश्वास कर रहे हैं लेकिन ऐसा ही चलता रहा तो यह आधा-आधा विश्वास भी जाता रहेगा। लोगों का मानना है कि पेड न्यूज की बीमारी की वजह से पत्रकारिता की विश्वसनीयता को सर्वाधिक क्षति हुई है। पेड न्यूज यानी नोट के बदले खबर छापना। वर्ष २००९ में लोकसभा के चुनाव के दौरान पेड न्यूज के कई मामले सामने आए थे। पहली बार पेड न्यूज एक बड़ी बीमारी के रूप में सामने आई थी। अखबारों और न्यूज चैनल्स ने बकायदा राजनीतिक पार्टी और नेताओं की खबरें प्रकाशित/प्रसारित करने के लिए पैकेज लांच किए थे। यानी राजनीति से जुड़ी खबरें वास्तविक नहीं थीं। जिसने ज्यादा पैसे खर्च किए उस पार्टी/नेता के समर्थन में उतना बढिय़ा कवरेज। जिसने पैसा खर्च नहीं किया उसके लिए कोई जगह नहीं थी। इस दौरान कई राजनेताओं ने सबूत के साथ मीडिया पर आरोप लगाए कि उनके समर्थन में खबरें छापने के लिए पैसा वसूला गया है या वसूला जा रहा है। पेड न्यूज की खबरों से बड़े मीडिया घरानों की साख पर भी बट्टा लगा। नतीजा यह हुआ कि इन विधानसभा चुनाव में स्वयं को विश्वसनीय दिखाने के लिए कई बड़े समाचार-पत्रों और चैनल्स ने पेड न्यूज के खिलाफ अभियान छेड़ दिया। सही मायने में कह सकते हैं कि खुद को पेड न्यूज के खिलाफ खड़ा दिखाया। समाचार-पत्रों ने तो 'नो पेड न्यूज' के लोगो तक प्रतिदिन प्रकाशित करना शुरू कर दिया। यानी हम विश्वसनीय अखबार हैं। हम नोट लेकर खबर नहीं छापते। लेकिन, पूर्व के कारनामे इतने बड़े हैं कि लोगों को 'नो पेड न्यूज' के मुखौटे पर आसानी के साथ विश्वास नहीं हो रहा है। वह तो खबरों से समाचार-पत्र और न्यूज चैनल की विश्वसनीयता को आंकता है। 
मध्यप्रदेश के जिले दतिया में चाय-नाश्ते की दुकान पर मैंने देखा कि एक व्यक्ति अखबार पढऩे में काफी रुचि ले रहा है। वह दो-तीन समाचार-पत्र पढ़ चुका था। अमूमन भागदौड़ भरे इस समय में आदमी एक अखबार भी ढंग से नहीं पढ़ता है। ऐसे में समाचार-पत्रों को इतनी रुचि लेकर पढऩे वाले सुधी पाठक से बात करना मैंने उचित समझा। 
'यहां, दतिया में कौन-से अखबारों की स्थिति अच्छी है।' मैं अपनी चाय का गिलास लेकर उसके नजदीक पहुंचा और उससे यह सवाल पूछा। उसने कहा- सब एक जैसे हैं। 'राजनीति के विषय में आपको समाचार-पत्रों से कितनी जानकारी प्राप्त होती है और आप उस पर कितना विश्वास करते हैं?' अखबार को मोड़ते हुए उसने मेरे इस सवाल का जवाब दिया- सब पैसा लेकर खबर छाप रहे हैं। ऐसे में सही जानकारी कहां मिल पा रही है। जो प्रत्याशी पैसा अखबार के दफ्तर पैसा पहुंचा देता है, अखबार के पन्नों पर उसकी वाहवाही और जीत दिखने लगती है। किसी एक अखबार की यह स्थिति नहीं है, सब के सब यही कर रहे हैं। अब अखबार और पत्रकार पहले जैसे नहीं रहे। यही कारण है कि अब अखबार में बड़ी-बड़ी खबरें प्रकाशित होने पर भी उनका कोई असर नहीं होता। 'आपको कैसे पता कि किस अखबार ने, कौन-सी खबर पैसा लेकर छापी है?' मेरे इस सवाल पर वह मुस्कुराया और बोला- स्थानीय आदमी को सब समझ में आता है साहब। अब अखबार वाले पैसा लेकर किसी बहुत ही कमजोर प्रत्याशी को जिताऊ प्रत्याशी बताएंगे तो स्थानीय लोगों को समझ नहीं आएगा क्या? यही कारण है कि लोग अब समाचार-पत्र की सभी खबरों पर पूरा भरोसा नहीं करते। मैं रोज तीन-चार अखबार पढ़ता हूं, क्योंकि तभी किसी खबर की पूरी जानकारी मिल पाती है। 
       उसने नाम लेकर कई प्रतिष्ठित अखबारों की नीति-रीति पर भी अंगुली उठाई। पैसा कमाने की भूख में सभी अखबार एक ही रंग में रंग गए हैं। उसने आगे कहा कि लोकतंत्र में मीडिया खुद को चौथा स्तम्भ मानता है। यह काफी हद तक सही भी है। लोकतंत्र को मजबूत करने में समाचार-पत्र और न्यूज चैनल्स की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका है। समाचार-पत्र और टेलीविजन की खबरें पढ़/सुनकर आज भी कई लोग अपनी चुनावी राय बनाते हैं। मीडिया के माध्यम से ही अलग-अलग नेताओं और पार्टियों के बारे में लोगों की धारणा बनती-बिगड़ी है। ऐसे में मीडिया यदि गलत और पक्षपातपूर्ण खबरें प्रकाशित करेगा तो लोकतंत्र को भारी नुकसान होने वाला है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए मीडिया को भ्रष्टाचार से मुक्त रखना जरूरी है। उसकी भूमिका ठीक रहना जरूरी है। फिलहाल तो मीडिया जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह काफी खतरनाक है, मीडिया के लिए भी और लोकतंत्र के लिए भी। मीडिया पर लोगों का विश्वास कम होता जा रहा है। यह चिंता का विषय है। छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले और राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ में भी लगभग सभी लोगों का यही कहना था कि मीडिया में आ रही खबरें पूरी तरह सच नहीं है। सच के प्रहरी अब ताकत और धन लोलुपता के नशे में हैं। मार्केटिंग से जुड़े श्रीमान जाड़ावत ने बताया कि आम जनता के सरोकारों से अब मीडिया को उतना लेना-देना नहीं रहा है। सच यह है कि अब व्यावसायिक हित प्राथमिक हो गए हैं। चुनाव के समय में अखबार राजनीतिक विज्ञापनों की दर व्यावसायिक विज्ञापन से भी कहीं अधिक कर देते हैं। मीडिया की विश्वसनीयता की स्थिति क्या है, इसे समझने के लिए, ये महज उदाहरण नहीं हैं। बल्कि चेतावनी है कि मीडिया को लेकर बन रहे लोगों के इस मानस को गंभीरता से लेने की जरूरत है।

सोमवार, 13 जनवरी 2014

युवा नायक स्वामी

 म हज ३९ साल की आयु में दुनिया का दिल जीतकर चले जाना आसान नहीं होता। निश्चिततौर पर ऐसा कोई असाधारण व्यक्ति ही कर सकता है। असाधारण होना नायक होने का पहला और नैसर्गिक गुण है। नायक प्रभावशाली होता है, वह लोगों की भीड़ को अपनी बातों से सम्मोहित कर सकता है। नायक अपने तेज से लोगों को अपनी ओर खींच सकता है। वह नई राह बनाता है लोगों के चलने के लिए। उसके पास समस्याएं नहीं बल्कि उनके हल होते हैं। नायक विचारवान, तर्कशील और तत्काल निर्णय लेने में सक्षम होता है। वह साहस, उत्साह और ऊर्जा से लबरेज रहता है। नायक कुशलता से लोगों का नेतृत्व करता है। इसके साथ ही तमाम दूसरे गुण कथनी-करनी में ईमानदार, आकर्षक व्यक्तित्व, न्याय प्रियता, निरपेक्षता, निर्लिप्तता, त्याग, संयम, शुचिता, वीरता, ओज, क्षमाभाव, प्रेम, समन्वयीकरण, प्रबंधन, परोपकार, परहित चिंता, दृढ़ता और इच्छाशक्ति भी नायक को औरों से अलग करते हैं। 
       स्वामी विवेकानंद ने ३९ वर्ष की अल्पायु में नायक के इन सब गुणों का प्रगटीकरण किया। अब विचार करने की बात है कि स्वामी विवेकानंद नायक किसके? स्वामी विवेकानंद यूं तो सबके नायक साबित होते हैं। उनको लेकर कहीं कोई भेद नहीं है। न जाति के आधार पर उन्हें किसी ने बांटा है, न विचारधारा के नाम पर। लिंग और आयुवर्ग के आधार पर भी वे किसी एक के नायक नहीं है। वे तो सबकी बात करते हैं। फिर भी स्वामी विवेकानंद युवाओं में सर्वाधिक लोकप्रिय हैं। दरअसल, स्वामी विवेकानंद के चिंतन में सदैव युवा केन्द्रीय बिन्दु रहा। स्वामी जी कहते थे कि मेरी आशा युवाओं में, इनमें से ही मेरे कार्यकर्ता आएंगे। स्वामी भली-भांति जानते थे कि भारत और हिन्दू धर्म के उत्थान में ओजस्वी और बलशाली युवाओं की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। युवा यदि देश और धर्म से विमुख होगा तो स्थितियां बदतर हो जाएंगी। इसलिए स्वामी जी अकसर युवाओं का आव्हान करते थी कि उठो और अपनी जिम्मेदारी संभालो। जागो युवा साथियो, अपनी कमर कसकर खड़े हो जाओ। भारत मां की सेवा के लिए सामथ्र्य जुटाओ।  
       स्वामी विवेकानंद बेहद आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी बातों में जादू था। तभी तो ११ सितंबर १८८३ को शिकागो में उनका जादू सिर चढ़कर बोला था। महज कुछ पलों में अपनी बात रखने का मौका स्वामी विवेकानंद को मिला था। इन चंद पलों में ही भारत के विवेक ने अमेरिका और दुनियाभर से जमा लोगों की बीच आनंद की लहर पैदा कर दी। इसके बाद तो धर्मसभा के आयोजकों ने उनका बड़े रोचक तरीके से इस्तेमाल किया। जब किसी के भाषण से श्रोताओं का मन ऊबने लगता और वे जाने को होते तब बीच में मंच पर आकर आयोजक उद्घोषणा करते कि एक भाषण के बाद स्वामी विवेकानंद बोलेंगे, इतना सुनते ही भीड़ वहीं ठिठक जाती। यह जादू आज भी बरकरार है। रामकृष्ण मिशन और विवेकानंद केन्द्र सहित स्वामी जी के विचारों को लेकर काम कर रहे अलग-अलग संगठनों के मुताबिक आज भी स्वामीजी को पढऩे और समझने के लिए युवा लालायित रहते हैं। इन संगठनों से युवा बड़ी संख्या में जुड़कर काम भी कर रहे हैं। दरअसल, युवा स्वामी विवेकानंद को औरों की अपेक्षा अपने अधिक निकट पाते हैं। युवाओं के मन में स्वामीजी की युवा संन्यासी, देशभक्त युवक और क्रांतिकारी प्रणेता की छवि बसी हुई है। स्वामी विवेकानंद भी अकसर अपने भाषणों में आव्हान करते थे कि संसार को बस कुछ सौ साहसी युवतियों-युवकों की जरूरत है। स्वामी जी युवाओं में साहस भी असीम चाहते थे। समुद्र को पी जाने का साहस, समुद्र तल से मोती लेकर आने का साहस, मृत्यु का सामना कर सकने का साहस और पहाड़-सी चुनौतियों को स्वीकार कर सकने का साहस स्वामी जी युवाओं में चाहते थे। स्वामीजी हिन्दू संन्यासी होकर युवाओं से मंदिर में बैठकर माला जपने और देवता के आगे अगरबत्ती लगाने की बात नहीं कहते थे। वे हमेशा युवाओं के मन की बात करते थे, सिर्फ मन की नहीं असल में युवाओं के उत्थान की, राष्ट्र के विकास की और समाज के सुदृढि़करण की बात। उनका तो मानना था कि सबसे पहले हमारे तरुणों को मजबूत बनना चाहिए। धर्म इसके बाद की वस्तु है। युवा शक्तिशाली होगा, नशे-व्यसन से दूर होगा और कर्मशील होगा तो बाकी सब समस्याओं को दूर भगाना आसान होगा। स्वामी जी युवाओं को संबोधित करते हैं - 'मेरे मित्रो, शक्तिशाली बनो, मेरी तुम्हें यही सलाह है। तुम गीता के अध्याय की अपेक्षा फुटबाल के द्वारा ही स्वर्ग के अधिक समीप पहुंच सकोगे। ये कड़े शब्द हैं लेकिन मैं उन्हें कहना चाहता हूं क्योंकि मैं तुम्हें प्यार करता हूं। तुम्हारे स्नायु और मांसपेशियां अधिक मजबूत होने पर तुम गीता अधिक अच्छी तरह समझ सकोगे। इसलिए जाओ मैदान में फुटबाल खेलो।' 
      अपनी ओजस्वी वाणी और तर्क के आधार पर विश्व में भारत की आध्यात्मिक परंपरा का डंका बजाने वाले स्वामी विवेकानंद तरुणों में ही लोकप्रिय नहीं है, वे युवतियों के भी हीरो हैं। इस युवा संन्यासी ने भारत की स्त्री शक्ति की भी चिंता की। उनकी महत्ता प्रतिपादित की। स्त्रियों को उनका अस्तित्व याद दिलाया। फलत: अमेरिका सहित यूरोप की कई स्त्रियां उनकी अनुयायी बन गईं। स्वामीजी के मार्ग पर चल निकलीं। स्त्रियों के साथ उस समय हो रहे दोयम दर्जे के व्यवहार पर विवेकानंद ने रोष प्रकट किया और पुरुष सत्ता को संभलने की चेतावनी दी। स्वामीजी कहते थे कि स्त्रियों की स्थिति में सुधार हुए बिना संसार के कल्याण की कोई संभावना नहीं है। एक पक्षी का केवल एक पंख के सहारे उड़ पाना संभव नहीं है। यहां स्पष्ट कर देना होगा कि स्वामीजी भारत में स्त्रियों की स्थिति को लेकर ही चिंतित नहीं थे वरन् उनकी चिंता दुनियाभर में स्त्रियों के साथ हो रहे अन्याय को लेकर थी। स्वामीजी सीधे स्त्रियों से भी अपेक्षा करते थे कि वे अपने काम स्वयं करें, पुरुषों के भरोसे रहे ही नहीं। उनका स्पष्ट मत था कि स्त्रियों में अवश्य ही यह क्षमता होनी चाहिए कि वे अपनी समस्याएं अपने ढंग से हल कर सकें। उनका यह कार्य न कोई दूसरा कर सकता है और न ही दूसरे को करना चाहिए। स्त्रियों को शिक्षित करने की दिशा में भी स्वामी जी की चिंता स्पष्ट दिखती है। वे जानते थे कि स्त्री शिक्षा के मायने क्या हैं। परिवार और समाज निर्माण की बुनियाद स्त्रियों के हाथ में पुरुषों की अपेक्षा कुछ अधिक रहती है। स्पष्ट है ऐसे में घर में मां और बहन का पढ़ा-लिखा होना कितना जरूरी है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी प्रिय शिष्या भगिनी निवेदिता (मार्गरेट नोबल) को भारत में नए सिरे से नारी शिक्षा की दिशा में काम करने के लिए प्रेरित किया। स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से ही भगिनी निवेदिता ने सारदा बालिका विद्यालय की स्थापना की। साथ ही देशभर में नारी शिक्षा को मजबूत करने के लिए आंदोलन भी चलाया। 
       साहस, उत्साह और ऊर्जा के पुंज स्वामी विवेकानंद के क्रांतिकारी विचार उनके समय से अब तक युवाओं को आत्मविश्वास से भर देते हैं। विवेकानंद का नाम मस्तिष्क में आते ही हृदय स्फूर्ति और उत्साह से भर जाता है। स्वामीजी के ओजस्वी विचार आज भी युवाओं को प्रेरणा देते हैं। 'उठो जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल न प्राप्त हो जाए' स्वामी विवेकानंद का यह वाक्य आज भी दुनियाभर के युवाओं का मार्गदर्शन करने का काम करता है। विद्यार्थी जीवन में तो अधिकतर युवा इस वाक्य को सदैव अपने अध्ययन की मेज के सामने लिखकर ही रखते हैं। युवाओं को स्वामी विवेकानंद अपने नायक तो दिखते ही हैं, मित्र की तरह भी महसूस होते हैं। युवाओं में स्वामी विवेकानंद की लोकप्रियता का कारण है कि उनकी जयंती को राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। हालांकि यह भी सच है कि वर्तमान युवा पीढ़ी उन्हें आदर्श जरूर मानती है लेकिन उनके विचारों और सिद्धांतों का पालन करने में बहुत पीछे है। जरूरत इस बात की है युवा आगे आएं और अपने नायक को अपने जीवन में उतारें। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि भारत को फिर से विश्वगुरु कोई बना सकता है तो वह है भारत की युवाशक्ति। स्वामी विवेकानंद के स्वप्न को साकार करने की महती जिम्मेदारी भारत की युवा पीढ़ी पर है, वे ऐसा कर सकते हैं, बस उन्हें जरूरत है अपने हीरो विवेकानंद के बताए मार्ग पर आगे बढऩे की। भारत की युवा शक्ति को जागृत करने और नई सोच देने के लिए विवेकानंद बहुत कुछ कह गए हैं। आज के युवा उसे पढ़ें, समझें और तब तक नहीं रुकें, जब तक स्वामी जी के स्वप्न साकार नहीं हो जाएं। 

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