शुक्रवार, 5 दिसंबर 2014

सबके साथी

 ध रती पर अगर स्वर्ग कहीं है तो वह है जम्मू-कश्मीर। लेकिन, जम्मू-कश्मीर की बड़ी आबादी को भयंकर कष्ट भोगने को विवश होना पड़ रहा है। स्वर्ग का सुख उनके नसीब में नहीं है। लाखों की संख्या में कश्मीरी पण्डितों को अपने ही देश में विस्थापित होकर बसर करना पड़ रहा है। अपने ही देश में पराए बनकर खुशी से रहा जाता है क्या? जम्मू-कश्मीर के धवल शिखरों को जब आतंकवादियों और अलगाववादियों ने लाल रंग में रंगना शुरू किया, खासकर कश्मीरी पण्डितों को निशाना बनाया गया तो मजबूरन उन्हें अपना आशियाना छोडऩा पड़ा। इस विस्थापन में अपने परिवार के साथ एक बच्चे ने भी घर छोड़ा था। आज यह बच्चा देश का सम्मानित और प्रख्यात टीवी पत्रकार है। नाम है राजेश रैना। दुनिया के तमाम संघर्ष से तपकर आगे आए राजेश रैना सदैव दूसरों की मदद के लिए तैयार रहते हैं। वे सौम्य हैं, सरल हैं और सहज हैं। 
      जम्मू-कश्मीर के अनंतनाग जिले के खूबसूरत गांव सलिया में 01 अक्टूबर, 1970 को जन्मे राजेश रैना के दिल में आज भी अपनी धरती से जुदा होने का दर्द है। भले ही वे देश के सबसे बड़े रीजनल न्यूज नेटवर्क समूह ईटीवी के समूह सम्पादक हो गए हों। लेकिन, आज भी वे अपनी जमीन को शिद्दत से याद करते हैं, महसूस करते हैं। अपनी जमीन के लिए उनके मन की तड़प को कुछ यूं भी समझ सकते हैं कि श्री रैना जम्मू से अपनी पढ़ाई पूरी करने के तत्काल बाद दूरदर्शन के न्यूज कास्टर बनकर सीधे श्रीनगर की खूबसूरत वादियों में पहुंच गए। तमाम आशंकाओं और खतरों के बीच यहां करीब छह साल तक उन्होंने पत्रकारिता की। इसके बाद एक निजी टीवी चैनल का हिस्सा होकर दिल्ली चले आए। लेकिन, दिल्ली में उनका दिल ज्यादा लगा नहीं। जम्मू-कश्मीर के बाद हैदराबाद को उन्होंने अपना दूसरा घर बना लिया। रामोजी राव के टीवी नेटवर्क ईटीवी (अब टीवी१८ ग्रुप का हिस्सा) से जुड़ गए। इसके बाद उन्होंने पीछे मुडक़र नहीं देखा। रामोजी राव से प्रेरित होकर अपनी मेहनत, लगन और प्रतिभा के दम पर राजेश रैना ने जो मुकाम हासिल किया है, मीडिया जगत में उसे पाने के सपने कई लोग देखते हैं। 
      हिन्दी, कश्मीरी, तेलगू, उर्दू और अंग्रेजी, पांच भाषाओं के जानकार और एक दशक से अधिक वक्त से इलेक्ट्रोनिक मीडिया में सक्रिय राजेश रैना ने ईटीवी के उर्दू चैनल को नई ऊंचाइयां दी हैं। 15 अगस्त, 2014 को उर्दू ईटीवी की 13वीं वर्षगांठ शानदार अंदाज में पूरी हुई है। उनके गरिमापूर्ण नेतृत्व में ईटीवी उर्दू, ईटीवी कन्नड़ और ईटीवी गुजराती को सफलतापूर्वक लांच किया गया। शिखर पर पहुंचने के बाद भी मिलनसार स्वभाव के राजेश रैना जमीन से जुड़े हुए हैं। वे खुलकर लोगों से मिलते हैं, उन्हें पूरी तन्मयता के साथ सुनते और समझते हैं।
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"राजेश रैना उस शख्सियत का नाम है, जो सबको साथ लेकर चलते हैं और सबके साथ चलते हैं। ईटीवी उर्दू को ऊंचाईयां देने में उन्होंने जो मेहनत की है वह काबिले तारीफ है।" 
- तहसीन मुनव्वर, पत्रका
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत ही उम्दा लिखा है भाई लोकेंद्र। राजेश रैना साबह वाकई बड़े पत्रकार हैं।
    इस लेख को पढ़कर एक वाकया याद आ गया, जिसे 6 साल पहले अपने गुरू प्रोफेसर एसके रैना से सुना था। श्रीनगर शहर के ठीक बीचों बीच कश्मीरी पंडितों की एक बस्ती थी रैनाबाड़ी। बरबरशा इलाके के पास। इस पूरे इलाके में 1989 से पहले तक बड़ी संख्यां में रैना और कॉल परिवार रहते थे। लेकिन आज यहां शायद एक भी रैना या कॉल परिवार नहीं हैं। यहीं एक बहुत खूबसूरत महलनुमा भवन था रैना पैलेस। 1989 में एक भीषण आतंकी हमले और हिंदुओं को कश्मीर छोड़ने की आतंकियों की चेतावनी के बाद इस रैनाबाड़ी के तमाम कश्मीरी पंडितों के परिवारों को अपनी पुश्तैनी जमींन और मातृभूमि छोड़ जान बचाने के लिए भागना पड़ा था। रैना पैलेस में आग लगा दी गई। इस पैलेस के मालिकों में एक थे हमारे गुरू प्रोफेसर एसके रैना। प्रो. रैना पीजीवी कॉलेज में माइक्रोबॉयोलॉजी विभाग के प्रमुख थे। अब वे रिटायर हो चुके हैं। जब कभी वे फुरसत में होते, तो अपने कश्मीरी दिनों की याद करते हुुए उन घटनाओं का जिक्र हम लोगों से करते थे। इस घटना के बाद वे कभी दोबारा लौटकर रैनाबाड़ी नहीं गए। वे बताते हैं कि अपनी संपत्ति को बेचने के लिए 1990 में उनके एक चचेरे भाई लौटकर कश्मीर गए तो उनकी रैनाबाड़ी में ही उनकी हत्या कर दी गई थी। यह घटना तो कश्मीरी पंडितों के विस्थापन और दर्द की सिर्फ एक कहानी है, एेसे कई किस्से आपको उन परिवारों से सुनने को मिल जाएंगे, जो तमाम शहरों में अपने रिश्तेदारों और मातृभूमि से बिछड़कर निर्वासन की जिंदगी जी रहे हैं।

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