सोमवार, 3 नवंबर 2014

राष्ट्रवादी तेवर

 जि सकी कथनी-करनी-लेखनी में राष्ट्र सबसे पहले रहा और है। न्यूजरूम में जिसने कागद कारे करने से पहले राष्ट्र का चिंतन किया और करता है। दमदार लेखनी, स्पष्ट सोच, अनथक श्रम करने का माद्दा, घुमक्कड़ी और मिलनसार स्वभाव, ये कुछ गुण हैं जो हितेश शंकर को भीड़ से अलग पहचान दिलाते हैं। 
      महज 36 वर्ष की उम्र में देश के सबसे पुराने हिंदी साप्ताहिक, दुनिया के सबसे बड़े सांस्कृतिक संगठन के वैचारिक मुखपत्र कहे जाने वाले पाञ्चजन्य का, सम्पादक हो जाना कोई मामूली बात नहीं है। पाञ्चजन्य का संपादकत्व संभालने के लिए ध्येयनिष्ठ पके-पकाए आदमी की तलाश होती है। पाञ्चजन्य के पहले संपादक थे श्री अटल बिहारी वाजपेयी और तब से आज तक इस पद के लिए खोज अमूमन पचास बसंत देख चुके अनुभवी पत्रकार पर ही पूरी होती रही है। सम्भवत: यह पहली बार है जब व्यावसायिक पत्रकारिता के मुकाबले राष्ट्रवाद का स्वर प्रखर करने, भारतीय स्वाभिमान और शौर्य का उद्घोष करने के लिए 'पाञ्चजन्य' युवा 'कृष्ण' के हाथ में है। हिन्दुस्तान अखबार के लिए उत्तरप्रदेश में विभिन्न संस्करण जमाने में महती भूमिका निबाहने, एनसीआर के पांच संस्करणों की सफलतापूर्वक संभाल करने के बाद जब हितेश शंकर मेट्रो एडिशन की सम्पादकीय धुरी बने हुए थे तब किसी ने नहीं सोचा था कि देश-दुनिया की समझ रखने वाला बेहद सम्भावनाशील डिप्टी न्यूज एडिटर मुख्यधारा के बड़े ब्रांड की चमक छोड़कर पाञ्चजन्य का रुख करेगा।
      हितेश शंकर का स्पष्ट मानना है कि राष्ट्र को आगे रखे बिना पत्रकारिता संभव ही नहीं है। ऐसा नहीं है कि अन्य संस्थान राष्ट्रवादी पत्रकारिता से दूर हैं, हां उनके बरक्स पाञ्चजन्य राष्ट्रीयता का मजबूत और शाश्वत प्रहरी है। यानी कह सकते हैं कि दैनिक जागरण, इंडिया टुडे और हिन्दुस्तान सहित पत्रकारिता की तमाम राहों के बाद अब हितेश शंकर को मनमाफिक मार्ग चलने के लिए मिला है। हालांकि यह भी सच है कि इतनी कम उम्र में इस मुकाम तक पहुंचने के लिए उन्होंने चलना तब शुरू कर दिया था जब कई दिग्गज घर से निकले भी नहीं थे। कॉलेज में पढ़ाई के साथ ही उन्होंने पत्रकारिता शुरू कर दी थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति विज्ञान में स्नातकोत्तर करने के बाद हितेश एमफिल के लिए जेएनयू कैम्पस पहुंचे लेकिन वहां का माहौल रास नहीं आया। बाद में विज्ञापन और विपणन प्रबंधन की शिक्षा ली। लेकिन विज्ञापन बाजार की चकाचौंध से पीठ फेर पूर्णकालिक पत्रकारिता में कूद पड़े। काबिलियत के दम पर हितेश पत्रकारिता में सोपान-दर-सोपान चढ़ते रहे। बालपन से यात्राओं और अध्ययन में लगे रहे हितेश शंकर पत्रकारिता शुरू करने से पहले पूरे भारत को बेहद करीब से देख चुके थे। वैसे उनका मानना है कि समझ विकसित करने के लिहाज से एक कोस चलना, सौ पेज पढऩे से ज्यादा कारगर होता है। पन्नों और पगडंडियों से अर्जित यही अनुभवजन्य पाथेय पत्रकारिता में उनकी पूंजी है और ताकत भी। वे देश की बोलियों, समाज, संस्कार और संस्कृति को बेहद नजदीक से समझते हैं। 
      हितेश सिर्फ कलमकार ही नहीं बल्कि एक अच्छे चित्रकार रहे हैं और इसीलिए डिजाइन की बारीकियां भी समझते हैं। प्रबंधन के विद्यार्थी होने के नाते बाजार की नब्ज भी पहचानते हैं। उनके आने के साथ पाञ्चजन्य की पाठ्य सामग्री पहले की अपेक्षा ज्यादा धारदार ही नहीं हुई बल्कि इसका कलेवर भी बदला गया है। उनकी ही युवा सोच का नतीजा है कि पाञ्चजन्य अब आधुनिक प्रबंधकीय अपेक्षाओं के अनुरूप टेबलॉइड की काया त्याग कर पत्रिका के रूप में व्यावसायिक पत्रिकाओं से मुकाबला करने के लिए मोर्चाबंदी कर रहा है। वे अभी और नई ऊंचाइयां छूएंगे, नए आसमान रचेंगे, हिन्दी मीडिया उनसे ये उम्मीद कर रहा है। 
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"हिन्दी पत्रकारिता में हितेश शंकर का अपना वजूद है। वह सबसे अलग है। खबरों पर पैनी नजर रहती है। वे छोटे-बड़े मुद्दों की गहरी समझ रखते हैं। हितेश जितने मजबूत संपादन में है, उतनी ही गहरी समझ उन्हें मार्केटिंग की भी है। सही मायने में वे ऑलराउण्डर हैं।" 
- मोहम्मद वकास, पत्रकार
-  जनसंचार के सरोकारों पर केन्द्रित त्रैमासिक पत्रिका "मीडिया विमर्श" में प्रकाशित आलेख

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