गुरुवार, 16 अक्तूबर 2014

स्कॉलर जर्नलिस्ट

 स्प ष्ट सोच, तर्कपूर्ण बात, साफगोई और बेबाकी का अद्भुत समन्वय अभय कुमार दुबे है। जब हम टीवी चैनल्स पर होने वाली लाइव बहस देखते हैं तो चख-चख तौबा-तिल्ला के बीच सार्थक बात और जनमानस से जुड़े सवालों की उम्मीद अभय कुमार दुबे से रहती है। वे इस भरोसे को निभाते भी हैं। जनता को बरगलाने वाले नेताओं और प्रवक्ताओं को वे अपने सटीक सवालों से कठघरे में खड़ा कर देते हैं। अपनी दूरदर्शिता और अंदाज-ए-बयां के चलते वे टीवी चैनल्स पर जनता से जुड़े मुद्दों पर होने वाली बहसों का अहम हिस्सा हो गए हैं।
                उत्तरप्रदेश के शहर इटावा में 29 सितम्बर, 1956 को जन्मे अभय कुमार दुबे ने आपातकाल में जेल काटते हुए बीए के पहले वर्ष का इम्तहान दिया और बाहर आकर दूसरे वर्ष का। स्नातक की परीक्षा पास करने के बाद फिर कॉलेज या विश्वविद्यालय में पढऩे की फुर्सत नहीं मिली। बाकी शिक्षा-दीक्षा राजनीतिक सक्रियता के दौरान कम्युनिस्ट पार्टी में काम करते हुए हुई। कम्युनिस्ट पार्टी और सांस्कृतिक क्षेत्र की अन्योन्यक्रिया पर प्रकाशित लेख 'कठोर फैसले देने की प्रवृत्ति' से श्री दुबे की तरफ भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) का ध्यान आकर्षित हुआ और वे पार्टी के कार्यकर्ता हो गए।
       उनके पिता देवीलाल दुबे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, समाजवादी नेता, पत्रकार-लेखक और ओजस्वी वक्ता थे। उन्हीं की कड़ी निगरानी में अभयजी ने पत्रकारिता का क-ख-ग सीखा। घर आए हिन्दी के यशस्वी पत्रकार बनारसी दास चतुर्वेदी से सीख पाई कि अभिव्यक्ति का कोई मौका कभी खोना नहीं चाहिए। इसे गांठ बांधकर इटावा से ही प्रकाशित पिता के अत्यंत लोकप्रिय अखबार 'दैनिक देशधर्म' में पत्रकारिता का अभ्यास शुरू किया। वर्ष 1980 में दिल्ली आकर जनसत्ता, माया, नवभारत टाइम्स, समकालीन तीसरी दुनिया, दिनमान, रविवार, भू-भारती, सरिता, हंस आदि में लेखन किया। इन दिनों अभयजी भाकपा (माले) के होलटायमरी कार्यकर्ता थे। छह साल बाद जब होलटायमरी छोड़ी तो पहले भू-भारती और फिर जनसत्ता में नौकरी की। जनसत्ता के सम्पादकीय पृष्ठों पर कई शोधपरक लेख लिखकर वे देशभर में चर्चा का केन्द्र बने। इस दौरान ही उन्होंने स्वतंत्र रूप से समाज-विज्ञान की विख्यात रचनाओं अनुवाद का काम शुरू कर दिया था। 1995-96 में सामाजिक चिंतन और विमर्श की मासिक पत्रिका 'समय चेतना' के 14 अंकों का भी संपादन श्री दुबे ने किया है। इस चक्कर में प्रभाष जोषी ने जनसत्ता से निकालने का प्रयास किया, इस कारण एक्सप्रेस समूह से लम्बा लेकिन कुछ मित्रतापूर्ण किस्म का विवाद चला।
       अभय कुमार दुबे वर्तमान में 'विकासशील समाज अध्ययन पीठ (सीएसडीएस) के भारतीय भाषा कार्यक्रम के निदेशक हैं। इस कार्यक्रम के तहत प्रकाशित 'लोक-चिंतक ग्रंथमाला' और लोक-चिंतन ग्रंथमाला' की सभी चर्चित कडिय़ों का सम्पादन उन्होंने किया है। उनके संपादन में वाणी प्रकाशन से साल में दो बार प्रकाशित होने वाली पत्रिका 'प्रतिमान' हमारे समय के सबसे महतवपूर्ण दस्तावेजों में से एक है।
---
"अभय कुमार दुबे प्रोफेशनल स्कॉलर हैंl अपने गहन अध्ययन और स्पष्ट सोच के कारण पत्रकारिता जगत में उनकी एक अलग पहचान हैl"
- विजय बहादुर सिंह, वरिष्ठ समालोचक 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी यह उत्कृष्ट प्रस्तुति कल शुक्रवार (17.10.2014) को "नारी-शक्ति" (चर्चा अंक-1769)" पर लिंक की गयी है, कृपया पधारें और अपने विचारों से अवगत करायें, चर्चा मंच पर आपका स्वागत है, धन्यबाद।

    उत्तर देंहटाएं

यदि लेख पसन्द आया है तो टिप्पणी अवश्य करें। टिप्पणी से आपके विचार दूसरों तक तो पहुँचते ही हैं, लेखक का उत्साह भी बढ़ता है…

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails