गुरुवार, 4 सितंबर 2014

शिक्षक कौन?

 भा रतीय संस्कृति में पुरातनकाल से ही अपने शिक्षकों के आदर-सम्मान की परम्परा चली आ रही है। हिन्दुस्थान में शिक्षकों को देवतुल्य बताया गया है। विद्यार्थी उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के रूप में पूजते रहे हैं। समाज में उनका सर्वोच्च स्थान रहा है। लेकिन, क्या आज ऐसी स्थिति है? क्या आज शिक्षक वास्तव में शिक्षक हैं? क्या शिक्षकों को देवतुल्य मानकर उन्हें सर्वोच्च स्थान दिया जा रहा है? क्या विद्यार्थी भी पहले जैसे हैं, अनुशासित, समर्पित, संयमी? गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा कहां खो गई? शिक्षा संस्थानों से पढ़-लिखकर निकलने वाली फौज महज डॉक्टर, इंजीनियर, प्रबंधक और अन्य प्रोफेशनल्स ही नहीं होते हैं बल्कि समाज में उनकी भूमिका बहुत बड़ी है। शिक्षा संस्थानों वे भारत का नेतृत्व करने के लिए तैयार होते हैं। गुरु-शिष्य परंपरा के माध्यम से उन्हें गौरवशाली भारतीय संस्कृति से परिचित भी कराया जाता है। ताकि वे अपनी संस्कृति के संवाहक बन सकें। इसलिए गुरु पूर्णिमा हो या शिक्षक दिवस, ये सवाल उठते हैं। इन सवालों के जवाब खोजना बेहद जरूरी है। ये भारत के भविष्य और उसके अस्तित्व से जुड़ी चिंताएं हैं।
            गुरु-शिष्य परंपरा में सबसे महत्वपूर्ण कड़ी शिक्षक है। शिक्षक है कौन? उसके दायित्व क्या हैं? उसका महत्व क्या है? इन सवालों के जवाब खोजने जब निकलते हैं तो पता चलता है कि शिक्षक वह है जो विद्यार्थी में निहित गुणों को उजागर करके सामने ला देता है, ताकि वह सही दिशा में आगे जा सके और समाज में अपनी भूमिका का निर्वाहन प्रभावी तरीके से कर सके। युवा नायक स्वामी विवेकानन्द का भी यही मानना था कि जिस तरह एक नन्हें बीज के भीतर विशाल वृक्ष छिपा हुआ है, उसे उपजाऊ भूमि में बोया जाए और उचित वातावरण मुहैया कराया जाए तो वह स्वत: ही पहले पौधा और फिर वृक्ष बन जाता है। ठीक इसी तरह किसी भी विद्यार्थी में उसकी प्रतिभा छिपी हुई है, इसलिए उस प्रतिभा को सामने लाने का कार्य शिक्षक का है। लगभग यही बात महर्षि अरविन्द ने कही है कि शिक्षक राष्ट्र की संस्कृति के चतुर माली होते हैं। वे संस्कारों की जड़ों में खाद देते हैं और अपने श्रम से सींच कर उन्हें शक्ति में निर्मित करते हैं।
            सिखाना शिक्षक का असल कार्य नहीं है। सीख तो विद्यार्थी स्वयं ही जाता है। दुनियाभर की किताबों से लाइब्रेरी भरीं पड़ी हैं। जानकारियों का नया खजाना इंटरनेट हो गया है। किताबी और पाठ्यक्रम की पढ़ाई तो विद्यार्थी किताबों और इंटरनेट से पूरी कर लेगा। लेकिन, जीवन क्या है और क्यों है? यह सिखाना जरूरी है। जीवन जीने की कला सिखा दी जाए तो किसी भी व्यक्ति को अपना रास्ता साफ नजर आ जाएगा। अपने ४० वर्ष आदर्श शिक्षक के रूप में जीने वाले डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी अपनी कक्षाओं में विद्यार्थियों को जीवन सिखाते थे। वे छोटी-छोटी आनंददायक कहानियों के माध्यम से उच्च नैतिक मूल्यों को अपने जीवन में उतारने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित करते थे। विद्यार्थियों के साथ उनके मैत्रीपूर्ण संबंध रहते थे। उनका स्पष्ट मानना था कि शिक्षक और विद्यार्थी के बीच कोई संकोच नहीं होगा तो सहजता के साथ अध्ययन-अध्यापन का कार्य हो सकता है। इसलिए शिक्षक को महज यह करना चाहिए कि विद्यार्थी को वह अधिक से अधिक जिज्ञासु बना दे। उसके अंतर्मन में सवाल पैदा होंगे तो उनके प्रश्न खोजने के लिए वह खुद आगे आएगा। उसकी जिज्ञासाओं का समाधान कहां और कैसे हो सकता है, यह मार्गदर्शन जरूर शिक्षक कर सकता है। यह एक लम्बी प्रक्रिया है। आज-कल या एक दिन में शिक्षक और विद्यार्थी के बीच यह सार्थक परंपरा विकसित नहीं हो सकती। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में यही खामी है। पश्चिम की परिभाषा के मुताबिक जो 'टीचर' है, प्रत्येक छह माह में बदल जाता है। एक सेमेस्टर में कोई पढ़ाता है तो दूसरे सेमेस्टर में कोई दूसरा 'टीचर'। ऐसे में विद्यार्थियों की नैसर्गिक प्रतिभा और दक्षता से शिक्षक ही परिचित नहीं हो पाता तो वह उन विद्यार्थियों को कैसे अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित कर सकता है। छात्रों से 'टीचर' का नाता सिर्फ 'क्लास रूम' तक सीमित है। कक्षा के बाहर उसे कोई मतलब नहीं कि उसका विद्यार्थी क्या कर रहा है? जबकि भारतीय अवधारणा के मुताबिक शिक्षक प्रत्येक मौके पर विद्यार्थी को प्रेरित करने का कार्य करता है। क्योंकि विद्यार्थियों की कामयाबी ही शिक्षक को समाज में अमर बनाती है, सम्मान का स्थान दिलाती है। इसलिए शिक्षक लगातार विद्यार्थी में आ रहे परिवर्तनों पर नजर रखता है। विद्यार्थी में अच्छे बदलाव आ रहे हैं तो उसे उस दिशा में आगे बढऩे के लिए प्रेरित किया जाता है और विद्यार्थी अनैतिक आचरण की ओर बढ़ रहा है तो उसे सही राह दिखाने की कोशिश शिक्षक करता है।
            भारतीय परंपरा में गुरु की महत्ता इसलिए भी अधिक है क्योंकि वह गुरु ही है जो अपने जीवनभर का अनुभव अपने शिष्य को दे देना चाहता है। जो कुछ उसने अपने जीवन में अर्जित किया, उसे विद्यार्थी के मन में बैठा देता चाहता है। गुरु हमें द्विज बनाता है, पुनर्जन्म देता है। आंखें खोलता है। अपने भीतर झांकने के लिए प्रेरित करता है। हम क्या हैं? हमारे कर्तव्य क्या हैं? हमारे दायित्व क्या हैं? हमें कहां जाना है? यह सब तो शिक्षक ही बताता है। यदि शिक्षक यह न बताए तो व्यक्ति अंधेरी गुफा में भटकता रहेगा। इसलिए विद्यार्थियों को भी चाहिए कि वे अपना समूचा अहंकार त्याग कर शिक्षक के समक्ष उपस्थित हों। उपभोग की संस्कृति आज के युवाओं पर इतनी हावी है कि वे अपने संस्कार भूल गए हैं। मर्यादा भूल गए हैं। शिक्षक ही नहीं वरन अपने से बड़ों का सम्मान भूल गए हैं। उन्हें युवा जोश का अहंकार है। टेक्नोक्रेट होने का अहंकार है। आजादी का अहंकार है। उन्हें अपने अधिकारों का तो ज्ञान है लेकिन अपने कर्तव्यों का भान नहीं है। पश्चिम से आ रही आंधी से उनके होश उड़े हुए हैं। इस बे-होशी की हालत में वे अपने शिक्षकों का सम्मान ही नहीं कर पा रहे हैं। यही कारण है कि बदले हालातों में शिक्षक भी अपने आप को सीमित कर रहे हैं। वे भी 'क्लास रूम स्टडी' पर ही पूरा ध्यान दे रहे हैं। बाहर की दुनिया का ज्ञान देने का प्रयत्न करने से वे बच रहे हैं। जीवन सिखाने से वे बच रहे हैं। उन्हें डर है कि पता नहीं किस घड़ी छात्रों की कोई हरकत उन्हें अपमान सहने के लिए मजबूर कर दे। यही कारण है कि शिक्षा संस्थानों से डॉक्टर-इंजीनियर तो निकल रहे हैं लेकिन जिम्मेदार नागरिक नहीं निकल रहे। विद्यार्थियों, शिक्षकों और शिक्षा नीति निर्धारकों को अपनी भूमिका को ठीक से समझना होगा। महर्षि अरविन्द ने शिक्षक को राष्ट्र का वास्तविक निर्माता बताया है। इसलिए तमाम प्रतिकूल समय के बावजूद शिक्षक को तो अपने कर्म, अपनी भूमिका के साथ न्याय करना ही होगा। देश के निर्माण की बागडोर उसके हाथ में है। 

2 टिप्‍पणियां:

  1. भाई लोकेन्द्र , यह एक आँधी है जिसमें सभी उड़े जा रहे हैं -एक अनजान दिशा की ओर -शिक्षक, शिक्षार्थी ,मूल्य ,आदर्श ,दायित्त्व-बोध । इसके जिम्मेदार थोड़े बहुत सभी हैं । फिर भी आशा पूरी तरह खत्म नही हुई है । आज भी अच्छे ज्ञानवान शिक्षक हैं । लेकिन कम । भाग्यशाली लोगों को ही अच्छे शिक्षकों का मार्गदर्शन व स्नेह मिल पाता है ।

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