शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

वोट बड़ा या नोट

 चु नाव, लोकतंत्र में हवन की तरह है। हवन के लिए हम पवित्र 'समिधा' का उपयोग करते हैं। हवन करते समय मन और बुद्धि भी सात्विक रखते हैं। जिस तरह की मर्यादा और आचरण हवन के लिए जरूरी है वैसी ही समझ और व्यवहार लोकतंत्र के हवन (चुनाव) के लिए आवश्यक है। चुनाव आयोग से लेकर तमाम सामाजिक संगठन तक निर्वाचन में स्वच्छ मतदान प्रतिशत को बढ़ाने के लिए जागरूकता अभियान चला रहे हैं। भारत में नोट के बदले वोट देने की बुराई व्याप्त है। सही मायने में इसे यूं कहना चाहिए कि भारत में नोट के बदले वोट खरीदने की बीमारी नेताओं में है। नोट के प्रभाव को खत्म करने के लिए चुनाव आयोग और सामाजिक संगठन खासी मेहनत कर रहे हैं। मतदाताओं से वोट के लिए नोट नहीं लेने की अपील की जा रही है। कोई नेता नोट तो नहीं बंटवा रहा, इस पर भी नजर रखी जा रही है। हम ऐसे लोगों को तो खूब गरियाते हैं जो शराब की बोतल और गांधी छाप नोट के बदले किसी प्रत्याशी को वोट देते हैं। लेकिन, क्या हम ऐसे लोगों की भर्त्सना नहीं करना चाहेंगे जो नोट कमाने की फिराक में वोट देना जरूरी नहीं समझते। नोट कमाना उनकी प्राथमिकता है, अपनी जिम्मेदारी का निर्वाहन करना नहीं। दोनों ही प्रकार के मनुष्य लालची हैं। दोनों के बीच एक बात कॉमन है कि वे नोट पाने के लिए बेताब हैं। एक प्रकार के लोग नोट पाने के लिए वोट बेच रहे हैं तो दूसरे प्रकार के लोग नोट कमाने के लिए वोट ही नहीं देना चाह रहे। बॉलीवुड के कई लोकप्रिय अभिनेता और अभिनेत्रियां २३ से २६ अप्रैल तक अमरीका के फ्लोरिडा शहर में आयोजित होने वाले आइफा समारोह में शामिल होने जा रही हैं। जबकि २४ अप्रैल को मुम्बई में मतदान है। लोकतंत्र के महापर्व में हिस्सेदारी करना इन हीरो-हीरोइन के लिए जरूरी नहीं है, जरूरी है तो आइफा में नाचकर पैसा कमाना। बॉलीवुड के ये कलाकार ऐसे वक्त में मतदान की अनदेखी करने वाले हैं जबकि चुनाव आयोग मतदान प्रतिशत बढ़ाने और मतदान में प्रत्येक मतदाता की भागीदारी को जोर-शोर से प्रोत्साहित कर रहा है। मतदान में हर कोई बढ़-चढ़कर हिस्सेदारी करे, इसके लिए सामाजिक संगठन जन-जागरण के कार्यक्रम चला रहे हैं। मतदाताओं को जागरूक करने के लिए कई व्यापारिक और उद्योग जगत की संस्थाएं एवं शख्सियत प्रयास कर रहे हैं। अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे बॉलीवुड के कई दिग्गज भी मतदान में भाग लेने के लिए लोगों से अपील कर रहे हैं। ऐसे में सैफ अली खान, करीना कपूर, फरहान अख्तर, प्रियंका चौपड़ा, अनिल कपूर, दीपिका पादुकोण, ऋतिक रोशन, माधुरी दीक्षित नेने और विवेक ओबेराय सहित कई कलाकारों का मतदान से दूर रहना खटक रहा है। समाज में अच्छा संदेश नहीं जा रहा। सवाल खड़ा हो रहा है कि मायानगरी के इन महानुभावों की नजरों में वोट बड़ा है या नोट?  
         चुनाव आयोग और सामाजिक संगठनों की ओर से भारत के नागरिकों से अपील की जा रही है कि वे अपने अधिकार को, अपने कर्तत्व को और अपनी जिम्मेदारी को ठीक से पहचानें। मतदान अवश्य करें। मतदाता लोकतंत्र में मताधिकार की ताकत को पहचानें। मतदान नई सरकार के निर्वाचन की महज एक प्रक्रिया मात्र नहीं है बल्कि यह लोकतंत्र में अपनी जिम्मेदारी के निर्वाहन का महत्वपूर्ण मौका है। अब जरा सोचिए, जब देश की सरकार चुनने का मौका आन पड़ा है तो हमारे हीरो-हीरोइन आइफा में नाचने के लिए मरे जा रहे हैं। क्या आइफा में जाना इतना जरूरी है? बॉलीवुड के ये कलाकार भारत सरकार के निर्वाचन की प्रक्रिया की अनदेखी कर रहे हैं। क्यों नहीं भारत की जनता इनके नाच का बहिष्कार करे? क्यों नहीं लोग लापरवाह और गैरजिम्मेदार कलाकारों को फॉलो करना बंद कर दें? क्यों नहीं इनके चहेते, इनकी फिल्मों को ही देखना बंद कर दें? जिनके लिए नोट कमाना प्राथमिकता हो, देश नहीं। ऐसे कलाकारों को हम सिर-माथे पर क्यों बैठाएं? क्यों इन्हें अपना हीरो-हीरोइन मानें? हमारे हीरो-हीरोइन वही होने चाहिए जो देश को अपनी प्राथमिकता में रखें। हमारे हीरो-हीरोइन वही होने चाहिए जो अपने कर्म से समाज को सही राह दिखाएं। हम उन्हें ही फॉलो करें, उन्हें ही अपने सिर-माथे पर सजाएं जो देश-समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी का ठीक से निर्वाहन करें। 
सैफ अली खान और करीना कपूर मतदान के दिन यानी २४ अप्रैल को मुम्बई में नहीं रहेंगे, वे आइफा में शामिल होना जरूरी समझते हैं। फरहान अख्तर सदैव खुद को एक जागरूक और संवेदनशील भारतीय नागरिक की तरह प्रस्तुत करते रहे हैं। लेकिन जब मौका आया अपनी जिम्मेदारी निभाने का तो वे आइफा चले जाएंगे। फरहान अख्तर, शाहिद कपूर के साथ मिलकर आइफा समारोह की मेजबानी करेंगे। यानी फरहान और शाहिद दोनों ही वोट नहीं डालेंगे। विवेक ऑबेराय जैसे फ्री-फोकट बैठे कलाकर भी मतदान से गैर हाजिर रहेंगे। वोट डालने के लिए उनके पास भी वक्त नहीं है। उनके लिए भी मतदान से अधिक महत्वपूर्ण आइफा का भव्य समारोह है। अनिल कपूर जैसे वरिष्ठ कलाकार भी मतदान के एक दिन पहले अमरीका के लिए निकल जाएंगे। जब वरिष्ठ कलाकार ही अपनी जिम्मेदारी निभाने में लापरवाह हों तो उनके जूनियर क्या सीखेंगे? सोचने वाली बात है। इस साल कई हिट फिल्म देने वाली दीपिका पादुकोण भी आइफा की शोभा बढ़ाएंगी। ये वही दीपिका पादुकोण हैं जिन्हें अपने पिताजी के लिए भारत रत्न मांगना तो याद रहता है लेकिन जब भारत के महापर्व की बात आई तो अपनी जिम्मेदारी और अपना कर्तव्य ही भूल गईं हैं। मतदान से ज्यादा जरूरी दीपिका के लिए आइफा में शामिल होकर तमाम ट्रॉफियां और नोट बटोरना है। आईपीएल-६ में अंधाधुंध पैसा कमाने के फेर में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग के आरोपी राज कुंद्रा की पत्नी शिल्पा शेट्टी सहित वाणी कपूर, बिपाशा बसु, दिया मिर्जा और नील नितिन मुकेश भी मतदान से दूर आइफा के ग्लैमरस माहौल का लुत्फ उठा रहे होंगे। 
        लोकतंत्र में एक-एक वोट का बड़ा महत्व होता है। एक वोट से कई दिग्गज चुनावी मैदान में चित हुए हैं। भाजपा की सरकार भी महज एक वोट से गिर गई थी। राजनीतिक पार्टियां और कार्यकर्ता एक-एक वोट को पोलिंग बूथ तक पहुंचाने की चिंता करते हैं। एक-एक वोट से अपने लिए वोट बैंक बनाते हैं। एक-एक वोट से पार्टी का जनाधार बनाते हैं। आपने गौर किया होगा, समाचार-पत्र हों या न्यूज चैनल्स, अभिनेता या अभिनेत्री को वोट डालने पर खूब कवरेज देते हैं। पोलिंग बूथ पर पहुंचने वाले कलाकारों को मीडिया खूब दिखाता है। इसके पीछे मनोविज्ञान है। दरअसल, बॉलीवुड के इन कलाकारों की तगड़ी फॉलोवर्स होती है। घर से निकलकर वोट डालने पोलिंग बूथ तक आए कलाकारों को कवरेज देने का यही उद्देश्य होता है कि उनके फॉलोवर भी मतदान के लिए प्रेरित हों। वे भी घर से निकलकर पोलिंग बूथ तक पहुंचे। मतदान में अपनी भागीदारी सुनिश्चत करें। आइफा समारोह में शामिल होने जा रहे बॉलीवुड के तमाम सितारों को अपनी भूमिका, अपनी जिम्मेदारी और अपनी प्राथमिकता समझनी चाहिए। अगर वे अपनी भूमिका और प्राथमिकता तय करने में अक्षम हैं तो फिर भारत की जनता, इन तमाम सितारों के फैन, फॉलोवर्स और सिनेप्रेमी तय करें कि गैरजिम्मेदार, लापरवाह इन सितारों को जमी कैसे दिखाई जाए।

1 टिप्पणी:

  1. "को नृप होई हमें का हानि " , का सीधा सा फंडा है इनका, क्रीम क्लास कभी वोट देने निकलता ही नहीं है। ऊपर से ये अपने बॉलीवुड के कलाकार तो वैसे भी जरूरत से ज्यादा "सोकॉल्ड" इलीट हैं, लेकिन हकीकत में ये जरूरत से ज्यादा गैर जिम्मेदार हैं। और ज्यादातर अनपढ़ हैं या कम पढ़े लिखे हैं। इन्हे राष्ट्र के प्रति इनकी क्या जिम्मेवारी है जानते ही नहीं हैं।

    --
    सादर,
    शिवेंद्र मोहन सिंह

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