शनिवार, 27 अप्रैल 2013

ऊंचे शिखरों पर रोमांच का सफर


 क ठिनाइयां आपको अंदर से मजबूत करती हैं। अचानक से आईं मुसीबतें आपको फटाफट निर्णय लेने का अनुभव देती हैं। अनजाने रास्ते और लंबे सफर आपके लिए नई राहें खोलते हैं। यह सब करने के लिए बस थोड़े-से साहस की जरूरत होती है।  उठाइए साइकिल और निकल जाइए, ऐसे रास्तों पर जहां जाने के लिए आपका जी मचल रहा हो। जिंदगी को ठाट से जीने के लिए साइकिलिंग से अच्छा विकल्प नहीं है। यह कहना है रोमांच के साथी युवा देवेन्द्र तिवारी का। मध्यप्रदेश के जिले ग्वालियर में कृषक परिवार में जन्मे देवेन्द्र तिवारी देश के कई दुर्गम क्षेत्रों को साइकिलिंग से जीत चुके हैं। 
अपनी पहली कठिन यात्रा जिक्र करते हुए वे कहते हैं कि अचानक एक दिन बैठे-बैठे मेरे दिल में खयाल आया कि क्यों न हिमालय की चोटियों और घाटियों को अपनी साइकिल के पहिए से नापा जाए। कुल्लूू मनाली क्षेत्र के १३,००० फीट से अधिक ऊंचे चंद्रखानी पास ट्रैक चला जाए। हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड ऐसे प्रदेश हैं, जिनका जर्रा-जर्रा खूबसूरत और आकर्षक है। हर कोई बार-बार और हमेशा के लिए इन्हें अपने जेहन में स्पंदित करने की चाह रखता है। अविवाहित श्री तिवारी चुटकी लेते हुए बताते हैं कि मनाली को उत्तर भारत का हनीमून कैपीटल भी कहते हैं। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी के साथ जरूर इस खूबसूरत वादी में आना चाहेंगे, बल्कि बार-बार आते रहेंगे। व्यास नदी के तट पर बसा यह शहर हमेशा पर्यटकों से गुलजार रहता है। कुल्लू की दो चीज काफी मशहूर हैं- ऊनी शाल और दशहरा पर्व। मनाली एडवेंचर में रुचि रखने वालों को भी अपनी ओर खींचता है। इसी चुंबकीय आकर्षण में आकर १३ हजार फीट से अधिक ऊंचे ट्रैक चंद्रखानी पास को फतह करनी की मन में ठान ली। तब मेरे पास उम्दा माउंटेन साइकिल उपलब्ध नहीं थी। एक एडवेंचर क्लब से जुड़े होने पर मुझे किराए पर वह साइकिल उपलब्ध हो गई। जरूरी तैयारी के साथ मैं निकल पड़ा अपनी पहले कठिन सफर पर। मनाली से शुरू होने वाला चंद्रखानी पास ट्रैक मलाना और मनिकर्ण होते हुए बिजली महादेव तक जाता है। चंद्रखानी पास को देवी-देवताओं के मिलन की जगह भी कहा जाता है। समतल सड़कों पर साइकिलिंग की जगह पहली बार ऊंचे शिखर पर साइकिल चलाने का रोमांच ही अलग था। मानो सातवां आसमान छू लिया हो। इस पहली जीत से इस यात्रा को और अधिक रोमांचकारी बनाने का साहस मन में पैदा हुआ। इस बार हाड़ कंपाने वाली सर्दी में हिमालच प्रदेश के बर्फीले पर्वतीय श्रृंखला धौलाधार में कुछ तूफानी करने का तय किया। यहां तो ऐसा लगा जैसे स्वप्रों में देखा स्वर्ग साकार उपस्थित हो गया हो। धौलाधार पर्वत रेंज कांगड़ा जिले का सबसे आकर्षक पर्यटन और साहसिक गतिविधियों का केन्द्र है। इसे १२ माह दूधिया बर्फ से ढंका हुआ देखा जा सकता है। हनुमान का टिंबा या सफेद पर्वत इस पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी है। धौलाधार की समुद्र तल से ऊंचाई ३५०० से ६,००० मीटर तक है। छोटा हिमालय के नाम से ख्यात धौलाधार पर्वत श्रृंखला डलहौजी के पास से शुरू होती है। इसके बाद साहसिक खेलों में रुचि रखने वाले युवा देवेन्द्र तिवारी ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। जैसे ऊंचे पहाड़ उन्हें आवाज देकर बुलाते हों, वे बार-बार उनके बुलावे पर जाते रहे। छोटा सियाचिन (१४,२०० फीट), रोहतांग पास (१३,०५१ फीट), बड़ा-लाचा-ला-दर्रा (१६,०४० फीट), नकीला पास (१५,५४७ फीट) और दुनिया के दूसरे सबसे ऊंचे चलने योग्य मार्ग तग-लांग-ला दर्रा (१७,५०० फीट) पर भी ग्वालियर के देवेन्द्र तिवारी ने भारत का झंडा फहराया।
मध्यप्रदेश में साइकिलिंग और साहसिक गतिविधियों में अपना योगदान देने के लिए देवेन्द्र तोमर का सरकार और सामाजिक संस्थाओं ने सम्मान भी किया है। कर्नाटक के राज्यपाल हंसराज भारद्वार और केन्द्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने उन्हें साहसिक गतिविधि के लिए सम्मान दिया है। हाल ही में उन्हें वन्देमातरम राष्ट्रीय अलंकरण से नवाजा गया। 

देवेन्द्र तिवारी कहते हैं कि दुनिया को साइकिल के पहिए से नापने की उनकी अदम्य इच्छा है। वे साइकिल से विश्वयात्रा पर निकलकर बेटी बचाओ का संदेश देना चाहते हैं। साथ ही वे पर्यावरण के प्रति भी दुनिया को सचेत करना चाहते हैं। उनका मानना है कि व्यक्ति को दैनिक जीवन में फिर से साइकिल को अपना लेना चाहिए। इसके कई फायदे हैं- शरीर चुस्त रहेगा, ईंधन का संकट कम होगा और महंगाई की मार से भी बचा जा सकेगा। ट्रैकिग पर जाने वाले साथियों को वे सलाह देते हैं कि ट्रैकिंग के लिए जगह और मार्ग चुनने से पहले अपनी रुचि और क्षमताओं को परखना जरूरी है। अगर आपको ऊंचाई पर चढऩे में तकलीफ है तो समतल मैदान ही चुने। यदि ऊंचाई आपको आनंदित करती है और आप लम्बे समय तक पहाड़ों में भटकने का माद्दा रखते हैं तो जरूर लम्बे रास्ते, ऊंची जगह चुने और ऊंचे शिखरों पर जीवन को रोमांच के साथ जिएं। 

गुरुवार, 11 अप्रैल 2013

मोदी, मोदी और मोदी


 भा रत की राजनीति इस समय मोदीमय है। गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी के जिक्र के बिना शायद ही कोई दिन बीतता हो। इसे प्रधानमंत्री की कुर्सी पर नजरें जमाए नरेन्द्र मोदी की कुशल रणनीति कह सकते हैं। मोदीफोबिया से ग्रस्त कांग्रेस के नेता यहां तक कि राहुल गांधी भी
आए दिन मोदी का जिक्र कर ही देते हैं। भाजपा में वटवृक्ष बनते जा रहे नरेन्द्र मोदी से पार्टी के क्षत्रपों में भी भय है। उन्हें डर है कि 'मोदी बरगद' की छांव में वे मुरझा न जाएं। इसीलिए मैं प्रधानमंत्री-मैं प्रधानमंत्री का राग अलाप कर पार्टी के नेता मोदी बहस शुरू कर देते हैं। हाल के घटनाक्रम देखकर स्पष्ट होता है कि राजनीति के नए चाणक्य नरेन्द्र मोदी का ही कमाल है कि वे एक दिन भी खबरों से परे नहीं जाते। दिल्ली में फिक्की के महिला सम्मेलन को संबोधित करना हो या फिर कोलकाता में उद्योगपतियों के कार्यक्रम में भाषण देना हो, इस तरह के तमाम आयोजन और बहस को मोदी की रणनीति के ही एक हिस्से के रूप में देखा जाना चाहिए।
नरेन्द्र मोदी मंच लूटने में माहिर हैं। उनकी लोकप्रियता फिलहाल सिर चढ़कर बोल रही है। इस बात का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नरेन्द्र मोदी का भाषण सुनने के लिए भीड़ इतनी अधिक थी कि फिक्की के महिला सम्मेलन का स्थान बदलकर एक पांच सितारा होटल करना पड़ा। फेसबुक और ट्विटर पर मोदी के भाषण के कुछ हिस्से बड़ी तेजी के साथ शेयर हुए और उतनी ही तेजी से उन पर कंमेट आए। मोदी ने फिक्की के महिला सम्मेलन में महिला सशक्तिकरण की बात बड़े जोरदार ढंग से रखकर महिलाओं का भरोसा भी जीत लिया। उन्होंने कन्या भ्रूण हत्या, बढ़ते लिंगानुपात की निंदा की। लड़कियों को समान अवसर उपलब्ध कराने की वकालत की। महिला उद्यमियों की तारीफ की और उन्हें सरकार की ओर से अधिक मदद उपलब्ध कराने की बात कही। फिक्की में महिलाओं से मुखातिब होने के मौके को नरेन्द्र मोदी ने खूब कैश कराया। इस बहाने उन्होंने यह बताने की कोशिश की है कि यदि वे प्रधानमंत्री बनते हैं तो उनकी सरकार महिला हितैषी होगी। महिला सशक्तिकरण की नीतियां नए सिरे से तय की जाएंगी। इसके लिए नीति निर्माण की प्रक्रिया में महिलाओं को शामिल किया जाएगा। ५० प्रतिशत महिला आरक्षण बिल का जिक्र कर नरेन्द्र मोदी ने सरकार में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने का भी संकेत दिया।
फिक्की में दिए भाषण पर बहस खत्म हो पाती उससे पहले ही नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस और मीडिया को एक और मसला पकड़ा दिया। कोलकाता में तीन बड़े व्यापारिक संगठनों भारत चेम्बर ऑफ कॉमर्स, इंडियन चेम्बर ऑफ कॉमर्स और मर्चेंट चेम्बर ऑफ कॉमर्स की ओर से आयोजित कार्यक्रम में मोदी ने सीधे यूपीए पर हमला बोला और ममता बनर्जी को रिझाने के लिए वामपंथियों को भी लपेटे में ले लिया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के किए गड्ढे मैं गुजरात में भर रहा हूं तो बंगाल में ३२ साल में वामपंथियों ने जो गड्ढे किए हैं उन्हें भरने का काम ममता बनर्जी कर रही हैं। राजग के विस्तार की योजना निश्चित ही मोदी के दिमाग में है। जयललिता से उनकी अच्छी बनती है। ममता जरूर नैनो प्रकरण के बाद से मोदी से नाराज हैं। लेकिन, ममता दीदी की पटरी कांग्रेस के साथ भी नहीं बैठ रही है। वे राजग में पहले भी शामिल रह चुकी हैं। इसीलिए मोदी ममता का पक्ष लेकर प्रधानमंत्री पद के लिए अपना पक्ष मजबूत करने की कोशिश में हैं। आखिर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का भी विकल्प तो उन्हें ही ढूंढऩा है जो राजग में नीतिश की जगह ले सके। क्योंकि ज्यादा संभावना है कि मोदी की प्रधानमंत्री पद के लिए घोषणा होते ही नीतीश कुमार राजग से अलग हो जाएंगे। 
नरेन्द्र मोदी ने कोलकाता के अपने इस भाषण में सीधे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व पर सवाल खड़ा किया। मोदी ने कहा कि कांग्रेस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को कोई अपना नेता ही नहीं मानता। यह तकरीबन सच भी है, जिससे पूरा हिंदोस्तान वाकिफ है। यह बयान देने के पीछे मोदी के गहरे निहितार्थ हैं, जिन्हें समझना जरूरी है। उन्होंने संकेत दिया है कि देश को कैसा नेता चाहिए रबर स्टम्प या फिर जिसका जनाधार हो यानी नरेन्द्र मोदी। मनमोहन सिंह के बहाने नरेन्द्र मोदी ने अप्रत्यक्ष रूप से एक फ्रेम आमजन को दी है कि आप ही फिट करके देखिए कि प्रधानमंत्री कुर्सी पर कौन जमेगा? 
अब नरेन्द्र मोदी बनाम राहुल गांधी देखा जाए तो नरेन्द्र मोदी कहीं आगे दिखते हैं। राहुल गांधी के नेतृत्व में लड़े गए चुनावों में कांग्रेस को कोई खास सफलता हाथ नहीं लगी है जबकि नरेन्द्र मोदी अपनी दम पर तीसरी बार गुजरात में सरकार बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर खम ठोंक रहे हैं। राहुल गांधी राष्ट्रीय बहस और संवेदनशील मुद्दों के दौरान राष्ट्रीय पटल से गायब रहते हैं जबकि मोदी हमेशा चर्चा में रहते हैं। हाल ही में राहुल गांधी का सीआईआई में दिया गया भाषण काफी सराहा गया लेकिन उतनी ही उसकी आलोचना भी हुई। ठीक यही स्थिति कांग्रेस के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिए भाषण की रही। जिसमें उन्होंने कार्यकर्ताओं को नई दिशा देने की जगह भावुक भाषण दिया। यहां तक की उन्होंने राजनीति को जहर का प्याला ही बता दिया। खैर, राहुल गांधी नरेन्द्र मोदी के सामने कहीं नहीं टिकते उसके कारण हैं। राहुल गांधी अपने भाषण में देश की समस्याएं तो बखूबी उठाते हैं लेकिन उनके पास समाधान नहीं है। उनके भाषण से सवाल तो बहुत उपजते हैं लेकिन जवाब राहुल गांधी के पास नहीं है। सीआईआई में दिए भाषण में राहुल कहते हैं कि भारत के सामने कई समस्याएं हैं। इन समस्याओं का समाधान जरूरी है। लेकिन, समाधान कैसे होगा? यह राहुल नहीं बता पाते हैं। राहुल कहते हैं कि युवाओं को सस्ती और बेहतर शिक्षा देने की जरूरत है। हकीकत यह है कि उनकी ही सरकार के दौरान शिक्षा महंगी होती जा रही है। हाल ही में केन्द्रीय विद्यालयों की फीस में भी बढ़ोतरी की गई है। निजी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय की मनमर्जी तो जग जाहिर है। शिक्षा सस्ती और सर्व सुलभ कैसे होगी? इसकी नीति राहुल गांधी नहीं बता सके। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि सरकार चंद लोग चला रहे हैं। सरकार चलाने के लिए आमजनता की भागीदारी की जरूरत है। सरकार में सबको कैसे, कहां और किस स्तर तक भागीदार बनाया जाएगा, इसका भी जवाब राहुल गांधी अपने भाषण में नहीं देते हैं। जबकि नरेन्द्र मोदी समाधान पर बात करते हैं। उनके पास हर सवाल का जवाब है। हाल ही में नरेन्द्र मोदी ने इंडिया टुडे कॉनक्लेव में शिरकत की थी। तब उनसे वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने पूछा था कि आप गुजरात दंगे के सवालों से बचते क्यों हैं? मोदी ने जवाब में कहा था कि मैं किसी भी सवाल से न तो डरता हूं और न ही बचता हूं। यदि मैं डरता तो यहां दिग्गज पत्रकारों के बीच नहीं आता। इस दौरान मोदी ने पूछे गए तमाम सवालों के जवाब तर्क के साथ रखकर अपना विजन देश के सामने रखा। विदेश नीति कैसी हो, देश के विकास की योजना क्या हो, एफडीआई को लागू किया जाए तो कैसे, भ्रष्टाचार दूर करने की योजना और सुरक्षा के मसले पर बेबाकी से अपना पक्ष रखा। इंडिया टुडे के एडिटर इन चीफ अरुण पुरी ने धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा से जुड़ा एक सवाल किया। जिसके जवाब में उन्होंने बड़ा सधा हुआ जवाब दिया, जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि सुरक्षा तो हर किसी को चाहिए, क्या मुस्लिम और क्या हिन्दू। इसलिए मेरी नीति है कि हर आदमी को उसके अधिकार और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए। कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि एक रणनीति के तहत आगे बढ़ रहे नरेन्द्र मोदी कॉनक्लेव, ऑनलाइन भाषण, छात्रों, फिक्की और उद्योगपतियों के आयोजनों में शिरकत कर अपना विजन देश के सामने रखते जा रहे हैं। बहस-मुहाबिस के बीच नमो बता रहे हैं कि वे देश के प्रधानमंत्री बने तो देश की तस्वीर क्या होगी? 

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक?

 भा रत में बाजार यौन फंतासियों के इर्द-गिर्द सिमट रहा है। विज्ञापन जगत मनुष्य की यौनिक संवेदनाओं को कुरेद-कुरेद कर जगा रहा है और पैसा बना रहा है। क्या नैतिक और क्या अनैतिक, इससे उसे कोई वास्ता नहीं। विज्ञापन बाजार बस मनुष्य की मनुष्यता का दोहन कर रहा है। यौन व्यवहार को जीवन की प्राथमिकता और सफलता के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। टेल्क पाउडर से लेकर सोड़ा पाउडर तक बेचने के लिए नग्नता बेधड़क परोसी जा रही है। ऐसा नहीं है कि विज्ञापन के क्षेत्र में सृजन की कमी है। यहां कई रचनाधर्मी काम कर रहे हैं। नतीजतन, कई बेजोड़ विज्ञापन देखने में आ रहे हैं, जो समाज की बुराई पर सीधी चोट कर रहे हैं, मनुष्य के कलेजे को फड़कने का बंदोबस्त कर रहे हैं। फिर भी, बाजार के चूल्हे पर गंदगी क्यों उबल रही है? समझ से परे है। ऐसे में कई बार साजिश की बू आती है। जैसे भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों को पीछे धकेलने का षड्यंत्र रचा जा रहा हो। मनुष्य से उसकी मनुष्यता छीनने की साजिश हो। इंसान को यौन संदर्भ में जानवर बनाने की व्यवस्था हो। जो भी है यह, बेहद घातक है। संभलना होगा हमें, निगरानी संस्थाओं और नीति निर्माताओं को भी। उत्पादन बेचने के लिए विज्ञापन कंपनियों की मनमानी अधिक दिन तक नहीं चलनी चाहिए। इस मनमानी को रोकने में ही सबकी भलाई।
    एक दिन मेरे परिवार का नन्हा सदस्य (तीन वर्ष) अपने बालों को सीधा करते हुए बुदबुदा रहा था। मैंने उससे पूछा क्या कर रहा है? इस पर उसने इतराते हुए कहा- मामा, ऐसा करने से लड़कियां फिदा हो जाएंगी। दरअसल, वह कोमल हृदय का बालक 'बालों में लगाए जाने वाले जैल' के विज्ञापन की नकल कर रहा था यानी वह उक्त भौंड़े विज्ञापन से सीख रहा था लड़की पटाने का फंडा। कुछ समय पहले एक जेंट्स अण्डरवियर का विज्ञापन आता था। इसमें अण्डरवियर को धोते वक्त महिला को अतिकामुक होते दिखाया जाता था। इस विज्ञापन पर बड़ा बवाल मचा। मचना भी चाहिए था। बाद में इसका प्रसारण बंद हो गया। लेकिन, ऐसे विज्ञापन तो अब भी बड़ी संख्या में बन रहे हैं और दिख रहे हैं।
स्त्रीत्व का निरादर : बॉडी स्प्रे की खुशबू से मदहोश होकर सारी वर्जनाएं तोड़कर युवक के पीछे युवती का चले आना, बिस्तर से अंतवस्त्रों को उतार फेंकना। कपड़े (जींस) के विज्ञापन में नग्न पुरुषों को दिखाना। यहां भी उक्त कंपनी के जींस पहनने के बाद पुरुषों का संसर्ग पाने के लिए स्त्री को लंपट होते दिखाया गया है। डर्टी विज्ञापन नग्नता ही नहीं परोस रहे बल्कि स्त्री अस्मता से भी खिलवाड़ कर रहे हैं। यह अधिक चिंता की बात है। डर्टी कैटेगरी के सभी विज्ञापन यही दिखाते हैं कि मनुष्य जाति में स्त्री सबसे ज्यादा कामुक है। काम इच्छाओं पर उसका जोर नहीं, वह इनके आगे हार जाती है। स्त्री की सोच सेक्स से शुरू होकर सेक्स पर ही खत्म हो जाती है। डर्टी विज्ञापन में भारत में शीर्ष पर बैठी स्त्री को दोयम दर्जे पर धकेलने का षड्यंत्र साफ दिखता है।
सकारात्मकता ही है हिट फार्मूला : सामान बेचने के लिए डर्टी विज्ञापन ही एकमात्र सफल फार्मूला नहीं है। निरमा, एमडीएच मसाला, टाटा चाय, बजाज स्कूटर सहित कई उदाहरण हैं। इन कंपनियों के ऐसे कई विज्ञापन हैं जो इतिहास के पृष्ठ पर स्वर्ण अक्षरों में दर्ज हो गए हैं। एक भी डर्टी विज्ञापन उतना बड़ा हिट नहीं हुआ जितना कि ये साफ-सुथरे विज्ञापन रहे। आजकल प्रसारित हो रहा चाय कंपनी का विज्ञापन - देश उबल रहा है। उबलेगा तभी तो आएगा जोश, बढ़ेगी मिठास, बदलेगा देश का रंग....  भ्रष्टाचार के खिलाफ देशभर में चल रही मुहिम का हिस्सा लगता है। इस विज्ञापन को देखकर लगता है कि समाज जागरण का काम तो सामान बेचने के साथ भी किया जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक यह विज्ञापन अन्य डर्टी विज्ञापन से कही अधिक हिट है। ग्राहक को उत्पाद की ओर आकर्षित तो करता ही है उसके मन में कुछ करने का जज्बा भी भरता है। इस तरह के विज्ञापन मनुष्य देह के उन्नत शिखर (मस्तिष्क) में स्पंदन करते हैं। यहां स्पष्ट कर हूं कि मेरा ऐसा मानना कतई नहीं है कि आप सामान न बेंचे या हर सामान बेचने के साथ समाज सृजन करें। लेकिन, कम से कम समाज को दूषित तो न करें। हर कोई आगे जाना चाहता है। बाजार में अपनी 'आवाज' सबसे ऊंची रखना चाहता है। लेकिन, इसके लिए समाज को क्या कीमत चुकानी पड़ रही है यह तो सोचना ही पड़ेगा।

प्रतिक्रियाओं पर देना होगा ध्यान :  समाज जागरण में लगी संस्थाओं के प्रयासों के चलते नागरिक जागरूक हुए हैं, वे अपनी प्रतिक्रिया दर्ज कराने के लिए आगे आने लगे हैं। यही कारण है कि पिछले कुछ सालों में डर्टी विज्ञापनों के खिलाफ काफी शिकायतें हुई हैं। विज्ञापनों पर नजर रखने वाली स्वयंसेवी स्वनियंत्रित संस्था एडवरटाइजिंग काउंसिल ऑफ इंडिया (एएससीआई) के पास प्रतिदिन डर्टी विज्ञापनों को लेकर हजारों शिकायतें पहुंचती हैं। अफसोस की बात है कि इसके बाद भी इस तरह के विज्ञापनों पर रोक लगना तो दूर इनमें कमी नहीं आई है। हालांकि इस बीच एएससीआई ने सूचना प्रसारण मंत्रालय को इस संबंध में एक प्रस्ताव भेजा है। इस प्रस्ताव में डर्टी विज्ञापनों का प्रसारण रात ११ से सुबह ६ बजे के बीच करने की सिफारिश की गई है। एएससीआई ने बाकायदा ऐसे विज्ञापनों की सूची भी मंत्रालय को भेजी है। सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने भी इस मसले को गंभीरता से लिया है। विभाग की मंत्री अंबिका सोनी ने हाल ही में लोकसभा के प्रश्नकाल में बताया था कि विज्ञापनों की नीति निर्धारण के लिए मंत्रियों का एक समूह बनाया गया है। यह समूह जल्द ही इस मसले पर अपनी राय देगा। डर्टी विज्ञापनों का प्रसारण रात ११ से सुबह ६ बजे के बीच करने से समस्या का हल नहीं होगा। क्योंकि आजकल की जीवनशैली ऐसी है कि बच्चे भी देर रात तक टेलीविजन देखते हैं। डर्टी विज्ञापनों को लेकर लोगों में कितना आक्रोश है, उनकी क्या प्रतिक्रियाएं हैं और वे क्या चाहते हैं, मंत्रियों के समूह को यह जरूर जानना चाहिए। मंत्री समूह की राय कुछ ऐसी हो जो लोगों को पसंद आए न कि कंपनियों के मालिकों को। मंत्री समूह को इस दिशा में अपनी राय बनाने से पहले उन तमाम प्रतिक्रियाओं का अध्ययन करना चाहिए जो एएससीआई पर प्रसारण मंत्रालय तक लोगों ने पहुंचाईं हैं।

LinkWithin

Related Posts with Thumbnails