शनिवार, 19 जनवरी 2013

भारत, विज्ञान और सोशल मीडिया

 स्कू ल-कॉलेज के समय अक्सर एक सवाल मन में नागफनी-सा चुभता था कि विज्ञान की किताबों में डब्ल्यू के रोएण्टजेन, जेएच वैंटहाफ, एई वॉन बेहरिंग, रेगनर फ्रिश, जॉन टिनबर्गन और आइंस्टीन जैसे कठिन और विदेशी नाम क्यों हैं? रामचंद्र, श्यामसुन्दर, अनिल, सुनील जैसे सरल और हमारे-तुम्हारे जैसे नाम क्यों नहीं है? क्या विज्ञान के क्षेत्र में सबकुछ विदेशियों की ही देन है? भारतमाता ने ऐसे सुत नहीं जने, जिन्होंने विज्ञान की प्रज्वला जलाई हो? बहुत पूछ-पड़ताल करने के बाद इस नतीजे पर पहुंचा कि भारत में विज्ञान का दीप प्रज्वलित ही नहीं था बल्कि अन्य को प्रकाश भी दे रहा था। लेकिन हम बचपन से रटे हुए विज्ञान को झुठलाना नहीं चाहते। हम आज भी विज्ञान के विकास और वैज्ञानिक दृष्टि के लिए पश्चिम की ओर ही देखते रहना चाहते हैं। हम यह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं है कि रॉकेट और बारूद विदेश में नहीं बल्कि अपने ही देश में ईजाद हुए। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के एक अनुभव को उल्लेखित करना चाहूंगा। उन्होंने अपनी पुस्तक 'इंडिया टू थाउजेंड ट्वेंटी : अ विजन फॉर न्यू मिलेनियम' में लिखा है कि एक बार वे रात्रिभोज में आमंत्रित थे। जहां बाहर के अनेक वैज्ञानिक और भारत के कुछ प्रमुख लोग आमंत्रित थे। वहां चर्चा चलते-चलते रॉकेट की तकनीक के विषय पर चर्चा चली। किसी ने कहा कि चीनी लोगों ने हजार वर्ष पूर्व बारूद की खोज की, बाद में तेरहवीं सदी में इस बारूद की सहायता से अग्नि तीरों का प्रयोग युद्धों में प्रारंभ हुआ। इस चर्चा में भाग लेते हुए डॉ. कलाम कहते हैं कि एक बार वे इंग्लैड गए थे। वहां लंदन के पास वुलीच नामक स्थान पर रोटुण्डा नाम का संग्रहालय है। इसमें टीपू श्ररंगपट्टनम् में अंग्रेजों के साथ हुए युद्ध में टीपू सुल्तान की सेना द्वारा प्रयुक्त रॉकेट देखे और यह विश्व में रॉकेट का युद्ध में सर्वप्रथम प्रयोग था। डॉ. कलाम के इतना कहते ही वहां मौजूद एक प्रमुख भारतीय ने तुरन्त टिप्पणी की कि वह तकनीक फ्रेंच लोगों ने टीपू को दी थी। इस पर डॉ. कलाम ने उन सज्जन से कहा कि आपका कथन ठीक नहीं है। मैं आपको प्रमाण बतलाऊंगा। बाद में डॉ. कलाम ने उन्हें प्रख्यात ब्रिटिश वैज्ञानिक सर बर्नाड लॉवेल की पुस्तक 'द ऑरीजिन एण्ड इंटरनेशनल इकॉनॉमिक ऑफ स्पेस एक्सप्लोरेशन' बताई। इसमें लिखा था कि विलियम कोनग्रेव्ह ने टीपू की सेना द्वारा प्रयुक्त रॉकेट का अध्ययन किया। उसमें कुछ सुधार कर सन् १८०५ में तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री विलियम पिट और युद्ध सचिव के्रसर लीध के सामने प्रस्तुत किया। वे इसे देखकर प्रभावित हुए और उन्होंने इसे सेना में शामिल करने की अनुमति प्रदान की। यह हमारा दुर्भाग्य ही है कि हम क्रोनगेव्ह के बारे में तो जानते हैं लेकिन उन महान वैज्ञानिकों के बारे में कोई जानकारी नहीं, जिन्होंने टीपू सुल्तान की सेना के लिए तोप बनाकर दी।
       दरअसल, भारत में वर्तमान में विज्ञान को लेकर जो धारणा प्रचलित है उसके लिए बहुत हद तक हमारा शिक्षा विभाग और बुद्धिजीवी लोग जिम्मेदार रहे हैं। शिक्षा संस्थानों ने अपनी भूमिका ठीक से नहीं निभाई। कहते हैं न जो बोएंगे वही तो काटेंगे। हमने एक लंबे अंतराल से विज्ञान के बीज शिक्षा संस्थानों में बोए ही नहीं तो विज्ञान के पौधे-वृक्ष कहां से मिलेंगे। विज्ञान के गीत गाना बंद कर दिया तो विज्ञान की अनुगूंज कहां से आएगी। भारत में आने वाली नस्ल को अपनी परंपरा, संस्कृति, इतिहास और ज्ञान के प्रति गौरव का भाव न रहे, इसके लिए १८३५ में लार्ड थॉमस बॉबिंग्टन मैकाले ने अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लागू करके पूरी कर दी। रही-सही कसर भारतीय मैकाले पुत्रों ने मैकाले के पौधे को सींच कर पूरी कर दी।
      चलिए अब इस बात पर गौर किया जाए कि भारत में फिर से वैज्ञानिक सोच का समाज बनाने के लिए सोशल मीडिया किस प्रकार की भूमिका निभा सकता है। अन्ना हजारे का आंदोलन हो बाबा रामदेव का आंदोलन दोनों को सोशल मीडिया से खूब ताकत मिली। असांजे ने विकीलीक्स के माध्यम से अमरीका के चाल, चरित्र और चेहरे को बेपर्दा कर उसकी चूलें हिला दीं। सोशल मीडिया वर्तमान में अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है, इससे कोई इनकार नहीं कर सकता। परंपरागत मीडिया की तरह यह मैनेज नहीं हो सकता। सोशल मीडिया में कहीं भी कोई चिंगारी उठती है तो वह दूर तक जाती है। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण को लेकर भारतीय जनमानस के मस्तिष्क पर छाई धुंध को हटाने में सोशल मीडिया एक कारगर माध्यम है। बस करना यह है कि सोशल मीडिया में विज्ञान लेखन की शुरुआत हो। हालांकि अभी भी कई सोशल मीडियाकर्मी विज्ञान लेखन का कार्य कर रहे हैं लेकिन यह अभी सीमित है। इस कार्य को गति देने की जरूरत है। चूंकि आजकल स्कूल-कालेज के विद्यार्थी अध्ययन के लिए इंटरनेट का काफी इस्तेमाल करते हैं। अब तो इंटरनेट डेस्कटॉप और लैपटॉप से निकलकर मोबाइल में आ गया है। ऐसे में सोशल मीडिया विज्ञान को रोचक तरीके से प्रस्तुत कर युवाओं को अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। बाल सुलभ मन विज्ञान के परंपरागत अध्ययन से ऊब जाता है। छुटपन से ही बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि जगानी है तो विज्ञान कथा लेखन इस दिशा में बेहतर उपाय हो सकता है। कथा रुचिकर होने के साथ अंतर्मन में पैठ करती है। विज्ञान कथा लेखन कर सोशल मीडिया दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका निभा सकता है। साथ ही अंग्रेजी में उपलब्ध सामग्री को क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया जाना चाहिए। गुरु रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने इस बात पर बड़ा जोर दिया है कि सृजन मातृभाषा में ही हो सकता है। शिक्षा की राष्ट्रीय परिचर्या-2005 की रूपरेखा में भी इस बात को स्वीकारा गया है कि अपनी भाषा में इंसान बेहतर सीख सकता है। वहीं कोठारी आयोग-1966 ने भी कहा था कि दुनियाभर के देशों में बच्चों को शिक्षा उनकी मातृभाषा में ही दी जाती है। भारत ही एकमात्र देश है जहां यह व्यवस्था नहीं है। अपनी भाषा में विज्ञान लेखन का कार्य सोशल मीडिया पर अच्छे से किया जा सकता है। विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए भारतीय भाषाओं में विज्ञान लेखन जरूरी है। इसके साथ ही इस बात के भी प्रयास करने होंगे की हमारे सुझाव सरकार तक भी पहुंचे। समाज में वैज्ञानिक सोच का वातावरण बनाने के लिए कुछ निजी और सरकारी संस्थाएं कार्यरत हैं। विज्ञान भारती, मेपकॉस्ट, मध्यप्रदेश विज्ञान सभा, साइंस सेंटर और स्पंदन इसके उदाहरण है, ऐसे और भी कई नाम हैं। सोशल मीडिया में जो लोग विज्ञान लेखन की जिम्मेदार संभाले हुए हैं या जो इस दिशा में कुछ करने का मन बना रहे हैं, वे इनके साथ जुड़कर काम कर सकते हैं। विज्ञान मेले, विज्ञान सेमिनार, परिचर्चा, वर्कशॉप, वैज्ञानिक संस्थानों का भ्रमण, वैज्ञानिकों से मुलाकात, विज्ञान नाटकों का आयोजन आदि गतिविधियां शुरू कर सकते हैं। इससे वैज्ञानिक सोच का समाज बनाने में बड़ी मदद मिलेगी।
      आखिर में एक बात और कहूंगा कि भारत में सदैव से विज्ञान की गंगाधारा बहती रही है। बीच में बाह्य आक्रमणों के कारण कुछ गड़बड़ जरूर हुई लेकिन यह धारा अवरुद्ध नहीं हुई। समाज में वैज्ञानिक चेतना खासकर विज्ञान के प्रति भारतीय दृष्टि के विकास के लिए अब सोशल मीडिया को मिलकर भगीरथी प्रयास करने होंगे।

शनिवार, 12 जनवरी 2013

भारत यानी गाँव नहीं

 रा ष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहनराव भागवत के बयान के बाद भारत बनाम इंडिया की बहस शुरू हुई है। संघ पर हमला करने के लिए तैयार बैठे रहने वाले लोग और संगठन कथ्य की गंभीरता को समझे बिना मोहनराव भागवत के बयान पर हाय तौबा मचा रहे हैं। इस बीच देखने और सुनने में आया कि भारत का अर्थ ज्यादातर लोग ग्रामीण क्षेत्र से और इंडिया का अर्थ शहरी क्षेत्र से लगा रहे हैं। यह सरासर गलत है। भारत का अर्थ किसी भी नजरिए से ग्रामीण क्षेत्र नहीं, संघ प्रमुख श्री भागवत की व्याख्या के अनुसार भी नहीं। संघ प्रमुख के मुताबिक तो भारत का अर्थ सांस्कृतिक भारत से हैं, जहां भारतीय मूल्यों और संस्कारों का पालन हो रहा है। इंडिया से अभिप्राय उस वर्ग से है जो पश्चिम से आई हवा के असर में हैं। स्पष्ट है कि पश्चिम की हवा टेलीविजन व अन्य संचार माध्यमों से गांव तक भी पहुंच गई है। इसके अलावा पहले भी कई गांव बुराइयों के लिए कुख्यात रहे हैं। ऐसे में इन गांवों को संघ प्रमुख की परिभाषा की कसौटी पर कसा जाए तो ये इंडिया ही होंगे, भारत नहीं। भारत का अर्थ तो भाव, राग और ताल से है। भाव से भरा है, संस्कारों से पूर्ण वर्ग ही भारत का प्रतिनिधित्व करता है। ये वर्ग शहर में भी आसानी से मिल जाएगा। ऐसा नहीं है कि यह परिभाषा अभी हाल ही में मोहनराव भागवत ने ही की है। भारत में बढ़ रहे सांस्कृतिक भेद को देखते हुए पहले भी कई विद्वान कह चुके हैं कि इस देश में दो राष्ट्र बन रहे हैं- भारत और इंडिया। जिसमें एक वर्ग पाश्चिात्य जीवनशैली, भोगवाद, चमक-दमक और स्वच्छंदचारिता से जीवन व्यतीत कर रहा है। जबकि एक वर्ग भारतीय संस्कारों को स्थापित कर रहा है और सहअस्तित्व के सिद्धांत का पोषण कर रहा है। खैर, इस विवाद को यहीं छोड़ते हैं। आइए देखते हैं कि आखिर इस देश का नाम क्या है? भारत और इंडिया में से अधिक गौरव की अनुभूति कौन कराता है? इस देश के लिए क्या नाम अधिक उपयुक्त है? क्या भारत गांव है और इंडिया शहर? इन सवालों के जबाव अभी तलाशना जरूरी है क्योंकि इनसे हमारा अतीत भी जुड़ा, वर्तमान का भी वास्ता है और भविष्य भी निर्भर है।
    देश का नाम क्या है? भारत या इंडिया? अकसर यह सवाल देश के तमाम नौजवानों और नौनिहालों के दिमाग को नागपाश की तरह जकड़ता रहता है। दुनियाभर के देशों के एक ही नाम हैं। जापान, जापान है, अमेरिका, अमेरिका है, चीन, चीन है और नेपाल का नेपाल। लेकिन, क्या कारण है कि भारत के दो आधिकारिक नाम प्रचलित हैं - भारत और इंडिया। इस सवाल से परेशान लखनऊ की सामाजिक कार्यकर्ता उर्वशी शर्मा ने केन्द्र सरकार से इसका उत्तर पूछा था। सूचना के अधिकार कानून के तहत उर्वशी शर्मा ने केन्द्र सरकार से पूछा था कि सरकारी तौर पर भारत का नाम क्या है? उसने यह भी पूछा कि किसने और कब इस देश का नाम भारत या इंडिया रखा? लेकिन, सरकार इसका अब तक स्पष्ट जवाब नहीं दे सकी है। हालांकि हम सभी जानते हैं कि इंडिया शब्द अंग्रेजों का दिया हुआ है। जिसे हम आज तक ढो रहे हैं। हमारे कर्णधारों को १९४७ में अंग्रेजों से सत्ता लेने के साथ ही देश का आधिकारिक नाम भारत ही घोषित कर देना चाहिए था। लेकिन, हुआ इसका उल्टा। भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ही लिख दिया गया -इंडिया दैट इज भारत। दरअसल, उस वक्त देश की कमान जिन हाथों में थी वे पाश्चात्य शैली में ही रचे-बसे थे। भारतीय राजनेताओं को अन्य देशों से प्रेरणा लेनी चाहिए थी, जिन्होंने आजाद होते ही या समय आने पर तत्काल अपने मूल नाम को स्थापित किया और गुलामी की याद दिलाने कारण को खत्म कर दिया। सीलोन ने अपना नाम बदलकर श्रीलंका, बर्मा ने म्यांमार और पौलेंड ने पोलेस्का कर लिया था। रूस में भी वामपंथी तानाशाही और क्रूर नेता लेनिन और स्टॉलिन के नाम ऐतिहासिक नगरों से हटा दिए गए। लेनिनग्राद को बदलकर सेंट पीटर्सबर्ग और स्टालिनग्राद को वोल्वोग्राद कर दिया था। दुनिया के इतिहास में ऐसे और भी उदाहरण भरे पड़े हैं लेकिन हमारे नेताओं ने इनसे कोई सीख नहीं ली।
    भारतवर्ष ऐसा नाम है जिसके साथ तमाम गौरवान्वित करने वाले प्रसंग जुड़े हैं। महान प्रतापी और लोक कल्याणकारी राजा भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत रखा गया था लेकिन इंडिया किसके नाम पर रखा गया, किसी के पास कोई जवाब नहीं। सरकार के पास भी नहीं। इंडिया शब्द के साथ इस तरह का कोई गौरव का विषय भी नहीं जुड़ा। जुड़ा है तो बस गुलामी और पीड़ा का किस्सा। भारत नाम देश की भाषा, समाज और संस्कृति की थाती है। इस नाम के साथ हजारों वर्ष पुरानी परंपराएं, स्मृति, रीति और ज्ञान जुड़ा है। इस राष्ट्र के प्रत्येक काल, वर्ग और भाषा के साहित्य में इस देश का नाम भारतवर्ष बताया गया है। नाम अपने आप में बड़ा महत्व रखते हैं। इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता। यही कारण है कि अपने बालक का नाम राम तो कोई भी रखने को तैयार हो सकता है लेकिन रावण संभवत: सामान्य आदमी नहीं रखना चाहेगा। ठीक इसी तरह अपनी बेटी का नाम सीता रखना सुखद है लेकिन सूपर्णखा कोई नहीं रखना चाहेगा। दरअसल, नाम अपने साथ इतिहास लेकर चलते हैं। नाम विशेष संस्कृति का भान कराते हैं।
    भारत का अर्थ ग्रामीण और इंडिया का अर्थ शहर, किसी भी नजरिए से ठीक नहीं है। पिछड़ा है वह भारत है और जो प्रगतिशील है वह इंडिया है। दरअसल, इसी सोच के कारण दिक्कत बढ़ी है। भारत ग्रामीण और पिछड़ा है, यह सोच बनी क्यों? किसी भी देश या समाज को अपना अनुयायी बनाना है तो उसे उसकी जड़ों से काट देना चाहिए। मैकाले के मानसपुत्रों ने यही भारत के संदर्भ में किया। उन्होंने भारत को झाड़-फूंक, जादू-टोना करने वालों का देश बताया, वैज्ञानिक रूप से बंजर कहा तो आधुनिकता के नजरिए से बेहद पिछड़ा और रूढ़ीवादी ठहरा दिया। इसी का नतीजा रहा कि धीरे-धीरे भारत में इंडिया वर्चस्व बढ़ता रहा। इसके उलट यदि भारत के विचारकों ने युवा नागरिकों को भारत के उजले पृष्ठ पढ़ाए होते तो आज स्थिति कुछ और होती। अंग्रेजों के आने तक न तो भारत वैज्ञानिक तौर पर सुप्त था, न ही शिक्षा-दीक्षा के नजरिए और न ही शहरीकरण और आधुनिक तौर पर पिछड़ा था वरन भारत विश्व की तमाम सभ्यताओं के शीर्ष पर था। प्रथम सुव्यवस्थित नगर के प्रमाण भारत में ही मिले हैं। स्त्री-पुरुषों को जिस समान रूप से सम्मान भारत में मिलता रहा है, उतना संभवत: किसी अन्य देश में नहीं मिला। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जितना संरक्षण भारतीय परिवेश में हुआ, उतना शायद और कहीं नहीं। अधिकारों के अधिक यहां मनुष्य को उसके कर्तव्य के पाठ पढ़ाए गए।
    खुले दिल से स्वीकारना होगा कि देश में फैली तमाम बुराइयों पर विजय पाना है तो भारत के महान संस्कार और परंपराओं को बढ़ावा देना ही होगा। भारत के संस्कार और जीवनशैली किसी भी वर्ग को दबा कर आगे बढऩे की नहीं है, हमें यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए। वरन भारतीय जीवन तो सहचार्य, सहकार्य, सहयोग, समभाव और समान आजादी पर आधारित है। इसमें मनुष्य-मनुष्य में भेद नहीं, स्त्री-पुरुष में भी भेद नहीं। भ्रष्टाचार, अनाचार, अपराध पर लगाम कसना है तो नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देना ही होगा। भारत को फिर से भारत बनाना ही होगा। निश्चिततौर पर बहुत समय बीत गया है, अब इंडिया का त्याग कर भारत को नाम स्वाभाविक रूप से भारत घोषित कर दिया जाना चाहिए। देश के कई नगरों और राज्यों के नाम हमने समय-समय पर सुधारे हैं। असम,  तिरुअनंतपुरम्, चेन्नई, बेंगलूरू, मुंबई, कोलकाता और ओडिसा सहित अन्य राज्य और कई स्थान अब गौरव के साथ पहचाने जा रहे हैं।

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