सोमवार, 28 अक्तूबर 2013

सपने से निकलेगा अंधविश्वास और अविश्वास

 उ त्तरप्रदेश के उन्नाव जिले का डोडियाखेड़ा गांव दुनिया में चर्चा का विषय बन गया है। भारत की मीडिया ने तो फिलहाल वहीं तम्बू तान लिया है। बाबा शोभन सरकार ने एक सपना देखा और सपने में एक हजार टन सोने का खजाना देखा। खंडहर हो चुके किले के राजा राव रामबक्श बाबा शोभन सरकार के सपने में आए और उन्हें खजाने की जानकारी दी। बाबा ने बिना देरी किए खजाना निकालने के लिए केन्द्रीय मंत्री चरण दास महंत और प्रधानमंत्री कार्यालय को चिट्ठी लिखी। सरकार में बैठे नुमाइन्दों की आंखें एक हजार टन सोने के ख्याल से ही चुंधिया गईं। देश की तरक्की के लिए तैयार बैठी सरकार ने बिना सोचे-विचारे 'पहुंचे हुए बाबा' के सपने को सच मानकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) को खुदाई के आदेश जारी कर दिए। एक हजार टन सोने का खजाना निकालने के लिए एएसआई ने खुदाई भी शुरू कर दी। एक बाबा के सपने के आधार पर खुदाई शुरू कराने के मसले को लेकर केन्द्र सरकार की देश-दुनिया में थू-थू होने लगी। रायता बहुत फैल गया तो सरकार ने उसे समेटना शुरू कर दिया। कभी सरकार की ओर से तो कभी एएसआई की ओर से कहा जाने लगा कि यह खुदाई बाबा के सपने के आधार पर नहीं बल्कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) के सर्वे के आधार पर की जा रही है। सवाल उठता है कि सच यह था तो सरकार इतने दिन से क्यों चुप थी? क्यों देश की छवि धूमिल होने दी जा रही थी? क्यों नहीं तत्काल खजाने की खोज का खण्डन किया गया? आखिर सर्वे और बाबा के सपने में क्या संबंध है? बाबा के सपने के बाद ही क्यों खुदाई की तैयारी की गई? खैर, इन सवालों को यूं ही खड़े छोड़कर जरा दूसरी तरफ बात करते हैं।
खजाने की खोज ने समाज के सम्मुख बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। एक हजार टन सोने का खजाना (जिसके मिलने की संभावना लगभग शून्य है) अगर मिल भी गया तो समाज का भला तो होगा सो होगा, नुकसान बहुत गंभीर होने वाले हैं। यदि खजाना नहीं मिला तब भी नुकसान की ही स्थिति बनती है। एक बाबा द्वारा सपने में खजाना देखे जाने और संवैधानिक संस्थाओं द्वारा उस सपने पर विश्वास जताने के इस प्रकरण के दुष्परिणाम तत्काल ही सामने आने लगे हैं। बदमाश और आपराधिक प्रवृति के लोग गेंती, फावड़ा लेकर दूसरे किलों-खंडहरों में पहुंचने लगे हैं। वैज्ञानिक सोच की ओर बढ़ रहे समाज में अंधविश्वास फिर से सिर उठाने लगेगा। मुझे अच्छे से याद है करीब २० साल पहले गांव में दफीने खोजने के लिए कुछ लोग बहुत सक्रिय हुए थे। आंख में काजल लगाकर और तमाम प्रकार के ढोंग करके पुराने खंडहरों और खेतों में खजाने का पता बताने वाले तांत्रिकों की चांदी कट रही थी। मेरे ही गांव के कई लोगों ने अपने पुराने घर रातों-रात चुपचाप खोद डाले थे। पहाड़ और पुरानी हवेलियां भी नहीं छोड़ी थीं। लोग दफीना ढूंढ़कर अमीर तो नहीं हो सके बल्कि गांठ का पैसा ढोंगी तांत्रिकों और बाबाओं को देकर गरीबी जरूर घर ले आए। शोभन सरकार को आया सपना अब देश के कई छुटभैए बाबाओं को भी आएगा। किसी को दस कलश में सोना दिखेगा तो किसी को हीरे-जवाहरात से भरे संदूक दिखाई पड़ेंगे। बिना मेहनत किए जल्द ही करोड़पति बनने का ख्वाब देखने वाले लोग इन बाबाओं की गिरफ्त में बड़ी आसानी से आएंगे। कुछ दिन के लिए गली-चौराहे के ये बाबा सट्टे का नंबर बताना बंद कर नए धंधे में हाथ आजमाएंगे। 
बाबा शोभन सरकार का दावा है कि सोना नहीं मिला तो वे अपना शीश काट देंगे। वे रघुकुल वंश से हैं। 'प्राण जाएं पर वचन न जाए' परंपरा का पालन करेंगे। हालांकि अब बाबा ने यू टर्न भी ले लिया है। उनकी तरफ से दो बातें कही जा रही हैं कि सरकार जिस तरह से खुदाई कर रही है, उस तरह से एक तोला सोना भी मिलना मुश्किल है। खुदाई के लिए सेना को बुलाया जाए। दूसरा प्रचार उनके शिष्य की ओर से यह किया गया है कि यदि सोना धन तेरस यानी २ नवंबर २०१३ से पहले नहीं निकाला गया तो सारा सोना राख हो जाएगा। दरअसल, एएसआई ने साफ कर दिया है कि उसे खुदाई में कम से कम एक माह का वक्त लगेगा। इस बात को समझकर बाबा ने अपनी आन-प्रान बचाने के लिए गणित लगा लिया है। सोना मिल गया तो बाबा भगवान बन जाएगा, समाज का क्या होगा यह ऊपर बता ही दिया है। अंधविश्वास का बोलबाला। सोना नहीं निकला तो बाबा के पास बहाने हैं ही कि खुदाई का काम धनतेरस से पहले नहीं हो सका। मेरे कहे अनुसार खुदाई नहीं कराई गई। ऐसी स्थिति में बाबा का जो होगा सो होगा, समाज में अविश्वास की स्थिति जरूर निर्मित होगी। अभी हाल ही में कुछ बाबाओं ने अपनी करतूतों से वैसे ही संत समाज-परंपरा को कलंकित किया है। लोगों ने संतों को अविश्वास भरे नजरिए से देखना शुरू कर दिया है। ग्वालियर से भोपाल की ओर आते वक्त ट्रेन में कुछ यात्रियों की चर्चा पर ध्यान दिया तो पता चला कि किस तरह संतों के प्रति अविश्वास बढ़ा है। एक सज्जन कह रहे थे कि अब तो अपने गुरु पर भी शंका होती है। पता नहीं उनका आचरण भी आसाराम की तरह तो नहीं। अभी तक तो सही दिखते थे लेकिन अब मन शंकालु हो गया है। दूसरे यात्री ने कहा- बहुत मुश्किल हो गया है अब साधु-संतों पर भरोसा करना। आसाराम और उसके बेटे को ही देख लो कितने गंदे काम में फंसे हैं। अब तक उजले कपड़े पहनकर और ऊंचे मंच से बाप-बेटे समाज को ब्रह्मचर्य का पालन करने का संदेश देते थे और खुद वासना के दलदल में फंसे हैं। कालिख से लिपे-पुते और सने हैं। बाबा शोभन सरकार का सपना झूठा साबित हुआ तो अविश्वास की यह भावना और गहरा जाएगी। सरकार को बाबा के सपने पर खुदाई शुरू करानी ही थी तो बड़े गोपनीय ढंग से इसे किया जाना था। मीडिया में मामला आने से बात बिगड़ गई है। स्थिति 'उगलने की न निगलने की' बन गई है। सोना मिलना, न मिलना, दोनों ही स्थितियां खतरनाक हैं। एक तरफ कुंआ और एक तरफ खाई। 
कानपुर के शिवली स्थित आश्रम में रहने वाले शोभन सरकार (असल नाम विरक्ता महाराज) के सपने से कुछ हासिल होगा या नहीं यह आने वाला वक्त बताएगा। फिलहाल तो सपने के रास्ते गुमनाम एक बलिदानी राजा को देश जानने लगा है। थोड़ा ही सही, हमने राजा राव रामबक्श सिंह के बलिदान को याद किया। १८५७ में भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राजा राव रामबक्श सिंह ने अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। लेकिन युद्ध में राजा को पराजय का मुंह देखना पड़ा। अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानी राजा राव रामबक्श सिंह को फांसी पर लटका दिया। उत्तरप्रदेश के उन्नाव जिले के डोडियाखेड़ा गांव में खंडहरनुमा किला इसी बलिदानी राजा का है। जहां एक बाबा के सपने के कारण फिर से लोगों की चहल-पहल है। दुनिया की निगाहें टिकी हैं। अंत में यही कि भारतीय समाज को अंधविश्वास से दूर हटकर वैज्ञानिक सोच की ओर आगे बढऩा चाहिए। संत समाज भी प्राचीन भारत की तरह फिर से वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देने, वैज्ञानिक अनुसंधान की गतिविधियों को बढ़ावा देने के अपने मूलभूत काम को आगे बढ़ाएं। सपने देखने का काम शेखचिल्ली के लिए छोड़ दिया जाए।

9 टिप्‍पणियां:

  1. यहाँ से पचास-पचास कोस दूर तक जब कोई बच्चा रोता है तो माँ कहती है, "बेटा सो जा, पर सपना मत देखना वरना कोई कंगली सरकार खुदाई करा देगी।"

    प्याज़-व्याज का सपना देखते तो थोड़ी बहुत सैटिंग हो जाती, सरकार ने सपना भी देखा तो 1000 टन सोने का, कौन देगा?

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  2. bhasa ke santulan ke sath hi vaicharik ttejna paida karne wala bahut sunder aalekh hai. sawal yah hai ki ham swayam par viswas karne ki wajay is tarah ke andhanukaran se bachne ki kosis kyon nahi karte. yah sahi hai hamari paramprayen hame santo ka aadar karna sikhati hain aur hamare aachar-vichar aur dharm bheeruta hame burayi se rokti hai. lekin yah kab tak ? is sabse bachna hoga warna prachar paise ki andhi daud mai samil tathakathit sant hamare dharm aur vaigyanik aadhar par rachi gayi manyatao se khaelte ahenge aur sanatan dharm ko todne ki unki sazis safal ho jayegi.

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  3. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  4. हमेशा की तरह बहुत अच्छा लिखा है लोकेन्द्र जी। वैसे आजकल हाईप तो सबसे ज्यादा मीडिया ही पैदा करता है और फ़िर चंद लोगों के कारण एक जीवन पद्धति और एक धर्म विशेष के पतन का सक्रिय भागीदार बनता है।
    दीपोत्सव पर आपको सपरिवार मंगलकामनायें।

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  5. आज के समय में भी ऐसा अंधविश्वास और वो भी सरकार के द्वारा .... समझ के हर मायने से दूर की बात ... पता नहीं क्यों ...

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  6. जनता जागे और सिसकती सारकार को सरका दे, जागरूकता का परिचय दे
    सजग लेखन तभी सार्थक जब जनता को जगा दे, लेखन से सार्थकता जता दे

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