शुक्रवार, 26 अक्तूबर 2012

अब लेनिन के बुत भी बर्दाश्त नहीं

 क भी रूस की ताकत का प्रतीक रहे कम्युनिस्ट लीडर ब्लादिमिर लेनिन की प्रतिमाएं भी लोग बर्दाश्त नहीं कर रहे हैं। हाल ही में मंगोलिया की राजधानी उलान बटोर में क्रेन की मदद से ब्रॉन्ज से बनी लेनिन की विशालकाय प्रतिमा हटा दी गई। लेनिन को मंगोलिया में (दुनियाभर में भी) दमन और हत्याओं का कारण माना जाता है। २०वीं शताब्दी में मंगोलिया कम्युनिस्ट शासन के तहत रहा। इस दौरान लेनिन ने मंगोलिया का भारी दमन और शोषण किया। लेनिन के बाद सोवियत तानाशाह जोसेफ स्टालिन के शासन में भी यहां के लोगों का जमकर उत्पीडऩ किया गया। मंगोलिया जाति ने शोषण के प्रतीक (लेनिन) का अपने देश की गलियों और चौराहों से सफाया कर दिया। यूं तो मंगोल जाति भी खूंखार मानी जाती रही है। इसका इतिहास भी रक्तरंजित है। लेकिन, यह शुभ संकेत है कि इस देश ने अन्य देशों को भी गर्व से खड़े होने की प्रेरणा दी है। गुलामी और शोषण के प्रतीकों को उखाड़ फेंकने का संदेश दिया है। यह देखने की बात है कि इस राह पर कौन-कौन बढ़ता है।
     मंगोल साम्राज्य की स्थापना १२०६ में क्रूर और अधर्मी लुटेरे चंगेज खान ने की थी। मंगोल को ही अरबी में मुगल कहते हैं। चंगेज खान के वंशजों ने भारतवासियों पर बहुत अत्याचार किए थे। स्वयं को दूसरा चंगेज खान मानने वाला तैमूर लंग एक तरह से राक्षस था। उसने दुनिया को लूटने की चाह में लाखों लोगों की हत्या की। तैमूर भारत लूटने भी आया था, तब उसने दिल्ली को सुल्तान विहीन कर दिया था। चंगेज खान और तैमूर लंग का वंशज ही था बाबर। आक्रांता बाबर भी अपने दादा-नानाओं की तरह वहशी था। उसने भारत की अस्मिता पर वार किया। बाबर के आदेश पर भारत के जन-जन के मन में बसने वाले राम का मंदिर ध्वस्त कर दिया गया। मंदिर की नींव पर ही मस्जिद बना दी गई। जिसे बाद में बाबरी मस्जिद के नाम से जाना गया। इस कलंक को धोने का प्रयास कुछ राष्ट्रभक्तों ने किया तो बवंडर खड़ा हो गया जो आज तक थमने का नाम नहीं ले रहा है। खैर बात मंगोलिया की करते हैं। मंगोलिया खानाबदोशों ने यहां-वहां से आकर बसाया था। जिसे विधिवत रूप से साम्राज्य का रूप खूंखार और बर्बर चंगेज खान ने दिया था। बाद के वर्षों में मंगोलिया इस्लामिक राष्ट्र हो गया। बौद्ध धर्म भी मंगोलिया तक पहुंचा। फिलहाल मंगोलिया में बौद्ध धर्म को मानने वाले लोगों की संख्या अधिक है। मंगोलिया में वामपंथियों के शासनकाल में सन् १९२४ के आसपास करीब ३० हजार बौद्धों को कत्ल कर दिया गया था। इस तरह की कत्लोगारत के लिए कम्युनिज्म जाना जाता है। रूस में स्टालिन, रूमानिया में चासेस्क्यू, पोलैंड में जारू जेलोस्की, हंगरी में ग्रांज, पूर्वी जर्मनी में होनेकर, चेकोस्लोवाकिया में ह्यूसांक, बुल्गारिया में जिकोव और चीन में माओ-त्से-तुंग जैसे अधिनायकवादों ने भारी नरसंहार कर आतंक का राज किया। कम्युनिज्म का आर्विभाव १९१७ में रूस की बोल्शेविक क्रांति के साथ हुआ। लेकिन, कम्युनिज्म के प्रति लोगों का आकर्षण इसी शताब्दी में खत्म हो गया। रूस में ही १९९१ में व्यापक भ्रष्टाचार और देशव्यापी भुखमरी के बीच कम्युनिज्म ने दम तोड़ दिया। रूस में कम्युनिज्म के पैरोकारों की क्या स्थिति वहां की जनता ने की होगी उसे इस बात से समझें। कम्युनिस्ट शासन ने तंग हो चुकी जनता ने रूस में लेनिन और स्टालिन के शवों को भी बुरी तरह पीटा था। बाद में यहां लेनिनग्राद का नाम पुन: सेंट पीटर्सबर्ग और स्टालिनग्राद का नाम वोल्गोग्राद कर दिया था। कम्युनिस्टों के कारनामों से काले पृष्ठों का ही नतीजा है कि मंगोलियन भी अपने देश से एक-एक कर शोषण की निशानियां मिटा गर्वोन्मुक्त महसूस कर रहे हैं। जिस समय मंगोलिया की राजधानी उलान बटोर में लेनिन की विशालकाय प्रतिमा हटाई जा रही थी तब सडक़ों पर उत्साहित नौजवानों और वृद्धों की भीड़ जमा थी। सब जुट आए थे कंलक को मिटता देखने के लिए। 
      हिन्दू संस्कृति का मंगोलिया पर खासा असर देखने को मिलता है। यही कारण रहा कि समय के साथ यहां के बर्बर लोग सभ्य होते दिखे। भारतीय संस्कृति के प्रभाव में आने के बाद यहां सांस्कृतिक परिवर्तन देखे गए। मंगोलिया में भारत की तरह दोनों हाथ जोडक़र अभिवादन करने की परंपरा थी। यहां धार्मिक कृत्य एवं पूजा गंगाजल के बिना पूरी नहीं होती थी। यहां संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषाओं में ग्रंथ रचे गए और यहां के लोक-काव्य में रामायण की कथाएं प्रचलित हैं। इतना ही नहीं बैकल झील के चारों ओर विद्या के अनेक केन्द्र थे। जहां देवी सरस्वती के अनेक चित्र और मूर्तियां थीं। मंगोलिया ने सभ्य होने के भारत से बहुत कुछ सीखा तो भारत को मंगोलिया से अब सीख लेनी चाहिए। जिस तरह गर्व से मंगोलिया ने शोषण के प्रतिकों को उखाड़ा है भारत को भी अपने देश से गुलामी के प्रतीक चिह्नों को हटा देना चाहिए। चाहे वो किसी मुस्लिम आक्रांता के नाम पर भारत की धरती पर अब तक स्थापित हो या ब्रिटिश शासन काल की निशानियां हों। आक्रांताओं और अत्याचारियों के बुत उखाड़ फेंक दिए जाएं, उनके नाम से बने शहर, सडक़, गली और मोहल्लों के नाम बदल दिए जाएं। तभी युवा भारत गर्व की सांस ले सकेगा।

रविवार, 21 अक्तूबर 2012

कठिन है ‘शब्द साधना’ की राह

lokendra singh/लोकेन्द्र
  अ पने ब्लॉग पर मैंने आखिरी पोस्ट (बड़ों के लिए किस्से बचपन के) २४ सितंबर को प्रकाशित की थी। तब से लेकर अब तक भारी व्यस्तता का दौर रहा। इस बीच पढऩे-लिखने का क्रम ही टूट गया। शिखा वाष्र्णेय की पुस्तक ‘स्मृतियों में रूस’ को रोज लालायित होकर देखता हूं लेकिन पढ़ नहीं पा रहा हूं। कारण एक ही है भारी व्यस्तता। १६ अक्टूबर को बालक पांच माह का हो गया। अपने नन्हें राजकुमार को भी समय देने में असमर्थ हूं। कल तो श्रीमती जी ने ताना मार ही दिया- तुम्हारे पास तो परिवार के लिए समय ही नहीं है। अपुन सुनकर रह गए। और कर भी क्या सकते थे। खैर, आप सोच रहे होंगे कि मैं ऐसा कौन-सा मील चला रहा था? हमारे इधर कहावत है- मील चलाना। जो मनुष्य यह कहता हुआ पाया जाता है कि मेरे पास समय नहीं है। दूसरे मनुष्य उसे पलटकर यही कहावत सुना देते हैं- तुम कौन-सा मील चला रहे, जो तुम्हारे पास दो मिनट का भी समय नहीं है। कुछ नहीं दोस्तो अभी-अभी संस्थान बदला है। राजस्थान पत्रिका को विदा कह कर नईदुनिया (जागरण ग्रुप) आया हूं। नया माहौल, नया सिस्टम, थोड़ा सहज होने में समय तो लगता ही है। फिर अपुन तो महाआलसी राम हैं। जरा-सा बदलाव, थोड़ा देर से सोना, बहुत देर से उठना। समय कब निकल जाता है अपुन को पता ही नहीं चलता।
           खैर, अभी तक की कहानी शीषर्क से मेल नहीं खा रही न? चलो यू टर्न लेते हैं। गपशप छोडक़र मुद्दे की बात पर आते हैं। दरअसल, भारी व्यस्तता का एक और कारण है, जिसकी चर्चा मैं आप लोगों से करना चाहता हूं। इन दिनों में अपने पहले काव्य संग्रह के प्रकाशन को लेकर इधर-उधर हाथ-पैर मारने में लगा हूं। संग्रह तैयार है लेकिन प्रकाशक नहीं मिल रहा। मिले भी तो क्यों? अपुन कोई देश-विदेश में ख्याति अर्जित कवि हैं नहीं। अपुन कोई बेस्टसेलर बुक राइटर भी नहीं? साहित्य का कोई सामंत भी अपना मुंह बोला ताऊ नहीं। अपनी कविताओं से विवाद भी नहीं फैलने वाला। ‘लोकेन्द्र जी हम कविताएं नहीं छापते’। कई प्रकाशकों का यह जवाब सुनकर तो माथे पर चिंता की और लकीरें और बढ़ गईं। एक तो आटा कम था वह भी गीला हो गया। दोस्तो, इस भागम-भाग भरे डेढ़ माह में एक विद्वान ने अपुन को उम्मीद की लौ दिखाई कि लगे रहो बेटा जब तक सांस है, कुछ न कुछ तो हो ही जाएगा। हारकर बैठ गए तो कुछ नहीं होना। उन्होंने यह मंत्र मुझे सीधे नहीं दिया। यह तो उन्होंने साहित्य जगत की बिडम्वना को लेकर कहा था। 
          हुआ यूं कि मैं गिरिजा कुलश्रेष्ठ जी की पुस्तकों के लोकार्पण कार्यक्रम में पहुंचा। कार्यक्रम में मंच पर देश के बड़े साहित्यकार जगदीश जी तोमर और दिवाकर विद्यालंकार जी विराजमान थे। विद्यालंकार जी ने अपने उद्बोधन में गिरिजा जी की पुस्तकों की भूरि-भूरि प्रशंसा की। इसके बाद उन्होंने कहा कि साहित्य के क्षेत्र में दो तरह की साधना होती है। एक तो भाव साधना और दूसरी शब्द साधना। भाव साधना पहली साधना है। शब्द साधना अगली सीढ़ी है। भाव साधना में साहित्यकार कितना भी पारंगत हो जाए लेकिन उसकी साधना तब तक अधूरी है जब तक शब्द साधना पूरी न हो जाए। शब्द साधना का अर्थ बताते हुए उन्होंने कहा कि शब्द साधना का मोटा-मोटा अर्थ है भावों का प्रकाशित हो जाना। किसी साहित्यकार की कृति प्रकाशित होने में बड़ा श्रम लगता है। हिन्दी साहित्य में प्रकाशक या तो स्थापित नामों को ही छाप रहे हैं या फिर जो उन्हें धन देता है उसे छाप देते हैं। अर्थात् भाव साधना से भी अधिक परिश्रम और महत्व की साधना है शब्द साधना। लेखक और कवि की बात समाज में जन-जन तक पहुंचे उसके लिए शब्द साधना बहुत जरूरी है। विद्यालंकार जी ने आगे कहा कि निराश होकर रचनाकार कभी-कभी सोचता है कि उसकी कृति स्तरीय नहीं है। यह सोचकर वह उसे किसी संदूक या किसी कोने में छुपा देता है। ऐसा करके वह भावों की हत्या करता है। अशुद्धियों और त्रुटियों के डर से साहित्य रचना को प्रकाशित नहीं कराना गलत कदम है। सबकी रचनाओं में कमियां रह जाती हैं, जिन्हें समालोचना, आलोचना और समीक्षा के बाद दूर किया जाता है।
            मित्रो उनके इस उद्बोधन ने अपने पिचकते फेंफड़ों में हवा भर दी। कार्यक्रम में ही जोश आ गया। मन ही मन तय किया कि अब और जोर-शोर से अपने काव्य संग्रह के प्रकाशन की तैयारी की जाएगी। शब्द साधना की कठिन डगर पर चल निकला हूं, देखते हैं कब पूरी होती है।
चलते-चलते : आप लोग भी बहुत दुष्ट हो। जरा ब्लॉग से दूर क्या हुआ? आप लोगों ने तो आना ही बंद कर दिया। दुष्टई की हद होती है, हाल-चाल तक नहीं पूछा मेरा। चलो छोड़ो अब आते रहिएगा। आभासी दुनिया के रिश्तों में भी थोड़ी संवेदनशीलता बनी रहनी चाहिए, वरना दुश्मनों के आरोपों को सच होते देर नहीं लगती।

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