शनिवार, 19 मई 2012

पूर्ण होने का अलहदा अहसास

 ब च्चा जब 100 तक गिनती सीख लेता है और बोलने लगता है तो उसकी मां मोहल्ले भर में ठसक से अपने बालक को सबके सामने गिनती सुनवाती है। मेहमानों और मेजबानों के सामने बड़े गर्व से कहती है- 'हमारे छुटकू को तो पूरी गिनती आती है। वह बिना भूले 100 तक गिन लेता है।' 100 का अपना अलग ही मजा है। आपको अपना बचपन याद होगा, एक-एक कर जब आपके पास 100 रुपए जमा हो जाते तो उस दिन कितने सारे प्लान बनाए जाते थे। मन करता था कि एक सौ रुपए में सारी दुनिया खरीद लें। क्रिकेट में ही देखिए, कितना ही अच्छा बल्लेबाज हो लेकिन जब तक वह सौ रन यानी शतक नहीं बना लेता वह दर्शकों को बल्ला उठाकर सलामी नहीं दे पाता। एक चुटकुला है - एक क्रिकेटर का जन्मदिन था। उसकी पत्नी को क्रिकेट के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। वह बहुत ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं थी। पति का जन्मदिन था तो उसे पति को कुछ उपहार देना था। वह बाजार जाती है। बड़े से शोरूम पर पहुंचकर वह इधर-उधर देखती है। कर्मचारी पूछता है कि मैडम आपको क्या चाहिए। तब वह महिला कहती है- मेरे पति का जन्मदिन है। उनके पास शतक नहीं है। इसलिए वे अक्सर उदास होते हैं। मुझे आप एक शतक दे दो ताकि मैं उन्हें खुश कर सकूं। विश्व क्रिकेट के महानतम खिलाड़ी सचिन को ही ले लीजिए 100 शतक बनाने पर उन्हें कितनी खुशी मिली और कितनी तारीफ मिली। भारतीय मनीषियों ने भी मानव जीवन को 100 साल का मानकर चार भागों में बांट दिया था। जो 100 बसंत पूरे करता है उसका समाज में बड़ा सम्मान होता है।
     आप सोच रहे होंगे मैं 100 की महत्ता को लेकर क्यों बैठ गया हूं? तो दोस्तो मेरे ब्लॉग की यह 100वीं पोस्ट है। अब मैं भी महान ब्लॉगर हो गया हूं। सर्वश्रेष्ठ ब्लॉगरों की सूची में शामिल होने की औकात अपनी भी हो गई है। वैसे अनुराग जी का धन्यवाद है कि उन्होंने मेरे ब्लॉग को पहले ही अच्छे ब्लॉग की सूची में शामिल कर रखा है। हालांकि एक ब्लॉगर एेसी ही कोई सूची बना रहे थे। उन्होंने इसकी घोषणा में लिखा था कि जिसके ब्लॉग पर स्वयं के द्वारा लिखी हुई 100 पोस्ट होंगी, उसे ही सर्वश्रेष्ठ ब्लॉग की सूची में शामिल किया जाएगा। खैर, अपुन को किसी सूची में शामिल होने तमन्ना नहीं है। उन सज्जन को मेरा इतना ही कहना है कि महज 100 पोस्ट लिखना ही सर्वश्रेष्ठ होने की निशानी नहीं है। हालांकि उनकी सूची में शामिल होने की और भी शर्तें थी। चलो, अपुन तो अपनी बात करते हैं। हां तो मेरे ब्लॉग अपना पंचू की यह 100वीं पोस्ट है। इन 100 पोस्टों में समसामयिक लेख, व्यंग्य, कविता, कहानी, यात्रा वृत्तांत सब शामिल है। जब जी खुश था तब लिखा, जब क्रोध आया तब लिखा और जब रोमांचित था तब भी लिखा। इनमें से अधिकतर लेख व अन्य सामग्री अंतरजाल से लेकर समाचार-पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। कई लेखों के लिए फोन कॉल आए, ई-मेल आए। कई महानुभावों ने खुले दिल से तारीफ की तो कुछ विरोध में भी रहे। कुछ लोगों ने आर्थिक मदद का प्रस्ताव भी दिया लेकिन पैसे का समाज हित में उपयोग करने के लिए मेरे पास कोई विस्तृत योजना नहीं थी इसलिए सब सुधीजनों को विनम्रता से इनकार कर दिया। समाज से आए पैसे का पूरा उपयोग समाज कल्याण के लिए हो एेसी सोच के साथ कई संस्थाएं समाज में कार्य कर रही हैं, मैंने उन महानुभावों को उनकी मदद का आग्रह जरूर किया।
    टिप्पणी किसी भी पोस्ट की लोकप्रियता की द्योतक नहीं हैं। इस बात को यूं समझा जा सकता है कि मेरे कई लेखों पर जितनी टिप्पणी नहीं आती थी उससे अधिक फोन कॉल आए। उन मौकों पर सर्वाधिक प्रसन्नता हुई जब मुझे मेरे ब्लॉग की वजह से पहचाना गया। एक जगह मेरा भाषण था, वहां कोई मुझे ब्लॉगर के नाते नहीं जानता था। भाषण खत्म होने के बाद औपचारिक बातचीत में एक-दो एेसे लोग सामने आए जिन्होंने कहा- सर, आपका तो ब्लॉग है न, अपना पंचू। हम नियमित आपके ब्लॉग को पढ़ते हैं। हालांकि उन्होंने कभी भी किसी पोस्ट पर टिप्पणी नहीं छोड़ी थी। कभी-कभी प्रोफेशन की व्यवस्तता के चलते नियमितता का क्रम भी टूटा लेकिन मैंने इस बिखरने नहीं दिया। ब्लॉगिंग मेरे जीवन का अहम हिस्सा है। इसलिए तमाम व्यस्तताओं के बीच भी मैंने ब्लॉगिंग के लिए समय निकाला ही। संजय तिवारी (आरम्भ), पंकज मिश्र (उद्भावना), सलिल वर्मा (चला बिहारी ब्लॉगर बनने), अनुराग शर्मा (पिट्सबर्ग में एक भारतीय), पीसी गोदियाल (पीसी गोदियाल का अंधड़), रश्मि प्रभा (मेरी भावनाएं), डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" (उच्चारण), दिनेश गुप्ता "रविकर", संजय जी (मो सम कौन कुटिल खल), सुनील दत्त (जागो हिन्दू जागो), दीर्घतमा, दिगम्बर नासवा (स्वप्न मेरे), गिरिजा कुलश्रेष्ठ (ये मेरा जहाँ), शिखा वार्ष्णेय (स्पंदन), संगीता स्वरूप (बिखरे मोती), रविशंकर (छींटें और बौछारें), केवल राम (चलते-चलते), महेंद्र वर्मा (शाश्वत शिल्प), डॉ. दिव्या (zeal), राहुल सिंह (सिंहावलोकन), धीरेन्द्र धीर (फुहार), जीत भार्गव (सेकुलर- ड्रामा), राकेश सिंह (सृजन), संजय भास्कर (आदत...मुस्कुराने की), कविता रावत, डॉ. वर्षा सिंह, वीना (वीणा के सुर), सुलभ जैसवाल ('सतरंगी यादों के इंद्रजाल), ज्ञानचंद मर्मज्ञ (मर्मज्ञ: "शब्द साधक मंच"), आशुतोष (आशुतोष की कलम), दिवस दिनेश गौर (भारत स्वाभिमान दिवस), एसएन शुक्ला (मेरी कवितायेँ), चर्चामंच (रविकर फैजाबादी), डॉ. जेन्नी शबनम (लम्हों का सफ़र), पंकज त्रिवेदी (नव्या), डॉ॰ मोनिका शर्मा (परवाज़...शब्दों के पंख), कौशलेन्द्र और सुमित प्रताप सिंह, आप सभी मित्रों का शुक्रिया जो समय-समय पर मुझे हौसला दिया सच लिखने का, सच का साथ देने का। जिन साथियों के नाम का उल्लेख में यहाँ नहीं कर सका उनसे माफ़ी चाहूँगा... उनका भी तहेदिल से शुक्रिया... ब्लॉग जगत में आगे भी सबका साथ मिलता रहेगा ऐसी उम्मीद है।
      मेरे दोस्तो आप खुश तो बहुत होंगे कि आपका लोकेन्द्र शतकवीर हो गया है। वैसे मेरे पास आपके लिए इससे भी बड़ी खुशखबरी है। मैं एक खूबसूरत से बालक का पिता बन गया हूं, मैं पूर्ण हो गया हूं। कहते हैं स्त्री मां बनने पर पूर्ण होती है लेकिन मेरा मानना है कि यही बात पुरुष पर भी लागू होती है। वह भी पिता बनने पर पूर्ण होता है। जब मैंने पहली बार अपने बालक को हथेली पर छुआ तो एक अलहदा अहसास हुआ। उस अहसास को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। दोस्तो मैं तो पिता बन गया, आप लोग अपना-अपना हिसाब-किताब लगा लो कौन क्या बन गया। हां, घर आआे तो कुछ मीठा लेते आना, दोहरी खुशी जो दी है आपको।

शुक्रवार, 11 मई 2012

तुष्टीकरण पर सुप्रीम कोर्ट की चोट

 ल गता है कांग्रेस पर शनि की साढ़े साती चल रही है। कहा जाता है कि शनि न्याय का देवता है। वह सच्चा न्याय करता है। दोषी को सजा, निर्दोष को मजा। साढ़े साती शनि के दरबार में सुनवाई और फैसले का समय है। जब से कांग्रेसनीत यूपीए सरकार सत्ता में लौटी है तभी से उसका मामला शनि दरबार में है। कभी सुब्रह्मण्यम स्वामी कांग्रेस को न्यायालय खसीट कर ले जाते हैं तो कभी कोर्ट ही (कु)नीतियों को लेकर कांग्रेस की रगड़ा-पट्टी कर देता है। बाबा और अन्ना के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन भी कांग्रेस को चैन नहीं लेने दे रहे।
    खैर, धीरे-धीरे कांग्रेस की तमाम (कु)नीतियां जनता के सामने आ रही हैं। इन्हें उजागर करने में सुप्रीम कोर्ट ने अहम भूमिका अदा की है। हज सब्सिडी पर भी सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए हैं। जस्टिस आफताब आलम और रंजना प्रकाश देसाई की बेंच ने हज सब्सिडी को दस साल में खत्म करने के आदेश जारी किए हैं। वहीं, बेंच ने हज यात्रा पर जाने वाले प्रधानमंत्री के भारी-भरकम शिष्टमंडल पर भी नाराजगी जताई है। दरअसल, हज यात्रा पर जाने वाले प्रधानमंत्री के शिष्टमंडल में ३० प्रतिनिधि शामिल हैं। बेंच ने शिष्टमंडल में प्रतिनिधियों की संख्या दो तक सीमित करने के आदेश दिए हैं। सोचने वाली बात है कि भारत को छोडक़र दुनिया में कहीं भी हज सब्सिडी नहीं दी जाती है। इस्लामिक देशों में भी नहीं। पाकिस्तान में भी सुप्रीम कोर्ट ने हज सब्सिडी को गैर-इस्लामिक करार देकर बंद करा दिया है। जबकि भारत में हज यात्रा पर सब्सिडी के नाम पर हर साल करीब ६०० करोड़ रुपए खर्च किए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अगर सरकार वाकई अल्पसंख्यकों का भला चाहती है तो उसे इस पैसा का इस्तेमाल शिक्षा व्यवस्था और अन्य जरूरी कार्यों में करना चाहिए। केन्द्र सरकार ने हज यात्रा सब्सिडी के बचाव में हलफनामा दायर किया है।
    सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को कांग्रेस की तुष्टीकरण नीतियों पर चोट के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से कांग्रेस वोट बैंक की राजनीति के लिए तुष्टीकरण का सहारा ले रही है। विपक्षी पार्टियां खासकर भारतीय जनता पार्टी समय-समय पर कांग्रेस के इस रवैए पर विरोध जाहिर करती रही है। अन्य सामाजिक संगठन भी हज सब्सिडी पर सवाल खड़े करते रहे हैं। यही नहीं, कई मुस्लिम संगठन भी हज सब्सिडी को गलत मानते हैं, वे इसे गैर-इस्लामिक परंपरा मानते हैं, कुरान और शरियत के खिलाफ मानते हैं। लेकिन, कांग्रेस को न तो परंपरा से मतलब है, न ही हज सब्सिडी के नाम पर हिन्दू-मुस्लिम के बीच बढ़ रही दरार की। कांग्रेस को तो सिर्फ चिंता है एक मुश्त वोट बैंक की, जो उसे अल्पसंख्यकों को भ्रमित करके मिल जाता है। समय-समय पर सवाल खड़े होते हैं कि एक ही वर्ग को इस तरह की सहूलियत क्यों? क्या दूसरे वर्ग के लोग तीर्थ यात्रा पर भारत के बाहर नहीं जाते हैं? क्या उन्हें सरकारी मदद की जरूरत नहीं? क्या उस वर्ग में सभी लोग सम्पन्न हैं और अपना खर्चा उठा सकते हैं? लेकिन, इन सवालों के जवाब कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने कभी नहीं दिए, हमेशा टालमटोल कर जाते हैं। इस देश के निवासियों का एक तीर्थ मक्का-मदीना ही देश के बाहर नहीं है। ननकाना साहेब है, मानसरोवर है और माता हिंगलाज भी है। लेकिन, यहां जाने वालों को कभी किसी प्रकार की सहूलियत नहीं दी जाती। कारण है, ये तीर्थ बहुसंख्यक वर्ग के हैं और बहुसंख्यकों के वोट एक मुश्त, एक पार्टी को नहीं मिलते। हज सब्सिडी का बचाव और उसे बढ़ावा देने वाली कांग्रेस ने आज तक हिन्दू समाज को उसके तीर्थ स्थलों पर जाने के लिए कोई मदद नहीं दी। कभी कैलाश मानसरोवर (तिब्बत) की यात्रा को सुगम बनाने पहल नहीं की। ननकाना साहेब (पाकिस्तान) जाने वाले श्रद्धालुओं को कोई छूट नहीं। शादानी दरबार की पाकिस्तानी यात्रा पर कोई रियायत नहीं। माता हिंगलाज के दर्शन के लिए बलूचिस्तान जाने वाले हिन्दुओं को भारत सरकार ने आज तक अनुदान में फूटी कौड़ी तक नहीं दी। इस तरह की दोहरी नीतियों से कांग्रेस का चरित्र उजागर होता है। भले ही सांप्रदायिक पार्टी का तमगा भाजपा की छाती पर ठोक दिया गया है लेकिन वस्तुस्थिति कुछ और ही है। ईमानदारी से चीजों को देखा जाए तो कांग्रेस से बड़ी सांप्रदायिक पार्टी कोई और हो ही नहीं सकती। हाल ही में संपन्न हुए उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनाव में भी यह साफ हुआ कि मुसलमानों के वोट बटोरने के लिए कांग्रेसी नेता किस हद तक गिर सकते हैं। तुष्टीकरण की परिपाटी कांग्रेस में बहुत पुरानी है। कांग्रेस की तुष्टिकरण की नीति जो जाहिर करते कुछ और उदाहरण...
  • कांग्रेस के मंत्री एसएम कृष्णा ने पिछले साल तुगलकी फरमान जारी किया। हज यात्रा पर जाने वाले यात्रियों के पासपोर्ट बिना किसी पुलिस वेरिफिकेशन के शीघ्रता से जारी किए जाएं।
  • सेना में भेद बढ़ाने के लिए डॉ. राजिन्दर सच्चर कमेटी द्वारा सेना से जानकारी मांगना कि सेना में कितने मुस्लिम जवान और अफसर हैं।
  • आतंकवादी अब्दुल मदानी की रिहाई के लिए केरल की विधानसभा में प्रस्ताव पारित करना।
  • डेनमार्क में मोहम्मद पैगम्बर के मामले में केन्द्र सरकार की ओर से चिंता व्यक्त करना वहीं भगवान राम को झुठलाने के लिए कोर्ट में हलफनामा पेश करना। रामसेतु को तोडऩे की योजना।
  • प्रधानमंत्री का सांप्रदायिक बयान- देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है।
  • संसद पर हमले के दोषी की फाइल को दबाकर रखना। उसके फांसी से बचाने का प्रयास।
  • कश्मीर के पत्थरबाजों के लिए १०० करोड़ का राहत पैकेज जारी करना वहीं कश्मीर से बेदखल पंडि़तों के लिए दो आंसू भी नहीं।
  • विकीलीक्स का खुलासा - राहुल-सोनिया का यह कहना कि देश को खतरा बहुसंख्यक समाज से है, अल्पसंख्यकों से नहीं।
  • कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं द्वारा विश्व के सबसे बड़े आतंकी की मौत पर अफसोस जाहिर करना।
  • सांप्रदायिक घटनाओं में बहुसंख्यकों के माथे दोष मढऩे के लिए - सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निरोधक अधिनियम-२०११ तैयार करना।

रविवार, 6 मई 2012

संस्थागत हुआ मीडिया में भ्रष्टाचार

 मी  डिया में भ्रष्टाचार अब व्यक्तिगत भ्रष्टाचार नहीं रह गया है यह संस्थागत हो गया है। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठकुरता यह बात अक्सर उठाते हैं। वैसे उनका आकलन वर्तमान परिप्रेक्ष्य में तकरीबन सच है। वे यूं ही इस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं। इसके पीछे उनका शोध है। २००९ के लोकसभा चुनावों और कुछ राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में यह बात खुलकर सामने आ गई थी कि किस तरह उम्मीदवार या पार्टी को मीडिया के मार्फत मतदाताओं को बेचा जा रहा है। इस दौरान पेड न्यूज या पैकेज पत्रकारिता की शक्ल में बड़े पैमाने पर मीडिया में भ्रष्टाचार का मामला सामने आया। २००९ के चुनावों में हालात यह हो गए थे कि कई प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों के प्रतिनिधि उम्मीदवारों और पार्टियों के पास कवरेज का रेट कार्ड तक लेकर पहुंचे और खबरों का सौदा किया। मीडिया में भ्रष्टाचार को लेकर लम्बे समय से चली आ रही छुटपुट बहस ने इसी दौरान आग पकड़ी। सबदूर पेड न्यूज की चर्चा और भत्र्सना होने लगी। लोग पत्रकारों और पत्रकारिता को संदिग्ध निगाह से देखने लगे। खबरों की विश्वसनीयत पर सवाल उठने लगे। पत्रकार और लेखक अपने-अपने स्तर पर मीडिया में पेड न्यूज और अन्य प्रकार के भ्रष्टाचार का विरोध करने लगे तो कई अपने को पाक-साफ साबित करने में जुट गए। इस हाल में प्रेस परिषद से अपेक्षा की गई की वह कुछ करे। लेकिन, प्रेस परिषद तो वैसे ही नख-दंतहीन संस्था है। फिर भी उससे जो बन सकता था उसने प्रयास करने शुरू कर दिए। पेड न्यूज को परिभाषित करते हुए पे्रस परिषद ने कहा कि 'कोई भी समाचार या विश्लेषण अगर पैसे या किसी और तरफदारी के बदले किसी भी मीडिया में जगह पाता है तो उसे पेड न्यूज की श्रेणी में माना जाएगा।' इसके साथ ही प्रेस परिषद ने स्वप्रेरणा से जांच के लिए एक समिति गठित की थी। वरिष्ठ पत्रकार परंजॉय गुहा ठकुरता को इस समिति में शामिल किया गया। उनके साथ वरिष्ठ पत्रकार के. श्रीनिवास रेड्डी को भी समिति में रखा गया। कड़ी मेहनत के बाद समिति ने पेड न्यूज से संबंधित ७१ पृष्ठ की एक रिपोर्ट तैयार की थी। 'हाउ करप्शन इन द इंडियन मीडिया अंडरमाइंस डेमोक्रेसी' नाम से जैसे ही यह रिपोर्ट तैयार हुई, पे्रस परिषद में बैठे मीडिया घरानों के प्रतिनिधियों में खलबली मच गई। उन्होंने इस रिपोर्ट को बाहर न आने देने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया। आखिरकार वे अपनी करतूत में सफल हुए। ७१ पृष्ठों की रिपोर्ट दबा दी गई। उसके बदले में ३० जुलाई को प्रेस परिषद ने सरकार को १२ पृष्ठों की एक संक्षिप्त रिपोर्ट सौंपी। इस संक्षिप्त रिपोर्ट में पेड न्यूज छापने वाले मीडिया घरानों के नाम नहीं दिए गए। इतना ही नहीं इस रिपोर्ट को भी परिषद ने अपनी वेबसाइट पर नहीं डाला। परंजॉय गुहा कहते हैं कि रिपोर्ट के सामने आने से कई दिग्गज मीडिया संस्थानों का काला-पीला सच सामने आ जाता। दुनिया को पता चल जाता कि उन्होंने कैसे और कब-कब पैसे लेकर खबरें बेचीं और खबरें दबाईं।
    मीडिया में बढ़ते कदाचार, भ्रष्टाचार और पेड न्यूज की बीमारी पर दिवंगत वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने भी खूब लिखा और कई मंचों से विरोध किया। प्रभाष जोशी १० मई २००९ को जनसत्ता के अपने कॉलम 'कागद कारे' में एक लेख लिखा। जिसके अंश हैं-
    'डायरी पढऩे के बाद इस दोस्त से मैंने कवरेज का तरीका पूछा। तो वह बताता है कि सबेरे सब हमारे दफ्तर आते हैं। उनके लिए नाश्ता, पीने का पानी और गाड़ी तैयार की जाती है। भोजन का पैसा नकद दिया जाता था। तय रेट के हिसाब से रोज का खर्चा-पानी अलग। चैनल वालों में छठे वेतन आयोग का वेतन पाने वाले दूरदर्शन के लोग भी होते थे। हमारी गाडिय़ों से निकलने से पहले वे दूसरे उम्मीदवारों से भी प्रबंध करते थे। किसी से पेट्रोल के पैसे लेते तो किसी से गाड़ी के। एक पत्रकार तो पैकेज का पैसा लेने के लिए रात दो बजे तक दरवाजे के बाहर बैठा रहा।'
उक्त विवरण से पता चलता है कि मीडिया में भ्रष्टाचार किस सीमा तक पहुंच चुका है। पत्रकार भोजन और पेट्रोल तक का पैसा ले रहे हैं। ऐसे में चिंता होना लाजमी है। प्रथम प्रवक्ता पत्रिका (१६ जुलाई २००९) में भी कई नेताओं ने अपने इंटरव्यू में पत्रकार और मीडिया घरानों पर खबरों के लिए पैसा लेने के आरोप लगाए। प्रथम प्रवक्ता में पूर्व नागरिक उड्डयन मंत्री हरमोहन धवन के हवाले से छपा है कि मैं २००९ का चुनाव बसपा के टिकट पर चंडीगढ़ से लड़ रहा था। प्रिंट मीडिया के एक प्रतिनिधि ने कवरेज के लिए मुझसे पैसे की मांग की। उसने कहा कि यदि आप हमसे डील करते हैं तो हम अपके समर्थन में अपने अखबार में खबरें छापेंगे। इसी अंक में आजमगढ़ से लोकसभा का चुनाव जीते भाजपा के रमाकांत यादव ने बताया कि एक अखबार ने कवरेज के लिए मुझसे १० लाख रुपए की मांग की। पैसे नहीं देने पर इस अखबार में मेरे खिलाफ एक लेख प्रकाशित हुआ, जिसमें मेरे हारने का दावा किया गया था। आजमगढ़ से ही कांग्रेस के उम्मीदवार डॉ. संतोष सिंह ने बताया कि एक अखबार ने मुझसे दस लाख और पांच लाख रुपए के दो पैकेज में से एक खरीदने को कहा। प्रथम प्रवक्ता पत्रिका को उप्र के घोसी लोकसभा क्षेत्र के उम्मीदवार अरशद जमाल ने कहा कि अखबारों ने मुझसे पैसे मांगे। यहीं से भाजपा के राम इकबाल सिंह ने भी खबरों के लिए पैसे मांगे जाने की बात कही।
    भारतीय मीडिया में पेड न्यूज से उपजे भ्रष्टाचार की चर्चा अंतरराष्ट्रीय समाचार पत्र 'वॉल स्ट्रीट जर्नल' में भी हुई। वॉल स्ट्रीट जर्नल ने पेड न्यूज को मुख्य रूप से भारतीय भाषाओं के मीडिया की समस्या के तौर पर पेश किया। मीडिया साइट 'द हूट' ने भी 'साउंड ऑफ मनी' शीर्षक से संपादकीय लिखकर इस मसले पर चिंता जाहिर की। लेकिन, मेरा मानना है कि पेड न्यूज और भ्रष्टाचार की बीमारी सिर्फ भारतीय भाषाओं के मीडिया संगठनों में ही नहीं है। अंगे्रजी मीडिया में भी यह उतनी ही गहरी है। बल्कि पेड न्यूज के खेल में बड़े खिलाड़ी अंग्रेजी के अखबार और टीवी चैनल्स ही हैं। हालांकि अंग्रजी मीडिया पेड न्यूज और मीडिया में करप्शन को लेकर हो रही बहस-आलोचना के दायरे से इस समय लगभग बाहर है। जबकि न्यूज स्पेस बेचने की शुरुआत अंग्रेजी प्रकाशनों से ही हुई है। न्यूज बेचने का काम संस्थाबद्ध तरीके से सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया ने किया। आज भी अंग्रेजी मीडिया संस्थान इस खेल में जमे और मंजे हुए बड़े खिलाड़ी हैं। ठीक राजनीति की तरह। राजनीति में जो पकड़ा जाए वो भ्रष्टाचारी बाकि सब पाक-साफ। जबकि कई वहां भी पुराने और जमे-जमाए खिलाड़ी हैं।
    भारत में पत्रकारिता कोई नई विधा नहीं है। यह तो प्राचीन काल से अलग-अलग रूपों में हर समय भारत में मौजूद रही है। ब्रिटिश शासन से संघर्ष से के दौर में यह एक मिशन रही। उसके बाद भी कुछ समय तक मिशन और समाजसेवा दोनों दायित्वों को भारतीय पत्रकारिता ने बखूबी निभाया। दरअसल मीडिया में भ्रष्टाचार का घुन लगा मीडिया हाउसों के विकसित होने के बाद। पत्रकारिता से मीडिया बनने के साथ। मिशन से व्यवसाय बनने के साथ। मीडिया में भी अर्थ का खेल बढऩे के बाद भ्रष्टाचार ने यहां अपनी जड़े रोपीं। भारत में आज ६० हजार से अधिक अखबार। १०० से अधिक खबरों के चैनल। ६०० से अधिक टीवी चैनल हैं। यह परिवर्तन बहुत कम समय में हुआ है। इतने कम समय में दुनिया के किसी भी देश की संचार माध्यमों में परिवर्तन नहीं आया है। १९९१ में भारत में मात्र एक टेलीविजन ब्रॉडकॉस्टर था दूरदर्शन। आज ६०० से अधिक ब्रॉडकॉस्टर हैं। इससे पत्रकारिता में व्यवसाय बढ़ा है, पूंजी बढ़ी है और प्रतिस्पर्धा भी। मीडिया संस्थानों की ताकत बढ़ती जा रही है। पत्रकारों की ताकत घटती जा रही है। मीडिया में अर्थव्यवस्था के खेल ने पत्रकारिता को मिशन मानने वाले खांटी पत्रकारों को पीछे छोड़ दिया है। ऐसे लोग ताकत के साथ आगे आ गए हैं जो संस्था और मालिकों के लिए लॉबिंग कर सकें। नीरा राडिया काण्ड से यह उजागर हो चुका है। इस काण्ड से जाहिर हुआ कि जो मीडियाकर्मी आम समाज और युवा पत्रकारों के हीरो थे वे भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं। बरखा दत्त, वीर सांघवी और प्रभु चावला सरीखे नाम भ्रष्टाचार में लिप्त मिले। ऐसे लोगों को पत्रकारिता के स्थापित मूल्यों से कोई लेने देने नहीं होता। इनका काम होता है स्वयं का और मालिकों का हित साधना।
    ऐसा भी नहीं है मीडिया में भ्रष्टचारा आज की देन है। यह पहले भी था। पाठक और दर्शक भले ही न जाने, लेकिन सरकार, राजनीतिक दल, एनजीओ और कॉरपोरेट सेक्टर से लेकर स्पोट्र्स और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री तक सब जानते हैं कि मीडिया को मैनेज करने की जरूरत पड़ती है, मीडिया को मैनेज किया जा सकता है और मीडिया को मैनेज किया जा रहा है। समाचार पत्र-पत्रिकाओं और न्यूज चैनल्स पर अचानक कुछ विशेष खबरों का आना और गायब हो जाना इसी ओर इशारा करता है। आठ-दस हजार वेतन पाने वाले पत्रकार कैसे चारपहिया वाहन मेंनटेन करते हैं। महंगी शराब-महंगे कपड़े व अन्य गैजेट्स कहां से आते हैं इस महंगाई के दौर में। ऐसे ही अनेक प्रश्न मीडिया में भ्रष्टाचार की ओर इंगित करते हैं। अब तक और आज भी निजी स्तर पर भी मीडियाकर्मियों में भारी भ्रष्टाचार मौजूद है। खबर छापने के पैसे, खबर नहीं छापने के पैसे, फोटो छापने के पैसे, नहीं छापने के पैसे। इतना ही नहीं कार्यक्रमों में शामिल लोगों के नाम तक छापने के पैसे मीडियाकर्मी वसूल लेते हैं। हालांकि पेड न्यूज और पैकेज के चलन से परिदृश्य में थोड़ा बदलाव आया है। खबरों और खबरों के पैकेज के क्रय-विक्रय में अब मीडिया संस्थान खुद ही उतर आए हैं। इसमें पत्रकारों की भूमिका सेल्समैन या बिचौलिए वाली ही बनकर रह गई है। खबर बेचने के धंधे की कमान अब प्रबंधन के हाथ में है। यही बात ज्यादा परेशान करने वाली है। व्यक्तिगत भ्रष्टाचार के उतने नुकसान नहीं है जितने संस्थागत भ्रष्टचारा से हैं।
त्रैमासिक पत्रिका मीडिया क्रिटिक में प्रकाशित आलेख.
    पत्रकारिता में बढ़ते भ्रष्टाचार ने लोगों के मन में खबरों को लेकर संशय और भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। आज का पाठक सोच में रहता है कि किस खबर को सच माने और किस खबर को प्रायोजित। खबर के सभी पहलुओं को ठीक से समझने के फेर में कई बार उसे तीन-चार अखबारों का सहारा लेना पड़ता है। दरअसल, बेहतर लोकतंत्र के लिए कथित चौथे खंबे (मीडिया) का ईमानदार होना अतिआवश्यक है। कम से कम मीडिया से संस्थागत भ्रष्टचार से निजात पाना बेहद जरूरी है। मीडिया और राजनीतिक गठजोड़ से उपजे भ्रष्टाचार में एक स्वस्थ्य लोकतंत्र सांस नहीं ले सकता। भारत में पत्रकारिता को पवित्र दृष्टि से देखा जाता है। भारतीय जनमानस की बड़ी उम्मीद रहती है पत्रकारिता से। जब वह सबदूर से निराश होता है तो न्याय और अपनी बात कहने का निष्पक्ष माध्यम उसे यही दीखता है। इसलिए एक ईमानदार कोशिश हो कि मीडिया संगठन पेड न्यूज और अन्य प्रकार के भ्रष्टाचार से दूर रहें।

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