शनिवार, 28 अप्रैल 2012

देश के बाहर पहुंची संस्कृत की सुगंध


 भा  रत में उसकी मूल और सबसे पुरानी भाषा संस्कृत तुच्छ राजनीति की भेंट चढ़ गई। भाषाई राजनीति के घटिया खेल ने उसे अभिजात्य वर्ग की भाषा करार देकर सामान्य वर्ग को उससे दूर कर दिया। अंग्रेजी की महिमा गाकर संस्कृत की उपयोगिता पर सवाल खड़े कर दिए। सरल, सरस और समृद्ध संस्कृत को कठिन भाषा बताकर उसके अध्ययन को कर्मकाण्डी ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया। सुनियोजित षड्यंत्र के तहत संस्कृत को स्कूली अध्ययन से बाहर कर दिया। लेकिन सूरज पर कितना भी मैला फेंका जाए वह गंदला नहीं होता। एक ओर जब संस्कृत के खिलाफ षड्यंत्र रचे जा रहे हैं दूसरी ओर उसे लोकप्रिय बनाने के लिए 'संस्कृत भारती' जी-जान से जुटी है। संस्था के प्रयासों से भारत की संस्कृति की आधार भाषा संस्कृत की चमक देश की भौगोलिक सीमाओं से भी बाहर पहुंच गई।
     शिक्षा के व्यवसायीकरण के बाद से भारत में जहां अंग्रेजी का वर्चस्व बढ़ रहा है, वहीं विदेश में संस्कृत का झंडा बुलंद हो रहा है। देश-विदेश में समय-समय पर हुए तमाम शोधों ने भी स्पष्ट किया कि संस्कृत वैज्ञानिक सम्मत भाषा है। रिसर्च के बाद सिद्ध हुआ है कि कम्प्यूटर के लिए सबसे उपयुक्त भाषा भी संस्कृत ही है। विश्व की प्रतिष्ठित वैज्ञानिक संस्था नासा भी लंबे समय से संस्कृत को लेकर रिसर्च कर रही है। दुनिया के कई देशों में संस्कृत का अध्ययन कराया जा रहा है। इसके अलावा कई विदेशी संस्कृत सीखने के लिए भारत का रुख कर रहे हैं। इन्हीं में से एक हैं पोलैंड की अन्ना रुचींस्की, जिनका पूरा परिवार ही अब संस्कृतमय हो गया है। रुचींस्की के परिवार में आपस में बातचीत भी संस्कृत में की जाती है। संस्कृत में रुचींस्की की रुचि २० साल पहले जगी थी। अन्ना रुचींस्की अपने पति तामष रुचींस्की के साथ घूमने के लिए भारत आईं थीं। वे बनारस के घाट पहुंचीं। यहां गूंज रहे वेदमंत्रों से प्रभावित होकर वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय और संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय पहुंचीं। विश्वविद्यालय में रुचींस्की ने संस्कृत भाषा और भारत की संस्कृति को पहली बार करीब से जाना। अंतत: देवभाषा से प्रेरित होकर अन्ना ने संस्कृत विश्वविद्यालय से डॉ. पुरुषोत्तम प्रसाद पाठक के निर्देशन में वर्ष २००६ में पीएचडी किया। इसके पूर्व वे पोलैंड में भारतीय विज्ञान से एमए कर चुकी थीं। इसी बीच उनके सबसे छोटे पुत्र स्कर्बीमीर रुचींस्की (योगानंद शास्त्री) के मन में भी संस्कृत के प्रति अलख जगी और वह वाराणसी आ गए। उन्होंने संस्कृत विश्वविद्यालय से विदेशी छात्रों के लिए चलाए जा रहे संस्कृत के प्रमाणपत्रीय पाठ्यक्रम में वर्ष १९९९ में दाखिला लिया और द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। २००४ में शास्त्री (स्नातक) और २००६ में आचार्य (स्नातकोत्तर) की परीक्षा उत्तीर्ण की। इसके बाद योगानंद ने वर्ष २०१० में योगतंत्रागम विभाग में उपाचार्य डॉ. शीतला प्रसाद उपाध्याय के निर्देशन में उन्होंने 'मंत्रदेव प्रकाशिका तंत्र ग्रंथस्य समालोचनात्मक' विषय पर पीएचडी के लिए पंजीयन कराया। उनकी शोध साधना अभी जारी है। उन्होंने बताया कि उनके पिता ने पोलैंड में ही भारतीय दर्शन पर पीएचडी की है। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं जो संस्कृत के प्रति विदेशियों के मन में जगे प्रेम को प्रकट करते हैं। 
      'संस्कृत भारती' ने संस्कृत को बोलचाल की भाषा बनाने का अभियान २५ साल पहले शुरू किया था। संस्था की ओर से देश-विदेश में संस्कृत सिखाने के लिए दस-दस दिन के शिविरों से लेकर कुछ सर्टीफेकेट कोर्स भी कराए जाते हैं। संस्था के प्रयासों की बदौलत देश में कई क्षेत्र संस्कृतमय हो गए हैं। कर्नाटक में २०० परिवारों का गांव मत्तूर वैदिक काल का गांव लगता है। यहां घरों की दीवारों पर संस्कृत में मंत्र लिखे हैं। सुबह-शाम मत्तूर मंत्रोच्चार से गूंजता है। यहां सब आपस में संस्कृत में ही बातचीत करते हैं। वर्तमान पीढ़ी से आगामी पीढ़ी की ओर संस्कृत ज्ञान की गंगा बहती रहे, इसकी व्यवस्था भी है। मत्तूर में गुरुकुल परंपरा का पालन भी किया जा रहा है। भारतीय विद्या भवन के पूर्व अध्यक्ष स्वर्गीय पद्यश्री डॉ. मत्तूर कृष्णमूर्ति का संबंध इसी गांव से है। मत्तूर का लगभग हर व्यक्ति संस्कृत का प्रकांड विद्वान है। इतना ही नहीं इनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली है। इनमें से कई विद्वान तो हिन्दू संस्कृति के प्रचार-प्रसार में भी लगे हुए हैं। मध्यप्रदेश में झिरी गांव भी मत्तूर की तरह संस्कृतनिष्ठ गांव है। संस्कृत भारती के अथक प्रयासों से यहां भी बच्चों से लेकर बड़े-बूढ़े संस्कृत की अच्छी समझ रखते हैं। यहां आप पहुंचेंगे तो संस्कृत अभिभावन से ही आपका स्वागत होगा। खास बात यह है कि यहां इससे पहले संस्कृत का कोई माहौल नहीं था। यहां पहुंचने पर प्रतीत होता है कि यह कोई रामायण काल का गांव है। संभवत: ये लोग दुनिया की नजर से बचे रह गए होंगे। लेकिन, यह सच नहीं। सब आधुनिक सुविधाओं के बीच भी गांव में संस्कृत का प्रचलन है। उन्हें अपनी भाषा पर गर्व है।     
    संस्कृत विश्व की ज्ञात भाषाओं में सबसे पुरानी भाषा है। लैटिन और ग्रीक सहित अन्य भाषाओं की तरह समय के साथ इसकी मृत्यु नहीं हुई। कारण भारत का वैभव तो संस्कृत में ही रचा बसा है। भारत की अन्य भाषाओं हिन्दी, मराठी, सिन्धी, पंजाबी, बंगला, उडिय़ा आदि का जन्म संस्कृत की कोख से ही हुआ है। हिन्दू धर्म के लगभग सभी ग्रंथ संस्कृत में ही लिखे गए हैं। बौद्ध व जैन संप्रदाय के प्राचीन धार्मिक ग्रन्थ संस्कृत में ही हैं। हिन्दुओं, बौद्धों और जैनियों के नाम भी संस्कृत भाषा पर आधारित होते हैं। अब तो संस्कृत नाम रखने का फैशन भी चल पड़ा है। प्राचीनकाल से अब तक भारत में यज्ञ और देव पूजा संस्कृत भाषा में ही होते हैं। यही कारण रहा कि तमाम षड्यंत्रों के बाद भी संस्कृत को भारत से दूर नहीं किया जा सका। यह दैनिक जीवन में नित्य उपयोग होती रही, भले ही कुछ समय के लिए पूजा-पाठ तक सिमटकर रह गई थी। लेकिन, समय के साथ अब फिर इसकी स्वीकार्यता बढ़ रही है। आज भी पूरे भारत में संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन से भारतीय एकता को सुदृढ़ किया जा सकता है। इसके लिए क्षेत्रीयता और वोट बैंक की कुटिल राजनीति छोडक़र आगे आना होगा। सार्थक प्रयासों से संस्कृत को फिर से जन-जन की भाषा बनाया जा सकता है।

शुक्रवार, 13 अप्रैल 2012

मार्क्स-लेनिन जाएं भाड़ में


 भा रत से वामपंथ को विदा करने की सही राह पश्चिम बंगाल की तेजतर्रार मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने पकड़ी है। ममता ने लम्बे संघर्ष के दौरान पश्चिम बंगाल की जनता को वामपंथ का कलुषित चेहरा दिखाया और उसे पश्चिम बंगाल की सत्ता से बेदखल किया। ममता बनर्जी को साधुवाद है इतिहास की पुस्तकों में से मार्क्स और लेनिन के अध्याय हटाने के लिए। शुक्र की बात यह है कि ममता भारतीय जनता पार्टी की नेता नहीं हैं। वरना हमारे तमाम बुद्धिजीवि और सेक्युलर जमात 'शिक्षा का भगवाकरण-भगवाकरण' चिल्लाने लगते। आखिर हम गांधी, सुभाष, दीनदयाल, अरविन्द, विवेकानन्द, लोहिया और अन्य भारतीय महापुरुषों, चिंतकों और राजनीतिज्ञों की कीमत पर मार्क्स और लेनिन को क्यों पढ़े? हम अपने ही महापुरुषों के बारे में अपने नौनिहालों को नहीं बता पा रहे हैं ऐसे में मार्क्स और लेनिन के पाठ उन पर थोपने का तुक समझ नहीं आता। अगर किसी को मार्क्स और लेनिन को पढऩा ही है तो स्वतंत्र रूप से पढ़े, उन्हें पाठ्यक्रमों में क्यों घुसेड़ा जाए। जबकि वामपंथियों ने यही किया। उन्हें पता है कि शिक्षा व्यवस्था के माध्यम से अपनी विचारधारा को किस तरह विस्तार दिया जा सकता है। 
       वामपंथियों का मार्क्स, लेनिन और अन्य कम्युनिस्ट नेताओं के प्रति कितना दुराग्रह है इसकी झलक सन् २०११ में त्रिपुरा राज्य में देखने को मिली। यहां की कम्युनिस्ट सरकार ने कक्षा पांच के सिलेबस से सत्य-अंहिसा के पुजारी महात्मा गांधी की जगह घोर कम्युनिस्ट, फासीवादी, जनता पर जबरन कानून लादने वाले लेनिन (ब्लाडिमिर इल्या उल्वानोव) को शामिल किया है। भारतीय संदर्भ में जहां-जहां वामपंथी ताकत में रहे शिक्षा का सत्यानाश होता रहा। शिक्षा व्यवस्था में सेंध लगाकर ये भारतीयों के मानस पर कब्जा करने का षड्यंत्र रचते रहे हैं। केरल के कई उच्च शिक्षित नागरिकों को विश्व शांति का मंत्र देने वाले महात्मा गांधी और अयांकलि के समाज सुधारक श्रीनारायण गुरु सहित अन्य स्वदेशी विचारकों के संदर्भ में उचित जानकारी नहीं होगी। क्योंकि केरल की कम्युनिस्ट पार्टी ने वहां स्कूल-कॉलेज के पाठ्यक्रमों में इन्हें स्थान ही नहीं दिया। बल्कि उन्होंने मार्क्सवादी संघर्ष के इतिहास से किताबों के पन्ने काले कर दिए। केरल के ही महात्मा गांधी विश्वविद्यालय के एमए राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम में भारतीय राजनीतिक विचारधारा में गांधीजी, वीर सावरकर और श्री अरविन्दों को हटाया गया, इनकी जगह मार्क्सवादी नेताओं को रखा गया। पत्रकार और सांसद अरुण शौरी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'एमिनेण्ट हिस्टोरियन्स' में 'शुद्धो-औशुद्धो' के संदर्भ में पश्चिम बंगाल के अध्यादेश का उदाहरण दिया है। यह अध्यादेश १९८९ को हायर सेकण्डरी स्कूलों को जारी किया गया था। इसमें इतिहास की पाठ्य पुस्तकों के लेखकों और प्रकाशकों कहा गया था कि उनके द्वारा प्रकाशित पुस्तक औशुद्ध (गलतियां) हो तो वे आगामी संस्करण में उन्हें ठीक कर लें। एक लम्बी सूची भी दी गई जिसमें बताया गया कि क्या-क्या गलत है और उसमें क्या संसोधन करना है। इस तरह पश्चिम बंगाल ने कम्युनिस्टों ने भारत के इतिहास में मनमाफिक फेरबदल किया। पश्चिम बंगाल में लम्बे समय तक कम्युनिस्ट सरकार रही। इस दौरान उन्होंने जबर्दस्त तरीके से शिक्षा व्यवस्था में घुसपैठ की। इसके चलते पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा, केरल के प्राथमिक विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों तक के अधिकांश शिक्षक, शिक्षक न होकर माकपा के सक्रिय कार्यकर्ता अधिक रहे हैं। वामपंथियों की मंशानुरूप ये शिक्षक इतिहास, भूगोल, साहित्य सहित अन्य विषयों को तोड़-मड़ोरकर प्रस्तुत करते रहे हैं। वामपंथियों ने अपनी थोथी राजनीति की दुकान चलाने के लिए शिक्षा व्यवस्था को तो जार-जार किया ही इसके माध्यम से राष्ट्रीय भावना को भी तार-तार किया। ऐसे में शिक्षा व्यवस्था में ममता सरकार की ओर से किए जा रहे सार्थक प्रयासों का स्वागत किया जाना चाहिए। वर्षों से कम्युनिस्टों ने जो गड़बडिय़ां की, उन्हें ठीक किया ही जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार ने कक्षा ११वी और १२वी के इतिहास के सिलेबस में बदलाव करने का फैसला लिया है। सिलेबस बनाने वाली कमेटी की ओर से तैयार किए गए नए प्रारूप में पुराने अध्यायों को हटाया गया है। हटाए जाने वालों में मार्क्स और लेनिन के अध्याय भी हैं। पाठ्यक्रम तैयार करने वाली कमेटी के चेयरमैन अभिक मजूमदार ने बताया कि इतिहास में ऐसे कई अध्याय हैं जिन्हें किताबों में बेवजह शामिल किया गया था, जबकि इनकी कोई जरूरत नहीं है। इन्हें हटाने की सिफारिश की गई है। उन्होंने कहा कि जब चीन का इतिहास पाठ्यक्रम में शामिल है तो अलग से मार्क्स और लेनिन को पढऩे की जरूरत क्या है? नए प्रारूप में महिला आंदोलन, हरित क्रान्ति और पर्यावरण से जुड़े अध्याय शामिल हैं। मजूमदार ने बताया कि हमने किसी विषय को जबरन थोपने की कोशिश नहीं की है।
       चालाक कम्युनिस्टों ने भारत में मार्क्स, लेनिन व अन्य वामपंथी विचारकों को पढ़ाने में भी ईमानदारी नहीं दिखाई। वामपंथ का पूरा सच भारत के कम्युनिस्टों ने कभी नहीं पढ़ाया। वामपंथ का साफ-सुथरा और लोक-लुभावन चेहरा ही प्रस्तुत किया गया। कम्युनिस्ट मार्क्सवाद के पीछे छिपा अवैज्ञानिकवाद, फासीवाद, अधिनायकवाद, हिंसक चेहरा कभी सामने लेकर नहीं आए। इससे वे हमेशा कन्नी काटते नजर आए। कम्युनिस्टों ने कभी नहीं पढ़ाया या स्वीकार किया कि रूस में लेनिन और स्टालिन, रूमानिया में चासेस्क्यू, पोलैंड में जारू जेलोस्की, हंगरी में ग्रांज, पूर्वी जर्मनी में होनेकर, चेकोस्लोवाकिया में ह्मूसांक, बुल्गारिया में जिकोव और चीन में माओ-त्से-तुंग ने किस तरह नरसंहार मचाया। इन अधिनायकों ने सैनिक शक्ति, यातना-शिविरों और असंख्य व्यक्तियों को देश-निर्वासन करके भारी आतंक का राज स्थापित किया। मार्क्सवादी रूढि़वादिता ने कंबोडिया में पोल पॉट के द्वारा वहां की संस्कृति के विद्वानों मौत के घाट उतार दिया गया। जंगलों और खेतों में उन्हें मार गिराया गया। रूस और मध्य एशिया के गणराज्यों में भी हजारों गिरजाघरों और मस्जिदों को बंद कर दिया गया। स्टालिन के कारनामों से मार्क्सवाद का खूनी चेहरा जग-जाहिर हुआ। हालांकि इन फासीवादी ताकतों को धूल में मिलाने में जनता ने अधिक समय नहीं लगाया। जल्द ही उक्त देशों से कम्युनिज्म उखाड़ फेंका गया। रूस में तो लेनिन और स्टालिन के शवों को बुरी तरह पीटा गया। इतना ही नहीं वहां कि जनता ने उन सब चीजों को बदलने का प्रयास किया जिन पर कम्युनिज्म ने अपना ठप्पा लगा दिया था। इतिहास की पुस्तकों से वे पन्ने निकाल दिए गए, जो कम्युनिस्ट के काले रंग से रंगे थे। सेंट पीटर्सबर्ग नगर कम्युनिस्टों के शासनकाल में 'लेनिनग्राड' हो गया था। कम्युनिज्म के ध्वस्त होते ही लेनिनग्राड वापिस सेंट पीटर्सबर्ग हो गया। भारत में भी कम्युनिस्टों ने समय-समय पर अपना रंग दिखाया है। महात्मा गांधी के आंदोलन भारत छोड़ो के खिलाफ षड्यंत्र किए, अंग्रेजों का साथ दिया, कम्युनिस्टों ने सुभाषचंद्र बोस और आजाद हिन्द फौज के खिलाफ दुष्प्रचार किया, पाकिस्तान बनाने की मांग को वैध करने और भारत में अनेक स्वायत्त राष्ट्र बनाने का समर्थन किया। १९६२ के युद्ध में चीन की तरफदारी की, क्योंकि वहां कम्युनिस्ट सरकार थी। कम्युनिस्टों के लिए सदैव राष्ट्रहित से बढक़र स्वहित रहे हैं। कम्युनिस्टों ने भारत की संस्कृति, राष्ट्रीय चरित्रों, राष्ट्रीय आदर्शों और परम्पराओं से नफरत करना सिखाया। मार्क्स, लेनिन, माओ, फिदेल कास्त्रो, चे ग्वारा  सबके सब उनके लिए आदर्श बने रहे, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविन्द, महात्मा गांधी, सुभाषचंद्र बोस, डॉ. हेडगेवार सभी बुर्जुआ, पुनरुत्थानवादी कहे जाते रहे। कितनी बेशर्मी से कम्युनिस्ट इस देश में रहकर ही इस देश के महापुरुषों को दरकिनार करते रहे और विदेश से प्रेरणा लेते रहे। ऐसे कम्युनिज्म को तो इस देश से खुरच-खुरच कर बाहर फेंक देना चाहिए।
         जिस कम्युनिज्म की अर्थी उसके जन्म स्थान से ही उठ गई, उसे भारत में दुल्हन की तरह रखा गया। रूस में मार्क्सवाद का प्रारंभ भीषण नरसंहार, नागरिकों की हत्याओं, दमन और सैनिक गतिविधियों से हुआ। १९९१ में इसका अंत व्यापक भ्रष्टाचार, आर्थिक कठिनाइयों और देशव्यापी भुखमरी के रूप में हुआ। ऐसे कम्युनिज्म का भारत में बने रहने का कोई मतलब नहीं है। ममता बनर्जी की तरह औरों को भी आगे आना होगा। साथ ही इस तरह के सुधारों का स्वागत किया जाना चाहिए। इतना ही नहीं अगर किसी भी स्तर पर वामपंथियों की ओर से विरोध जताया जाता है तो उसका सबको मिलकर मुकाबला करना चाहिए।

रविवार, 8 अप्रैल 2012

धवल राजनीति की पैरोकार थीं राजमाता


 पु  ण्यश्लोका राजमाता पुस्तक महज 69 पृष्ठों की है। 26 संक्षिप्त अध्याय हैं। इनमें ही राजमाता के सहज-सरल और उन्नत व्यक्तित्व को श्री नरसिंह जोशी जी ने प्रस्तुत किया है। पुस्तक अति लघु है क्योंकि राजमाता के बारे में पढऩे का मन अधिक है। उनके प्रेरक और विराट व्यक्तित्व को जानने की ललक अधिक है। पुण्यश्लोका राजमाता को पढ़कर यह ललक और बढ़ जाती है। नरसिंह जोशी जी ने इस लघु पुस्तक में राजमाता के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व, धर्म के प्रति प्रेम-आस्था, पर्यावरण की चिंता, समाज की चिंता, स्वदेशी प्रेम को बखूबी रेखांकित किया है। साथ ही सदैव-सदैव के लिए राजनीति का चित्र और चरित्र क्या होना चाहिए इस ओर भी पुस्तक इंगित करती है। राजमाता का असल नाम लेखा दिव्येश्वरी था। पिता डिप्टी कलेक्टर थे लेकिन ननिहाल नेपाल राजघराने से संबंध रखता था। राजमाता का जन्म सागर में हुआ। यहीं उनकी पढ़ाई हुई। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था। उन्होंने अपनी सहेलियों के साथ विदेशी वस्त्रों को त्यागने की शपथ ली और स्वदेशी को अपना लिया। जीवन की अंतिम सांस तक राजमाता जी अपनी इस शपथ का पालन करते दिखीं वे बहुत ही सात्विक जीवन जीती रहीं। धर्म पारायणता उन्होंने अपनी नानी से सीखी। राजमाता भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। 
       पुस्तक में नरसिंह जोशी जी ने लिखा है कि वे हमेशा अपने साथ एक सुन्दर से बक्से में कृष्ण की प्रतिमा साथ रखती थीं। तमाम वैभव होने के बाद भी उनका जीवन संकटों के बीच गुजरा। असमय उनके पति महाराज जीवाजीराव सिंधिया का निधन, आपातकाल में जेल की यातानाएं, विपरीत समय में पुत्र माधवराव सिंधिया उनसे दूर हो गए। इन सबके बाद भी राजमाता अपने कर्तव्य पर डटी रहीं। उन्होंने कभी अपने को हारने नहीं दिया। अन्याय का सदैव विरोध किया। राजमाता पहली बार कांग्रेस के टिकट पर जीतकर संसद गईं हालांकि राजमाता कभी-भी कांग्रेस पार्टी में जाना नहीं चाहती थीं। उनका असल राजनीतिक जीवन तो 1966 से शुरू हुआ। 17 सितंबर 1966 में ग्वालियर में छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। कांग्रेस से मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा की सरकार ने छात्रों पर गोली भी चलवाईं। इसमें एक छात्र मारा गया। इस प्रसंग के बाद राजमाता जी कांग्रेस के प्रति मन खीझ जाता है। वे 1967 के चुनाव से पूर्व कांग्रेस का त्यागकर काफी सोच-विचारकर जनसंघ में प्रवेश करती हैं। राजमाता ने अथक प्रयासकर द्वारिका प्रसाद की सरकार को मटियामेट कर दिया। जनसंघ से जुडऩे और मप्र से कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के कारण कांग्रेस नेतृत्व उनसे चिढ़ गया। इसके बाद कांग्रेस ने उनके खिलाफ साम-दाम-दण्ड की नीति अपनाई। आपातकाल में राजमाता को तिहाड़ जेल में रखा गया। धीमे-धीमे राजमाता की निकटता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और अन्य राष्ट्रवादी संगठनों से बढ़ी। राजमाता ने संपत्ति जोडऩे से अधिक संपत्ति का जनता के हित में उपयोग हो इस आचरण को समाज के सामने प्रस्तुत किया। 1967 के चुनाव के बाद छत्तीसगढ़ में सूखा की स्थिति में और अतिवृष्टि से चंबल नदी से मुरैना, नर्मदा से होशंगाबाद में आई बाढ़ के समय उन्होंने यथासंभव पीडि़तों की मदद की। 
राजनीति कैसी होनी चाहिए। उसका चरित्र क्या हो। राजनीति का उद्देश्य क्या हो। राजनेताओं का चरित्र और व्यवहार कैसा हो। इसकी झलक वे स्वयं तो प्रस्तुत करती ही थी अन्य को भी इसके लिए प्रेरित करती थीं। इस विषय में उन्होंने मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने पर विधानसभा सदस्यों को विस्तृत पत्र लिखा। पत्र में वे लिखती हैं कि यह हमारे लाखों कार्यकर्ताओं की वर्षों की कठिन तपस्या और कठोर परिश्रम का ही फल है कि मध्यप्रदेश के शासन की बागडोर प्रदेश की जनता ने हमें सौंपी है। अक्षम, भ्रष्ट और अत्याचारी इकाई शासन को हटाकर जनता ने हमें सत्ता इसीलिए सौंपी है कि उसे एक साफ सुथरी, ईमानदार, सक्षम और सेवाभावी सरकार मिल सके। इस अवसर पर आपसे कुछ व्यक्तिगत निवेदन करना चाहती हूं। वस्तुत: यह परिवर्तन केवल चेहरों या हाथों का परिवर्तन नहीं, अपितु इसे एक संपूर्ण व्यवस्था का परिवर्तन समझा जाना चाहिए। इसे अंधेरी रात के स्थान पर नए सवेरे के सूरज का उदय समझना चाहिए। अत: जो अंतर अंधेरे और उजाले में होता है, वही अंतर कांग्रेस की और हमारी सरकार के बीच जनता को महसूस होना चाहिए। इस पत्र में वे आगे और लिखती हैं। राजनीतिक सुचिता की बात करती हैं। राजनीति का उद्देश्य और जनता के प्रति उत्तरदायित्व की बात करती हैं। लेखक नरसिंह जोशी जी ने पुस्तक में यह पत्र शामिल किया है। पुस्तक में सुनी-सुनाई बातें नहीं अपितु लेखक के स्वयं के अनुभव हैं। साथ ही प्रमाण सहित उन्होंने राजमाताजी के संदर्भ में अपनी बात लिखी हैं। लेखक ने लंबा राजनीतिक कालखण्ड राजमाताजी के साथ बिताया इस दौरान उन्होंने उनके विराटत्व, गरिमा, सादगी, आध्यात्मिक और संत पक्ष के दर्शन किए। नरसिंह जोशी जी ने महसूस किया कि जनसंघ में शामिल होने के समय और उसके बाद भी कुछ वर्षों तक राजमाताजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को साम्प्रदायिक संगठन मानती थी। उनका कहना था कि कांग्रेस में उन्हें यही बताया गया था। इसलिए उनकी धारणा संघ के प्रति ऐसी ही बन गई। लेकिन, जब बाद में उन्होंंने राष्ट्र के प्रति संघ की तड़प और समर्पण को देखा तो उनकी धारणा बिखर गईं। वे संघ सहित उसके कई अनुषांगिक संगठनों से जुड़ गईं। विश्व हिन्दू परिषद के साथ तो उन्होंने लम्बे समय तक काम किया। राम मंदिर निर्माण का वे प्रबल पक्ष लेती थीं। उनका कहना था कि राम इस देश की आन है जब सर्वविधित है कि एक आक्रांता ने अयोध्या में मंदिर तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद का ढांचा खड़ा किया है। ढांचे के स्थान पर पुन: मंदिर बनना चाहिए। उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए काम किया। भाजपा में भी इस मुद्दे पर कई मर्तबा अपनी राय रखी। प्रदेश में गौवंश की रक्षा हो उसके प्रति भी वे चिंतित थीं। वर्ष 1986 में भोपाल में प्रन्यासी मण्डल की बैठक में जब अन्य कार्यवाही चल रही थी तब मंच पर बैठे-बैठे ही राजमाताजी ने गौरक्षा का प्रस्ताव लिखा। अधिकारियों को बताया और आंशिक संशोधन के साथ उस पर बैठक में चर्चा भी हुई। इसके बाद उनके इस प्रयास ने एक बड़ा रूप ले लिया।
पुस्तक में करीब 20 चित्र राजमाताजी से संबंधित प्रकाशित किए गए हैं, ये चित्र इस पुस्तक को और अधिक महत्वपूर्ण व संग्रहणीय बनाते हैं। पुस्तक सभी वर्गों के लिए पठनीय, संग्रहणीय और उपहार देने योग्य है। 
 पुस्तक - पुण्यश्लोका राजमात
लेखक - नरसिंह जोशी
प्रकाशक - सौ. अपर्णा पाटील
संपादिका, यश
एफ-160, हरिशंकरपुरम्, ग्वालियर
मूल्य - 60 रुपए

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