रविवार, 26 फ़रवरी 2012

बौखलाहट या दंभ?


उत्तरप्रदेश की जनता का अपमान राष्ट्रपति शासन की धमकी
 उ त्तरप्रदेश में पांच चरणों के मतदान के बाद आ रहे रुझान देखकर कांग्रेस की सिट्टी-पिट्टी गुम है। कांग्रेस की यथा स्थिति यानी चौथे पायदान पर बने रहने की प्रबल संभावनाएं जताई जाने लगी हैं। इससे कांग्रेस के तमाम नेतागण या तो बौखला गए हैं या फिर उनके बयानों में दंभ झलक रहा है। सबसे पहले कांग्रेस के विवादास्पद नेता दिग्विजय सिंह ने उत्तरप्रदेश में सत्ता में न आने पर राष्ट्रपति शासन की बात कही। बात क्या कही जनता को राष्ट्रपति शासन का डर दिखाया। दिग्विजय की बात का कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व की ओर से विरोध नहीं जताया गया। अर्थात् ऐसी कांग्रेस पार्टी और आलाकमान सोनिया गांधी की मंशा है यह समझा जाना चाहिए। इसे और अधिक पुष्ट किया कांग्रेस सांसद और केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जायसवाल ने। बुंदेलखंड में मट्टी पलीद होते देख कांग्रेस की बौखलाहट या दंभ सामने आ गया। केन्द्रीय मंत्री प्रकाश जायसवाल ने कहा था कि यदि उत्तरप्रदेश में कांग्रेस की सरकार नहीं बनी तो किसी और की सरकार नहीं बनेगी। ऐसे में राष्ट्रपति शासन के अलावा कोई विकल्प नहीं। इस पर तमाम विपक्षी पार्टियों ने इसे लोकतंत्र का उपहास, कांग्रेस का दिवालियापन, पागलपन, तानाशाही और हताशा की स्थिति में पहुंचना बताया। 
सबका अपना-अपना नजरिया है। लेकिन, मैं इसे सीधे तौर पर उत्तरप्रदेश की जनता का अपमान समझता हूं। यह साफ तौर पर वहां की जनता को धमकाने का मामला है। भला यह क्या बात हुई, हमको जिताओ वरना राष्ट्रपति शासन झेलना। लोकतंत्र में जनता को अपने मन के प्रतिनिधि चुनने का हक है। उन पर किसी तरह का मानसिक दबाव बनाना गलत है। हालांकि वोट पाने का कांग्रेस का यह तरीका (धमकी) भी कारगर नहीं होगा। दंभ किसी का भी हो भारत की जनता झेलती नहीं है। यह इतिहास हमें बताता है। कांग्रेस खुद का ही इतिहास पढ़ लेती तो राष्ट्रपति शासन लागू करने की मंशा ही नहीं बनाती। सोनिया गांधी की सास और पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी वर्ष 1975 में इसी दंभ का शिकार हो गई थीं। उन्होंने अपनी सत्ता को बचाए रखने के लिए 1975 देश पर 21 महीने का आपातकाल थोप दिया। इस दौरान पुलिस की मदद से इंदिरा गांधी ने अपने विरोधियों को प्रताडि़त किया। इन 21 महीनों को भारतीय राजनीति का काला इतिहास माना जाता है। दरअसल, इंदिरा गांधी के चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण की याचिका पर इलाहबाद हाईकोर्ट ने भ्रष्टाचार में लिप्त होने पर इंदिरा गांधी का चुनाव रद्द कर दिया था। ऐसे में उनके प्रधानमंत्री बने रहने पर संकट आ गया था। विपक्षी पार्टियां उनसे इस्तीफे की मांग जोर-शोर से करने लगी थीं। सत्ता से चिपके रहने का नशा और अंहकार ने इंदिरा को 1975 में आपातकाल का फैसला लेने पर मजबूर कर दिया था। आपातकाल के दौरान आमजन के पीड़ा-वेदना से भरे अनुभव इतिहास के पन्नों पर दर्ज किए गए हैं। दो साल बाद आम चुनाव में जनता ने दंभ को धूल चटा दी। 1977 में कांग्रेस का सूपड़ा-साफ हो गया। पहली बार देश में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। आज तक इंदिरा गांधी को उस दंभी निर्णय के लिए निंदित किया जाता है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत विधानसभा में यदि कोई दल स्पष्ट बहुमत में नहीं होता अर्थात् यदि कोई दल सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होता तो ऐसी स्थिति में केन्द्रीय सरकार की सलाह पर राज्यपाल राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू कर देता है। छह माह में भी यदि कोई दल सरकार बनाने के लिए बहुमत सिद्ध नहीं कर सका तो राज्य में फिर से चुनाव कराए जाते हैं। लेकिन, यह सब बाद की स्थिति है। कांग्रेस के नेता तो अभी से ही राष्ट्रपति शासन की धमकी दे रहे हैं। यह कहां तक वाजिब है। बहरहाल, कांग्रेस ने अपना रवैया न बदला तो जनता उसे उसकी औकात बताने में पांच साल भी नहीं लगाएगी, उसके हाथ वर्तमान में ही मौका है। लोकसभा के आमचुनाव भी अधिक दूर नहीं। वैसे भी यूपीए-2 के कार्यकाल में परत-दर-परत घोटालों के खुलासे से कांग्रेस के बारह बजे हुए हैं। 
लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस की सत्ता उखाड़ फेंकने के लिए उमड़ा जनसैलाब। 

शुक्रवार, 24 फ़रवरी 2012

जिन्दगी के सवालों के जवाब देती पुस्तक : मंगल भवन अमंगलहारी


 क भी-कभी हम सुनते हैं कि जिन्दगी सवालों के नागपाश में उलझी हुई है। ये सवाल मानव को जीवन भर सताते हैं। हर आदमी इनके उत्तर खोजता रहता है, लेकिन उसे ठीक-ठीक उत्तर नहीं मिलते। ऐसे ही सवालों के जवाब 'मंगल भवन अमंगलहारी' पुस्तक देती है। पुस्तक में जन्म से मृत्यु तक जीवन के विकट सफर से जुड़े सभी सवालों के उत्तर हैं। यह पुस्तक जीवन को सरल, सुगम और संस्कारपूर्ण बनाने में मदद कर सकती है। 
       पुस्तक में कुल ३६४ पृष्ठ हैं। इंसान के जीवन के उद्देश्य, इस संसार में करना ही चाहिए ऐसे कार्य कौन-से और कितने हैं, ८०० प्रश्नों के उत्तर में सब समाहित है। खास बात यह है कि इन सवालों को पुस्तक रूप देने से पहले कर्नाटक के कई मंदिरों में प्रयोग किया गया। मंदिरों व अन्य जगह प्रत्येक दिन एक प्रश्न सूचना पटल पर लिखकर टांग दिया जाता था। इससे मंदिर आने वाले सभी लोगों के मन में प्रश्नों के उत्तर को लेकर कौतूहल देखा गया। उनकी मनोस्थिति में बदलाव देखे गए। ऐसे ही ८०० प्रश्नों को बाद में पुस्तक की सूरत में प्रकाशित कराया गया।
        वर्ष २०१० में पहली बार पुस्तक कन्नड भाषा में 'मनेय मांगल्य' के नाम से प्रकाशित कराई गई। मनेय मांगल्य का अर्थ होता है घर ही मांगल्य स्त्रोत। पुस्तक की मांग को देखते हुए एक ही साल में इसके छह: सस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। कर्नाटक में पुस्तक की लोकप्रियता इतनी है कि शुभ और मांगलिक अवसरों पर उपहार स्वरूप देने की परंपरा सी बन गई है। इसकी लोकप्रियता और समाज में आवश्यकता को देखते हुए इसे हिन्दी भाषा में 'मंगल भवन अमंगलहारी' नाम से प्रकाशित कराया गया है। 
        वर्तमान संदर्भ में देखें तो ऐसी पुस्तकों के प्रचार-प्रसार की अति आवश्यकता है। हमारे साथ की पीढ़ी भारतीय संस्कारों से दूर हो रही है। ऐसे में आने वाली पीढ़ी की हम कल्पना कर सकते हैं। परिवारों में संस्कारपूर्ण वातावरण न होने से समाज के सामने विकट समस्या खड़ी हो गई है। समाज में व्याभिचार बढ़ गया है। हर कोई भोग विलास में डूबा है। उन्हें सही राह भी नहीं दिख रही है। ऐसे में मंगल भवन अमंगलहारी पुस्तक बहुत उपयोगी साबित हो सकती है।

प्रकाशक : परिवार प्रदीपिका 
७५ - ७६, ज्ञानगिरि
४ वां क्रॉस, २ वां मईन, सौदामिनी ले आउट
कोणनकुंटे मईन रोड
बेंगलूरु - ५६००६२ 
दूरभाष - ०९९००१५७७१४
मूल्य - १२० रुपए

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

मैंने भारत को करीब से देखा है



मैंने भारत को करीब से देखा है
बहुत करीब से देखा है.
रोटी के लिए बिलखते भी देखा है
किन्तु स्वाभिमान के साथ जीते देखा है
मानवता उसकी रग-रग में है
स्वयं कष्ट में होते हुए भी दूसरों के ज़ख्मों को सीते देखा है, दर्द समेटते देखा है।

विश्व मार्गदर्शक के रूप में स्वर्णिम इतिहास देखा है
तो संघर्षमय, पीड़ा, वेदना से भरा पृष्ठ भी देखा है
पाश्चात्य संस्कृति के दलदल में फंसा ही सही
किन्तु अब इससे उभरता हुआ अपनी जड़ों में लौटते देखा है, परम वैभव कि ओर बढ़ते देखा है। 

शस्य-श्यामल भाल आतंक में लहू-लुहान देखा है
आँचल में भी अलगाव का दर्द देखा है
भाषा-जाति-धर्म को लेकर लड़ते ही सही
किन्तु राष्ट्रीय एकता-अखंडता के लिए
साथ-साथ चलते देखा है, राष्ट्र चेतना का नव सृजन करते देखा है। 

शान्ति उपवन का निर्माण करते देखा है 
विश्व कल्याणी कार्य में संलग्न देखा है 
पंचशील के सिद्धांत का संस्थापक ही सही 
किन्तु स्व-अस्तित्व पर उठे संकट कोई 
तो सिंह से दहाड़ते देखा है, शत्रु का मर्दन करते देखा है। 

आतंक, नक्सलवाद से जूझते देखा है 
स्वसंतान के कारण उठे प्रश्नों में उलझते देखा है 
फिर भी हर क्षण उसकी आँखों में चमक 
समर्थ विश्वगुरु बनने का 
सशक्त स्वप्न देखा है, प्रशस्त कर्मपथ देखा है।



बुधवार, 15 फ़रवरी 2012

सौ सुनार की एक लोहार की

 28 अक्टूबर, 2011 को साहित्य का एक चमकता सूरज ढल गया था। भविष्य के कैलेंडर में हमेशा इस दिन एक काला बिंब दिखा करेगा। मैं बात कर रहा हूं उपन्यास सूनी घाटी का सूरज (1957) से साहित्य की दुनिया में उपस्थित दर्ज कराने वाले और कालजयी उपन्यास राग दरबारी के रचयिता की। यानी श्रीलाल शुक्ल की। उनकी अन्य रचनाएं- पहला पड़ाव, मकान, अज्ञातवास और विश्रामपुर का संत प्रख्यात हैं। लेकिन, समाज उन्हें राग दरबारी के लिए अधिक पहचानता है। लम्बे अरसे से मैं राग दरबारी पढऩे का इच्छुक था। बीच में मेरे मित्र ने मुझे यह उपन्यास पढऩे के लिए दिया। दो दिन भी न बीते थे कि हम दोनों में किसी अन्य पुस्तक को लेकर बहस हो गई। मैं थोड़ा गरम मिजाज का हूं। गुस्सा आ गया, अपना थैला खोला और राग दरबारी निकलकर उन्हें थमा दी। आज के बाद आपसे पढऩे के लिए कोई किताब नहीं लूंगा, ऐसा कहकर उनसे नमस्ते कर लिया। चूंकि मेरे मित्र उम्र में मुझसे बड़े हैं। उन्हें गुस्सा दिखाने के लिए माफी मांगने का धर्म मेरा ही था। दूसरे ही दिन उनके घर जाकर साथ में खाना खाया लेकिन किताब तब भी नहीं ली पढऩे। मैंने तब तक राग दरबारी के चार पन्ने ही पढ़े थे। उन चार पन्नों ने जो छाप मन में छोड़ी, उससे लगातार मन में राग दरबारी को जल्द ही पढ़ लेने की इच्छा बलवती हो रही थी। इसी दौरान मेरा स्थानांतरण पत्रिका के भोपाल संस्करण में हो गया। यहां नए दोस्त बनना शुरू हुए। कुछ अपने टाइप के मिल गए। यहीं मुझे मेरी मित्र ने राग दरबारी पढऩे को दी। मैंने राग दरबारी पौने दो बार (एक बार डूबकर, दूसरी बार सरसरी तौर पर) पढ़कर खत्म की। उसके पात्र और कहानी हमारे आसपास के ही प्रतीत होते हैं। वैध महाराज, रामधीन भीखमखेड़ी, लंगड़, शनिचर सब हमारे आसपास मिल जाएंगे।
    उपन्यास की भाषा शैली के लिए लेखक को काफी मेहनत करनी पड़ी थी। एक अखबार को उन्होंने बताया था कि राग दरबारी में अजीब-सी भाषा है, कुछ असभ्य-सी। इसे अपने भीतर उतारने के लिए उन्हें काफी मेहनत, परेशानी और बेइज्जती झेलनी पड़ी। उपन्यास जब लिखा जा रहा था, उस दौरान उनके व्यवहार और बातचीत से अक्सर लोग नाराज हो जाया करते थे। खासकर महिलाएं तो उन्हें बेहूदा इंसान समझने लगी थीं। इस उपन्यास को पूरा करने के लिए कुछ महीनों के लिए वे दुनिया से कट गए थे। घर छोड़कर एक फ्लैट किराए से लिया। फ्लैट की जानकारी किसी को नहीं थी। वहीं रहकर उन्होंने उपन्यास लेखन किया। इस दौरान श्रीलाल शुक्ल काफी बीमार भी हो गए थे। उपन्यास के कुछ मुहावरे, कथन अजब ही हैं। ठोस, लोहार के हथौड़े की तरह प्रहार करने वाली भाषा। कुछ यहां प्रस्तुत कर रहा हूं :-
  • ट्रक : उसे देखते ही यकीन हो जाता था, इसका जन्म केवल सड़कों के साथ बलात्कार करने के लिए हुआ है।
  • बैठक : ईंट-गारा ढोनेवाला मजदूर भी जानता है कि बैठक ईंट और गारे की बनी इमारत भर नहीं है। नं. 10 डाउनिंग स्ट्रीट, व्हाइट हाउस, के्रमलिन आदि मकानों के नहीं ताकतों के नाम हैं।
  • कुकुरहाव : कुत्ते आपस में लड़ते हैं और एक-दूसरे को बढ़ावा देने के लिए शोर मचाते हैं। उसी को कुकरहाव कहते हैं।
  • बुद्धिजीवी : हालत यह है कि हैं तो बुद्धिजीवी, पर विलायत का एक चक्कर लगाने के लिए यह साबित करना पड़ जाय कि हम अपने बाप की औलाद नहीं हैं, तो साबित कर देंगे। चौराहे पर दस जूते मार लो, पर एक बार अमरीका भेज दो - ये हैं बुद्धिजीवी।
  • बाछें (वे जिस्म में जहां कहीं भी होती हैं) खिल गईं।
  • हाथी आते हैं, घोड़े जाते हैं, बेचारे ऊंट गोते खाते हैं।
  • जिसके छिलता है, उसी के चुनमुनाता है।
  • तुम अपना दाद उधर से खुजलाओ, हम अपना इधर से खुजलाते हैं।
  • सब मीटिंग में बैठकर रांड़ों की तरह फांय-फांय करते हैं, काम-धाम के वक्त खूंटा पकड़कर बैठ जाते हैं।
  • आग खाएगा तो अंगार हंगेगा।
  • सच्ची बात ठांस दूंगा तो कलेजे में कल्लाएगी।
  • जिस किसी की दुम उठाकर देखो, मादा ही नजर आता है।
  • हमारी ही पाली लोमड़ी, हमारे ही घर में हुआ-हुआ। (यद्यपि लोमड़ी हुआ-हुआ नहीं करती)
  • कल्ले में जब बूता नहीं होता, तभी इन्सानियत के लिए जी हुड़कता है।
  • धरती-धरती चलो। आसमान की छाती न फाड़ो।
  • गला देश भक्ति के कारण नहीं, खांसी के कारण भर आया था।
  • हिन्दुस्तानी छैला, आधा उजला आधा मैला।
  • सच्ची बात और गदहे की लात को झेलने वाले बहुत कम मिलते हैं।
  • मर्द की जबान एक कि दो?
  • चौदह लड़कों को हमने पैदा किया और हमीं को ये सिखाते हैं कि औरत क्या चीज है।
  • घोड़े की लात और मर्द की बात कभी खाली नहीं जाती।
  • एक-एक से सवा लाख की कोठी में मूंज न कुटवाऊं तो समझ लेना तुम्हारे पेशाब से पैदा नहीं हुआ हूं।
  • एक-एक वकील करने में सौ-सौ रण्डी पालने का खर्च है।
  • कोई कटी अंगुली पर भी मूतने वाला नहीं।
  • हमारा पेशाब किसी के मुकाबले पतला नहीं होता।
  • यह भी कोई गड्ढा है। चिडिय़ा भी एक बार मूत दे तो उफना चलेगा।
  • टहलना काम है घोड़ी का, मर्द-बच्चे का नहीं।
  • पांच सौ डण्ड फटाफट मारिए, लोहा-लंगड़ सबकुछ पेट में हजम हो जाएगा।
  • पेशाब से चिराग जलना।
  • घोड़े की लात घोड़ा ही सह सकता है।
  • सब चिड़ीमार हैं तो तुम्हीं साले तीसमार खां बनकर क्या उखाड़ लोगे।
  • गू खाय तो हाथी का खाय।
  • देह पर नहीं लत्ता, पान खायं अलबत्ता।
  • वोट साला कौन छप्पन टके की चीज है।
  • हमें कौन साला वोट का अचार डालना है। जितने कहो, उतने वोट दे दें।
  • तुम्हारी जवानी पर पिल्ले मूतते हैं साले।
  • कल तक जोगी, चूतड़ तक जटा।
  • गिलहरी के सिर पर महुआ चू पड़े तो समझेगी, गाज गिरी है।
  • जैसे तुम तो विलायत से आए हो और बाकी सब काला-आदमी-जमीन पर हगने वाला है।
  • सूअर का लेंड, न लीपने का के काम आय, न जलाने के।
  • जहां मुर्गा न होगा तो क्या वहां भोर न होगा।
  • हम तो गलत समझेंगे ही। तुम पतलून पहने हो, साहब। सही बात तो तुम्हीं समझोगे।
पंचू कहिन : जिसने राग दरबारी न पढ़ी हो तो उसे पढऩी ही चाहिए। जो पढ़ चुका हो वो बार-बार पढ़कर आनंद ले सकता है।
   

शनिवार, 11 फ़रवरी 2012

पंडित दीनदयाल उपाध्याय


11 फरवरी, पुण्यतिथि
 क हा जाता है कुछ लोग महान पैदा होते है, कुछ लोग महानता अर्जित करते है और कुछ पर महानता थोप दी जाती है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ऐसे महापुरुष हैं जिन्होंने महानता अर्जित की थी। पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर, 1916 को नाना चुन्नीलाल शुक्ल के घर में हुआ था। पंडितजी के नाना राजस्थान के धनकिया गांव में रहते थे। यह गांव जयपुर-अजमेर रेललाइन पर स्थित है। चुन्नीलाल शुक्ल धनकिया गांव के रेलवे स्टेशन के स्टेशन मास्टर थे। पंडित जी के पिता भगवतीप्रसाद उपाध्याय ब्रज के मथुरा जिले के छोटे-से गांव फराह में रहते थे। वे मथुरा में जलेसर रेलवे मार्ग पर एक स्टेशन में स्टेशन मास्टर थे। पं. दीनदयाल उपाध्याय का बचपन असहनीय परेशानियों के बीच बीता। दीनदयाल जी जब तीन साल के थे, उनके सिर से पिता का साया हट गया। सात वर्ष की छोटी-सी आयु में मां रामप्यारी का भी निधन हो गया। जिन्दगी की जिस अवस्था में मां-पिता के प्रेम की बहुत जरूरत होती है, उसी अवस्था में पंडितजी पिता के आश्रय और मां की ममता से वंचित हो गए थे।  
पंडितजी होनहार थे। बुद्धि से तेज थे। उन्होंने कल्याण हाई स्कूल सीकर से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। उन्हें अजमेर बोर्ड और स्कूल दोनों की तरफ से एक-एक स्वर्ण पदक प्रदान प्रदान किया गया। दो वर्ष बाद बिड़ला कॉलेज पिलानी से हायर सेकंड्री परीक्षा में वे प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हुए। इस बार भी उन्हें दो स्वर्ण पदक मिले। 1939 में उन्होंने सनातन धर्म कॉलेज, कानपुर से गणित विषय से बीए की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण की। यहीं उनकी भेंट राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं और अन्य राष्ट्रवादियों से हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं के तपस्वी जीवन से प्रभावित होकर उनके मन में भी देश सेवा करने का खयाल आया। पंडितजी ने आगरा के सेंटजॉन्स कॉलेज में एमए के लिए दाखिला लिया परन्तु किन्हीं कारणों से पढ़ाई बीच में ही छोडऩी पड़ी। इस दौरान उन्होंने तय कर लिया था कि वे नौकरी नहीं करेंगे। उन्होंने राष्ट्रीय जाग्रति एवं राष्ट्रीय एकता के लिए कटिबद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित कर दिया। 1951 तक वे संघ में विभिन्न पदों पर रहकर समाज चेतना का कार्य करते रहे। 1951 में जनसंघ की स्थापना हुई तब से उन्होंने अपनी सेवाएं जनसंघ को अर्पित कर दी। डॉक्टर मुखर्जी उनकी संगठन क्षमता से इतने अधिक प्रभावित हुए कि कानपुर अधिवेशन के बाद उनके मुंह से यही उद्गार निकले कि यदि मेरे पास और दो दीनदयाल होते तो मैं भारत का राजनीतिक रूप बदल देता। दुर्भाग्य से 1953 में डॉक्टर मुखर्जी की मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु अभी भी रहस्य है। कहा जाता है कि डॉक्टर मुखर्जी की हत्या राजनीतिक कारणों के चलते की गई थी। श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मौत के बाद भारत का राजनीतिक स्वरूप बदलने  की जिम्मेदारी पंडित दीनदयाल के कंधों पर आ गया। उन्होंने इस कार्य को इतने चुपचाप और विशेष ढंग से पूरा किया कि जब 1967 के आम चुनाव के परिणाम सामने आने लगे तब देश आश्चर्यचकित रह गया। जनसंघ राजनीतिक दलों में दूसरे क्रमांक पर पंहुच गया। यद्यपि दीनदयालजी महान नेता बन गए थे परन्तु वे अति साधारण ढंग से ही रहते थे। अपने कपडे स्वयं ही साफ़ करते थे। स्वभाव से इतने सरल थे कि जब तक उनकी बनियान कि चिद्दी-चिद्दी नहीं उड़ जाती थी वे नई बनियान बनबाने के लिए तैयार नहीं होते थे। वे स्वदेशी के बारे में शोर तो नहीं मचाते थे परन्तु वे कभी भी विदेशी वस्तु नहीं खरीदते थे। 
स्वाधीनता आंदोलन के दौरान अनेक नेताओं ने पत्रकारिता का उपयोग राष्ट्रभक्ति की अलग जगाने के लिए किया। ऐसे नेताओं की कतार में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम भी शामिल है। प. दीनदयाल राजनीति में सक्रिय होने के साथ साहित्य से भी जुड़े थे। उनके हिंदी और अंग्रेजी के लेख विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते थे। उनके बौद्धिक सामर्थ्य को समझने के लिए एक उदाहरण की काफी है। उन्होंने एक ही बैठक में (लगातार 16 घंटे बैठ कर) लघु उपन्यास 'चंद्रगुप्त मौर्य' लिख डाला था। दीनदयालजी ने लखनऊ में राष्ट्रधर्म प्रकाशन की स्थापना की। राष्ट्रवादी विचारों को प्रसारित करने के लिए मासिक पत्रिका राष्ट्रधर्म शुरू की। बाद में उन्होंने 'पांचजन्य' (साप्ताहिक) और 'स्वदेश' (दैनिक) की शुरुआत भी की। वे उच्च कोटि के पत्रकार थे। पंडितजी न केवल इन पत्रों का संपादन करते थे बल्कि मशीन भी चला लेते थे, वाइन्डर और डिस्पेचर का कार्य भी कर लेते थे। उनकी कृति एकात्म मानववाद तो विश्वस्तर पर सराही गई है। पंडित जी एकात्म मानववाद में कहते हैं कि भारतीय चिन्तन कहता है कि व्यक्ति और समाज न बांटी जा सकने वाली इकाई है। इसको आप बांट नहीं सकते। व्यक्ति और समाज जब बंट जाता है तो मानव मर जाता है, मानव रहता ही नहीं। दीनदयाल जी ने कहा, भारत की मनीषा के अनुसार समग्रता और सम्पूर्णता से देखो तो पाओगे कि मानव में व्यष्टि और समष्टि की एकात्मता है। दीनदयाल जी ने कहा भारत का संदर्भ उससे आगे है, व्यष्टि-समष्टि, सृष्टि और परमेष्टि। इनमें भी एकात्मता है। इसलिए यह एकात्मता का विचार, यदि मानव के सुख का संधान करता है तो इस एकात्मकता के विचार को समझना होगा। इस एकात्मता के विचार को समझते समय हमें ध्यान देना होगा कि हमें केवल व्यक्ति के सुख की साधना नहीं करनी है। यदि हमने समाज को व्यक्तिवादी बनाया तो सुख की लूट मच जायेगी और कोई सुखी नहीं हो पाएगा और यदि हमने समाज के नाम पर व्यक्ति की अस्मिता को नकार दिया तो भारत नौकरों का देश बन जायेगा।
11 फरवरी 1968 को मुगलसराय रेलवे यार्ड में उनकी लाश मिलने से सारे देश में शौक की लहर दौड़ गई थी। उनकी इस तरह हुई हत्या को कई लोगों ने भारत के सबसे बुरे कांडों में से एक माना। पंडित दीनदयाल जी की रहस्यमयी स्थिति में हुई हत्या की गुत्थी आज तक नहीं सुलझ सकी है। 

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2012

राजनीति उत्तराधिकार की


श्री लाल शुक्ल के कालजयी उपन्यास राग दरबारी का अंतिम हिस्सा सबको बखूबी याद होगा। उपन्यास के अंत में वैध महाराज की सत्ता पर जब सवाल उठने शुरू हुए या कहें उनके दिन पूरे होने को आए तो उन्होंने किस तरह नाटकीय अंदाज से सत्ता अपने पहलवान बेटे को सौंप दी। अयोग्य शनिचर को अपनी ताकत का इस्तेमाल कर ग्राम प्रधान बनवा दिया। यही भारतीय राजनीति की वर्तमान स्थिति है। देखें, बालठाकरे ने पुत्रमोह में योग्य होते हुए भी राज ठाकरे को अपना उत्तराधिकारी नहीं बनाया। शिवसेना को संभाल रहे हैं उद्भव ठाकरे। नतीजा परिवार और पार्टी विघटन। राज ठाकरे ने अपनी नई पार्टी बना ली महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे)। इसका खामियाजा हालांकि दोनों को ही भुगतना पड़ रहा है। दोनों की ताकत बंट गई। ताकत बंटने पर हानि ही होती है। उधर, उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी का मुखिया बनने के कई योग्य दावेदार हैं लेकिन पार्टी की कमान मिली मुलायम यादव के बेटे अखलेश यादव को। कोई भी परिवार सत्ता विमुख नहीं होना चाहता। बड़े नेता किसी भी कीमत पर पद से या तो खुद चिपके रहते हैं या फिर अपने आत्मीय को वहां सुशोभित कर देते हैं।
कांग्रेस तो जैसे गांधी परिवार की जागीर बन गई है। दुनियाभर के विरोध के बाद भी किसी और को मौका नहीं दिया जा रहा। सोनिया गांधी (एडविग एंतोनिययो अल्बिना मैनो) का विदेशी होने का मुद्दा कितना उछाला गया सभी जानते हैं, नतीजा भी सबके सामने है। कहने को तो सोनिया त्याग की मूर्ति बना दी गई हैं। कहा जाता है कि विरोध के कारण ही उन्होंने प्रधानमंत्री का पद स्वीकार नहीं किया। सच्चाई क्या है कानून विशेषज्ञ अच्छी तरह जानते हैं। सोनिया को विरोध की इतनी ही परवाह थी तो राजनीति से ही दूर क्यों नहीं हो गई। क्योंकि गांधी परिवार कांग्रेस की हुकुमत नहीं छोडऩा चाहता। राहुल गांधी से अधिक लोकप्रिय हैं प्रियंका वाड्रा लेकिन वे सोनिया की बेटी हैं बेटा नहीं। भारत में पितृसत्तात्मक समाज है। प्रियंका को कांग्रेस का उत्तराधिकारी बनाने से सत्ता गांधी परिवार के पास नहीं रहेगी। इस बात को सोनिया गांधी अच्छी तरह समझती हैं। तभी तमाम कांग्रेसियों और जनता के आग्रह के बाद भी वे प्रियंका वाड्रा को प्रत्यक्ष राजनीति में लेकर नहीं आतीं। हालांकि चुनाव के वक्त उनकी लोकप्रियता का जमकर उपयोग किया जाता है। 
उत्तर प्रदेश में चुनावी घमासान चल रहा है। प्रचार जोरों पर है। प्रियंका वाड्रा कांग्रेस और राहुल गांधी के समर्थन में रायबरेली और अमेठी में जमकर चुनाव प्रचार कर रहीं हैं। उनको देखने और सुनने हजारों की तादात में भीड़ पहुंच रही है। उनकी लोकप्रियता को देखकर उनके पति रॉबर्ट वाड्रा का मन राजनीति में कूदने का होता है। 6 फरवरी को वे प्रियंका के साथ प्रचार करने पहुंचे। यहां उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि जनता चाहेगी तो वे भी राजनीति में आने को तैयार हैं। वे चुनाव लडऩा चाहते हैं। जब पत्रकारों ने राबर्ट से सवाल किया कि प्रियंका क्या हमेशा प्रचार ही करती रहेंगी या चुनाव भी लड़ेंगी? जवाब में रॉबर्ट ने कहा कि हर चीज का वक्त होता है। सबकुछ समय आने पर ही होता है। अभी प्रियंका का राजनीति में आने का वक्त नहीं है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि अभी राहुल गांधी का वक्त चल रहा है। आगे प्रियंका का भी वक्त आएगा, तब वे राजनीति में आएंगी। रॉबर्ट वाड्रा के इस बयान को आधा दिन भी नहीं बीता था कि प्रियंका को खुद इसका खंडन करना पड़ा। उन्होंने कहा कि उनके पति व्यवसाय में बहुत खुश हैं वे राजनीति में नहीं आएंगे। जरूर पत्रकारों ने कोई आड़ा-टेड़ा सवाल किया होगा तभी उनके मुंह से उक्त बयान निकल गया होगा। लेकिन, सच यह है कि वहां प्रियंका के लिए जनता का उत्साह देखकर रॉबर्ट के मुंह से दिल की बात निकली थी। जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है कि सोनिया गांधी नहीं चाहती कि प्रियंका गांधी राजनीति में आए। इसलिए ही शाम तक प्रियंका को सफाई देनी पड़ गई। 
एक यक्ष प्रश्न है। इसके उत्तर की खोज करने पर भी संभवत: स्पष्ट हो जाएगा कि यह सच है कि सोनिया गांधी अपनी बेटी प्रियंका वाड्रा (जो अब गांधी नहीं रही) संसद में कभी प्रवेश नहीं करने देंगी। संसद में प्रवेश कर भी लिया तो कांग्रेस में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं दी जाएगी। यक्ष प्रश्र यह है कि जब प्रत्येक पार्टी एक-एक सीट जीतने के लिए गुंडा, बदमाश, दागी उम्मीदवारों को भी टिकट बांट रहीं हैं ऐसे में एक साफ-सुथरी छवि और निश्चित विजय प्राप्त करने वाली उम्मीदवार को टिकट क्यों नहीं दिया जाता? उससे महज प्रचार ही क्यों कराया जा रहा है? कुछ लोग कह सकते हैं राजनीति में गंदगी है इसलिए सोनिया गांधी अपनी बेटी को राजनीति से दूर ही रखना चाहती हैं। राजनीति इतनी ही गंदी है तो वह खुद क्यों राजनीति में हैं या अपने बेटे को राजनीति में क्यों आगे बढ़ा रही हैं। कुछ लोग कह सकते हैं प्रियंका को भी राजनीति में लाने से परिवारवाद का आरोप लगेगा। सो तो अभी भी लगता ही है। यह भी कहा जा सकता है कि प्रियंका गांधी ही राजनीति नहीं करना चाहती। भई, प्रचार के लिए जी-जान लगाना भी राजनीति ही है। यह तो गुड़ खाए गुलगुलों से परहेज वाली बात हो गई। एक जिताऊ प्रत्याशी को टिकट नहीं देना गहरी राजनीति की बात है। 
पंचू का पंच : भैय्ये कांग्रेस जागीर है। गांधी परिवार जागीरदार। राहुल बाबा जागीर के उत्तराधिकारी तो प्रियंका वाड्रा कौन खेत की मूली। 

शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2012

मेरे मणिक मुल्ला 'दाऊ बाबा'

 सू रज का सातवां घोड़ा अर्थात् वह जो सपने भेजता है। धर्मवीर भारती का बहुचर्चित और अनूठे तरीके से लिखा गया उपन्यास है सूरज का सातवां घोड़ा। यह भी कह सकते हैं कि यह उपन्यास नहीं वरन् कहानियों का गुच्छ है। इस उपन्यास का सूत्रधार है मणिक मुल्ला। मणिक मुल्ला जिस मोहल्ले में रहता था उसी मोहल्ले और आसपास के कुछ युवा गर्मी की दोपहर में उसके पास समय काटने के लिए आ जाते थे। मणिक मुल्ला उनको कहानियां सुनाया करता था। मणिक की कहानियां निष्कर्षवादी हैं। सूरज का सातवां घोड़ा में मणिक मुल्ला लेखक और उसके मित्रों को लगातार सात दोपहर में सात कहानियां सुनता है। दोपहर होते ही लेखक और उसके मित्र मणिक के घर पहुंच जाया करते थे। 
पहली दोपहर जब लेखक अपने दोस्तों के साथ मणिक मुल्ला के घर पहुंचा तो अहसास हुआ कि मैं भी उस मित्र समूह में शामिल हूं। हां, मुझे अपना बीता वक्त याद आ गया था। मेरा गांव। गांव के दोस्त। पहाड़। खेत-खलियान। सोना गाय और झुर्रियों वाला एक खास चेहरा। दाऊ बाबा का चेहरा। असली और पूरा नाम हरभजन सिंह किरार। वे गांव में ही रहते हैं। अब तो काफी वृद्ध हो गए होंगे। बहुत दिन से तो उन्हें देखा ही नहीं। ख्याल आया कि मेरे मणिक मुल्ला तो दाऊ बाबा हैं। हां, उन्होंने मुझे और मेरे दोस्तों को खूब कहानियां सुनाई हैं। अंतर इतना ही तो है कि मणिक मुल्ला दोपहर में कहानी सुनाता था जबकि दाऊ बाबा रात में। स्कूली शिक्षा के दौरान परीक्षा के बाद गर्मियों में तीन माह की छुट्टी मिलती थी। मेरे ये तीन महीने गांव में बीतते थे। समय के साथ यह सब छूट गया। अब तो कभी-कभार ही गांव जाना हो पाता है। वह भी दिनभर या एक-दो दिन के लिए। गांव में पहाड़ है उसी की तलहटी में बाबा (दादा), चाचा, दाऊ बाबा, दोस्त लोग रात को खटिया बिछाकर सोते थे। दरअसल, वहीं हमारे गौत (जानवर बांधने की जगह) भी थे। पशुधन की देखभाल के लिए सभी वहां सोते थे। लेकिन, मैं तो दाऊ बाबा से कहानियां सुनने के लिए वहां सोने जाता था। कहानियों का खजाना था उनके पास। मेरी फरमाइश पर ही कोई कहानी दोबारा सुनाई जाती थी वरना तो हर रोज एक नई कहानी। उनकी कहानियों में राजाओं का शौर्य, देशभक्त योद्धाओं की वीरता, भारत का वैभव, नारियों की महानता और पवित्रता, धर्म की विजय, अधर्म का नाश, मां की ममता, पिता का आश्रय, मेहनत कर सफल होने वालों की दास्तां, व्यापारियों के किस्से, परियों की खूबसूरती सब कुछ मिलता था। मैं बड़े चाव से उनसे कहानियां सुनता था। कहानी के अंत में वे भी मणिक मुल्ला की तरह निष्कर्ष निकाला करते थे। एक तरह से वे हमें कहानी से शिक्षित करने का प्रयास करते थे। निश्चित तौर पर उनसे सुनी कहानियों का असर मेरे जीवन पर पड़ा है और अभी भी है। 
धर्मवीर भारती के उपन्यास में या कहें मणिक मुल्ला की कहानियों में राजा-रानी, परी-देवताओं के किस्से तो नहीं थे। लेकिन, मध्यमवर्गी समाज का सटीक चित्रण है। आर्थिक संघर्ष है, निराशा के घनघोर बादलों के बीच आशा की रोशनी है। भरोसा तोड़ते लोगों के बीच भी विश्वास श्वांस लेता दिखता है। निश्छल प्रेम है। कपट है। क्रोध है। दोस्ती और दुश्मनी भी है। दु:ख है तो सुख भी है। सूरज के सातवां घोड़ा उपन्यास में मणिक मुल्ला ने कहानियों को इस ढंग से सुनाया है कि जो लोग सुखान्त उपन्यास के प्रेमी हैं वे जमुना के सुखद वैधव्य से प्रसन्न हों, लिली के विवाह से प्रसन्न हों और सत्ती के चाकू से मणिक मुल्ला की जान बच जाने पर प्रसन्न हों। जो लोग दु:खान्त के प्रेमी हैं वे सत्ती के भिखारी जीवन पर दु:खी हों, लिली और मणिक मुल्ला के अनन्त विरह पर दुखी हों। लेकिन, दाऊ बाबा अपनी कहानियों से किसी को दु:खान्त का  प्रेमी होने का मौका नहीं देते थे। वे सुखान्त के उपासक थे। कहानी सुनने वाले के मस्तिष्क में सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो, मन में आत्मविश्वास हिलोरे ले, यही उनका प्रयास रहता था। हालांकि उनकी कहानियां मौलिक नहीं थी। वे कहानियां गढ़ते नहीं थे बल्कि उन्होंने कहानियों का संग्रह किया था अपने पूर्वजों से, धार्मिक ग्रंथों से। कभी-कभी वे स्वयं के अनुभव भी सुनाया करते थे ठीक कहानी की तरह। लम्बा अरसा बीत गया उन्हें सुने हुए। उन्हें सुनने की कामनापूर्ति का स्वांग रचा मैंने।
     सूरज का सातवां घोड़ा में मणिक मुल्ला को दाऊ बाबा माना और लेखक की जगह स्वयं को रखा। उपन्यास खत्म होने पर एक अलहदा अहसास था। लगा फिर से वही पहाड़ की तलहटी में खटिया बिछाकर दाऊ बाबा की कहानियों का आनंद ले रहा हूं। मणिक मुल्ला की कहानियों से मिले आनंद की खुमारी टूटी भी न थी एक सुबह मां का फोन आया। मां कह रही थीं - दाऊ बाबा नहीं रहे। कल गांव जाऊंगी तेरे पिताजी के साथ। तुझे तो छुट्टी नहीं मिलेगी। फोन उठाया था तब मैं नींद में था लेकिन यह सब सुनकर मैं सन्न रह गया। बाद में मां से और कितनी देर तक, क्या बात हुई कुछ ठीक से याद नहीं रहा। याद रहा बस इतना कि मेरा मणिक मुल्ला चला गया। 

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