शनिवार, 14 जनवरी 2012

बड़ा मुश्किल होता है अपनों से दूर होना

 ए क बरस और बीत गया। मैं 28 साल का हो गया। मेरे जीवन का 28वां साल उडऩ खटोले पर सवार होकर आया था। पता ही नहीं चला कब गुजर गया। मैं बस देखता रहा और वो तरसाकर चलता बना। इस साल बहुत कुछ पाया तो बहुत कुछ नहीं। कुछ पाकर भी नहीं पा सका। इस बहुत कुछ खोया भी तो बहुत कुछ खोकर भी नहीं खोया। कुल जमाकर कुछ नए पाठ सीखने को मिले। 28वें वसंत की शुरुआत में ही प्रणय सूत्र में बंध गया था। 21 जनवरी को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश किया। तीन माह प्रेम से गुजरे ही थे कि विरह ने आकर घेर लिया। और अधिक ऊंचा पढऩे की ख्वाहिस से राजधानी भोपाल चला आया। राजधानी में पत्रकारिता करने की अदम्य लालसा भी थी। भोपाल ट्रांसफर करने के लिए कंपनी में अर्जी दे रखी थी। मई में फरमान आ गया-भोपाल जाना है। अद्र्धांगिनी को यह स्वीकार न था कि मैं उसे छोड़कर जाऊं और वह भरेपूरे परिवार को छोड़कर जाए। उस रात वह देर तक रोयी थी। मुझसे बात भी नहीं की थी। एक क्षण तो उसके आंसुओं ने मेरे पैरों में बेढिय़ां ही डाल दी थीं। अंततोगत्वा मेरा जाना तय हुआ। इधर, इन दिनों मेरी मां का भी बुरा हाल था। वो कई बार मुझसे पूछ चुकी थीं - तेरा जाना जरूरी है क्या? यहीं रहकर पढ़ाई नहीं हो सकती क्या? जैसे-तैसे करके मैं उन्हें समझा सका। विदा करते वक्त दरवाजे पर मां-पिता, दादा-दादी, भाई-बहिन सब थे।  शहर से दूर जाने का मेरा यह पहला मौका नहीं था। हर साल मैं 10 से 20 दिन के प्रवास पर घर से बाहर जाता ही था। लेकिन, इस बार मैं लम्बे समय तक वापस घर नहीं आने के लिए शहर छोड़ रहा था। दरवाजे से सटकर मेरी मां खड़ी थी। भाई स्कूटर लेकर तैयार था। मेरी और मां की आंखों में आंसुओं का सैलाब उमड़ रहा था। दोनों एक-दूसरे के सामने रोना नहीं चाहते थे। सब मुझे देख रहे थे, मैं बारी-बारी से सबको। आंसुओं की झीनी परत के कारण मुझे सबके चेहरे धुंधले नजर आ रहे थे। ठीक वैसे ही धुंध छाए कांच की दूसरी ओर देखने पर दिखता है। ठीक वैसे ही जैसे सर्द मौसम में हल्की धुंध में चीजें लिपटी हुई होती हैं। भाई स्टेशन तक छोडऩे आया था। मैं स्कूटर पर पीछे बैठा था। अब मां सामने नहीं थी। आंसुओं को और बांध न सका। बह गए सब।
      भोपाल के हर चौराहे से सफलता की सौ राहें फूटती हैं। लेकिन, शुरुआती दिनों में मुझे सिर्फ घर जाती राह ही नजर आती थी। मेरा व्यथित मन देख साथ देने के लिए श्रीमती जी भी भोपाल आ गईं। इधर, यहां भी आवोहबा मुझे भाने लगी। धीरे-धीरे ही सही लेकिन कब मैं भोपाली हो गया पता ही नहीं चल सका। भोपाल के ताल ने मेरा बड़ा साथ दिया। जब भी उदास हुआ या आनंद की अनुभूति हुई अपने अभिन्न मित्र दीपक सोनी के साथ पहुंच जाता था ताल के किनारे। घंटो उसे देखता रहता। सूरज की रोशनी में भी तो कभी चंद्रमा की चांदनी में ताल से बातें कीं। उसके पास सभी बातों का जवाब था। एक दिन उसने बड़े ही दार्शनिक अंदाज में कहा- मुझे देखो गर्मी में कितना रीत जाता हूं। लेकिन, मुझे उम्मीद रहती है कि वक्त बदलता है। मन सकारात्मक रखो तो बुरे दिन भी मौज से कट जाते हैं। फिर बारिश के बाद में लबालब हो जाता हूं। और भी तमाम बातें वो मुझसे करता था। इस बीच भोपाल में मुझे कई अच्छे दोस्त भी मिल गए। कुछ पहले से ही थे तो माहौल बन गया।
     मेरे प्रेरणास्त्रोत युवा संत स्वामी विवेकानंद का जन्मदिवस मेरी जन्मतिथि (14 जनवरी) से दो दिन पहले (12 जनवरी) को पड़ता है। 'विवेक' से 'आनंद' लेता रहा इसलिए कभी भी निराशा को मन में घर नहीं करने दिया। हालांकि इस साल हमला तो नैराश्य ने कई बार किया था। कई बार उसने मेरे आत्मविश्वास और उत्साह पर हावी होना चाहा। लेकिन, धूल ही चाट सका बेचारा। मेरे पास स्वामी विवेकानंद के प्रेरणादायी विचारों की एक छोटी-सी पुस्तिका थी - 'शक्तिदायी विचार'। इस पढ़कर साहस बटोर लेता और भिड़ जाता अंधेरे से। उम्मीद की दो किरण तो फोड़ ही लाता था। बस फिर क्या चल रही है जिंदगी....

सोमवार, 9 जनवरी 2012

अधूरे मंदिर के आंगन में आधा दिन

 भो जपुर अधूरे लेकिन विशाल शिवालय के लिए मशहूर है। बेतवा नदी किनारे 106 फीट लम्बे, 77 फीट चौड़े और 17 फीट ऊंचे चबूतरे पर शिवमंदिर बना है। इसमें दुनिया के विशालतम शिवलिंगों में शुमार है। योनिपट्ट सहित शिवलिंग की ऊंचाई 22 फीट है। इस विशाल मंदिर को उत्तर भारत का सोमनाथ कहा जाता है। परमार वंशीय राजा भोज (1010-1055 ई.) को सांस्कृतिक कार्यों, शिव भक्ति और सरस्वती उपासना के लिए इतिहास के पन्नों में जीवत रखा गया है। राजा भोज प्रकांड पण्डित और विद्याप्रेमी थे। ज्योतिष, राजनीति, दर्शन, वास्तु, व्याकरण और चिकित्सा शास्त्र के ज्ञाता थे। इन विषयों पर दो दर्जन से अधिक ग्रंथ उन्होंने लिखे थे। राजा भोज के राज्य के संबंध में 11 अभिलेख उज्जैन, देपालपुर, धार, बेटमा और भोजपुर सहित अन्य जगहों से मिले हैं। राजा भोज का राज्य चित्तौड़, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भिलसा (वर्तमान विदिशा), खानदेश, कोंकण, और गोदावरी की घाटी के उत्तरी भाग तक विस्तृत था। इस विशाल राज्य की राजधानी धारा नगरी (वर्तमान धार) थी। इन्हीं राजा भोज ने भोजपुर में विशाल शिव मंदिर का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि गगन को चूमते इस शिवालय का निर्माण 24 घंटे में किया गया था। किन्हीं कारणों से मंदिर को पूरा नहीं बनाया जा सका। इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि किसी विधर्मी ने इसे तोड़ दिया हो। मंदिर अधूरा है लेकिन भव्य है।
      इसी अधूरे मंदिर के आंगन में शानदार दिन बीता अपने साथियों के साथ। 25 दिसंबर, 2011 की इतवारी सुबह थी वह। मौसम सर्दी का था लेकिन अहसास वसंत सा। एक छोटी कार (मारुति 800) में छह लोग (मनीष गीते, अनिल चौधरी, मनोज अवस्थी, बलवीर नेगी, स्मृति मिश्रा और मैं यानी लोकेन्द्र सिंह राजपूत) जमा हुए और निकल पड़े शिवमय होने को। भोपाल से भोजपुर करीब 32 किलोमीटर के फासले पर है। इस फासले को तय करते वक्त ही आपको अहसास होने लगेगा कि आप बेहतरीन सफर पर हैं। मुख्य शहर के पीछे छूटते ही प्रकृति की सुन्दरता का साथ मिलता है। सड़क का एक हिस्सा दोनों और से ऊंचे-ऊंचे तरुओं के बीच था। यहां से गुजरते वक्त लगा कि हरे पेड़ों की गुफा से निकल रहे हैं लेकिन काली खोपड़ी का इंसान इस सुन्दरता को शायद अधिक दिन तक नहीं रहने देगा। सड़क के दोनों ओर स्थित खेतों में अट्टालिकाएं खड़ी करने की तैयारियां हैं। प्रकृति के निश्छल सौंदर्य का आनंद लेते हुए कब शिव के द्वार पहुंच गए पता ही नहीं चला। अमूमन शिवालय में सोमवार को अधिक लोग पहुंचते हैं लेकिन यहां रोज ही सोमवार होता है। हां, यह बात अलग है कि बाकी के दिनों में असल सोमवार की अपेक्षा भीड़ कम होती है लेकिन शिव के दरबार में रोज रौनक रहती है। ऊंचे चबूतरे पर अपना सिंहासन जमाए शिव एक राजा के जैसे ही लगे मुझे तो। लगा कि यहां से वो छोटी-सी दुनिया पर निगाह रखे हुए हैं।
         स्कॉटलैंड के प्रसिद्ध भूगर्भ विज्ञानी जेम्स हटन ने लिखा है कि चट्टानें पृथ्वी की इतिहास रूपी किताब के पन्ने हैं। भोजपुर शिवालय के समीप पसरी चट्टानें और उन पर उकेरे गए नक्शे जेम्स हटन के कथन को पुख्ता करते हैं। मैं इतिहासवेत्ता नहीं और न ही भूगर्भ वैज्ञानिक लेकिन इन नक्शों को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि परिसर में और भी मंदिर या भवनों का निर्माण होना था। नक्शों के अध्ययन के बाद यह कहा भी जाने लगा है। रास्ते में आते वक्त भोजपुर के समीप की चट्टानों पर अधूरे-पूरे कई शिवलिंग पड़े हुए भी दिखे। संभवत: अन्य मंदिरों में उनका उपयोग किया जाता। नक्शों को सहेजने के लिए जहां-जहां नक्शे हैं रेलिंग लगा दी गई है। चट्टानों पर अंकित नक्शों को देखकर मैं तो यही सोच रहा था कि क्या कमाल के कारीगर थे, पत्थर पर ही कहां, क्या बनना है? कैसे बनना है खींच लिया। मंदिर के गर्भगृह में भी शानदार कारीगरी का नमूना देखने को मिलता है। द्वारपाल, नदी देवी और परिचायकाएं सहित कमलछत्र का सुरुचिपूर्ण अंकन है।
       आगे बढ़ते हैं। शिव मंदिर बेतवा नदी के तीर पर बना है। नदी का अपना आकर्षण होता है। सौंदर्य होता है। इस वक्त बेतवा नि:शब्द थी। जलराशि कम थी। बारिश में बेतवा अपने यौवन पर होती होगी। तब निश्चित ही वह उसके ठहरे हुए पानी में अठखेलियों में मग्न युवतियों की मांनिद इतराती होगी। अपनी हंसी से वह नदी प्रेमी को मदहोश करती होगी। एक कमाल की बात बताता हूं नदी जादूगरनी होती है। मानो न मानो मुझ पर तो उसका जादू चलता है। नदी और पहाड़ का अप्रतिम सौंदर्य हरेक को अपनी ओर खींचता है। नदी को बांधना मुझे कतई पसंद नहीं। उसके बहते रहने में ही आनंद है। खैर नदी की बातें फिर कभी। राजा भोज ने 11वीं शताब्दी में बेतवा को बांधने के लिए बांध बनवाया था। बांध निर्माण के अस्तित्व आज भी मौजूद हैं। उस समय बांध निर्माण आज की तरह नहीं था, न तकनीक के लिहाज से और न स्वार्थ के लिहाज से। राजा ने खेतों की सिंचाई के लिए इसका निर्माण कराया था। बांध बेहद मजबूत था। इस तथ्य का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 15वीं शताब्दी में बांध को तुड़वाने में तीन माह का समय लगा। वहीं डूब क्षेत्र का दलदल सूखने में कई वर्ष लग गए।
      भोजपुर एक शानदार जगह है। यहां से आने का मन तो नहीं हो रहा था लेकिन शाम को दफ्तर पहुंचना था। शिव और नदी से विदा लेकर भोपाल की ओर चल दिए। घुमक्कड़ों को एक बार तो यहां आना ही चाहिए। अपुन तो अब यहां बार-बार आएंगे। आज तो महज आधा दिन ही बिताकर जा रहा हूं किसी दिन पूरा दिन बिताने आऊंगा इस अधूरे मंदिर के आंगन में।




मंदिर के समीप एक प्राचीन प्रतिमा।


मंदिर के समीप की चट्टानों पर अंकित नक्शे।



विशालतम शिवलिंग, भोजपुर।


विशाल लेकिन अधूरा शिव मंदिर।


lokendra singh rajput, bhojpur

मंगलवार, 3 जनवरी 2012

उनका हिन्दू होना ही दुर्भाग्य है !

 को ई भी इंसान अपनी जमीन यूं ही नहीं छोड़ता। उसके साथ उसके पुरखों की याद जुड़ी होती है। लेकिन, पाकिस्तान में हिन्दू एक क्षण भी नहीं रहना चाहते। वे अपनी जमीन, जायदाद सबकुछ छोड़कर बस वहां से भाग जाना चाहते हैं। हाय री दुनिया! उनके लिए यह भी तो मुमकिन नहीं। हिन्दुओं के देश में ही उन्हें रहने को ठौर नहीं मिल रहा तो कहीं और का खयाल कैसे किया जाए। पाकिस्तान से आए १५१ हिन्दुओं पर बैरी सरकार की नजर है। इनका वीजा समाप्त हो गया है। इसलिए सरकार उन्हें यहां से घसीटकर फिर से पाकिस्तानी नर्क में धकेल देना चाहती है। जहां न उनकी इज्जत है न उनके काम की। उनके धर्म को तो वहां हिकारत की नजरों से देखा जाता है। उनकी नाबालिक और जवान बेटियों-बीवीयों पर पाकिस्तानी युवकों-बूढ़ों की नजर ठीक वैसे ही रहती है जैसे कुत्तों की नजर हड्डी पर। लड़कियों का अपहरण, जबरन धर्मांतरण, बेरोजगारी, मताधिकार पर प्रतिबंध, आए दिन प्रताडऩा.... पाकिस्तान में हिन्दुओं की महज २ फीसदी रह गई आबादी को आज यही सब हासिल हैं।
      इस सबसे आजिज आ चुके पाकिस्तानी हिन्दू अब पाकिस्तान में और नहीं रहना चाहते। भारत सरकार भी उनकी मदद नहीं करती। भारत सरकार की ओर से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान में हिन्दुओं की स्थिति सुधारने के लिए बात नहीं की जाती। आखिर क्यों...? क्या इसलिए कि वे हिन्दू हैं। शायद हां। ऑस्ट्रेलिया में आतंकवादी होने के शक में एक मुस्लिम डॉक्टर के पकड़े जाने पर भारत के प्रधानमंत्री को नींद नहीं आ सकी थी। जबकि पाकिस्तान में आए दिन हिन्दुओं के साथ दुराचार हो रहा है, वे और उनकी सरकार तान के चादर सो रही है। पाकिस्तान की स्थानीय एजेंसियों की ओर से किए गए शोध बताते हैं कि पाकिस्तान में हर माह औसत २५ लड़कियों का अपहरण होता है और जबरन उनका धर्मांतरण किया जाता है। नतीजा यह है कि विभाजन के समय पाकिस्तान में हिन्दुओं की आबादी करीब 15 फीसदी थी, जो वर्तमान में महज 2 फीसदी से भी कम रह गई है। हिन्दुओं के पूजा स्थल तोड़ दिए गए या फिर उन पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया। फिलवक्त पाकिस्तान में 428 मंदिरों में से सिर्फ 26 में ही पूजा-पाठ होता है। इतना ही नहीं उन्हें अंतिम संस्कार करने तक की आजादी नहीं है। वहां हिन्दू अपने धर्म के मुताबिक परिजन के शव को जला नहीं सकते। स्थानीय मुस्लिम आवाम दबाव बनाकर शव को दफन करवा देती है।
      ऐसी स्थितियों में भला कोई कैसे रह सकता है? जिन 151 हिन्दुओं को सरकार वापस पाकिस्तान भेजना चाह रही है वे ऐसी ही अपमानजनक स्थितियों से तंग आकर भारत आए हैं। उन्हें उम्मीद थी कि यह उनके अपने हिन्दू भाइयों का देश है। यहां उन्हें सम्मानजनक जीवन जीने के लिए थोड़ी सी जगह मिल सकेगी। लेकिन, दुर्भाग्य कि वे वोट बैंक नहीं है, अल्पसंख्यक नहीं, भारत को अपना मानते हैं भारत विरोधी नहीं है, ऐसे में सरकार उन्हें सिरमाथे कैसे बैठा सकती है। हां, अगर ये हिन्दू नहीं होते तो बांग्लादेशी और पाकिस्तानी घुसपैठियों की तरह इनके राशनकार्ड बनवा दिए जाते, रहने और रोजगार की व्यवस्था कर दी जाती। पिछले दिनों यूपीए सरकार के केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम रामचंद्र ने संसद को लिखित बयान में कहा था कि इन पाकिस्तानी हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान जाना होगा। इनका वीजा समाप्त हो चुका है। जब यह बात मीडिया के जरिए समाज में पहुंची तो कुछ संगठनों की संवेदनाएं जागी। उन्होंने जाकर उनके सुख-दु:ख को जानने की कोशिश की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी व कार्यकर्ता, विश्व हिन्दू परिषद, भारतीय जनता पार्टी और अन्य हिन्दू संगठनों के लोग वहां पहुंचे। संत श्री श्री रविशंकर, स्वामी स्वरूपानंद, स्वामी आनंदस्वरूप सहित अन्य साधु-संत की उनको दिलासा देने पहुंचे। इन पाकिस्तानी हिन्दुओं को भारत में शरण दी जानी चाहिए इस बात को लेकर अखिल भारत हिन्दू महासभा दिल्ली हाईकोर्ट में पहुंची। हिन्दू महासभा की याचिका पर बुधवार को दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यकारी चीफ जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ की बेंच ने विदेश और गृह मंत्रालय से इस मसले पर 29 फरवरी तक जवाब मांगा है। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम. रामचन्द्र के बयान से घबराए हुए ये हिन्दू राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और मानवाधिकार आयोग तक में गुहार लगा चुके हैं। मुसीबत के मारे हिन्दू करें भी तो क्या? यहां उनके अपने सुनवाई नहीं कर रहे बल्कि उन्हें जबरन पाकिस्तान भेजना चाह रहे हैं और वहां मुसलमान उन्हें जीने नहीं देंगे।
      आश्चर्य इस बात पर अधिक है कि पाकिस्तान से आए महज 151 हिन्दुओं को वापस पाकिस्तान भेजने के लिए केन्द्र सरकार कटिबद्ध दिख रही है जबकि सालों से पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान से बड़ी संख्या में अवैध रूप से भारत आए मुसलमानों को उनके देश भेजने को कभी उत्सुक नहीं रही। आजादी के बाद के 60 सालों में कांग्रेस व अन्य तथाकथित सेक्यूलर पार्टियों ने बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से आए घुसपैठियों को बसाने का ही काम किया है न की भगाने का। पश्चिम बंगाल, असम सहित पूर्वांचल के राज्यों में अवैध बांग्लादेशियों के चलते स्थितियां बिगड़ गईं हैं। केन्द्रीय गृहराज्य मंत्री एम रामचंद्र राज्यसभा के एक प्रश्न के उत्तर में बताते हैं कि देश में करीब 70 हजार विदेशी अवैध तरीके से रह रहे हैं। इनमें 28 हजार से अधिक बांग्लदेशी हैं। इसके अलावा 13747 अफगानिस्तानी, 8319 पाकिस्तानी, 2461 अमरीकी, 1817 ब्रिटिश और 662 चीनी अवैध तरीके से भारत में रह रहे हैं। उक्त सभी आंकड़े सरकारी हैं। वास्तविकता इससे अलग है। देश में बांग्लादेश से और बांग्लादेश के रास्ते पाकिस्तान, अफगानिस्तान के लोग भारी संख्या में आए दिन घुसपैठ करते हैं। सरकार 151 हिन्दुओं को भगाने के लिए तो आतुर दिख रही है लेकिन अन्य के बारे में कोई कार्रवाई करने के मूड में नहीं दिखती। पिछले दिनों एक शोध में बताया गया कि बांग्लादेश, असम और पूर्वांचल के राज्यों में इन अवैध विदेशियों को वोट की खातिर राशनकार्ड, वोटर आईडी बनवा दिए गए। वैध तरीके से बने फर्जी दस्तावेजों के आधार पर कई बांग्लादेशियों ने तो नगरीय निकाय के चुनाव भी लड़े और जीत भी हासिल की। कहा जा रहा है कि पाकिस्तान से आए लोगों का धर्म हिन्दू है इसलिए इनको सरकार से मदद की आशा नहीं रखनी चाहिए।
      पाकिस्तान में हिन्दुओं की दुर्दशा के गवाह हैं दिल्ली के मजनूं टीला में डेरा डाले 151 पाकिस्तानी हिन्दू : पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या स्थिति है, यह किसी से छिपी नहीं है। भारत सरकार भी इस बात से भली-भांति परिचित है। भारत में पर्याप्त आजादी के बाद भी अल्पसंख्यकों के अधिकारों के लिए छाती पीटने वाले बुद्धिजीवी, सेक्यूलर और एक्टिविस्ट भी जानते हैं कि कैसे पाकिस्तान में 62 सालों में हिन्दू 15 फीसदी से महज 2 फीसदी रह गए। लेकिन, सवाल उठता है सब जानते हैं तो बोलते क्यों नहीं? भारत के अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता तो अंतरराष्ट्रीय पटल तक करते हैं लेकिन पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की रक्षा पर घर में ही चुप्पी साध लेते हैं। मीडिया कई दफा पाकिस्तान में हिन्दुओं की क्या दुर्दशा हो रही है इसकी जानकारी देती रहती है। कुछ राष्ट्रवादी सोच के पत्र-पत्रिका भी समय-समय पर पाकिस्तान के हिन्दुओं के हितों की चिंता करते दिखती हैं। इनके दिए आंकड़ों को तो सरकार के लोग और बुद्धिजीवी सेक्यूलर झूठ का पुलिंदा करार दे देते हैं। मेरे ही एक आलेख पर दिल्ली के एक पत्रकार अंगुली उठाते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान में ऐसा नहीं होता आपकी जानकारी गलत है। पता नहीं किस ने आपको यह जानकारी मुहैया कराई है। वहां हिन्दू लड़कियों के साथ बलात्कार, जबरन धर्मांतरण, टेरर टैक्स जैसी कोई बात नहीं। उन महाशय और उनके जैसे तमाम सेक्यूलरों को जवाब देने के लिए दिल्ली के मजनूं टीला में डेरा डाले 151 पाकिस्तानी हिन्दू मौजूद हैं।
इंडिया टुडे की रपट कहती है कि पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों का अपहरण आम बात है : हिन्दी की प्रतिष्ठित समाचार पत्रिका इंडिया टुडे ने अपने 1 जून, 2011 के अंक में बताया है कि पाकिस्तान में हिन्दुओं का जीना मुहाल है। उनका हर दिन खौफ के साए में गुजरता है। मुसलमानों के लिए बने प्याऊ से हिन्दू पानी भी नहीं पी सकता। अपने परिजनों का अंतिम संस्कार करने तक की आजादी उन्हें नहीं है। उन्हें मजबूरी में इस्लाम की शिक्षा ग्रहण करनी पड़ती है क्योंकि वहां के सभी स्कूलों का इस्लामीकरण कर दिया गया है। हाल ही में अमरीका की एक सरकारी संस्था की रिसर्च बताती है कि पाकिस्तान के स्कूलों में भारत और हिन्दुओं के खिलाफ घृणा का पाठ पढ़ाया जाता है। इंडिया टुडे की रपट बताती है कि कराची की एक फैक्टरी में हिन्दू कर्मचारी जगदीश कुमार की हत्या फैक्टरी के ही मुसलिम साथियों ने कर दी। उस पर इस्लाम की निंदा करने का आरोप लगा दिया गया। पेशावर के जगदीश भट्टी इंडिया टुडे को बताते हैं कि नौकरी पाने के लिए उनके बेटे को मुसलिम नाम रखना पड़ा। पुलिस अधिकारियों ने नाम गुप्त रखने की शर्त पर इंडिया टुडे को बताया कि कई हिन्दुओं से सुरक्षा के नाम पर हर माह वसूली की जाती है। पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की परिषद के सदस्य और सामाजिक कार्यकर्ता अमरनाथ मोटूमल इंडिया टुडे को बताते हैं कि अकेले कराची में ही हिन्दू लड़कियों का अपहरण आम बात है। आगे पत्रिका में लिखा है कि नगरपारकर इलाके की 17 साल की एक लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया जबकि आकली गांव की 15 साल की लड़की का अपहरण कर जबरन उसका धर्म परिवर्तन किया गया।
तहलका की विशेष खबर बताती है पाकिस्तान में हिन्दू होना गुनाह : स्वतंत्र, निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता के लिए प्रसिद्ध पत्रिका तहलका ने 31 दिसंबर 2011 के अपने अंक में पाकिस्तान से आए 151 हिन्दुओं के मुख से पाकिस्तान में हिन्दुओं के हालात का जिक्र किया है। तहलका के संवाददाता को इन हिन्दुओं में से 22 वर्षीय दयाराम बताते हैं कि वहां हिन्दुओं का धर्म नहीं है। हम लोगों को डराया धमकाया जाता है। धर्म बदलने को कहा जाता है। स्कूलों में सिर्फ इस्लाम की शिक्षा देते हैं। परेशानियां सह कर अगर हिन्दू पढ़ भी ले तो उसे नौकरी नहीं मिल पाती। एक नौजवान बताता है कि हम स्कूल में जवान लड़कियों को पढऩे नहीं भेजते थे क्योंकि वहां लोग हिन्दू लड़कियों को अगवा कर धर्म परिवर्तन करा कर निकाह करा लेते हैं। जैसे आपके यहां लड़कियां आराम से अकेले दिल्ली से मुंबई चली जाती हैं, वैसे हमारे यहां इतनी दूर अकेले नहीं जा सकतीं। 35 वर्षीय आशा देवी कहती है कि यहां हमने पहली बार दिवाली इतनी खुशी से मनाई। वहां तो पता ही नहीं चलता कि त्योहार है। मनाते भी थे तो अपने घर के अंदर एक कोने में एक-दो दिए जला कर। होली भी बाहर नहीं खेल सकते थे। सबसे अधिक दु:ख वाली बात है कि वहां अंतिम संस्कार भी आप अपने ढंग से नहीं कर सकते। इस बारे में सुनील ने तहलका को बताया कि वहां हिन्दुओं को मरने के बाद जलाने भी नहीं दिया जाता है। शव जलाने के वक्त लोग पुलिस लेकर आ जाते हैं कि जलाओ मत, हमें बदबू आती है। दो-तीन दिन तक लाश ऐसे ही पड़ी रहती है। फिर कुछ लोग दबाव में आकर दफना देते हैं।
      बहरहाल, इन सब बातों को जानने के बाद भी सरकार इन हिन्दुओं को पाकिस्तान भेजती है तो लानत है ऐसी सरकार पर। केन्द्र सरकार को चाहिए कि पाकिस्तान से आए इन हिन्दुओं बयानों को आधार बनाकर अंतरराष्ट्रीय पटल पर मजबूती के साथ पाकिस्तान में रह रहे अन्य हिन्दुओं की हितों की रक्षा के लिए पाकिस्तान की सरकार पर दबाव बनाए। साथ पाकिस्तान में मानवाधिकारों की क्या स्थिति है इस बारे में दुनिया को बताया जाए।

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