रविवार, 8 अप्रैल 2012

धवल राजनीति की पैरोकार थीं राजमाता


 पु  ण्यश्लोका राजमाता पुस्तक महज 69 पृष्ठों की है। 26 संक्षिप्त अध्याय हैं। इनमें ही राजमाता के सहज-सरल और उन्नत व्यक्तित्व को श्री नरसिंह जोशी जी ने प्रस्तुत किया है। पुस्तक अति लघु है क्योंकि राजमाता के बारे में पढऩे का मन अधिक है। उनके प्रेरक और विराट व्यक्तित्व को जानने की ललक अधिक है। पुण्यश्लोका राजमाता को पढ़कर यह ललक और बढ़ जाती है। नरसिंह जोशी जी ने इस लघु पुस्तक में राजमाता के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व, धर्म के प्रति प्रेम-आस्था, पर्यावरण की चिंता, समाज की चिंता, स्वदेशी प्रेम को बखूबी रेखांकित किया है। साथ ही सदैव-सदैव के लिए राजनीति का चित्र और चरित्र क्या होना चाहिए इस ओर भी पुस्तक इंगित करती है। राजमाता का असल नाम लेखा दिव्येश्वरी था। पिता डिप्टी कलेक्टर थे लेकिन ननिहाल नेपाल राजघराने से संबंध रखता था। राजमाता का जन्म सागर में हुआ। यहीं उनकी पढ़ाई हुई। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही उनकी राष्ट्रभक्ति का प्रादुर्भाव हो गया था। उन्होंने अपनी सहेलियों के साथ विदेशी वस्त्रों को त्यागने की शपथ ली और स्वदेशी को अपना लिया। जीवन की अंतिम सांस तक राजमाता जी अपनी इस शपथ का पालन करते दिखीं वे बहुत ही सात्विक जीवन जीती रहीं। धर्म पारायणता उन्होंने अपनी नानी से सीखी। राजमाता भगवान कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। 
       पुस्तक में नरसिंह जोशी जी ने लिखा है कि वे हमेशा अपने साथ एक सुन्दर से बक्से में कृष्ण की प्रतिमा साथ रखती थीं। तमाम वैभव होने के बाद भी उनका जीवन संकटों के बीच गुजरा। असमय उनके पति महाराज जीवाजीराव सिंधिया का निधन, आपातकाल में जेल की यातानाएं, विपरीत समय में पुत्र माधवराव सिंधिया उनसे दूर हो गए। इन सबके बाद भी राजमाता अपने कर्तव्य पर डटी रहीं। उन्होंने कभी अपने को हारने नहीं दिया। अन्याय का सदैव विरोध किया। राजमाता पहली बार कांग्रेस के टिकट पर जीतकर संसद गईं हालांकि राजमाता कभी-भी कांग्रेस पार्टी में जाना नहीं चाहती थीं। उनका असल राजनीतिक जीवन तो 1966 से शुरू हुआ। 17 सितंबर 1966 में ग्वालियर में छात्रों के प्रदर्शन पर पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया। कांग्रेस से मुख्यमंत्री द्वारिका प्रसाद मिश्रा की सरकार ने छात्रों पर गोली भी चलवाईं। इसमें एक छात्र मारा गया। इस प्रसंग के बाद राजमाता जी कांग्रेस के प्रति मन खीझ जाता है। वे 1967 के चुनाव से पूर्व कांग्रेस का त्यागकर काफी सोच-विचारकर जनसंघ में प्रवेश करती हैं। राजमाता ने अथक प्रयासकर द्वारिका प्रसाद की सरकार को मटियामेट कर दिया। जनसंघ से जुडऩे और मप्र से कांग्रेस को उखाड़ फेंकने के कारण कांग्रेस नेतृत्व उनसे चिढ़ गया। इसके बाद कांग्रेस ने उनके खिलाफ साम-दाम-दण्ड की नीति अपनाई। आपातकाल में राजमाता को तिहाड़ जेल में रखा गया। धीमे-धीमे राजमाता की निकटता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद और अन्य राष्ट्रवादी संगठनों से बढ़ी। राजमाता ने संपत्ति जोडऩे से अधिक संपत्ति का जनता के हित में उपयोग हो इस आचरण को समाज के सामने प्रस्तुत किया। 1967 के चुनाव के बाद छत्तीसगढ़ में सूखा की स्थिति में और अतिवृष्टि से चंबल नदी से मुरैना, नर्मदा से होशंगाबाद में आई बाढ़ के समय उन्होंने यथासंभव पीडि़तों की मदद की। 
राजनीति कैसी होनी चाहिए। उसका चरित्र क्या हो। राजनीति का उद्देश्य क्या हो। राजनेताओं का चरित्र और व्यवहार कैसा हो। इसकी झलक वे स्वयं तो प्रस्तुत करती ही थी अन्य को भी इसके लिए प्रेरित करती थीं। इस विषय में उन्होंने मध्यप्रदेश में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनने पर विधानसभा सदस्यों को विस्तृत पत्र लिखा। पत्र में वे लिखती हैं कि यह हमारे लाखों कार्यकर्ताओं की वर्षों की कठिन तपस्या और कठोर परिश्रम का ही फल है कि मध्यप्रदेश के शासन की बागडोर प्रदेश की जनता ने हमें सौंपी है। अक्षम, भ्रष्ट और अत्याचारी इकाई शासन को हटाकर जनता ने हमें सत्ता इसीलिए सौंपी है कि उसे एक साफ सुथरी, ईमानदार, सक्षम और सेवाभावी सरकार मिल सके। इस अवसर पर आपसे कुछ व्यक्तिगत निवेदन करना चाहती हूं। वस्तुत: यह परिवर्तन केवल चेहरों या हाथों का परिवर्तन नहीं, अपितु इसे एक संपूर्ण व्यवस्था का परिवर्तन समझा जाना चाहिए। इसे अंधेरी रात के स्थान पर नए सवेरे के सूरज का उदय समझना चाहिए। अत: जो अंतर अंधेरे और उजाले में होता है, वही अंतर कांग्रेस की और हमारी सरकार के बीच जनता को महसूस होना चाहिए। इस पत्र में वे आगे और लिखती हैं। राजनीतिक सुचिता की बात करती हैं। राजनीति का उद्देश्य और जनता के प्रति उत्तरदायित्व की बात करती हैं। लेखक नरसिंह जोशी जी ने पुस्तक में यह पत्र शामिल किया है। पुस्तक में सुनी-सुनाई बातें नहीं अपितु लेखक के स्वयं के अनुभव हैं। साथ ही प्रमाण सहित उन्होंने राजमाताजी के संदर्भ में अपनी बात लिखी हैं। लेखक ने लंबा राजनीतिक कालखण्ड राजमाताजी के साथ बिताया इस दौरान उन्होंने उनके विराटत्व, गरिमा, सादगी, आध्यात्मिक और संत पक्ष के दर्शन किए। नरसिंह जोशी जी ने महसूस किया कि जनसंघ में शामिल होने के समय और उसके बाद भी कुछ वर्षों तक राजमाताजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को साम्प्रदायिक संगठन मानती थी। उनका कहना था कि कांग्रेस में उन्हें यही बताया गया था। इसलिए उनकी धारणा संघ के प्रति ऐसी ही बन गई। लेकिन, जब बाद में उन्होंंने राष्ट्र के प्रति संघ की तड़प और समर्पण को देखा तो उनकी धारणा बिखर गईं। वे संघ सहित उसके कई अनुषांगिक संगठनों से जुड़ गईं। विश्व हिन्दू परिषद के साथ तो उन्होंने लम्बे समय तक काम किया। राम मंदिर निर्माण का वे प्रबल पक्ष लेती थीं। उनका कहना था कि राम इस देश की आन है जब सर्वविधित है कि एक आक्रांता ने अयोध्या में मंदिर तोड़कर उसके स्थान पर मस्जिद का ढांचा खड़ा किया है। ढांचे के स्थान पर पुन: मंदिर बनना चाहिए। उन्होंने रामजन्मभूमि आंदोलन के लिए काम किया। भाजपा में भी इस मुद्दे पर कई मर्तबा अपनी राय रखी। प्रदेश में गौवंश की रक्षा हो उसके प्रति भी वे चिंतित थीं। वर्ष 1986 में भोपाल में प्रन्यासी मण्डल की बैठक में जब अन्य कार्यवाही चल रही थी तब मंच पर बैठे-बैठे ही राजमाताजी ने गौरक्षा का प्रस्ताव लिखा। अधिकारियों को बताया और आंशिक संशोधन के साथ उस पर बैठक में चर्चा भी हुई। इसके बाद उनके इस प्रयास ने एक बड़ा रूप ले लिया।
पुस्तक में करीब 20 चित्र राजमाताजी से संबंधित प्रकाशित किए गए हैं, ये चित्र इस पुस्तक को और अधिक महत्वपूर्ण व संग्रहणीय बनाते हैं। पुस्तक सभी वर्गों के लिए पठनीय, संग्रहणीय और उपहार देने योग्य है। 
 पुस्तक - पुण्यश्लोका राजमात
लेखक - नरसिंह जोशी
प्रकाशक - सौ. अपर्णा पाटील
संपादिका, यश
एफ-160, हरिशंकरपुरम्, ग्वालियर
मूल्य - 60 रुपए

9 टिप्‍पणियां:

  1. एक मूल्यांकन परक पुस्तक की जानकारी देकर आपने हमें कृतार्थ किया .....!

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  2. सम्मानजनक समर्पण एक पुस्तक के माध्यम से!! अच्छा परिचय!!

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  3. पुस्‍तक के प्रत्‍येक पक्ष को आपने बहुत ही सार्थक शब्‍द दिये हैं जो कि पुस्‍तक पढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं ...आभार सहित बधाई

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  4. बहुत बढ़िया समीक्षा लोकेन्द्र जी....
    हम म.प्र. वासिओं को यूँ भी ग्वालियर घराना सदा आकर्षित करता रहा है.....

    सादर

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  5. पुस्तक की सुन्दर समीक्षा की है आपने ...

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  6. बहुत सुन्दर पुस्तक समीक्षा....

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  7. राजमाता सिधिया के प्रखर राष्ट्र वादी व्यक्तितिव और कर्म को समुचित आलोकित करती समीक्षा .आभार .

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  8. सुन्दर समीक्षा! राजमाता सिन्धिया के बारे में पहली बार इतनी जानकारी पढी। गौवंश की रक्षा की उनकी इच्छा पूरी होना ही उनके लिये एक अनुकूल श्रद्धांजलि होगी।

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