शनिवार, 31 दिसंबर 2011

जब गुंडा ही हीरो हो तो मुश्किल होती है


 हा ल ही में पहली बार मैंने दो फिल्म एक ही दिन में देखीं। एक डॉन-२ और दूसरी लेडीज वर्सेस रिक्की बहल। डॉन-२ में भारतीय सिनेमाई परंपरा के विपरीत कहानी है जबकि लेडीज वर्सेस रिक्की बहल में कहानी समाज की सोच के साथ ही बहती है। पैसा वसूल नजरिए से तो दोनों फिल्में मुझे पसंद आईं लेकिन विद्रोही मन ने इन्हें नहीं स्वीकारा। मेरे मन ने डॉन-२ में सिनेमाई परंपरा का उल्लंघन और लेडीज वर्सेस रिक्की बहल में समाज की सोच का फिल्मांकन स्वीकार नहीं किया। दरअसल, डॉन-२ के अंत में विलेन विजयी होता है। फिल्म में एक अंतरराष्ट्रीय बदमाश को हीरो की तरह प्रस्तुत किया गया है। यहां मेरा मन फिल्म निर्माता का विरोध करता है। साहित्य और सिनेमा समाज के शिक्षक-मार्गदर्शक होते हैं इस बात का मैं हिमायती हूं। ऐसे में डॉन-२ से क्या सीखा जा सकता है, अपराध जगत का बेताज बदशाह होना? कहानी में एक अपराधी को हीरो की जगह रखा गया है। फिल्म का अंत अच्छाई की जगह बुराई की जीत पर हुआ। एक गुंडा पुलिस-इंटरपोल सबको ठेंगा दिखाता हुआ उनकी गिरफ्त से दूर चला जाता है। अभी तक भारतीय सिनेमा में बहुत कम मौके आए होंगे की प्यार-रिश्ते-नाते दायित्व पर भारी पड़े हों। कर्तव्य को हमेशा भावनाओं के बंधन से ऊपर माना गया और दिखाया गया। हमारा सिनेमा अब तक सिखाता रहा है कि कर्तव्य मार्ग पर अगर अपने भी बाधा बनकर खड़े हों तो परवाह नहीं करनी चाहिए। कर्तव्य पहली प्राथमिकता है लेकिन फिल्म में कर्तव्य की मां-बहन एक कर दी गई। वरधान (बोमन ईरानी), रोमा (प्रियंका चोपड़ा) से कहता है कि डॉन (शाहरुख खान) को गोली मार दो। यहां रोमा के हाव-भाव देखकर ही दर्शक समझ जाता है भैंस गई पानी में। ये नहीं मारेगी गोली। हुआ भी यही। जिस गुंडे ने उसके भाई का कत्ल किया (डॉन-१ में) और जिसे दुनियाभर की पुलिस जिंदा या मुर्दा पकडऩा चाहती है रोमा उसके लिए खुद गोली खा लेती है। खैर, जो भी हो फरहान अख्तर ने बढिय़ा मसाला मूवी बनाई लेकिन माफ करना भाई अपुन को पसंद नहीं आई।
     वहीं, लेडीज वर्सेस रिक्की बहल में लड़कियों को बेवकूफ दिखाया गया है। दुनिया लड़कियों की प्रतिभा का लोहा मान रही है वहीं डायरेक्टर महाशय (मनीष शर्मा) ठग (रणवीर सिंह) के माध्यम से लड़कियों को कहानी के अंत तक आसानी से बेवकूफ बनाई जानी वाली 'गऊ' दिखा रहे हैं। रणवीर फिल्म में अगल-अलग जगह की लड़कियों को अपने प्रेमजाल में फंसाता है फिर उनको 'स्टूपिड' (चूतिया) बनाकर उनका पैसा ऐंठकर दूसरे शिकार की तलाश में निकल जाता था। बाद में इशिका (अनुष्का शर्मा) की मदद से तीन लड़कियां रणवीर को 'कॉन' (छल से लूटना, ठगना) करने का प्लान बनाती हैं। धूर्त ठग इशिका के जाल में फंस भी जाता है लेकिन डायरेक्टर का पुरुष अहंकार जाग जाता है। उसने सोचा होगा कि लड़कियां कैसे लड़कों को 'कॉन' कर सकती हैं। दुनिया में 'स्टूपिड' होने का ठेका तो लड़कियों ने ही लिया है। भैय्ये जबकि यह सच नहीं है। डायरेक्टर महाशय अपने पुरुषार्थ को उच्च रखने के लिए कहानी को गर्त में धकेल देते हैं। किवाड़ के पीछे से ठग लड़कियों का प्लान जान लेता है। आखिर में लड़कियों को फिर से ठग लेता है। साबित कर देता है कि वे निरी बेवकूफ ही रहेंगी। पुरुषों से जीत की होड़ न लगाएं। अच्छी भली कहानी इसी मोड़ से सड़ान मारने लगती है। उसके बाद आगे के सीन दर्शक पहले ही गेस कर लेता है। 

रविवार, 25 दिसंबर 2011

शराबी कवियों से छीन लिया था मंच

 भा रत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के ८७वें जन्मदिन पर उनके कुछ पुराने फोटोग्राफ्स प्रस्तुत कर रहा हूं। कविमना, सरल हृदय और ओजस्वी वक्ता की एक कविता भी प्रस्तुत है। उनका जन्म ग्वालियर में हुआ था। यहीं से उन्होंने राजनीति में कदम रखा। संयुक्त राष्ट्र सभा को हिन्दी में संबोधित करने वाले भारत के सपूत और प्रख्यात हिन्दी प्रेमी के संबंध में ग्वालियर में अनेक किस्से प्रचलित हैं। एक किस्सा जरूर बताना चाहूंगा। उन दिनों की बात है जब वे महाविद्यालयीन पढ़ाई कर रहे थे। ग्वालियर में एक कवि सम्मेलन का आयोजन किया गया। कवि समय से सम्मेलन में नहीं पहुंच सके थे। कार्यक्रम में विलंब होते देख अटल बिहारी ने माइक संभाला और कॉलेज के नए-नए कवियों को मंच सौंप दिया। इसके बाद की बात और जबरदस्त है। कवि महोदय शराब के नशे में टुन्न होकर कार्यक्रम में पहुंचे। अटल बिहारी को जैसे ही मालूम हुआ उन्हें यह ठीक नहीं लगा। कविता का पाठ करते-करते कवि बहकने भी लगे थे। मामला बिगड़ता इससे पहले ही उन्होंने कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उन्हें दीर्घ आयु और स्वास्थ्य मिले। ताकि वे फिर से नेताओं को मूल्य आधारित राजनीति का पाठ पढ़ा सकें।











झुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते
सत्य का संघर्ष सत्ता से
न्याय लड़ता निरंकुशता से
अंधेरे ने दी चुनौती है
किरण अंतिम अस्त होती है
दीप निष्ठा का लिये निष्कंप
वज्र टूटे या उठे भूकंप
यह बराबर का नहीं है युद्ध
हम निहत्थे, शत्रु है सन्नद्ध
हर तरह के शस्त्र से है सज्ज
और पशुबल हो उठा निर्लज्ज
किन्तु फिर भी जूझने का प्रण
अंगद ने बढ़ाया चरण
प्राण-पण से करेंगे प्रतिकार
समर्पण की माँग अस्वीकार
दाँव पर सब कुछ लगा है, रुक नहीं सकते
टूट सकते हैं मगर हम झुक नहीं सकते

बुधवार, 21 दिसंबर 2011

विरोध का असल कारण कुछ और...

 रू स में कुछ मतिभ्रष्ट ईसाई मत के लोगों ने हिन्दुओं के ही नहीं वरन् संपूर्ण विश्व के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व के धर्मग्रंथ गीता पर प्रतिबंध लगाने की मांग की। वे इस मसले को रूस के साइबेरिया प्रांत में टोम्स्क की एक अदालत में घसीट ले गए। उनके इस कुप्रयास पर दुनियाभर से कड़ी आपत्तियां आईं। नतीजन अदालत ने मामले की सुनवाई टाल दी। रूस में गीता पर लिखे जिस भाष्य को लेकर विवाद शुरू हुआ, वह इस्कॉन के संस्थापक संत स्वामी प्रभुपाद जी की रचना है,  किताब का नाम है : भगवद गीता एज इट इज। इस्कॉन संस्था भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और उनके उपदेशों के लिए समर्पित ढंग से काम कर रही है। अनेक देशों में इस्कॉन ने भव्य मंदिर बनाए हैं। उनके माध्यम से श्रीकृष्ण और गीता के विचार को प्रचारित और प्रसारित किया। इस्कॉन के इसी समर्पण के चलते अन्य धर्म के लोग गीता और हिन्दू धर्म के करीब आए। वैसे भी विश्वभर में गीता के अनेक विद्वान मुरीद हुए हैं और वर्तमान में भी हैं। दुनिया में संभवत: गीता के अलावा कोई ऐसा ग्रंथ नहीं होगा, जिसकी सौ से ज्यादा व्याख्याएं होंगी। विरोध कर रहे लोगों ने आरोप लगाया है कि यह धर्म हिंसा सिखाता है। कट्टरवाद को बढ़ावा देता है। ईसाई मत से मेल नहीं खाता। तीनों ही तर्क अजीब  और बेबुनियाद हैं। देखा जाए तो ये तीनों तर्क तो अन्य धर्म (ईसाई और इस्लाम) के धर्मग्रन्थों पर सटीक बैठते हैं। खैर इस बात को यहीं छोड़ दिया जाए तो ठीक है।
     दरअसल, गीता के विरोध का कारण ईसाई धर्म से मेल खाना नहीं है। इसके पीछे कुछ और ही कारण है। वह कारण है इस्कॉन की ओर से किए जा रहे कार्यों के प्रभाव से कई ईसाई लोग गीता और हिन्दू धर्म के नजदीक आए हैं। वे सब कुछ छोड़कर कृष्ण के प्रेम में डूबे हैं। मैंने स्वयं देखा है कि इस्कॉन की ओर से स्थापित मंदिरों में किस तरह गोरे सबकुछ भूलकर कृष्ण की भक्ति में रमे रहते हैं। इससे ही ईसाईयों के पेट में पीर हो रही है। ईसाई इधर भारत में तमाम झूठे प्रलोभन दिखाकर और छल-कपट से हिन्दुओं को ईसाई बनाते हैं। उधर, बिना किसी प्रलोभन के ईसाई समाज इस्कॉन के सहारे हिन्दू धर्म में शामिल हो रहा है। हालांकि यह प्रक्रिया उतने स्तर पर नहीं है जितनी हिन्दुओं के ईसाई बनने की है। इसमें यह भी समझना होगा कि इस्कॉन लक्ष्य निर्धारित कर ईसाईयों को हिन्दू नहीं बनाता। न हीं उनका कभी भी धर्मांतरण करता है। वहां आने वाले सभी धर्म के लोग सिर्फ श्रीकृष्ण के भक्त ही होते हैं। संभवत: यही ईसाई मत के उन मतिभ्रष्ट लोगों की तकलीफ का कारण है। तमाम उदाहरण, घटनाएं और शोध रिपोर्ट जाहिर करती हैं कि बड़े पैमाने धर्मांतरण का काम ईसाईयों की ओर से ही किया जा रहा है। इस संबंध में पूर्व पोप बेनेडिक्ट ने तो खुली घोषणा की थी कि अब एशिया को ईसाई बनाना है। उसमें भी शुरुआत भारत से करनी है। जबकि न तो हिन्दू और न ही इस्कॉन संस्था इस तरह के कुकृत्य में संलिप्त है और न ही गीता ऐसा कोई संदेश देती है। गीता के बारे में विश्व के तमाम विद्वानों ने अपनी राय जाहिर की है। लेकिन, उसे हिंसा सिखाने वाला और कट्टरवाद को बढ़ावा देने वाला किसी ने नहीं कहा। गीता तो जीवन का सत्य पथ प्रकाशित करती है। कर्म करने की प्रेरणा देनेवाला ग्रंथ है। गीता अध्यात्म नहीं जीवन दर्शन सीखती है। मनुष्य को हर परिस्थिति में सकारात्मक रहने की ऊर्जा गीता देती है।
विश्व की नज़र में श्रीमद् भगवत गीता ----
 अल्बर्ट आइन्स्टाइन - जब मैंने गीता पढ़ी और विचार किया कि कैसे इश्वर ने इस ब्रह्माण्ड कि रचना की है, तो मुझे बाकी सब कुछ व्यर्थ प्रतीत हुआ।
अल्बर्ट श्वाइत्जर - भगवत गीता का मानवता कि आत्मा पर गहन प्रभाव है, जो इसके कार्यों में झलकता है।
अल्ड्स हक्सले - भगवत गीता ने सम्रद्ध आध्यात्मिक विकास का सबसे सुवयाव्स्थित बयान दिया है। यह आज तक के सबसे शाश्वत दर्शन का सबसे स्पष्ट और बोधगम्य सार है, इसलिए इसका मूल्य केवल भारत के लिए नही, वरन संपूर्ण मानवता के लिए है।
हेनरी डी थोरो - हर सुबह मैं अपने ह्रदय और मस्तिष्क को भगवद गीता के उस अद्भुत और देवी दर्शन से स्नान कराता हूँ, जिसकी तुलना में हमारा आधुनिक विश्व और इसका साहित्य बहुत छोटा और तुच्छ जान पड़ता है।
हर्मन हेस - भगवत गीता का अनूठापन जीवन के विवेक की उस सचमुच सुंदर अभिव्यक्ति में है, जिससे दर्शन प्रस्फुटित होकर धर्म में बदल जाता है।
रौल्फ वाल्डो इमर्सन - मैं भागवत गीता का आभारी हूँ। मेरे लिए यह सभी पुस्तकों में प्रथम थी, जिसमे कुछ भी छोटा या अनुपयुक्त नहीं किंतु विशाल, शांत, सुसंगत, एक प्राचीन मेधा की आवाज जिसने एक - दूसरे युग और वातावरण में विचार किया था और इस प्रकार उन्हीं प्रश्नों को तय किया था, जो हमें उलझाते हैं।
थॉमस मर्टन- गीता को विश्व की सबसे प्राचीन जीवित संस्कृति, भारत की महान धार्मिक सभ्यता के प्रमुख साहित्यिक प्रमाण के रूप में देखा जा सकता है।
डा. गेद्दीज़ मैकग्रेगर - पाश्चात्य जगत में भारतीय साहित्य का कोई भी ग्रन्थ इतना अधिक उद्धरित नहीं होता जितना की भगवद गीता, क्योंकि यही सर्वाधिक प्रिय है.

बुधवार, 14 दिसंबर 2011

अफजल बनाम कश्मीर की आग

 13  दिसंबर 2001 को देश के सर्वोच्च मानबिन्दु पर हमला हुआ था। दस बरस बीत गए लेकिन इस हमले को नाकाम करने में शहीद हुए वीरों के परिजनों की पीढ़ा कम नहीं हुई। उन्हें मलाल है कि संसद पर हमले और कई जवानों की हत्या का दोषी अफजल अब तक जिन्दा है। जेल में बिरयानी और सींक कबाब उड़ा रहा है। मलाई चाट रहा है। उसके ऐशो-ओ-आराम में पैसा देश की जेब से जा रहा है। इधर, कुछ सिरफिरे लोग उसको फांसी देने का जमकर विरोध कर रहे हैं। खुद कांग्रेसनीत यूपीए सरकार सालों से फाइल इधर से उधर कर रही है। पिछले साल जून में जम्मू-कश्मीर के लाटसाहब उमर अब्दुल्ला ने कहा था कि - अफजल को फांसी न दो वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद जो आग कश्मीर में लगी थी वही आग अफजल को फांसी देने पर लग जाएगी.... (पढ़ें - ... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?)  साल भर भी नहीं बीता कि सैयद अब्दुल रहमान गिलानी ने भी यही राग अलापा। गिलानी ने कहा है कि अफजल दोषी नहीं है। उसे फांसी नहीं होनी चाहिए। अगर अफजल को फांसी होती है तो कश्मीर में आग लग जाएगी। कश्मीर में अशांति फैल जाएगी। अफजल की फांसी बड़ी परेशानी का कारण बनेगी।
    ऐसा नहीं है कि राष्ट्रविरोधी बातें करने वालों की यह सिर्फ धमकियां हैं। २००६ में बकायदा अफजल की फांसी के विरोध में श्रीनगर और जम्मू के कई इलाकों में हिंसक प्रदर्शन किए गए। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के वरिष्ठ नेता यासीन मलिक ने इन प्रदर्शनों का नेतृत्व किया।  इसी साल जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विधायक शेख अब्दुल रशीद ने अफजल गुरु की फांसी की सजा माफी के लिए एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का मुख्य विपक्षी पार्टी पीपुल्स डेमोके्रटिक पार्टी (पीडीपी) ने भी अफजल की क्षमादान याचिका का समर्थन किया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने ट्विट कर इसे अप्रत्यक्ष रूप से बढ़ावा दिया।  देश की राष्ट्रीय अस्मिता पर हाथ डालने वाले अफजल गुरु की तरफदारी एक तरह से देशद्रोह है। शर्म की बात तो यह भी है कि देश की कथित १२५ साल पुरानी राजनीतिक पार्टी के कथित वरिष्ठ नेता अफजल को 'जी' लगाकर संबोधित करते हैं।
      मुझे ठीक-ठीक याद है कि हमले के छह-सात महीने बाद मैं संसद गया था। साथ में और भी दोस्त थे। वहां के प्रबंधन ने दो जवानों को हमें संसद घुमाने की जिम्मेदारी सौंपी। सुगठित शरीर के ऊंचे-पूरे जवान हमारे साथ हो लिए। मेरे एक दोस्त ने संसद की बाहरी दीवार में एक गहरा गड्ढा देखते हुए कहा-क्या यह गोली का निशान है। जवान का खून खौल गया। उसने हां में जवाब दिया। साथ ही कहा कि हमलावरों में से एक कुत्ता बच गया है। हमारे देश की राजनीति उसे लम्बे समय तक जिंदा रखेगी। पीढ़ा इसी बात की है। यह पीढ़ा दस बरस बाद १३ दिसंबर २०११ को भी दिखी। उस वक्त आतंकियों से लड़ते-लड़ते खेत रहे वीर जवानों के घरवालों ने दसवीं बरसी पर सरकार की ओर से आयोजित श्रद्धांजलि समारोह का बहिष्कार कर दिया। उन्होंने कहा कि हमारी एक ही मांग है कि देश के दुश्मन को जल्द ही फांसी पर लटकाया जाए। अब उसका जीवित रहना हमसे सहन नहीं होता। शहीदों के परिजन ही क्या हर देशभक्त उस वक्त ठगा-सा महसूस करता है जब खबरें आती हैं कि अफजल और कसाब की सुरक्षा में करोड़ों रुपए सरकार फूंक चुकी है। जेल में अफजल और कसाब बिरयानी खा रहा हैं। लगता है कि वे बिरयानी नहीं खा रहे हमारी बोटी नोंच-नोंच कर खा रहे हैं और हमारा उपहास उड़ा रहे हैं। जवानों को ऐसी थोती श्रद्धांजलि मत दो मेरे देश के कर्णधारो। उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना है तो देश के गद्दारों को फांसी दे दो। राजनीति किसी ओर मुद्दे पर कर लेना। राजनीति के लिए ढेर मुद्दे हैं।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

ऑनलाइन जुबान पर ताला

 के न्द्रीय संचार एवं सूचना मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा है कि सरकार इंटरनेट और सोशल वेबसाइट्स पर प्रकाशित होने वाली आपत्तिजनक सामग्री को नियंत्रित करने के लिए जरूरी दिशा-निर्देश तैयार करेगी। मंत्री महोदय या तो चालकी से झूठ बोल गए या फिर बोलने की आजादी पर लगाम लगाने की उनकी मंशा अभी पूरी नहीं हो सकी है। वे हिन्दुस्तानियों को पूरी तरह गूंगा करना चाहते हैं। दरअसल, 11 अप्रैल 2011 को भारत सरकार के सूचना एवं प्रौद्योगिकी विभाग ने गुपचुप तरीके से सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधित) कानून-2008 में कांग्रेस की मंशानुरूप फेरबदल कर दिए हैं। विभाग ने आईटी एक्ट में कुछ ऐसे नियम जोड़ दिए हैं, जिनके बाद देश में इलेक्ट्रोनिक, मोबाइल और इंटरनेट समेत संचार साधनों पर सरकारी निगरानी हद से ज्यादा बढ़ गई है। यानी सरकार ने तो इंटरनेट का इस्तेमाल करने वाले करीब 10 करोड़ हिन्दुस्तानियों की ऑनलाइन जुबान पर पहले ही ताला लगाने की व्यवस्था कर ली थी। सिब्बल साहब अब बता रहे हैं या कह सकते हैं वे ऑनलाइन अभिव्यक्ति की आजादी पर और मजबूत ताला लगाना चाहते हैं। क्योंकि गूगल, फेसबुक और अन्य वेबसाइट्स ने सरकार के आदेश को पूरी तरह मामने से इनकार कर दिया है। वेबसाइट्स ने कहा कि सिर्फ विवादित होने पर वे किसी भी सामग्री को नहीं हटाएंगे। हालांकि आईटी एक्ट (संशोधित)-2008 के नए नियम 43-ए और 79 के मुताबिक सरकार किसी भी कंपनी के पास एकत्रित किसी भी व्यक्ति का डाटा हासिल कर सकती है। इसके लिए उसे किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं होगी। साथ ही सरकार कथित आपत्तिजनक सामग्री प्रसारित करने पर किसी भी वेबसाइट, होस्ट वेबसाइट, सर्च इंजन और सोशल साइट को ब्लॉक कर सकती है। यह दीगर बात है कि अब तक गूगल और अन्य सोशल नेटवर्किंग साइट ने सरकार के निर्देशों का सौ फीसदी पालन नहीं किया।
         अब तक आप अपने ब्लॉग, फेसबुक पेज, वेबसाइट या अन्य सोशल साइट पर तर्कों और सबूतों के आधार पर सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकते थे। सरकार के खिलाफ आंदोलन को समर्थन दे सकते थे। भ्रष्ट मंत्रियों या अफसरों के खिलाफ लिख सकते थे। मंत्रियों-नेताओं के भड़काऊ बयानों के खिलाफ प्रतिक्रिया जाहिर कर सकते थे। लेकिन, अब यह उतना आसान नहीं रहेगा। खासकर 'सांप्रदायिक एवं लक्षित हिंसा निवारण अधिनियम-2011' तैयार करने वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद और कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और इस्लाम की गलत नीतियों का विरोध नहीं किया जा सकता। मंत्री कपिल सिब्बल ने सोनिया गांधी, मनमोहन सिंह और पैगंबर के खिलाफ इंटरनेट पर प्रसारित सामग्री को ही आपत्तिजनक माना है। इसीलिए सरकार ने गूगल, फेसबुक, माइक्रोसॉफ्ट और याहू के अधिकारियों से कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और पैगंबर से जुड़ी कथित अपमानजनक सामग्री को हटाने को कहा था। बाकि किसी के बारे में कोई कुछ भी लिखे-छापे वह आपत्तिजनक नहीं। कांग्रेस के नेता-कार्यकर्ता हिन्दुत्व को गरियाएं, आतंकवादियों को 'आप' और 'जी' लगाकर संबोधित करें। मैडम सोनिया गांधी गुजरात के मुख्यमंत्री को 'मौत का सौदागर' कहे। कथित कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना आतंकवादी संगठन सिमी' से करें। नई-नई राजनीति सीखे कांग्रेस के प्रवक्ता मनीष तिवारी समाजसेवी अन्ना हजारे के चरित्र पर कीचड़ उछाले। यह सब आपत्तिजनक नहीं है। मंत्री महोदय ने हिन्दुओं के खिलाफ प्रसारित सामग्री और हिन्दुओं के देवी-देवताओं के अभद्र चित्रों को भी आपत्तिजनक सामग्री नहीं माना है। ठीक वही मामला है मकबूल फिदा हुसैन हिन्दू देवताओं के नग्न चित्र बनाए तो यह अभिव्यक्ति की आजादी है। कलाकार की मौलिकता है। वहीं पैगंबर का कार्टून बनाने पर भी बावेला मचा दिया जाता है। रामायण के पात्रों के बारे में ऊल-जलूल विश्वविद्यालय में पढ़ाने पर भी कोई हल्ला नहीं। हल्ला मचाया भी जाता है है इस तरह के विवादित पाठ को कोर्स से हटाने पर कांग्रेस को चाहिए पहले अपने आंगन की सफाई करें फिर आवाम से बात करे। इस देश की जनता ने कांग्रेस को सत्ता की चाबी इसलिए नहीं दी कि उसकी मर्जी जो आए करे। लेकिन, सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने यही किया। इससे जनता में आक्रोश है। उसकी नीतियों को लेकर, उसके नेताओं के आचरण को लेकर और यह आक्रोश बाहर निकलता है इंटरनेट और सोशल वेबसाइट पर। वेब मीडिया एक ऐसा साधन है जो जनता को अपनी बात कहने की पूरी आजादी देता है। इतना ही नहीं यहां से उसकी आवाज दूर तक भी जाती है। माहौल भी बनता है। यह हम बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान देख चुके हैं। दरअसल, देखा जाए तो कांग्रेस और उसके नेताओं के खिलाफ ही इंटरनेट और सोशल साइट पर लिखा जा रहा है। संभवत: कांग्रेस इसी बात से डरी हुई है। इसलिए वह संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी को लगातार कुचलने के प्रयास करती दिखती है। कांग्रेसनीत यूपीए सरकार का बस चले तो वह पैदा होते ही हिन्दुस्तानियों के हलक में हाथ डालकर उनकी जुबान खींच ले।
        आईटी एक्ट (संशोधित)-2008 के नए नियमों के मुताबिक अगर इंटरनेट पर किसी टिप्पणी, लेख या खबर पर सरकार को आपत्ति है तो उसे 36 घंटे के भीतर हटाना होगा। अन्यथा सरकार बिना नोटिस दिए संबंधित वेबसाइट के खिलाफ कार्रवाई कर सकती है। इंटरनेट पर प्रसारित जनभावनाओं से डरी कांग्रेसनीत यूपीए सरकार अभी तक 11 वेबसाइट को बिना कारण बताए ब्लॉक करवा चुकी है। आईटी एक्ट में संशोधन से पहले जनवरी 2010 से दिसंबर 2010 तक विभिन्न वेबसाइट्स को हटाने के लिए सरकार ने गूगल को 30 आवेदन भेजे, इनमें से 53 फीसदी साइट्स बंद कर दी गईं या उनसे कथित आपत्तिजनक सामग्री हटा दी गई। वहीं साल 2009 में गूगल को सरकार ने 142 आवेदन भेजे इनमें से 78 फीसदी वेबसाइट्स को ब्लॉक कर दिया गया या कथित आपत्तिजनक सामग्री हटा दी गई।
फासीवादी नक्शे कदम पर कांग्रेस :  कांग्रेस के इस कदम से लोगों में काफी रोष है। कई राजनीतिक विशेषज्ञ और सामाजिक कार्यकर्ता बताते हैं कि कांग्रेसनीत यूपीए सरकार की नीतियों को देखकर तो यही लगता है कि यह फासीवादी, तालीबानी और साम्यवादी नक्शेकदम पर चल रही है। मंत्री महोदय हमारा देश चीन, म्यांमार, थाइलैंड, पाकिस्तान, बांग्लादेश, ईरान, उज्बेकिस्तान, वियतनाम और सउदी अरब नहीं है। भारत में लोकतंत्र है यहां सबको अपनी बात कहने की आजादी है। यह अधिकार उन्हें संविधान ने दिया है। कृपाकर उसे छीनने का प्रयास न कीजिए। 

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