शुक्रवार, 3 जून 2011

कुछ अपना-सा, कुछ बेगाना-सा शहर भोपाल

षि गालव की तपोस्थली ग्वालियर (ग्वाल्हेर) से राजा भोज की नगरी भोपाल (भोजपाल) आए हुए तकरीबन 25 दिन हो गए हैं। भोपाल प्रदेश की राजधानी है। राजधानी में रहने का सुख पाना बहुतों का सपना होता है। मेरा भी था। लेकिन, अब तक मुझे भोपाल में सुखद अनुभूति नहीं हो सकी है। हां, ग्वालियर से बिछुडने की पीड़ा जरूर है। ग्वालियर मुझे रोज याद आता है। आबाद भोपाल में रहने के लिए अब तक एक ठिकाना नहीं ढूंढ सका हूं। शायद इसलिए भी कि मुझे आफिस के नजदीक ही रहना है और अपना जेब भी छोटी है। वो तो शुक्र है कि यहां मेरे कुछ अजीज रहते हैं, जिनसे हौसला कायम है। वरना मैं अब तक उल्टे पैर ग्वालियर भाग लिया होता। दीपक जी सोनी, प्रमोद जी त्रिवेदी, मुकेश जी सक्सेना, अनिल जी सौमित्र। इन सबसे मेरे दिल के तार बहुत गहरे जुड़े हैं। भोपाल में ये सब मेरा सबसे बड़ा सहारा हैं। इनके अलावा कुछ और भी हैं जिन पर मैं अपना अधिकार रखता हूं। कुछ नए दोस्त भी बने हैं। इन सबकी वजह से पहाड़ सी परेशानियां भी बौनी नजर आती हैं।
              यह पहली दफा नहीं है कि मैं घर से बाहर रह रहा हूं। फर्क इतना है पहले पता रहता था कि दो-तीन महीने गुजरने के बाद वापस घर पहुंच जाउंगा। इस बार आने का तो पता था, लेकिन घर कब जाऊंगा यह नहीं पता। शायद इसलिए ही रह-रहकर ग्वालियर की बहुत याद आती है। बात इतनी सी नहीं है। दरअसल सुना है कि यहां चूना बहुत लगाया जाता है। यहां एक जगह का तो नाम ही चूना भट्टी है। भोपाल आते ही एक साहित्यक पत्रिका के माध्यम से साहित्यकार ने आगाह कर दिया कि भैया भोपाल में संभलकर रहना। न जाने कब कोई भोपाली सूरमा (सूरमा भोपाली) मिल जाए और मजाक-मजाक में चूना लगा जाए। इस बात पर विश्वास करने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। साहित्यकार आला दर्जे का था और खुद चूनाभोगी (भुक्तभोगी) था। सो गुरू बहुत डर बैठा है मन में। अपुन ठहरे बाबा भारती कोई भी डाकू सुल्तान ठग सकता है।
            वाहन विहीन हूं। आफिस जाते वक्त चेतक ब्रिज मिलता है। दरअसल आफिस चेतक ब्रिज के पास ही है। पुल के ठीक बीच जाकर खडा हो जाता हूं। वहां से नीले और लाल रंग की लम्बी-लम्बी ट्रेनें गुजरती हैं। मन करता है कि हीरो की माफिक पुल से सीधे ट्रेन पर कूद सवार हो जाऊं और घर पहुंच जाऊं। लेकिन, यह भी संभव नहीं। खैर, थकहार कर फिर से एक अदद ठौर की तलाश में जुट जाता हूं। माना कि कहां राजा भोज और कहां गंगू तेली। लेकिन, ये भी सही है कि एक दिन तेली के दिन भी फिरेंगे और राजा भोज अपनी नगरी में उसे ससम्मान स्थान देंगे।

  फिलहाल खाली दिमाग की उपज एक कविता और झेलिए.....

ग्वालियर तू बहुत याद आता है।

गोपाचल पर्वत पर शान से खडा
आसमान का मुख चूमता ‘दुर्ग’
नदीद्वार, जयेन्द्रगंज, दौलतगंज
नया बाजार से कम्पू को आता रास्ता
वहां बसा है मेरा प्यारा घर
मुझे बहुत भाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सात भांति के वास्तु ने संवारा
सबको गोल घुमाता ‘बाड़ा’
दही मार्केट में कपडा, टोपी बाजार मे जूता
गांधी मार्केट में नहीं खादी का तिनका
पोस्ट आफिस के पीछे नजरबाग मार्केट में
मेरा दोस्त कभी नहीं जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

सन् 57 के वीरों की विजय का गवाह
शहर की राजनीति का बगीचा ‘फूलबाग’
बाजू से निकली स्वर्णरेखा नाला
कईयों को कर गया मालामाल
चैपाटी की चाट खाने
शाम को सारा शहर जाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है

चाय की दुकान, कालोनी का चैराहा
यहां सजती दोस्तों की महफिल
देष की विदेष की, आस की पड़ोस की
बातें होती दुनिया जहान की
मां की ममता, पिता का आश्रय
पत्नी का प्यार बुलाता है
ग्वालियर तू मुझे बहुत याद आता है।

9 टिप्‍पणियां:

  1. भाई साहब छः महीने रह लो भोपाल में, फिर याद करना ग्वालियर को.
    वैसे तो, अपुन को भी रतलाम याद आता रहता है... :(

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  2. आपके अनुभव पढ़कर मुझे अपने पुराने दिन आ गए. पद्धाई के लिए जब घर छोड़ा था तो ऐसे ही विचार मन में आते थे.

    कविता अच्छी है. बिलकुल अन्दर की आवाज़.

    नीरज झा

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  3. bahut khub likhe bhai............
    hame bhi aap bahut yaad aate he......
    kahate he jab aap aas pas hi hote ho to aksar ahsas ko kho dete he ham...par ab vaakai aapki kami mahsus karate he ham......bado kub bado hamari shubhkamnaye hamesha aapke sath......

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  4. भई हम भी काफी समय भोपाल रहे हैं और हमें तो बहुत याद आता है...आप भी रहकर तो देखिए..भाने लगेगा...
    अपना शहर तो अपना ही होता है याद तो आता है...
    कविता बहुत अच्छी है...

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  5. सुन्दर लेख के लिए बधाई स्वीकार करें..
    मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - अज्ञान

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  6. यह बात सौ फीसदी सही है कि राजधानी में रहने का अपना मजा है। सौभाग्य से मैं दो राज्यों की राजधानी में रहा हू। सारी पढ़ाई लिखाई उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में की। और नौकरी की शुरुआत देहरादून से। लेकिन साहब राजधानी में रहने पर खर्च भी बहुत होता है। हर चीज के कुछ फायदे और नुकसान होते हैं।
    वैसे आप अभी अभी घर से बाहर निकले हैं इसलिए ऐसा हो रहा होगा। मुझसे पूछो पूरे १४ साल हो गए हैं। अब तो अकेले ही ज्यादा मजा आता है। आपके साथ एक दिक्कत और भी है, आपकी हाल ही में शादी हुई है और पत्नी से इतनी जल्दी दूरी बर्दाश्त नहीं होती। हालांकि बाद में दूरी ज्यादा अच्छी लगती है। लेकिन आप गए हैं कुछ पा्रप्त करने। एक लक्ष्य लेकर। उसी में लगे रहिए। सफलता आपको अवश्य मिलेगी। मेरी शुभकामनाएं।

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  7. लोकेन्द्र जी आज में आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हू !पर आपकी रचना देखकर ही में समझ गया की आप मीडिया से जरुर जुरे हो !आप का अनुभव उचित है!आप लोग मेरे ब्लॉग पर भी आये मेरे ब्लॉग पर आने के लिए यहाँ क्लिक करे-"samrat bundelkhand"

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  8. नॉस्टैल्जिक रही यह पोस्ट!! मुझे भी याद आता है वो सब जो पीछे छूट गया!

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  9. यादों के जरिए जिया किजिए ... भाई साहब ... इतना भावुक होना खतरे की निशानी है ... जरा मेरे बारे में सोचिए ... वैसे मैं भी बड़ा भावुक किस्म का हूं ... इसलिए बड़े प्यारे प्यारे लोग मिले ... और कारवां बनता गया... लेकिन भोपाल ... भोपाल हैं बहुत अच्छा शानदार.. मजेदार... अद्भुत ... हौसला बढ़ा ???? कल ही मिलता हूं आपसे .. धन्यवाद इतनी अच्छी प्रस्तुति के लिए .. सच में मन भावन है..

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