सोमवार, 30 अगस्त 2010

क्यों बने आक्रांता का मकबरा?

बाबर कोई मसीहा नहीं अत्याचारी, अनाचारी, आक्रमणकारी और इस देश के निवासियों का हत्यारा है
सितम्बर में अयोध्या (अयुध्या, जहां कभी युद्ध न हो) के विवादित परिसर (श्रीराम जन्मभूमि )  के मालिकाना हक के संबंध में न्यायालय का फैसला आना है। जिस पर चारो और बहस छिड़ी है। फैसला हिन्दुओं के हित में आना चाहिए क्योंकि यहां राम का जन्म हुआ था। वर्षों से यहां रामलला का भव्य मंदिर था, जिसे आक्रांता बाबर ने जमींदोज कर दिया था। एक वर्ग चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि निर्णय मुसलमानों के पक्ष में होना चाहिए, क्योंकि वे बेचारे हैं, अल्पसंख्यक हैं। उनकी आस्थाएं हिन्दुओं की आस्थाओं से अधिक महत्व की हैं। मुझे इस वर्ग की सोच पर आश्चर्य होता है। कैसे एक विदेशी क्रूर आक्रमणकारी का मकबरा बने इसके लिए सिर पीट रहे हैं। एक बड़ा सवाल है - क्या अत्याचारियों की पूजा भी होनी चाहिए? क्या उनके स्मारकों के लिए अच्छे लोगों के स्मारक को तोड़ देना चाहिए? (कथित बाबरी मस्जिद रामलला के मंदिर को तोड़कर बनाई गई है।), क्या लोगों की हत्या करने वाला भी किसी विशेष वर्ग का आदर्श हो सकता है? (बुरे लोगों का आदर्श बुरा हो सकता है, लेकिन अच्छे लोगों का नहीं। रावण प्रकांड पंडित था, लेकिन बहुसंख्यक हिन्दु समाज का आदर्श नहीं। कंस बहुत शक्तिशाली था, लेकिन कभी हिंदुओं का सिरोधार्य नहीं रहा। हिन्दुओं ने कभी अत्याचारियों के मंदिर या प्रतीकों के निर्माण की मांग नहीं की है। फिर एक अत्याचारी और विदेशी का मकबरा इस देश में क्यों बनना चाहिए? क्यों एक वर्ग विशेष इसके लिए सिर पटक-पटक कर रो रहा है।)
    इतिहास-बोध और राष्ट्रभावना का अभाव
काबुल-गांधार देश, वर्तमान अफगानिस्तान की राजधानी है। १० वीं शताब्दी के अंत तक गांधार और पश्चिमी पंजाब पर लाहौर के हिन्दूशाही राजवंश का राज था। सन् ९९० ईसवी के लगभग काबुल पर मुस्लिम तुर्कों का अधिकार हो गया। काबुल को अपना आधार बनाकर महमूद गजनवी ने बार-बार भारत पर आक्रमण किए। १६ वीं शताब्दी के शुरू में मध्य एशिया के छोटे से राज्य फरगना के मुगल (मंगोल) शासक बाबर ने काबुल पर अधिकार जमा लिया। वहां से वह हिन्दुस्तान की ओर बढ़ा और १५२६ में पानीपत की पहली लड़ाई विजयी होकर दिल्ली का मालिक बन गया। परन्तु उसका दिल दिल्ली में नहीं लगा। वही १५३० में मर गया। उसका शव काबुल में दफनाया गया। इसलिए उसका मकबरा वहीं है।
         बलराज मधोक ने अपनी पुस्तक 'जिन्दगी का सफर-२, स्वतंत्र भारत की राजनीति का संक्रमण काल'  में उल्लेख किया है कि वह अगस्त १९६४ में काबुल यात्रा पर गए। वहां उन्होंने ऐतिहासिक महत्व के स्थान देखे। संग्रहालयों में शिव-पार्वती, राम, बुद्ध आदि हिन्दू देवी-देवताओं और महापुरुषों की पुरानी पत्थर की मूर्तियां देखीं। इसके अलावा उन्होंने काबुल स्थित बाबर का मकबरा देखा। मकबरा ऊंची दीवार से घिरे एक बड़े आहते में स्थित था। परन्तु दीवार और मकबरा की हालत खस्ता थी। इसके ईदगिर्द न सुन्दर मैदान था और न फूलों की क्यारियां। यह देख बलराज मधोक ने मकबरा की देखभाल करने वाले एक अफगान कर्मचारी से पूछा कि इसके  रखरखाव पर विशेष ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? उसका उत्तर सुनकर बलराज मधोक अवाक् रह गए और शायद आप भी सोचने पर मजबूर हो जाएं। उसने मधोक को अंग्रेजी में जवाब दिया था - “Damned foreigner why should we maintain his mausaleum.”  अर्थात् कुत्सित विदेशी विदेशी के मकबरे का रखरखाव हम क्यों करें?
       काबुल में वह वास्तव में विदेशी ही था। उसने फरगना से आकर काबुल पर अधिकार कर लिया था। परन्तु कैसी विडम्बना है कि जिसे काबुल वाले विदेशी मानते हैं उसे हिन्दुस्तानी के सत्ताधारी और कुछ पथभ्रष्ट बुद्धिजीवी हीरो मानत हैं और उसके द्वारा श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर तोड़कर बनाई गई कथित बाबरी मस्जिद को बनाए रखने में अपना बड़प्पन मानते हैं। इसका मूल कारण उनमें इतिहास-बोध और राष्ट्रभावना का अभाव होना है।
लगातार बाबर के वंशजों के निशाने पर रही जन्मभूमि : पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी गुट लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद ने पिछले कुछ वर्षों में करीब आठ बार रामलला के अस्थाई मंदिर पर हमले की योजना बनाई, जिन्हें नाकाम कर दिया गया। ५ जुलाई २००५ को तो छह आतंकवादी मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच गए थे। जिन्हें सुरक्षा बलों ने मार गिराया।

शुक्रवार, 13 अगस्त 2010

दो लड्डू और पंद्रह अगस्त

 ई साल बीत गए बोलते हुए गांधी जी की जय। वह वर्षों से देखता आ रहा है, स्कूल, तहसील और पंचायत की फूटी कोठरी पर तिरंगे का फहराया जाना। इतना ही नहीं मिठाई के लालच में हर साल शामिल होता है वह २६ जनवरी और १५ अगस्त के कार्यक्रम में, लेकिन अब तक नहीं समझ पाया बारेलाल आजादी का अर्थ
            दोपहर हो गई थी। सूरज नीम के विशाल पेड़ के ठीक ऊपर चमक रहा था। पेड़ चौपाल के ठीक बीच में था। नीम इतना विशाल था कि उसकी शाखाओं ने पूरी चौपाल और आसपास के रास्ते को ढक रखा था। इस वक्त चौपाल पर सूरज की एक-दो किरणें ही नीम की शाखाओं से जिरह करके आ पा रही थीं वरना तो पूरी चौपाल नीम की शीतल छांव के आगोश में थी। इधर-उधर कुछ बच्चे कंचे खेल रहे थे और कुछ बुजुर्ग नित्य की तरह ताश खेल रहे थे। पंचू कक्का अपनी चिलम बना रहे थे। उनका एक ही ऐब था चिलम पीना। यह भी उम्र के साथ आया। चौपाल पर इस वक्त लोगों का आना शुरू हो जाता है। बारेलाल भी अपने पशुओं को इसी वक्त पानी पिलाकर सीधे चौपाल पर आता है। आज उसे आने में थोड़ी देर हो गई थी। बारेलाल आज बड़े मास्साब के साथ आ रहा था।
           मास्साब ने आते ही पंचू कक्का को राम-राम कहा। कक्का ने पूछा- काहे बड़े बाबू कैसे हो? भोत दिनन में इतको आए हो, काहा बात है? सब खैरियत तो है। मास्साब ने कहा-बस दादा सब ईश्वर की कृपा और आपका आशीर्वाद है। बात यह है कि दो दिन बाद १५ अगस्त है। सो आपको न्योता देने आया था। कक्का की चिलम अब तक तैयार हो चुकी थी। उन्होंने एक दम लगाकर कहा-अरे मास्टर जी जा काम में न्योता की का जरूरत है, हम तो हर साल अपए आप ही चले आत हैं। सब बच्चा लोगन का नाटक, गीत-संगीत सुनत हैं। मास्साब ने सहमति में सिर हिलाते हुए निवेदन किया-कक्का वो तो हम भी जानते हैं आप स्कूल को लेकर बड़े संजीदा रहते हैं। बीच-बीच में भी बच्चों की पढ़ाई की जानकारी लेते रहते हैं। इस बार हम आपको स्वाधीनता दिवस पर मुख्य अतिथि के रूप में न्योता देने आए हैं। कक्का ने हंसते हुए कहा- अरे सरकार रहन दो आप। अतिथि और काहू को बनाए लो, हम तो ऐसेई आ जाएंगे। बारेलाल ने भी हां में हां मिलाई। मास्साब चाहते थे कि इस बार कक्का को ही मुख्य अतिथि बनाया जाए। असल में वह कक्का के विचारों और बच्चों की पढ़ाई को लेकर उनकी सजगता से काफी प्रभावित थे। कक्का की मदद से ही जर्जर स्कूल भवन का जीर्णोद्धार हो सका था। जब से गांव में शराब का प्रचलन बढ़ा, बुराइयों का जमावड़ा गांव में हो गया था। शराबी बोतल की जुगाड़ के लिए स्कूल के गेट-खिड़की तक उखाड़ ले गए थे। वो तो कक्का ही थे जिन्होंने पहल करके स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था चौकस की। मास्साब ने जिद करके उनसे कहा कि नहीं इस बार तो आपको ही झंडा फहराना है। बड़े मास्साब सहमति प्राप्त करके वापस चले गए।
          मास्साब के जाने के बाद व्याकुल बारेलाल ने पंचू कक्का से कहा-कक्का ये १५ अगस्त का होत है और ये १५ अगस्त को ही काए आतो है। तब कक्का ने उसे विस्तार से भारत का इतिहास सुनाया। तब जाकर बारे बारेलाल को कुछ पल्ले पड़ा। उसने सिर खुजाते हुए कहा-धत् तेरे की! मैं तो अब तक जो सब जानत ही नहीं हतो। मैं तो बस जई जानतो हतो की जा दिना पुराने स्कूल और तहसील की पीली बिल्डिंग पर झंडा लहराओ जात है। और सही बताऊं तो मैं जा दिना स्कूल में सिर्फ दो लडुआ (लड्डू) लेवे ही जात हतो। अब समझ में आई जै दिन तो हमें बड़े जतन के बाद नसीब हुआ था। जै हो उन वीरां लोगन की जिनकी बदौलत हमें आजादी की आबो-हवा मिली है।

बुधवार, 11 अगस्त 2010

कपटी लोगों का धर्म इस्लाम

चर्च में जलाई जाएंगी कुरान
बर है कि फ्लोरिडा के एक चर्च में ११ सितंबर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुरान को जलाने (इंटरनेशनल बर्न ए कुरान डे) के दिवस के तौर पर मनाया जाएगा। न्यूयॉर्क के समाचार पत्रों के अनुसार ११ सिंतबर २००१ को हुए आतंकी हमले की घटना की नौवीं बरसी पर चर्च ने यह कदम उठाने का फै सला लिया है। फ्लोरिडा के 'द डोव वल्र्ड आउटरीच सेंटरÓ में ९/११ की बरसी पर एक शोक सभा आयोजित की जाएगी। जिसके तहत इस्लाम को कपटी और बुरे लोगों का धर्म बताकर कुरान को जलाया जाएगा।
संसद में उछला मुद्दा
चर्च द्वारा कुरान की प्रतियां जलाने के बारे में अमरीकी चर्च की घोषणा के मुद्दे को ९ अगस्त सोमवार को लोकसभा में उठाते हुए इस पर चर्चा कराए जाने की मांग की गई। बसपा डॉ. शफीकुर रहमान बर्क ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि भारत सरकार को अमरीका के राष्ट्रपति बराक ओबामा के समक्ष इस मसले को रखना चाहिए। भारत और दुनिया के मुसलमान अपने पवित्र धर्मग्रंथ के किसी भी तरह के अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकते।
नोट:- इस महाशय ने कभी-भी उस वक्त आपत्ति दर्ज नहीं कराई, जब मुस्लिमों द्वारा कई बार बीच सड़क पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज जलाए। लगता है ये देश का अपमान बर्दाश्त कर सकते हैं... साथ ही इन्हें दूर देश में क्या हो रहा है इस बात की तो चिंता रहती है, लेकिन अपने देश में सांप्रदायिक ताकतें क्या गुल खिला रही हैं यह नहीं दिखता।
कुरान- इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद साहब थे। इनका जन्म अरब देश के मक्का शहर में सऩ ५७० ई में हुआ था। अपनी कट्टर सोच के कारण इन्हें अपनी जान बचाने के लिए मक्का से भागना पड़ा। इस्लाम के मूल हैं-कुरान, सुन्नत और हदीस। कुरान वह ग्रंथ है जिसमें मुहम्मद साहब के पास ईश्वर के द्वारा भेजे गए संदेश संकलित हैं। कुरान का अर्थ उच्चरित अथवा पठित वस्तु है। कहते हैं कुरान में संकलित पद (आयतें) उस वक्त मुहम्मद साहब के मुख से निकले, जब वे सीधी भगवत्प्रेरणा की अवस्था में थे।
मुहम्मद साहब २३ वर्षों तक इन आयतों को तालपत्रों, चमड़े के टुकड़ों अथवा लकडिय़ों पर लिखकर रखते गए। उनके मरने के बाद जब अबूबक्र पहले खलीफा हुए तब उन्होंने इन सारी लिखावटों का सम्पादन करके कुरान की पोथी तैयार की, जो सबसे अधिक प्रामाणिक मानी जाती है।
ईसाइयों से विरोध
कुरान सबसे अधिक जोर इस बात पर देती है कि ईश्वर एक है। उसके सिवा किसी और की पूजा नहीं की जानी चाहिए। हिन्दुओं से तो इस्लाम का सदियों से सीधा विरोध है। हिन्दू गौ-पालक और गौ-भक्त हैं तो मुस्लिम गौ-भक्षक, हिन्दू मूर्ति पूजा में विश्वास करते हैं तो इस्लाम इसका कट्टर विरोधी है। ईसाइयों से भी उसका इस बात को लेकर कड़ा मतभेद है कि ईसाई ईसा मसीह को ईश्वर का पुत्र कहते हैं। कुरान का कहना है कि ईसा मसीह ईश्वर के पुत्र कतई नहीं हो सकते, क्योंकि ईश्वर में पुत्र उत्पन्न करने वाले गुण को जोडऩा उसे मनुष्य की कोटि में लाना है।
दोनों से भला हिन्दुत्व
कुछ लोगों को हिन्दुत्व से बड़ी आपत्ति है, लेकिन मैं भगवान का शुक्रिया अदा करता हूं कि मैं हिन्दू जन्मा। हिंदू होने के नाते मुझे सभी धर्मों का आदर करने की शिक्षा मिली है। मैं मंदिर जा सकता हूं, मस्जिद और दरगाह पर श्रद्धा से शीश झुका सकता हूं और चर्च में प्रार्थना भी कर सकता हूं। जिस तरह से एक आतंककारी घटना से ईसाइयों में इस्लाम के प्रति इतना क्रोध है कि कुरान को चर्च में जलाने का निर्णय ले लिया। इससे तो हिन्दू भले हैं। हिन्दुओं ने तो मुगलों के अनगिनत आक्रमण और आंतकी हमले झेले हैं, लेकिन कभी भी कुरान जैसे ग्रंथ को जलाने का निर्णय नहीं लिया। भले ही इस देश के मुसलमान सड़कों पर यदाकदा राष्ट्रीय ध्वज तिरंगे को जलाते रहे हों या फिर राष्ट्रगीत वन्देमातरम् के गाने पर एतराज जताते हों।
                असल में इस्लाम और ईसाई दोनों ही धर्म अति कट्टर हैं। वे अपने से इतर किसी अन्य धर्म की शिक्षाओं को न तो ठीक मानते हैं और न उनका आदर करते हैं। एक ने अपने धर्म का विस्तार तलवार की नोक पर किया तो दूसरे ने लालच, धोखे और षडय़ंत्र से भोले-मानुषों को ठगा। खैर चर्च में कुरान जलाने का मसला तूल पकड़ेगा। इसके विरोध में पहली प्रतिक्रिया भारतीय संसद में हो चुकी है।

शुक्रवार, 6 अगस्त 2010

इसे कहते हैं मति फिरना

लगता है सरकार और सरकार के लोग पगलाय गए हैं?
मने कई बार अपने से बड़ी उम्र या हमउम्र लोगों से सुना होगा कि तेरी मति फिर गई है क्या? जो इस तरह का काम कर रहा है। दूसरा वाक्य बदल भी सकता है। जैसे तेरी मति फिर गई है क्या? जो वहां मरने के लिए जा रहा है। अपन ने भी कई बार सुना है और हर बार सोचा है कि मति कैसे फिरती है? मति चकरी की तरह गोल-गोल फिरती है क्या? या फिर बावरे मन की तरह यहां-वहां फिरता है? नहीं तो यह होता होगा कि मति पहले खोपड़ी के आगे वाले हिस्से में होती होगी बाद में फिर कर पीछे चली जाती होगी, तब कहते होंगे मति फिर गई। जो भी हो अपन तो समझे नहीं उस समय, क्योंकि तब अपन बच्चे थे सो थोड़े कच्चे थे जी। अब केंद्रीय सरकार के एक कानून के बारे में सुनकर समझ आ गया है। पता चला है कि केंद्र एक नए कानून को व्यवहार में लाने की सोच रहा है, जिससे बच्चों पर हो रहा अत्याचार रुकेगा। कानून में तय किया जा रहा है कि गुरुजन ही नहीं माता-पिता भी अपने बच्चे को पिटाई नहीं कर सकेंगे। अगर वे बच्चों को पीटते हैं तो उन्हें जेल की हवा खानी पड़ेगी।
        लगता है केंद्र में बैठे लोगों की मति ही फिरी होगी तभी इस कानून को लाने का विचार किया गया। अब भला सज्जन पुरुषों से यह पूछो कौन माता-पिता अपने बच्चे को जान-बूझकर मारना चाहते हैं और क्या उनकी मार में अत्याचार होता है? क्या वह मां बच्चे पर अत्याचार कर सकती है जो खुद नौ माह कष्ट में रह कर उसे जन्म देती है? पैदा होने के बाद उसे अपने कलेजे से चिपकाकर रखती है। क्या वह मां उस पर बेवजह लाठी चला सकती है? जिसे वह बड़े लाड़ से पालती है, बिझौना जब बच्चे के सूसू से गीला हो जाता है तो वह ममता की मूर्ति स्वयं गीले में सो जाती है और अपने कलेजे के टुकड़े को सूखे में सुलाती है। पिता की बात करें तो वह भी बच्चे को प्रेम करने में मां से कहीं पीछे नहीं रहता। बाहर से कठोर दिखने वाला पिता अंदर से मां सा ही कोमल होता है। उसका बच्चा सुख से जी सके इसके लिए ही तो पिता सारे जतन करता है। क्या ये माता-पिता बच्चे पर अत्याचार कर सकते हैं? मुझे तो लगता है नहीं कर सकते। यह लिखने से पहले मैं कई लोगों से इस विषय पर बहुत लोगों से चर्चा कर चुका हूं। सबने ऐसे कानून की उपयोगिता पर आश्चर्य व्यक्त किया। तो क्या केंद्र सरकार में बैठे लोगों की मति फिर गई है? लगता तो यही है। वे जो कानून बना रहे हैं उसके तहत अगर माता-पिता बच्चे को मारते हैं तो उन्हें जेल हो सकती है, जुर्माना भी देना होगा। जो कानून बनने चाहिए उन पर तो सरकार ध्यान नहीं दे रही, लेकिन ऐसे हास्यपद कानूनों की तैयारी में जुटी है। आतंकवाद रुके, नक्सलवाद को नकेल लगे, महंगाई डायन के अत्याचार से जनता को कैसे बचाएं, लगातार बढ़ रहे अपराध को कैसे रोका जाए। इन सब पर तो कुछ काम नहीं किया जा रहा।
        मेरा मत है कोई भी गुरुजन व माता-पिता अपने बच्चे को शिक्षा देने के लिए थोड़ा-बहुत पीट सकता है, जो अत्याचार की श्रेणी में नहीं आता। यह जरूरी भी है वरना बच्चों को बिगडऩे से कोई नहीं रोक सकेगा। मान लो सरकार यह कानून कठोरता से लागू कर देती है तो क्या स्थितियां निर्मित होंगी।
  • - बच्चे का मन स्कूल जाने का नहीं हो रहा, माता-पिता उसे पिटाई का डर तो दिखा नहीं सकते। ऐसे में हो सकता है वे उसे स्कूल जाने के लिए कोई लालच दें, अगर ऐसा होता है तो बच्चे में रिश्वत लेने की आदत बचपन से ही पैदा हो जाएगी।
  • - बच्चा स्कूल का होमवर्क ले जाए या नहीं टीचर उसे पीट तो सकता नहीं है। माता-पिता से शिकायत करके भी क्या फायदा। क्लास रूम में धमा-चौकड़ी मचाते हैं तो भी शिक्षक कुछ न कर सकेंगे।
  • - माना वह शिक्षक उसे डांट और बालक इसका बदला लेने के लिए शिक्षक के मुंह पर थूक दे, चांटा मार दे, धूल फेंक दे या फिर शिक्षक रास्ते से जा रहा हो और वह उन्हें पत्थर मार दे। तब क्या किया जाए?
  • - बच्चा सुबह से कार्टून चैनल देख रहा है। मना करने और समझाने पर मान नहीं रहा, तब माता-पिता क्या करें? क्या जेल जाने के भय से उसे अपना भविष्य खराब करते रहने दें। उसे लगातार टीवी देखकर अपनी आंखे खराब करते रहने दिया जाए।
  • - वह गली-मोहल्ले में किसी दूसरे बच्चे से मारपीट करके आता है, तब क्या करें परिजन की वह भविष्य में ऐसा न करें।
  • - पत्थरों से वह पड़ोसियों के खिड़की के कांच तोड़ दे, तब पिता उसे कैसे समझाए और समझाने के बाद बार-बार वह ऐसा करे तब क्या करें?
  • - मान लो वह कहीं से गंदी-गंदी गालियां सीखकर आता है और जोर-जोर से बकता है। आपकी लड़की को भी वह अपशब्द कहे तो क्या करोगे?
         लगता है यह सब केंद्र सरकार ने सोचा ही नहीं। लगता है मति फिरने के बाद दिमाग सोचना बंद कर देता होगा। ऐसे में तो बच्चों का वर्तमान ही नहीं भविष्य भी खराब हो जाएगा। सरल-सी बात है कि कोई भी माता-पिता अपने बच्चों को बेवजह नहीं मारता। उनकी मार में भी सीख होती है। उपरोक्त स्थितियों में बच्चा समझाने से न समझेगा तो दण्ड स्वरूप उसकी पिटाई करनी ही पड़ेगी वरना वह उद्ण्ड़ होकर समाज के लिए समस्या बन जाएगा। सरकार को चाहिए बादम (इसे खाने से दिमाग ठीक रहता है और सही काम करता है) खाए और जरूरत की जगह बुद्धि का इस्तेमाल करे। आतंकवाद, उग्रवाद, धर्मांतरण, घुसपैठ, अपराध पर रोक लगाने और देश की तरक्की में सहायक कानूनों का मसौदा तैयार करने पर ध्यान दे।

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