मंगलवार, 29 जून 2010

... तो क्या मुसलमान देशद्रोही है?

क्या मुसलमान ऐसे हिन्दुओं का दिल जीत सकते हैं ?
इस लेख के बाद हो सकता है कुछ खास विचारधारा के ब्लॉगरों की जमात मुझे फास्सिट घोषित कर दे। हो सकता है मुझे कट्टरवादी, पुरातनंपथी, दक्षिणपंथी, पक्षपाती, ढकोसलावादी, रूढ़ीवादी, पुरातनवादी, और पिछड़ा व अप्रगतिशीस घोषित कर दिया जाए। इतना ही नहीं इस पोस्ट के बाद मुझ पर किसी हिन्दूवादी संगठन का एजेंट होने का आरोप भी मढ़ दिया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं, लेकिन मुझे डर नहीं, जो सच है कहना चाहता हूं और कहता रहूंगा। 

एक सीधा-सा सवाल आपसे पूछता हूं क्या देश के शत्रु को फांसी पर लटकाने से देश की स्थिति बिगड़ सकती है? क्या किसी देश की जनता लाखों लोगों के हत्यारे की फांसी के खिलाफ सड़कों पर आ सकती है? पूरी आशा है कि अगर आप सच्चे भारतीय हैं तो आपका जवाब होगा-देश के गद्दारों को फांसी पर ही लटकाना चाहिए? लेकिन आपकी आस्थाएं इस देश से नहीं जुड़ी तो मैं आपकी प्रतिक्रिया का सहज अनुमान लगाया जा सकता है।


एक खानदान है इस देश में जिसके पुरुखों ने हमेशा देश विरोधी कारनामों को ही अंजाम दिया। देश में सांप्रदायिकता कैसे भड़के, देश खण्ड-खण्ड कैसे हो? इसके लिए खूब षड्यंत्र किया। उन आस्तीन के सांपों की पैदाइश भी आज उसी रास्ते पर रेंग रहे हैं। मैं बात कर रहा हूं कश्मीर के अब्दुला खानदान की। शेख अब्दुल्ला और फारूख अब्दुल्ला के शासन काल में कश्मीर की कैसी स्थितियां रही सब वाकिफ हैं, कितने कश्मीरी पंडितों को बलात धर्मातरित किया गया, कितनों को उनके घर से बेघर किया गया सब बखूबी जानते हैं। बताने की जरूरत नहीं।
           इसी खानदान का उमर अब्दुल्ला कहता है कि - ''अफजल (देश का दुश्मन, संसद पर हमला और सुरक्षा में तैनात जवानों का हत्यारा) को फांसी न दो, वरना कश्मीर सुलग उठेगा और लोग विरोध में सड़कों पर उतर आएंगे। मकबूल बट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में जो आग लगी थी। वह अफजल की फांसी के बाद और भड़क उठेगी।" पढ़ें.....
>>>>>बहुत दिनों बाद भारत भक्तों को सुकून मिला जब कांग्रेस के पंजे में दबी अफजल की फाइल बाहर निकली और उसकी फांसी की चर्चाएं तेज होने लगीं। लेकिन, कुछ देशद्रोहियों को यह खबर सुनकर बड़ी पीड़ा हुई। कुछ तो उसे बचाने के लिए मैदान में कूद पड़े हैं और बहुतेरे अभी रणनीति बना रहे हैं, मुझे विश्वास (किसी के विश्वास बरसों में जमा होता है) है वे भी कूदेंगे जरूर।

>>>>>मैं पूछता हूं क्यों उतरेंगे लोग सड़कों पर एक देशद्रोही के लिए ?  क्या यह समझा जाए कि देश के मुसलमान देश के दुश्मनों के साथ हैं?  ये कौम इस तरह की हरकत करके जता देती है कि इन पर विश्वास न किया जाए। अगर इन्हें इस देश के बहुसंख्यकों के दिल में जगह पाना है और विश्वास कायम करना है तो इस तरह की घटनाओं का विरोध करना चाहिए, जैसा कि ये कभी नहीं करते। इन लोगों को तो इस बात के लिए सड़क पर आना चाहिए था कि देश के दुश्मनों (अफजल, कसाब आदि) को फांसी देने में इतनी देर क्यों? इन्हें तुरंत फांसी पर लटकाया जाए, लेकिन नहीं आए। ये लोग तब भी सड़कों पर नहीं उतरे जब पूरी कश्मीर घाटी को हिंदुओं के खून से रंग दिया गया, उन्हें उनकी संपत्ति से बेदखल कर दर-दर की ठोकरें खाने के लिए छोड़ दिया गया। अब तक कश्मीर में करीब २००० से अधिक हिंदुओं की इस्लामी आतंकी हत्या कर चुके हैं। यह दर्द कई लोगों को सालता रहता है। कश्मीर के इस खूनी खेल में अपने पिता को खो चुके बॉलीवुड के संजीदा अभिनेता संजय सूरी ने 'तहलका' के नीना रोले को दिए इंटरव्यू में कुछ इस तरह अपना दर्द बयां किया था- ''१९९० की एक मनहूस सुबह श्रीनगर में मेरे पिता को आतंकवादियों ने गोली मार दी थी। आखिर उनकी गलती क्या थी? यही कि वो कश्मीर में रह रहे एक हिंदू थे।" उन्होंने यह भी कहा कि कश्मीर से हिन्दुओं के पलायन के बाद यहां एक ही धर्म बचा है।

>>>>>क्यों करें इस देश के मुसलमानों पर विश्वास-
रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी अपनी प्रसिद्ध किताब 'संस्कृति के चार अध्याय'  में लिखा है - ''इस देश के मुसलमानों में इस्लाम के मौलिक स्वभाव, गुण और उसके ऐतिहासिक महत्व का ज्ञान बहुत ही छिछला रहा है। भारत में मुसलमानों का अत्याचार इतना भयानक रहा है कि सारे-संसार के इतिहास में उसका कोई जोड़ नहीं मिलता। इन अत्याचारों के कारण हिन्दुओं के हृदय में इस्लाम के प्रति जो घृणा उत्पन्न हुई, उसके निशान अभी तक बाकी हैं?"

जरा इनके व्यवहार पर नजर डालें तो-
अपनी छवि को ठीक करने के लिए देश के मुसलमानों को देशद्रोही घटनाओं में संलिप्त मुसलमानों का तीव्र विरोध करना चाहिए था, लेकिन ये उल्टे काम करते रहे।
- अफजल ने जब संसद पर हमला किया और कसाब ने होटल ताज पर तो ये लोग सड़कों पर विरोध करने नहीं आए, हजारों बेगुनाहों के हत्यारों को मौत की सजा हो ऐसी मांग इन्होंने नहीं की। लेकिन, उन्हें बचाने के लिए ये कश्मीर जला देंगे। (मतलब शेष बचे कश्मीरी पंडितों की हत्या कर देंगे)
- जब कहीं मीलों दूर किसी अखबार में किसी मोहम्मद का कार्टून छपा तो इस कौम ने देश-दुनिया और भारत के हर शहर गली-मोहल्ले में हल्ला मचाया। देश के एक पत्रकार आलोक तोमर ने जब इस कार्टून को छाप दिया तो उन्हें तिहाड़ जेल भेज दिया गया। पढें....  वहीं जब इसी कौम के एक भौंड़े कलाकार एमएफ हुसैन ने हिंदु देवी-देवताओं और भारतमाता का नग्न चित्र बनाया तो ये बिलों में दुबके रहे और हुसैन अपनी करतूतों से बाज नहीं आया, उसे किसी ने जेल नहीं भेजा। उस समय देश के मुसलमान सड़कों पर उतरते तो लाखों दिलों में घर बनाते। ये तो सड़कों पर उतरे भी तो हुसैन की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए।
- एक ओर हिन्दू धर्म के सबसे बड़े धर्मगुरू शंकराचार्य को देश के सबसे बड़े त्योहार दीपोत्सव पर उठाकर सींखचों के पीछे ढकेल दिया वहीं खुले मंच से 'मैं सबसे बड़ा आतंकवादी हूं, मुझे पकड़कर दिखाए कोईÓ कहने वाले का कोई बाल बांका नहीं कर सका।
- बाल ठाकरे की टीका-टिप्पणी से भी नाराजगी जबकि मंत्री पद पर बैठे हाजी याकूब द्वारा किसी की हत्या कर उसका सिर काटकर लाने के आह्वान की भी अनदेखी।
- नरेन्द्र मोदी के शासन में एक बच्चे का अपहरण भी राज्य की दुर्गति का प्रमाणिक उदाहरण, जबकि फारूख अब्दुल्ला के राज में दर्जनों सामूहिक नरसंहारों से भी कोई उद्वेलन नहीं।
- आप ही बताएं क्या इस तरह के दो तरह के व्यवहार से सांप्रदायिक एकता कायम हो सकती है?
- क्या इस तरह की घटनाओं में शामिल रहने पर हिन्दू, मुसलमानों पर भरोसा करें?

मंगलवार, 22 जून 2010

बिहारी बाबू लालू और उनकी लालटेन

ब आप और हम क्या लालूजी को कौन नहीं जानता, अब आप सब लोगों तक ये खबर भी पहुंच ही गई होगी कि लालू के राष्ट्रीय जनतादल (आरजेडी) से राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा और चुनाव चिह्न के छिनने पर खतरा आ गया है। चुनाव आयोग ने इसके लिए लालू को नोटिस जारी किया है और उन्हें सफाई में कुछ कहने के लिए २ जुलाई तक का समय दिया है। पूरी खबर यहां पढें
.....   अब आप सोचो अगर बड़बोले लालू अपनी पार्टी का राष्ट्रीय दर्जा और उससे भी अधिक महत्वपूर्ण चुनाव चिह्न लालटेन नहीं बचा सके तो क्या होगा? लालू ने इसी लालटेन के उजाले में बिहार की भोली-भाली जनता को खूब ch2so4 बनाया है। पिछले लम्बे समय से उनकी लालटेन का तेल चुक गया तो बेचारे अंधेरे में फडफ़ड़ाते रहते हैं, कुछ तो भी बड़बड़ाते रहते हैं। और तो क्या करें भई लालू, मैडम के छोरे (बाबा) ने भी लालू को लाल बत्ती दिखा दी है। सुना है इस बार बाबा की पार्टी उनके दिशा-निर्देश में बिहार में अपने बूते चुनाव लड़ेगी। भई ये सब तो ठीक नहीं है लालू बेचारे तो पहले से ही अंधेरे में जी रहे हैं ऊपर से ये नए लड़के ने और उनकी हवा खराब कर दी है। उनकी लालटेन भी मुसीबत में है और गांधी-नेहरू घराने की पार्टी ने भी उनका साथ छोड़ दिया है। वैसे तो लालू बहुत बड़े तिकड़मी हैं। तिकड़म भिड़ाने में पूरे भारत ही क्या वरन विश्वभर में उनकी कोई सानी नहीं है। जैसे-तैसे करके वो अपनी लालटेन को बुझने नहीं देंगे। वे चुनाव आयोग को भी ch2so4 बना सकते हैं। नहीं बना पाए तो तिकड़म बिठा सकते हैं। वे धन-लाभ के लिए चारा तक खा सकते हैं तो धन-बरसाने वाली कुर्सी को पाने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगे ही। इतना तो पूरे देश की जनता को उन पर भरोसा है।
..........अब अपन रहे गणित के विद्यार्थी तो अपन 'माना कि' का भरपूर उपयोग करते हैं। तो मान लो कि लालू अपनी बुझती (करीब-करीब बुझ ही गई) लालटेन को नहीं बचा पाते तब क्या होगा? ...... क्या लालू का जादू चल पाएगा? ...... क्या लालू बिहार जीत का हार पहन सकेंगे? ..... क्या लालू फिर से लालटेन को पाने के लायक तेल जुटा सकेंगे? ....... कहीं फिर लालू दीपक को तो चुनाव चिह्न नहीं बना लेंगे?  ....नहीं-नहीं इसे नहीं बना सकते ये निशान सेक्यूलर नहीं होगा। ये तो हिन्दू धर्म का पवित्र प्रतीक है। इससे तो लालू के मुस्लिम वोटर रूठ (जो वैसे भी रूठ चुके हैं) जाएंगे। लालू संभवत: इसे चुनाव चिह्न नहीं बनाएंगे। हां चिराग को बना सकते हैं लेकिन उसका जिन्न भी कब का निकल भागा। इससे भी कोई फायदा नहीं।
...........और सोचो...... भला लालू बिना लालटेन के बिहार की उबड़-खाबड़ मार्गों पर चुनाव प्रचार के लिए कैसे निकलेंगे। और निकलेंगे भी तो बिना उजाले के लोगों को कैसे अपने शासन काल का विकास और नीतीश के मुख्यमंत्रित्वकाल में हुए विनाश को दिखाएंगे?
बहुत सवाल हैं भैया! पर जवाब नहीं मिल पा रहे हैं। आप हमारी कोई मदद करो, सॉरी हमारी नहीं उनकी..... कोई अच्छे से सुझाव हों लालू के लिए तो बताइयेगा जरूर... काश बात बन जाए।

सोमवार, 7 जून 2010

ग्वालियर की शान महाराज बाड़े का वैभव खाक

महारानी लक्ष्मीबाई मार्केट हुई राख
महाराजबाड़ा स्थित ऎतिहासिक इमारत में संचालित विक्टोरिया मार्केट शनिवार तड़के लगी भीषण आग से जलकर खाक हो गया। इसमें सवा सौ दुकानों में रखा माल जलकर स्वाहा हो गया। आग बुझाने में 320 वाहन पानी लगा। इस कोशिश में दो सैनिक समेत 4 लोग घायल हो गए। लगभग दस करोड़ रूपए के नुकसान की खबर है।
मैं अधिक कुछ तो नहीं लिख सकता इस मामले पर... बस उस दर्दनाक मंजर को व्यक्त करने के लिए शब्द नहीं मिल रहे। कुछ तस्वीरें हैं मेरे पास जिन्हें मैं पोस्ट कर रहा हूं...... वे उस वीभत्स अग्निकांड का चित्र आपके दिमाग में उपस्थित कर देंगी। बस इतना कहूंगा कि इस इमारत में लगने वाले किताबों के बाजार से किताबें खरीदकर ही मैंने स्कूली और महाविद्यालयीन शिक्षा प्राप्त की। दोस्तों के साथ आते थे किताब खरीदते और बाहर बनी दुकान पर छोले भटूरा खाते थे। वैसे अपना आग से सीधा-सीधा बैर है इसने अपना प्रेरणा स्त्रोत छीना था।
महारानी लक्ष्मीबाई मार्केट (विक्टोरिया मार्केट ) आग की लपटों में

सब कुछ उजाड़ गया... अब क्या करेंगे

सुबह तक उठती रहीं आग की लपटें 

महराज बाड़े का वैभव ख़ाक
उमड़ा जनसैलाब
ग्वालियर का सबसे बड़ा अग्निकांड
ऐतिहासिक महत्व रखने वाली और 150 से अधिक व्यापारियों का घर चलाने वाली विक्टोरिया मार्केट एक चिनगारी से जलकर राख हो गई। यहां अधिकांश दुकानें किताबों और स्टेशनरी के व्यापारियों की थीं।
25-3० - करोड़ तक का नुकसान
1904-05 - में बनी थी विक्टोरिया मार्केट
02 - बजे के लगभग लगी थी आग
रात 10 - बजे तक भी नहीं बुझ पाई आग
352 - गाड़ी पानी फेंका गया
100 -  के करीब दुकानें जलकर खाक हुईं

106 साल पुराना निर्माण
- विक्टोरिया मार्केट का निर्माण 1904 में ग्वालियर के महाराज माधवराव प्रथम ने कराया था।
- 1905 में महारानी विक्टोरिया के भारत आगमन के उपलक्ष्य में इसका नामकरण विक्टोरिया मेमोरियल किया गया।
- सन् 1905 में ग्वालियर का पहला मेला भी इसी मार्केट में लगा।
- विक्टोरिया मार्केट, टाउनहॉल, रीजनल प्रेस, निगम मुख्यालय, पोस्ट ऑफिस बिल्डिंग के आर्किटेक्ट बलवंत भैया थे

- सन् 1911 में संपूर्ण महाराजबाड़े का सौंदर्यीकरण पूर्ण किया जा सका।
- इसके बाद जीवाजी राव की प्रतिमा स्थापित की गई।
- विक्टोरिया मार्केट की स्थापत्य कला इंडो-ब्रिटिश श्ौली की थी।

मंगलवार, 1 जून 2010

उफ! कोई इन्हें भी फांसी दे दे

या तो हमारी सरकार का खून सूख गया है या फिर उसकी नक्सलियों से कोई गुप्त संधि है। वरना इतने बेगुनाहों का खून सड़कों पर, रेल की पटरियों पर और छोटे से घर के बाहर बने नाले में बहते देख सरकार का हृदय पिघलता जरूर। वह सिर्फ बातें नहीं करती, कुछ कड़े कदम भी उठाती। हाल ही की तीन बड़ी घटनाओं ने पूरे देश को हिला कर रख दिया है। और उन निरीह गरीबों की तो जान कलेजे में हैं जहां नक्सलियों की सरकार खुल के चलती है। जिसकी चाहे जान ले लेते हैं, चाहे जिस बच्चे को उठाकर ले जाते हैं उसके निश्छल मन में अपनी ही मिट्टी और अपने ही लोगों के खिलाफ बैर भर देते हैं। पिछले दिनों मामला सामने आया था कि एक लड़की ने नक्सलियों की शैतानी सेना में शामिल होने से इनकार किया तो इन्हीं नक्सलियों ने उसके साथ सामूहिक बलात्कार किया। सात-आठ माह पुरानी घटना है किसी व्यक्ति के समूल परिवार (जिसमें मासूम दूध पीते बच्चे भी शामिल थे) को झौंपड़े के अंदर बंद कर आग से जला दिया। कारण बताया कि उस परिवार के एक व्यक्ति ने उनकी मुखबरी की थी। माना की भी हो तो उन मासूमों का क्या दोष था जो अभी अपनी मां को मां और पिता को बाप भी नहीं कहना सीख पाए थे। और दंतेवाड़ा में ७० जवान की हत्या, उसके बाद बस में विस्फोट कर ३५ लोगों की जान ली और अब रेल को खून से लाल करके करीब सवा सौ लोगों की जिंदगी छीन ली। माफ करना सवा सौ लोगों की जिंदगी नहीं संख्या और अधिक है। उनकी भी मौत हुई है जो इनसे प्रेम करते थे, जो इन पर आश्रित थे। 
कौन है नक्सली- 'नक्सलियों  का अर्थ में उन लोगों से लगाता हूं 'जिनकी नस्ल खराब हो गई है।  इनका कहना है कि इन्होंने हथियार गरीब और वंचितों के लिए उठाए हैं (शायद उन्हें जान से मारने के लिए)। लेकिन हकीकत यह है कि ये डाकू हैं, लुटेरे हैं, लूट-लूट के खाना पसंद करते हैं। यदि किसी ने इनकी बात नहीं मानी तो वो चाहे गरीब ही क्यों न हो वे उसे मार डालते हैं, इतना ही नहीं उसके परिवार का समूल नाश भी करने से नहीं चूकते। ये नहीं चाहते कि पिछड़े क्षेत्रों में विकास हो। तभी रेल की पटरियां उखाड़ते हैं, सड़कें खोदते हैं, स्कूल भवन को बम से उडाते हैं। इतना ही नहीं कहीं उन गरीबों के बच्चे पढ़-लिख कर समझदार न हो जाएं (हो गए तो इनके खिलाफ आवाज बुलंद करेंगे) इसलिए ये बच्चों को पढ़ाने आने वाले मास्टर को ही उठवा लेते हैं और क्रूरता से उसकी हत्या कर देते हैं। इन्हें ही कहते हैं हम नक्सली।
इनके पैरोकार- इस देश में सब तरह के लोग हैं। आंतकवादी का सम्मान करने वालों से लेकर इन खूनी दरिंदों के लिए चिल्ला-चिल्लाकर गला और लिख-लिखकर कलम की स्याही सुखाने वाले भी। ये ऐसे इसलिए कर पाते हैं क्योंकि इनके भीतर की भी मानवीय संवेदनाएं मर गईं हैं। साथ ेमें इस देश के प्रति प्यार भी नहीं बचा। और कभी नक्सलियों ने इनके घरों के दुधमुहें बच्चों को गोली नहीं मारी, वरना ये तथाकथित सेक्यूलर ऐसा कभी नहीं कह पाते।
सरकार जाग जाए वरना..... अब हद हो चुकी है। जनता और नहीं सहेगी। जनता खून से भरे गले से रो-रोकर कह रही है कोई है जो इन दुष्टों को भी फांसी देगा, कोई है जो इन्हें भी बुलेट को जबाव बुलेट से देगा। अगर सरकार ने नक्सलियों को खत्म करने के लिए हथियार नहीं उठाए तो मजबूरन भोली जनता को ये कदम उठाना पड़ेगा। और जब जनता उठाएगी तो फिर सरकार को भी नहीं छोड़ेगी। क्योंकि वे भोले मानुष सरकार से भी त्रस्त हैं। पंजाब में उग्रवाद का खात्मा करने के लिए जैसे कठोर निर्णय लेने पड़े थे वैसे ही खूनी हो चुके नक्सलवाद को खत्म करने के लिए लेने होंगे।

पंचू पंच- पंचू से किसी ने कहा कि मप्र में भी नक्सलवादियों की आहट हो गई है। वे तेरे गांव व शहर में भी आ सकते हैं। तब उसने क्या कहा सुन लें..........
'आने तो देओ वाये... ससुर के नाती को मूड़ (सिर) लठिया से फोर-फोर के लाल कर दंगो... मेरे गांम के एकऊ मोड़ा-मोड़ा (लड़का-लड़की) को हाथ लगायो तो सारे के हाथ कुलाई (कुल्हाड़ी) से काट दुंगो। आए तो सही न पनारे (घर से निकली नाली) में उल्टो करके गाप देंगो।

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