सोमवार, 20 सितंबर 2010

रैन, रिले और रिश्ते

क्वींस बैटन रिले का सम्मान भी और विरोध भी
फिर दिखी सांप्रदायिक एकता की झलक मेरे शहर में
 १९  सितंबर खास रहा ग्वालियर के लिए। एक तो १९ वें कॉमनवेल्थ गेम्स की क्वींस बैटन रिले का आगमन था। जाते-जाते बदरा इतना बरसे की शहर का हर जर्रा भीग गया। इक और खास और अति महत्वपूर्ण घटनाक्रम रहा उदारवादी मुसलमानों का सही बात के लिए आगे आना।
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क्वींस बैटन रिले का विरोध करते लोग।
शनिवार-रविवार दरमियानी रात से ही शहर में बादलों ने नेमत बरसानी शुरू कर दी। जो अभी यानी रविवार-सोमवार की रात १:२६ मिनट पर भी जारी है। मानसून बीत गया। पहली बार बरसाती (रैनकोट) पहनकर दफ्तर आना पड़ा। इसी झमाझम बारिस में शाम के वक्त क्वींस बैटन रिले का आगमन हुआ। जिसकी शहरभर में परिक्रमा कराई गई। नतीजतन जगह-जगह जाम लगा। लोगों को खामख्वाह परेशानी उठानी पड़ी। घुटनों तक पानी से भरी सड़क पर जाम खुलने का इंतजार किया। जगह-जगह शहर की विभिन्न संस्थाओं ने बैटन रिले का स्वागत किया। वहीं एक ओर एक सामाजिक संस्था ने वीरागंना महारानी लक्ष्मीबाई समाधी के सामने बैटन रिले का विरोध किया। उसे गुलामी का प्रतीक माना। कुल मिला कर बैटन रिले की अच्छी झांकी जम गई। हां एक और बात बताते हैं जहां प्रदेश के मुखिया शिवराज चौहान ने बैटन रिले को थामने से इनकार कर दिया। वहीं उनकी पार्टी की ग्वालियर महापौर समीक्षा गुप्ता और क्षेत्रीय सांसद यशोधरा राजे सिंधिया ने शहर में इसकी आगवानी की।
यूं ही कायम होंगे मीठे रिश्ते
शांति की अपील के लिए आगे आए मुस्लिम।
  दूसरी बात पर आते हैं जो इस समय बहुत महत्वपूर्ण है। २४ सितंबर को अयोध्या राम जन्मभूमि का फैसला आना है। दोनों पक्षों (हिन्दू-मुसलमान) को बड़ी बेसब्री से इसका इंतजार है। जरा-सी चिंगारी धार्मिक भावनाएं भड़का सकती है। यह जानकर सभी लोग शांति की कामना लेकर आगे आ रहे हैं। दोपहर में एक टीवी चैनल पर बहस देख रहा था। वहां भी दोनों पक्षों के बड़े नेता धैर्य से काम लेने की बात करते दिखे। उन्होंने भी लोगों से शांति की अपील की। मेरे शहर के मुसलमान बंधुओं ने भी एक मिशाल कायम करने की कोशिश की। वे हाथ में बैनर-पोस्टर लेकर शहर में निकले। जिन पर लिखा था- हम अमन चाहते हैं। बहुत अच्छा लगा, देखकर। मैं अक्सर कहता भी रहता हूं कि अच्छी बात कहने के लिए जो उदारवादी मुसलमान हैं उन्हें आगे आना होगा। अक्सर होता यह है कि कट्टरवादी सोच के मुस्लिम उन्हें पीछे छोड़ देते हैं या उनकी आवाज का गला घोंट देते हैं। जिससे मुस्लिम समुदाय के सकारात्मक लोगों का पक्ष सामने नहीं आ पाता। आज जो हुआ यह एक अच्छी पहल है। इससे पहले भी मैं एक बार सांप्रदायिक एकता की मिशाल अपने शहर में देख चुका हूं। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का दशहरे पर प्रतिवर्ष पथ संचलन निकलता है। जिसका जगह-जगह लोग फूल बरसा कर स्वागत करते हैं। बीते वर्ष मैंने देखा कि एक-दो मुस्लिम गुट भी पथ संचलन के स्वागत के लिए आगे आए। उपनगर ग्वालियर में संघ की एक शाखा पर कुछ मुस्लिम बालक और  युवा भी आते रहे हैं। इन बातों से यह मत सोचना कि मेरे शहर में कट्टर मानसिकता के मुसलमान नहीं रहते। वे भी बड़ी संख्या में रहते हैं। एक-दो बार पाकिस्तान के लिए जासूसी करते भी धरे गए हैं तो कुछ बस्तियों में  पाकिस्तान के जीतने पर आतिशबाजी भी करते हैं। मैं आज इसीलिए खुश हूं कि उनको पीछे धकिया कर उदारवादी और सच्चा मुसलमान अब आगे आ रहा है।

4 टिप्‍पणियां:

  1. लोकेन्द्र जी अपने बहुत अच्छा लेख लिखा है आप हमें एक अच्छे साहित्यकार लगे आपने अपनी बात को ठीक प्रकार से रखी है .जहा तक मुसलमानों की बात है वास्तविकता यह है की यदि वे ख़ुशी क़ा जुलुश निकलते है तो भी या दुःख क़ा निकलते है तो भी वे आक्रान्ता क़े समान आतंक मचाना उनके स्वभाव में ही है ,हा यदि हिन्दू मजबूती से खड़ा रहा तो दंगे बच सकते है उनके स्वभाव में परिवर्तन करना बहुत मुस्किल है.
    अच्छे बिचार क़े लिए धन्यवाद.

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  2. हमको उम्मीद नहीं छोड़ना चाहिए... वह सुबह कभी तो आएगी...राष्ट्रीयता का जज़्बा दबाने से नहीं दबने वाला, एही उम्मीद करना चाहिए!!

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  3. उमीद पर दुनिया कायम है .... आशा वादी होना हमारा कर्तव्य है .....

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  4. Ji main aap ki baaton se sehmat hun. dekh te hain aane wala waqt kya dikha ta hain?

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