मंगलवार, 12 जनवरी 2010

किधर जा रहा है युवा.....

युवा दिवस पर विशेष
- विश्व के अधिकांश देशों में कोई न कोई दिन युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयन्ती , अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् 1985 ई. को अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८५ से 12 जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयन्ती का दिन राष्ट्रीय युवा दिन के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए।

इस सन्दर्भ में भारत सरकार का विचार था कि -

ऐसा अनुभव हुआ कि स्वामी जी का दर्शन एवं स्वामी जी के जीवन तथा कार्य के पश्चात निहित उनका आदर्श—यही भारतीय युवकों के लिए प्रेरणा का बहुत बड़ा स्रोत हो सकता है।


कल रात से सोच रहा था क्या लिखूं युवा दिवस पर युवाओं के पक्ष में या विपक्ष में? वैसे जो भी लिखने जा रहा हूं वो पक्ष में ही है।
सब ओर से आवाज आ रही है इस देश की बागडोर युवाओं को सौंप दो। इस क्षेत्र में युवाओं ने झंडा बुलंद किया। इस फील्ड में भी युवाओं ने अपने आप को साबित कर दिया है। यह सब सच है। और होगा भी क्यों नहीं, युवाओं में दम है, जोश है, उत्साह है, उमंग है और उनकी शिराओं में गर्म रक्त भी बह रहा है। लेकिन, क्या हम अपने आस-पास कभी गौर से देखते हैं। देखो क्या वाकई युवाओं के दम पर इस देश और समाज में उच्च बदलाव लाए जा सकते हैं। मैं खुद एक युवा हूं। लेकिन फिर भी मैं हमेशा से युवाओं की इस वकालत पर उंगली उठाता रहा हूं। असल में जिन युवाओं पर गर्व कर रहे हैं वो चंद उंगलियों पर गिनने लायक हैं। देश का अधिकांश युवा तो अंधे गर्त की ओर जा रहा है। महानगरों की तो बात ही क्या करना। मैं जिस शहर में रहता हूं वह महानगर और नगर के बीच की कड़ी है। यहां के युवाओं की वस्तुस्थिति देखकर ही मैं सोच में रहता हूं। स्वामी विवेकानंद को पूरे भारत भ्रमण और विश्व भ्रमण के बाद वो १०० युवा नहीं मिल पाए जिनके दम पर पूज्य श्री स्वामी जी भारत का विश्वशक्ति बनाने की बात करते थे। कारण एक ही है जो युवा प्रतिभा हैं भी वो सीमित दायरे तक सोचती हैं। खुद के बारे में और बहुत अधिक तो अपने माता-पिता के बारे में इससे ऊपर उनकी सोच ही नहीं उठ रही है। मेरे ग्वालियर शहर के युवा ही विभिन्न व्यसनों में आकंठ डूब चुके हैं। शराब, चरस, गांजा, अफीम आदि नशीले पदार्थों की गिरफ्त में वह आ चुका है। इसी सब की पूर्ति के लिए वह अपराध की ओर अग्रसर हो रहा है। चैन झपटने की सबसे अधिक वारदात युवा ही अंजाम दे रहे हैं। कारण एक ही है अपने मंहगे और व्यर्थ के शौक पूरे करने के लिए। मैली-संस्कृति को वह अपनी आदर्श जीवन शैली समझने लगा है। वह दिन-ब-दिन इसमें गहरा और गहरा घुसता जा रहा है। इन सबके पीछे बहुत से कारण हैं। एकल परिवार उनमें सबसे बड़ा कारण है उससे ही जुड़े अन्य कारण हैं। माता-पिता को यह नहीं पता होता कि उनके बच्चे टीवी पर क्या देख रहे हैं, देर रात तक क्या और किस से बात कर रहे हैं, किस तरह की किताबें पढ़ रहे हैं? यह बात भी सही है कि क्या मां-पिता अपने बच्चों के पीछे जासूस की तरह घूमें। बच्चों को खुद सोचना चाहिए कि उनके माता-पिता ने कितनी मेहनत से रुपया पैसा कमाकर उन्हें सुविधाएं उपलब्ध कराईं हैं। पढऩे और आगे बढऩे के लिए अवसर उपलब्ध कराया है। लेकिन, दुर्भाग्य वह इस चमक-दमक के युग में यह सब नहीं सोचता। अपनी आजादी और उपलब्ध संसाधनों का भयंकर दुरुपयोग करता है। अपनी मटर गस्ती में मूल्यवान समय और अपने परिजनों के विश्वास पर कालिख पोतता रहता है।
विश्व की सबसे बड़ी शक्ति इस समय युवा ही है और सौभाग्य से वह हमारे देश के पास है। लेकिन, बुरी हालत में। उसे जागना होगा। स्वामी विवेकानंद के उस वाक्य को याद करके बुराईयों को दूर करके खड़े होकर हुकांर भरनी होगी। याद करो - उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल को न प्राप्त कर लो!

1 टिप्पणी:

  1. उठो, जागो और तब तक न रुको जब तक मंजिल को न प्राप्त कर लो!-यही नारा याद रखना!!

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